परिचय
भारतीय अर्थव्यवस्था में भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) द्वारा जारी मौद्रिक नीति के संकेत एक निर्देशक सूचक का कार्य करते हैं- ये संकेत न केवल घरेलू ब्याज दरों और तरलता को प्रभावित करते हैं बल्कि रुपये की विनिमय दर पर भी गहरा असर डालते हैं – मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठकों के परिणाम और गवर्नर के बयान वैश्विक निवेशकों द्वारा बारीकी से देखे जाते हैं- जो रुपये की मांग और आपूर्ति को तत्काल प्रभावित करते हैं- यह अंतर्संबंध यूपीएससी अभ्यर्थियों के लिए अर्थव्यवस्था के खुलेपन और वित्तीय स्थिरता को समझने का एक महत्वपूर्ण पहलू है –
अर्थ एवं परिभाषा
मौद्रिक नीति से तात्पर्य केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों- धन आपूर्ति और ऋण की उपलब्धता जैसे मापदंडों को विनियमित करने की प्रक्रिया से है- जिसका प्राथमिक लक्ष्य मूल्य स्थिरता कायम रखते हुए विकास को सहयोग देना है – इस संदर्भ में ‘मौद्रिक नीति संकेत’ वे औपचारिक व अनौपचारिक संदेश हैं जो आरबीआई भविष्य की नीतिगत दिशा के बारे में बाजार को देता है- ‘रुपया-बाज़ार की प्रतिक्रिया’ इन संकेतों के जवाब में विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की विनिमय दर में होने वाले उतार-चढ़ाव को दर्शाती है –
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना 1935 में आरबीआई अधिनियम- 1934 के तहत हुई थी और 1949 में इसका राष्ट्रीयकरण किया गया – प्रारंभ में इसका ध्यान बैंकनोट जारी करना और मौद्रिक स्थिरता पर था- समय के साथ इसकी भूमिका में विस्तार हुआ और विदेशी मुद्रा प्रबंधन इसका एक प्रमुख कार्य बन गया – मई 2016 में आरबीआई अधिनियम में लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढांचे को अपनाया गया- जिसने मौद्रिक नीति को एक स्पष्ट लक्ष्य (सीपीआई मुद्रास्फीति 4 प्रतिशत -/- 2 प्रतिशत) दिया – इस ढांचे ने मौद्रिक नीति संकेतों के महत्व और बाजार पर उनकी प्रतिक्रिया को और बढ़ा दिया है-
मौद्रिक नीति संकेतों के प्रमुख साधन एवं विशेषताएं

आरबीआई मौद्रिक नीति संकेत देने के लिए मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों प्रकार के साधनों का उपयोग करता है –
मुख्य नीतिगत दरें
- रेपो दर– यह वह दर है जिस पर आरबीआई बैंकों को अल्पकालिक तरलता प्रदान करता है- इस दर में परिवर्तन उधार लागत को प्रभावित करता है और रुपये पर दबाव डाल सकता है –
- रिवर्स रेपो दर– यह वह दर है जिस पर आरबीआई बैंकों से अतिरिक्त तरलता अवशोषित करता है-
- वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) और नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर)– ये अनुपात बैंकिंग प्रणाली में तरलता को नियंत्रित करते हैं और संसाधनों की उपलब्धता को प्रभावित करते हैं –
अन्य महत्वपूर्ण साधन
- खुले बाजार परिचालन (ओएमओ)– सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद-बिक्री के माध्यम से तरलता का प्रबंधन –
- बाजार स्थिरीकरण योजना (एमएसएस)– अतिरिक्त तरलता को अवशोषित करने के लिए विशेष बॉण्ड जारी करना –
- नैतिक अनुनय– बैंकों से विशिष्ट नीतिगत दिशा में कार्य करने का अनुरोध –
- मौद्रिक नीति रुख– यह बयानबाजी (जैसे- ‘तटस्थ’- ‘आवासीय’ या ‘हटाव’) भविष्य की कार्रवाई की संभावना का एक शक्तिशाली संकेत है –
रुपये पर प्रभाव के कारण
मौद्रिक नीति के संकेत सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से रुपये को प्रभावित करते हैं –
पोर्टफोलियो निवेश का प्रवाह
- रेपो दर में वृद्धि या एक हठीले रुख से घरेलकरल ब्याज दरों में वृद्धि का संकेत मिलता है- इससे विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफपीआई) को भारतीय बॉन्ड और इक्विटी बाजार में आकर्षित किया जा सकता है- डॉलर की आमद बढ़ने से रुपया मजबूत होता है-
