Table of Contents

1. प्रस्तावना (Introduction)

Fundamental Rights (मौलिक अधिकार) भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला और संविधान की अंतरात्मा हैं। एक सिविल सेवक (Civil Servant) के रूप में, आपके लिए यह समझना अनिवार्य है कि संविधान राज्य की असीमित शक्ति और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे स्थापित करता है। मौलिक अधिकार वे अधिकार हैं जो व्यक्ति के भौतिक, बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास के लिए अनिवार्य हैं।

UPSC की परीक्षा प्रणाली में, चाहे वह प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) हो या मुख्य परीक्षा (Mains), इस अध्याय का वेटेज सर्वाधिक है। यह अध्याय केवल एक कानूनी सूची नहीं है, बल्कि यह ‘कानून के शासन’ (Rule of Law) को स्थापित करने का एक उपकरण है। जहाँ एक ओर यह राज्य को तानाशाही से रोकता है, वहीं दूसरी ओर यह नागरिकों को गरिमापूर्ण जीवन की गारंटी देता है।

fundamental rights

UPSC Syllabus Mapping:

  • GS Paper 2: भारतीय संविधान – ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएं, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।
  • GS Paper 4 (Ethics): मानवीय मूल्य, अधिकार और कर्तव्य, शासन में नैतिक चिंताएं।

2. संकल्पना और मुख्य विशेषताएं (Concept & Core Understanding)

Fundamental Rights को ‘मौलिक’ कहने के दो मुख्य कारण हैं:

  1. इन्हें देश के सर्वोच्च कानून (संविधान) द्वारा सुरक्षा और गारंटी प्रदान की गई है।
  2. ये व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए अपरिहार्य हैं।

प्रमुख विशेषताएं (Key Features for Prelims Statement)

  1. न्यायोचित प्रकृति (Justiciable): इनके उल्लंघन पर नागरिक सीधे सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32) या उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226) जा सकता है।
  2. असीमित नहीं (Not Absolute): ये अधिकार आत्यंतिक (Absolute) नहीं हैं, बल्कि अयोग्य (Qualified) हैं। राज्य इन पर ‘युक्तियुक्त निर्बंधन’ (Reasonable Restrictions) लगा सकता है।
  3. राज्य के विरुद्ध: अधिकांश अधिकार राज्य की मनमानी के खिलाफ उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ अधिकार (जैसे अनुच्छेद 15(2), 17, 23) निजी व्यक्तियों के खिलाफ भी उपलब्ध हैं।
  4. नकारात्मक और सकारात्मक: कुछ अधिकार नकारात्मक हैं (राज्य को कुछ करने से रोकते हैं, जैसे अनुच्छेद 14), जबकि कुछ सकारात्मक हैं (विशेषाधिकार प्रदान करते हैं, जैसे अनुच्छेद 21A, शिक्षा का अधिकार)।
  5. निलंबन (Suspension): राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) के दौरान अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर अन्य सभी निलंबित किए जा सकते हैं। (अनुच्छेद 19 केवल युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर निलंबित होता है, सशस्त्र विद्रोह पर नहीं)।

3. राज्य की परिभाषा और न्यायिक समीक्षा (Article 12 & 13)

अनुच्छेद 12: राज्य की परिभाषा (Definition of State)

चूंकि Fundamental Rights राज्य के खिलाफ सुरक्षा कवच हैं, इसलिए यह जानना जरूरी है कि ‘राज्य’ कौन है। अनुच्छेद 12 के अनुसार, राज्य में शामिल हैं:

  • भारत सरकार और संसद।
  • राज्यों की सरकारें और विधानमंडल।
  • सभी स्थानीय प्राधिकारी (नगरपालिका, पंचायत, जिला बोर्ड)।
  • अन्य प्राधिकारी (Other Authorities): यह सबसे विवादास्पद और महत्वपूर्ण हिस्सा है।