- इसके विपरीत- दर में कटौती या नरम रुख एफपीआई के बहिर्वाह को प्रेरित कर सकता है- जिससे रुपये पर गिरावट का दबाव बन सकता है-
व्यापारिक निर्णय
- आयातक और निर्यातक मौद्रिक नीति के संकेतों के आधार पर भविष्य की विनिमय दर की दिशा का अनुमान लगाते हैं और अपने विदेशी मुद्रा लेनदेन की योजना बनाते हैं- जो अल्पकाल में रुपये की मांग और आपूर्ति को प्रभावित करते हैं-
वैश्विक सापेक्षता
- निवेशक अन्य प्रमुख केंद्रीय बैंकों (जैसे अमेरिकी फेड) की नीतियों के सापेक्ष में आरबीआई की नीति की तुलना करते हैं- यदि आरबीआई की नीति अपेक्षाकृत अधिक ‘हॉकिश’ (कड़ी) है तो यह रुपये के लिए सहायक हो सकती है-
लाभ एवं चुनौतियां
लाभ
- पारदर्शिता एवं निश्चितता– स्पष्ट संकेत बाजार में अनावश्यक उतार-चाढ़ाव और अटकलबाजी को कम करते हैं –
- निवेश को प्रोत्साहन– एक स्थिर और अनुमानित मौद्रिक नीति वातावरण दीर्घकालिक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) को आकर्षित करने में मदद करता है –
- मुद्रास्फीति नियंत्रण– स्थिर विनिमय दर आयातित मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद करती है- जो मौद्रिक नीति का प्राथमिक लक्ष्य है –
चुनौतियां
- वैश्विक स्पिलओवर का प्रबंधन– प्रमुख केंद्रीय बैंकों की नीतियों में बदलाव रुपये पर अप्रत्याशित दबाव डाल सकते हैं- जिससे घरेलकरल नीतिगत संकेतों का प्रभाव कम हो सकता है –
- विकास बनाम स्थिरता– रुपये की स्थिरता बनाए रखने के लिए कभी-कभी दरों में बदलाव की गति को सीमित करना पड़ सकता है- भले ही घरेलकरल विकास को प्रोत्साहन की आवश्यकता हो –
- अटकलबाजी का जोखिम– संकेतों की अत्यधिक व्याख्या अल्पकालिक सट्टा पूंजी प्रवाह को बढ़ावा दे सकती है- जो वित्तीय अस्थिरता का कारण बन सकती है-
संबंधित मुद्दे एवं आलोचनाएं
- समयबद्धता का मुद्दा– मौद्रिक नीति के प्रभाव अर्थव्यवस्था में देरी से पहुंचते हैं- इस कारण कभी-कभी नीतिगत संकेत वास्तविक समय की बाजार स्थितियों से मेल नहीं खाते –
- व्यापारिक तनाव का प्रभाव– वैश्विक व्यापारिक तनाव और भू-राजनीतिक घटनाएं रुपये पर अचानक दबाव डाल सकती हैं- जो आरबीआई के संकेतों के प्रभाव को कम कर देती हैं –
- वास्तविक विनिमय दर बनाम नाममात्र दर– आलोचक कहते हैं कि नीतिगत संकेत अक्सर नाममात्र विनिमय दर पर केंद्रित होते हैं- जबकि व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के लिए वास्तविक- मुद्रास्फीति-समायोजित विनिमय दर अधिक महत्वपूर्ण है-
सरकार एवं आरबीआई की पहल
- लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढांचा– यह ढांचा मुद्रास्फीति को 2 से 6 प्रतिशत के बीच रखने के लिए आरबीआई को जवाबदेह बनाता है- जिससे नीतिगत संकेत अधिक अनुमानित होते हैं –
- विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप– आरबीआई अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है- यह हस्तक्षेप स्वयं एक महत्वपूर्ण नीतिगत संकेत है –
- जीएसटी सुधार– जीएसटी दरों के युक्तिसंगतकरण जैसे संरचनात्मक सुधार मुद्रास्फीति को कम करके आरबीआई को नीतिगत दरों में लचीलापन देते हैं- जिसका रुपये पर सकारात्मक असर होता है –
- भारतीय रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण पर जोर– अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में रुपये के उपयोग को बढ़ावा देने से विनिमय दर पर निर्भरता कम होती है-
यूपीएससी मेन्स के लिए नोट्स
- मौद्रिक नीति संचरण तंत्र में विनिमय दर चैनल एक महत्वपूर्ण लिंक है –
- आरबीआई का तटस्थ रुख विकास और मुद्रास्फीति के बीच संतुलन बनाने की रणनीति को दर्शाता है –
- विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन केवल संख्याओं का खेल नहीं है- यह बाजार को स्थिरता का संकेत देने का एक साधन है –
- मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की संस्थागत संरचना ने नीति निर्माण को अधिक समावेशी और डेटा-चालित बनाया है –
- भारत का संकुचित चालू खाता घाटा और मजबूत सेवा निर्यात रुपये के लिए एक मौलिक सहायता प्रदान करते हैं –
प्रारंभिक परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना 1 अप्रैल- 1935 को हुई और 1949 में इसका राष्ट्रीयकरण हुआ –
- मौद्रिक नीति का प्राथमिक लक्ष्य विकास के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखना है –
- वर्तमान मुद्रास्फीति लक्ष्य सीपीआई पर आधारित 4 प्रतिशत -/- 2 प्रतिशत है –
- रेपो दर- रिवर्स रेपो दर- सीआरआर- एसएलआर और ओएमओ मौद्रिक नीति के प्रमुख साधन हैं –
- एमएसएफ दर रेपो दर से अधिक होती है और यह ब्याज दर गलियारे की ऊपरी सीमा तय करती है –
- भारतीय रुपया विदेशी मुद्रा बाजार में एक प्रबंधित अस्थायी व्यवस्था के तहत चलता है-
- मौद्रिक नीति समिति में 6 सदस्य होते हैं- जिनमें 3 आरबीआई से और 3 बाहरी विशेषज्ञ होते हैं –
- विदेशी मुद्रा भंडार का संरक्षक होना आरबीआई का एक प्रमुख कार्य है –
उदाहरण एवं केस स्टडी
अप्रैल 2025 की मौद्रिक नीति– अप्रैल 2025 में आरबीआई ने रेपो दर में 25 आधार अंकों की कटौती कर इसे 6 प्रतिशत कर दिया- इस नीतिगत नरमी का उद्देश्य वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच विकास को सहयोग देना था – इस घोषणा के बाद रुपये पर तत्काल दबाव देखा गया- क्योंकि दरों में कमी से एफपीआई प्रवाह कम होने की आशंका बढ़ी- हालांकि- आरबीआई द्वारा मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और तटस्थ रुख का आश्वासन देने से बाजार स्थिर हुआ- यह केस स्टडी दर्शाती है कि कैसे दर परिवर्तन और नीतिगत रुख का संयोजन अंतिम बाजार प्रतिक्रिया को आकार देता है –
मेन्स उत्तर लेखन का दृष्टिकोण
मेन्स परीक्षा में इस विषय पर प्रश्न विश्लेषणात्मक हो सकते हैं- जैसे- “मौद्रिक नीति के संकेत विदेशी मुद्रा बाजार को कैसे प्रभावित करते हैं- आरबीआई इस अंतर्संबंध का प्रबंधन करते हुए अपने मूल्य स्थिरता के जनादेश को कैसे पूरा करता है-” उत्तर लिखते समय निम्नलिखित बिंदुओं को शामिल करें
- मौद्रिक नीति संचरण के विनिमय दर चैनल की व्याख्या करें-
- रुपये की अस्थिरता से आयातित मुद्रास्फीति और निर्यात प्रतिस्पर्धा पर पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा करें-
- मौद्रिक नीति की स्वायत्तता बनाए रखने में पूंजी प्रवाह प्रबंधन उपायों (जैसे- एफसीआरए) की भूमिका स्पष्ट करें-
- हाल के नीतिगत निर्णयों (जैसे- रुख में बदलाव) और उनके बाजार प्रभाव के उदाहरण दें –
- वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए आरबीआई के संशोधित जीडीपी और मुद्रास्फीति पूर्वानुमान का उल्लेख करते हुए निष्कर्ष दें –
यूपीएससी पिछले वर्षों के प्रश्न
- 2023– मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की संरचना और कार्यों पर एक टिप्पणी लिखिए- मुद्रास्फीति पर नियंत्रण में इसकी भूमिका का विश्लेषण कीजिए-
- 2022– विनिमय दर अस्थिरता भारतीय अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करती है- स्थिरता बनाए रखने में भारतीय रिज़र्व बैंक की भूमिका की विवेचना कीजिए-
यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा एमसीक्यू अभ्यास
- मौद्रिक नीति का प्राथमिक लक्ष्य क्या है-
(क) राजकोषीय घाटे को कम करना
(ख) विकास को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखना
(ग) बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना
(घ) शेयर बाजार को विनियमित करना
उत्तर- (ख) - वह दर जिस पर आरबीआई बैंकों से अल्पकालिक अतिरिक्त तरलता अवशोषित करता है- कहलाती है-
(क) रेपो दर
(ख) बैंक दर