केस लॉ: अजय हसिया बनाम खालिद मुजीब (1981) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई एजेंसी सरकार के ‘हाथ’ (Instrumentality) के रूप में काम करती है, तो वह राज्य है। इसमें LIC, ONGC, SAIL, और यहाँ तक कि निजी निकाय भी शामिल हो सकते हैं यदि वे सार्वजनिक कार्य कर रहे हों। (नोट: BCCI और NCERT को ‘राज्य’ नहीं माना गया है, हालांकि यह मामला न्यायालयों में विचाराधीन रहता है)।

अनुच्छेद 13: मूल अधिकारों से असंगत विधियाँ (Laws Inconsistent with FRs)

यह अनुच्छेद न्यायपालिका को न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्ति प्रदान करता है।

  • कानून की परिभाषा: इसमें संसद/विधानमंडल द्वारा पारित अधिनियम, अध्यादेश, आदेश, उप-नियम, नियम, विनियमन और प्रथाएं शामिल हैं।
  • संविधान संशोधन: केशवानंद भारती केस (1973) के अनुसार, यदि कोई संविधान संशोधन ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) का उल्लंघन करता है, तो उसे अनुच्छेद 13 के तहत चुनौती दी जा सकती है।

महत्वपूर्ण सिद्धांत (Mains Enrichment):

  1. पृथक्करण का सिद्धांत (Doctrine of Severability): यदि कानून का कोई हिस्सा असंवैधानिक है, तो पूरा कानून रद्द नहीं होगा, केवल वह दूषित हिस्सा रद्द होगा।
  2. आच्छादन का सिद्धांत (Doctrine of Eclipse): कोई कानून जो मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है, वह मृत नहीं होता, बल्कि ‘सुप्त’ हो जाता है। (भीकाजी नारायण केस)।

4. समानता का अधिकार: अनुच्छेद 14 से 18 (Right to Equality)

अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता और विधियों का समान संरक्षण

इसमें दो अवधारणाएं शामिल हैं:

  1. विधि के समक्ष समता (ब्रिटिश अवधारणा): यह नकारात्मक है। इसका अर्थ है- कोई भी व्यक्ति (चाहे पीएम हो या चपरासी) कानून से ऊपर नहीं है।
  2. विधियों का समान संरक्षण (अमेरिकी अवधारणा): यह सकारात्मक है। समान परिस्थितियों में समान व्यवहार। (समान के साथ समान, असमान के साथ असमान)।
  • अपवाद: राष्ट्रपति और राज्यपाल को अनुच्छेद 361 के तहत विशेष उन्मुक्तियां प्राप्त हैं।

अनुच्छेद 15: कुछ आधारों पर भेदभाव का निषेध

राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।

  • अपवाद (सकारात्मक कार्यवाही): महिलाओं, बच्चों, SC/ST और सामाजिक-शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC) के लिए विशेष प्रावधान।
  • 103वां संशोधन (EWS): अनुच्छेद 15(6) जोड़ा गया। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए शिक्षण संस्थानों में 10% आरक्षण।

अनुच्छेद 16: लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता

सरकारी नौकरियों में भेदभाव नहीं होगा। लेकिन राज्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण दे सकता है यदि उनका प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है।

महत्वपूर्ण विश्लेषण: मंडल आयोग और आरक्षण (Mandal Commission & Reservation)

  • मोरारजी देसाई सरकार (1979) ने बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया।
  • सिफारिश: OBC को 27% आरक्षण (कुल 50% के भीतर)।
  • इंद्रा साहनी केस (1992): सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला।
    1. आरक्षण की सीमा 50% से अधिक नहीं हो सकती (असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर)।
    2. पदोन्नति (Promotion) में आरक्षण नहीं (बाद में 77वें संशोधन द्वारा इसे बदला गया)।
    3. Creamy Layer (मलाईदार परत): OBC के संपन्न तबके को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।
  • समसामयिक मुद्दा: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को SC/ST के भीतर ‘उप-वर्गीकरण’ (Sub-categorization) की अनुमति दी है ताकि सबसे पिछड़े समूहों तक लाभ पहुंचे।

अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का उन्मूलन (Abolition of Untouchability)

यह एकमात्र निरपेक्ष (Absolute) अधिकार है। ‘अस्पृश्यता’ को संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है, लेकिन मैसूर उच्च न्यायालय ने इसे ऐतिहासिक संदर्भ में समझा।

  • कानून: नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 और SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989।

अनुच्छेद 18: उपाधियों का अंत

राज्य ‘सेना’ या ‘विद्या’ संबंधी सम्मान के सिवाय कोई उपाधि नहीं देगा।

  • बालाजी राघवन केस (1996): SC ने कहा कि भारत रत्न, पद्म विभूषण आदि ‘उपाधि’ नहीं बल्कि ‘सम्मान’ हैं, इसलिए ये अनुच्छेद 18 का उल्लंघन नहीं करते। लेकिन इनका उपयोग नाम के आगे/पीछे प्रत्यय (Suffix/Prefix) के रूप में नहीं किया जा सकता।

5. स्वतंत्रता का अधिकार: अनुच्छेद 19 से 22 (Right to Freedom)

यह लोकतंत्र की रीढ़ है।

अनुच्छेद 19: छह अधिकारों की रक्षा

मूल संविधान में 7 अधिकार थे (संपत्ति का अधिकार 44वें संशोधन, 1978 द्वारा हटा दिया गया)। अब 6 हैं:

  1. 19(1)(a) वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: इसमें प्रेस की स्वतंत्रता, चुप रहने का अधिकार और इंटरनेट का अधिकार (अनुराधा भसीन केस) शामिल है।
    • प्रतिबंध: भारत की संप्रभुता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार, मानहानि, न्यायालय की अवमानना।
  2. 19(1)(b) शांतिपूर्वक सम्मेलन का अधिकार: बिना हथियार के।
  3. 19(1)(c) संगम या संघ बनाने का अधिकार: इसमें सहकारी समितियां (97वां संशोधन) शामिल हैं।
  4. 19(1)(d) संचरण का अधिकार: देश के भीतर कहीं भी घूमने का अधिकार।
  5. 19(1)(e) निवास का अधिकार: कहीं भी बसने का अधिकार।
  6. 19(1)(g) वृत्ति/व्यापार का अधिकार: कोई भी पेशा अपनाने का अधिकार।

अनुच्छेद 20: अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण

यह भारतीय नागरिकों और विदेशियों दोनों को प्राप्त है।

  1. भूतलक्षी विधियों से संरक्षण (No Ex-post Facto Law): किसी व्यक्ति को उस कार्य के लिए दंडित नहीं किया जाएगा जो अपराध करते समय कानूनन अपराध नहीं था (केवल फौजदारी मामलों में)।
  2. दोहरे दंड से संरक्षण (No Double Jeopardy): एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार दंडित नहीं किया जाएगा।
  3. स्व-अभिशंसन से संरक्षण (No Self-Incrimination): खुद के खिलाफ गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। (नार्को टेस्ट, पॉलीग्राफ टेस्ट बिना सहमति के अवैध हैं – सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य)।

अनुच्छेद 21: प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण (Most Dynamic Article)

“किसी भी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के सिवाय वंचित नहीं किया जाएगा।”

  • गोपालन केस (1950): SC ने संकीर्ण व्याख्या की (केवल कार्यपालिका की मनमानी रोकी, विधायिका की नहीं)।
  • मेनका गांधी केस (1978): SC ने व्यापक व्याख्या की। ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ को ‘विधि की सम्यक प्रक्रिया’ (Due Process of Law) जैसा माना। कानून ‘उचित, निष्पक्ष और न्यायपूर्ण’ होना चाहिए।
  • विस्तार: इसमें अब शामिल हैं – निजता का अधिकार (पुट्टास्वामी केस), स्वच्छ पर्यावरण, आश्रय, स्वास्थ्य, त्वरित सुनवाई, हथकड़ी न लगाने का अधिकार, विदेश जाने का अधिकार।

अनुच्छेद 21A: शिक्षा का अधिकार

86वें संविधान संशोधन (2002) द्वारा जोड़ा गया। राज्य 6 से 14 वर्ष के बच्चों को अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा देगा।

  • RTE Act 2009: इसे लागू करने के लिए बनाया गया।

अनुच्छेद 22: निरोध और गिरफ्तारी से संरक्षण

इसके दो भाग हैं:

  1. सामान्य कानून के तहत गिरफ्तारी: व्यक्ति को गिरफ्तारी का कारण बताना होगा, 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होगा और वकील करने का अधिकार होगा।
  2. निवारक निरोध (Preventive Detention): बिना अपराध किए केवल शक के आधार पर हिरासत।
    • अधिकतम अवधि: 3 महीने (सलाहकार बोर्ड की अनुमति के बिना)।
    • यह दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में संविधान का हिस्सा नहीं है, सिवाय भारत के। यह ‘बुराई आवश्यक’ (Necessary Evil) माना जाता है।

6. शोषण के विरुद्ध अधिकार: अनुच्छेद 23-24

अनुच्छेद 23: मानव दुर्व्यापार एवं बाल श्रम का निषेध

  • मानव तस्करी (Human Trafficking), बेगार (Begar – बिना वेतन काम) और बलात् श्रम (Forced Labour) प्रतिबंधित है।
  • अपवाद: राज्य सार्वजनिक उद्देश्य (जैसे सैन्य सेवा या सामाजिक सेवा) के लिए अनिवार्य सेवा लागू कर सकता है, लेकिन इसमें धर्म/जाति का भेदभाव नहीं होगा।

अनुच्छेद 24: कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध

  • 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी भी कारखाने, खान या संकटमय गतिविधियों में नहीं लगाया जाएगा।
  • बाल श्रम (निषेध और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016: इसने 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के सभी व्यवसायों में नियोजन पर रोक लगा दी है।

7. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार: अनुच्छेद 25-28

भारत एक पंथनिरपेक्ष (Secular) राज्य है (प्रस्तावना में 42वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया)।

  1. अनुच्छेद 25: अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने का अधिकार।
    • कृपाण: सिखों द्वारा कृपाण धारण करना धार्मिक स्वतंत्रता का अंग है।
    • धर्मांतरण: प्रचार के अधिकार में ‘जबरन धर्मांतरण’ का अधिकार शामिल नहीं है (स्टेनिस्लॉस केस)।
  2. अनुच्छेद 26: धार्मिक कार्यों के प्रबंधन की स्वतंत्रता (संस्थागत अधिकार)।
  3. अनुच्छेद 27: किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए कर (Tax) न देने की स्वतंत्रता। (राज्य कर नहीं लगा सकता, लेकिन शुल्क/Fee ले सकता है)।
  4. अनुच्छेद 28: शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा पर रोक। (सरकारी संस्थानों में पूर्णतः प्रतिबंधित)।

अनिवार्य धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practice Doctrine): सुप्रीम कोर्ट यह तय करता है कि धर्म का कौन सा हिस्सा अनिवार्य है और कौन सा नहीं। (उदाहरण: सबरीमाला केस, हिजाब केस)।

8. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार: अनुच्छेद 29-30

ये अधिकार मुख्य रूप से अल्पसंख्यकों के लिए हैं, लेकिन अनुच्छेद 29 सभी के लिए है।

अनुच्छेद 29: अल्पसंख्यक-वर्गों के हितों का संरक्षण

भारत के किसी भी भाग में रहने वाले नागरिकों के किसी भी अनुभाग को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार है।