(ग) रिवर्स रेपो दर
(घ) एमएसएफ दर
उत्तर- (ग) - मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के संबंध में कौन सा कथन सही है-
(क) इसमें केवल आरबीआई के अधिकारी होते हैं-
(ख) इसकी सिफारिशें सरकार के लिए बाध्यकारी हैं-
(ग) यह ब्याज दर निर्धारित करती है और मौद्रिक नीति का रुख तय करती है-
(घ) इसकी बैठक वर्ष में केवल दो बार होती है-
उत्तर- (ग) - भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का संरक्षक कौन है-
(क) वित्त मंत्रालय
(ख) भारतीय रिज़र्व बैंक
(ग) भारतीय स्टेट बैंक
(घ) सेबी
उत्तर- (ख) - लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढांचे के तहत मुद्रास्फीति की लक्ष्य सीमा क्या है-
(क) 3 प्रतिशत -/- 1 प्रतिशत
(ख) 4 प्रतिशत -/- 2 प्रतिशत
(ग) 5 प्रतिशत -/- 3 प्रतिशत
(घ) 6 प्रतिशत -/- 4 प्रतिशत
उत्तर- (ख)
निष्कर्ष
रिज़र्व बैंक के मौद्रिक नीति संकेत और रुपया-बाज़ार की उन पर प्रतिक्रिया भारतीय अर्थव्यवस्था के खुलेपन का एक स्पष्ट प्रमाण है- आरबीआई का कार्य केवल रेपो दर तय करना नहीं बल्कि बाजार की अपेक्षाओं का सूक्ष्म प्रबंधन करना भी है- मौद्रिक नीति समिति की संरचना और मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण जैसे संस्थागत सुधारों ने इस प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाया है – भविष्य में- वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच- आरबीआई की चुनौती घरेलकरल स्थिरता के लक्ष्यों को प्राप्त करते हुए रुपये की अस्थिरता को प्रबंधित करने की रहने वाली है- यह संतुलन अधिनियम भारत की वित्तीय परिपक्वता की कसौटी साबित होगा –
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1- मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) क्या है और यह कैसे काम करती है-
एमपीसी आरबीआई अधिनियम में हुए एक संशोधन के बाद गठित छह सदस्यीय समिति है- जिसमें तीन आरबीआई अधिकारी और तीन बाहरी विशेषज्ञ शामिल हैं- यह समिति हर दो महीने में बैठक करके नीतिगत रेपो दर और मौद्रिक नीति के रुख का निर्धारण करती है- इसका लक्ष्य मुद्रास्फीति को 2 से 6 प्रतिशत के दायरे में रखना है –
2- रेपो दर में बदलाव का सीधा असर रुपये की विनिमय दर पर क्यों पड़ता है-
रेपो दर में बढ़ोतरी से घरेलकरल परिसंपत्तियों पर प्रतिफल बढ़ता है- जो विदेशी निवेशकों को आकर्षित करता है- उन्हें भारतीय परिसंपत्तियाँ खरीदने के लिए रुपये की आवश्यकता होती है- जिससे रुपये की मांग और मूल्य बढ़ता है- इसके विपरीत- दर में कमी से प्रतिफल कम हो सकता है और पूंजी बहिर्वाह से रुपये पर दबाव पड़ सकता है –
3- आरबीआई ‘तटस्थ’ रुख अपनाने का क्या अर्थ है-
तटस्थ रुख का अर्थ है कि आरबीआई भविष्य में नीतिगत दरों को बढ़ाने या घटाने के लिए खुला है- यह विकास और मुद्रास्फीति के बीच संतुलन बनाए रखने तथा उभरते आर्थिक आंकड़ों पर निर्भर रहने की नीति को दर्शाता है- यह बाजार को अस्थिर करने वाली अटकलबाजी को कम करने का एक संकेत है –
4- विदेशी मुद्रा भंडार का रुपये की स्थिरता से क्या संबंध है-
विदेशी मुद्रा भंडार आरबीआई को विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करने की क्षमता देता है- यदि रुपया बहुत तेजी से गिर रहा है तो आरबीआई डॉलर बेचकर रुपये की आपूर्ति कम कर सकता है और इसके मूल्य को सहारा दे सकता है- पर्याप्त भंडार बाजार को स्थिरता का आश्वासन देता है –
5- क्या मौद्रिक नीति अकेले रुपये के मूल्य को निर्धारित कर सकती है-
नहीं- मौद्रिक नीति एक प्रमुख कारक है- लेकिन रुपये का मूल्य कई अन्य कारकों से भी प्रभावित होता है- जैसे वैश्विक डॉलर की मजबूती- कच्चे तेल की कीमतें- चालू खाता घाटा- भू-राजनीतिक घटनाएं और वैश्विक जोखिम की भावना- आरबीआई का कार्य इन सभी चरों के बीच संतुलन बनाना है –