अनुच्छेद 30: शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार

अल्पसंख्यकों (धार्मिक और भाषाई) को अपनी शिक्षण संस्थाएं खोलने का अधिकार है।

  • TMA Pai Case: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अल्पसंख्यक दर्जा ‘राज्य’ की जनसंख्या के आधार पर तय होगा, न कि राष्ट्रीय स्तर पर।

9. संवैधानिक उपचारों का अधिकार: अनुच्छेद 32 (The Soul)

डॉ. अंबेडकर ने इसे संविधान की ‘आत्मा और हृदय’ कहा। यह अधिकार स्वयं में एक मौलिक अधिकार है। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट 5 प्रकार की रिट (Writs) जारी करता है:

  1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus): “शरीर को प्रस्तुत किया जाए”। यह अवैध हिरासत के खिलाफ है। (निजी और सरकारी दोनों के खिलाफ)।
  2. परमादेश (Mandamus): “हम आदेश देते हैं”। सार्वजनिक अधिकारी या निकाय को कर्तव्य पालन का आदेश। (निजी व्यक्ति, राष्ट्रपति या राज्यपाल के खिलाफ जारी नहीं हो सकती)।
  3. प्रतिषेध (Prohibition): “रोकना”। वरिष्ठ न्यायालय अधीनस्थ न्यायालय को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने से रोकता है। (निर्णय से पहले)।
  4. उत्प्रेषण (Certiorari): “प्रमाणित होना”। अधीनस्थ न्यायालय के निर्णय को रद्द करना या मामले को ऊपर बुलाना। (निर्णय के बाद)।
  5. अधिकार पृच्छा (Quo-Warranto): “किस प्राधिकार से?” सार्वजनिक पद पर किसी व्यक्ति के दावे की वैधता की जांच।

अनुच्छेद 32 बनाम अनुच्छेद 226:

  • अनुच्छेद 32 (SC) केवल मौलिक अधिकारों के लिए है।
  • अनुच्छेद 226 (High Court) मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अन्य कानूनी अधिकारों के लिए भी रिट जारी कर सकता है। अतः रिट जारी करने में HC का दायरा SC से व्यापक है।

10. अपवाद और अन्य प्रावधान (अनुच्छेद 33, 34, 35)

  1. अनुच्छेद 33: संसद को अधिकार है कि वह सशस्त्र बलों, पुलिस बलों, खुफिया एजेंसियों के मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित करे। (सैन्य अनुशासन बनाए रखने के लिए)।
  2. अनुच्छेद 34: जब किसी क्षेत्र में मार्शल लॉ (Martial Law) लागू हो, तो मूल अधिकारों पर प्रतिबंध लग सकता है।
  3. अनुच्छेद 35: मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाने की शक्ति केवल संसद के पास है (राज्य विधानमंडल के पास नहीं), ताकि पूरे देश में एकरूपता रहे।

11. आलोचनात्मक विश्लेषण और महत्त्व (Mains Dimension)

महत्व (Significance):

  1. लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव: ये राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना करते हैं।
  2. गरिमा की रक्षा: व्यक्ति की भौतिक और नैतिक उन्नति सुनिश्चित करते हैं।
  3. अल्पसंख्यकों का विश्वास: बहुसंख्यकवाद के अत्याचार से रक्षा।

आलोचना (Criticism):

  1. अत्यधिक सीमाएं: आलोचक कहते हैं कि संविधान एक हाथ से अधिकार देता है और दूसरे हाथ से (प्रतिबंधों के माध्यम से) वापस ले लेता है।
  2. आर्थिक अधिकारों का अभाव: काम का अधिकार, सामाजिक सुरक्षा का अधिकार इसमें शामिल नहीं है (ये DPSP में हैं)।
  3. निवारक निरोध: आपातकाल के बिना भी शांति काल में इसका प्रावधान होना लोकतंत्र पर धब्बा माना जाता है।
  4. महंगा न्याय: अनुच्छेद 32 का उपयोग आम आदमी के लिए व्यावहारिक रूप से कठिन और महंगा है।

12. मौलिक अधिकार बनाम नीति निदेशक तत्व (FR vs DPSP)

UPSC Mains का पसंदीदा प्रश्न क्षेत्र:

  1. चंपकम दोरायराजन केस (1951): FR सर्वोच्च हैं।
  2. गोलकनाथ केस (1967): संसद FR में संशोधन नहीं कर सकती ताकि DPSP लागू हो।
  3. केशवानंद भारती केस (1973): संसद संशोधन कर सकती है, लेकिन ‘मूल ढांचे’ को नहीं छेड़ सकती।
  4. मिनर्वा मिल्स केस (1980): भारतीय संविधान FR और DPSP के बीच ‘संतुलन’ (Bedrock of Balance) पर टिका है। एक रथ के दो पहियों की तरह।

13. PYQ विश्लेषण (Previous Year Questions)

Prelims MCQs (अभ्यास प्रश्न)

Q1. भारत के संदर्भ में, अधिकारों और कर्तव्यों के बीच सही संबंध क्या है? (UPSC 2017) A. अधिकार कर्तव्यों के साथ सह-संबंधित हैं। B. अधिकार व्यक्तिगत हैं और समाज और कर्तव्यों से स्वतंत्र हैं। C. नागरिक के व्यक्तित्व के विकास के लिए अधिकार महत्वपूर्ण हैं, कर्तव्य नहीं। D. राज्य की स्थिरता के लिए कर्तव्य महत्वपूर्ण हैं, अधिकार नहीं। उत्तर: A (गांधीजी ने भी कहा था कि अधिकारों का स्रोत कर्तव्य है)।

Q2. ‘निजता के अधिकार’ को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के आंतरिक भाग के रूप में संरक्षित किया जाता है। यह किस अनुच्छेद के तहत है? (UPSC 2018) A. अनुच्छेद 14 B. अनुच्छेद 17 C. अनुच्छेद 21 D. अनुच्छेद 24 उत्तर: C (के.एस. पुट्टास्वामी निर्णय)।

Mains Questions Trend

  • 2020: “न्यायिक विधान (Judicial Legislation) भारतीय संविधान में शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के विपरीत है।” (अनुच्छेद 13 और 32 के संदर्भ में सोचें)।
  • 2019: “फ्रांस और भारत के धर्मनिरपेक्षता के दृष्टिकोण में अंतर।” (अनुच्छेद 25-28)।
  • 2017: “मौलिक अधिकारों को संशोधित करने की संसद की शक्ति का विश्लेषण करें।”

14. Mains Model Answer (पूर्ण उत्तर)

प्रश्न: “समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14-18) का उद्देश्य न केवल कानूनी समानता सुनिश्चित करना है, बल्कि सामाजिक असमानताओं को दूर करना भी है।” इस कथन का परीक्षण करें। (250 शब्द)

उत्तर:

प्रस्तावना: भारतीय संविधान में निहित समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18) केवल एक औपचारिक कानूनी घोषणा नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी सामाजिक विषमताओं और पदानुक्रम को समाप्त करने का एक परिवर्तनकारी उपकरण है। डॉ. अंबेडकर के अनुसार, राजनीतिक समानता तब तक अर्थहीन है जब तक सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित न हो।

मुख्य भाग:

  1. कानूनी समानता (Legal Equality):
    • अनुच्छेद 14 ‘विधि के समक्ष समता’ के माध्यम से यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है। यह विशेषाधिकारों (Privileges) का अंत करता है।
    • यह राज्य के मनमानेपन के खिलाफ सुरक्षा कवच है।
  2. सामाजिक न्याय का उपकरण (Instrument of Social Justice):
    • अनुच्छेद 15: यह राज्य को महिलाओं, बच्चों और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए ‘सकारात्मक भेदभाव’ (Positive Discrimination) करने की अनुमति देता है। यह स्वीकार करता है कि असमानों के साथ समान व्यवहार करना सबसे बड़ी असमानता है।
    • अनुच्छेद 16: ‘मंडल आयोग’ और हालिया ‘EWS आरक्षण’ का उद्देश्य सरकारी नौकरियों में वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। यह ‘परिणाम की समानता’ (Equality of Outcome) की ओर एक कदम है।
    • अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का उन्मूलन भारतीय समाज के माथे पर लगे कलंक को धोता है। यह नागरिक गरिमा की बहाली है।
    • अनुच्छेद 18: वंशानुगत उपाधियों (जैसे राय बहादुर, सर) का अंत करके यह सामंती मानसिकता को चोट पहुँचाता है।

चुनौतियां:

  • जातिवाद का राजनीतिकरण।
  • आरक्षण का लाभ ‘क्रीमी लेयर’ तक सीमित रहना।
  • निजी क्षेत्र में भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा का अभाव।

निष्कर्ष: समानता का अधिकार एक ‘समतामूलक समाज’ (Egalitarian Society) की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि “आरक्षण समानता का विरोधी नहीं, बल्कि समानता का पूरक है।” अतः, यह अधिकार केवल कानूनी नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति का दस्तावेज है।

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15. डायग्राम सुझाव (Diagram Suggestions for Mains)

अपने उत्तर में इन स्थानों पर डायग्राम बनाएं:

  1. अनुच्छेद 19: एक षट्कोण (Hexagon) बनाएं और उसके 6 कोनों पर 6 स्वतंत्रताओं को लिखें।
  2. गोल्डन ट्राएंगल (Golden Triangle): एक त्रिभुज बनाएं जिसके तीन कोनों पर Article 14, Article 19 और Article 21 लिखें। (मेनका गांधी केस में स्थापित – ये तीनों एक दूसरे से जुड़े हैं)।
  3. संरचना: मौलिक अधिकार vs DPSP संतुलन दिखाने के लिए ‘तराजू’ (Weighing Scale) का चित्र।

16. आगे की राह (Way Forward & Conclusion)

2026 और उससे आगे के भारत के लिए Fundamental Rights की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। डिजिटल युग में ‘डेटा प्राइवेसी’ और ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ के दौर में अनुच्छेद 21 की नई व्याख्याओं की आवश्यकता है।

सुझाव:

  • जागरूकता अभियान: स्कूलों से ही अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों (अनुच्छेद 51A) की शिक्षा दी जानी चाहिए।
  • न्यायिक सुधार: अनुच्छेद 32 को आम आदमी के लिए सुलभ बनाने हेतु ‘ई-कोर्ट’ और स्थानीय भाषाओं में न्याय की पहल को तेज करना होगा।
  • संतुलन: राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना (जैसे UAPA कानून के प्रयोग में सावधानी)।

एक प्रशासक के रूप में, आपको इन अधिकारों का रक्षक बनना है, न कि भक्षक। याद रखें, एक सशक्त लोकतंत्र वही है जहाँ अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति (अंत्योदय) के अधिकारों की भी सुरक्षा हो।

17. रिवीजन ट्रिगर्स (Last Minute Revision)

  1. मैग्ना कार्टा: भाग III।
  2. 12 & 36: राज्य की परिभाषा समान।
  3. 13: न्यायिक समीक्षा (परोक्ष रूप से)।
  4. 14: विधि का शासन (Rule of Law)।
  5. 17 & 24: पूर्णतः निरपेक्ष (Absolute)।
  6. 20 & 21: आपातकाल में भी निलंबित नहीं।
  7. 15, 16, 19, 29, 30: केवल भारतीय नागरिकों को।
  8. 32: रिट अधिकारिता (SC)।
  9. Sabarimala Case: अनुच्छेद 25 vs 26.
  10. Puttaswamy Case: अनुच्छेद 21 (Privacy).

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