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लाचित दिवस 2025,असम के महानायक और पूर्वोत्तर के प्रहरी

(Current Affairs Notes for UPSC CSE – Prelims & Mains)

संदर्भ – हर साल 24 नवंबर को असम और पूरे भारत में लाचित दिवस (Lachit Diwas) मनाया जाता है। यह दिन अहोम साम्राज्य के महान सेनापति लाचित बोरफुकन (Lachit Borphukan) की जयंती (Birth Anniversary) का प्रतीक है, जिन्होंने 1671 की सराईघाट की लड़ाई में मुगल विस्तार को रोका था।

चर्चा में क्यों? (Current Affairs Linkages)

UPSC के लिए यह टॉपिक केवल इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान घटनाक्रमों (Art & Culture, Polity) से भी जुड़ा है

  • स्टैच्यू ऑफ वेलोर (Statue of Valour – मार्च 2024) – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम के जोरहाट में लाचित बोरफुकन की 125 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया था। यह “स्टैच्यू ऑफ यूनिटी” की तर्ज पर एक राष्ट्रीय स्मारक है।
  • यूनेस्को विश्व धरोहर (July 2024) – जुलाई 2024 में, अहोम राजवंश की ‘चराईदेव मैदाम’ (Charaideo Maidams) को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।
    • Note – लाचित बोरफुकन का मैदाम (समाधि) जोरहाट में है, लेकिन चराईदेव मैदामों को मिली मान्यता पूरी अहोम स्थापत्य कला (Architecture) को महत्वपूर्ण बनाती है।
  • राष्ट्रीय पहचान – उनकी 400वीं जयंती के उपलक्ष्य में उनकी जीवनी का 23 भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया गया, जो सरकार के “Unsung Heroes” (गुमनाम नायक) पहल का हिस्सा है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)

कौन थे लाचित बोरफुकन?

  • पद – अहोम साम्राज्य (Ahom Kingdom) के सेनापति (Commander-in-Chief)।
  • राजा – वे राजा चक्रध्वज सिंह (Chakradhwaj Singha) के शासनकाल में सेनापति थे।
  • प्रसिद्ध कथन – जब उनके मामा ने रक्षा दीवार बनाने में लापरवाही की, तो उन्होंने उनका सिर काट दिया और कहा:

“देशाट कोइ मोमाई डांगर नहॉय” (मेरे मामा मेरे देश से बड़े नहीं हैं)। (यह कथन GS-4 Ethics में ‘Dedication to Duty’ का बेहतरीन उदाहरण है)

सराईघाट का युद्ध (Battle of Saraighat – 1671)

  • स्थान – गुवाहाटी के पास ब्रह्मपुत्र नदी पर (यह एक नौसैनिक युद्ध/Naval Battle था)।
  • पक्ष
    • अहोम सेना: नेतृत्व लाचित बोरफुकन ने किया।
    • मुगल सेना: नेतृत्व राजा राम सिंह प्रथम (औरंगजेब के आदेश पर) ने किया।
  • परिणाम – मुगलों की विशाल सेना और तोपखाने के बावजूद अहोम सेना ने निर्णायक जीत हासिल की। इसने पूर्वोत्तर भारत (Northeast India) में मुगल विस्तार को हमेशा के लिए रोक दिया।

अहोम सैन्य रणनीति (Military Strategy Analysis)

लाचित बोरफुकन की जीत को ‘War Strategy’ के केस स्टडी के रूप में पढ़ा जाता है

  1. गोरिल्ला युद्ध (Guerrilla Warfare) मुगलों की खुली लड़ाई की ताकत को बेअसर करने के लिए उन्होंने रात में हमले और छापामार युद्ध का सहारा लिया।
  2. भूगोल का उपयोग (Terrain Usage) उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी के संकरे रास्ते (narrow choke point) का फायदा उठाया, जहां मुगलों के बड़े जहाज फंस गए और अहोमों की छोटी नावें (Bacharis) कारगर साबित हुईं।
  3. मनोवैज्ञानिक युद्ध (Psychological Warfare) उन्होंने मुगलों को भ्रमित करने के लिए जासूसों का प्रभावी इस्तेमाल किया।

UPSC Prelims के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Key Facts)

विषयविवरण
बुरंजी (Buranjis)अहोम साम्राज्य के ऐतिहासिक दस्तावेज/क्रॉनिकल्स। लाचित के बारे में जानकारी का मुख्य स्रोत।
पाइक प्रणाली (Paik System)अहोमों की विशिष्ट श्रम और सैन्य व्यवस्था। हर घर से एक सदस्य (Paik) को राज्य के लिए सेवा (युद्ध/निर्माण) देनी होती थी।
अलाबोई की लड़ाई (Battle of Alaboi)1669 में सराईघाट से पहले लड़ी गई। इसमें अहोमों की हार हुई थी, लेकिन लाचित ने इससे सीख लेकर सराईघाट में जीत हासिल की।
NDA Gold Medal1999 से, राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को “Lachit Borphukan Gold Medal” दिया जाता है।

UPSC Mains के लिए विश्लेषण (Mains Analysis)

GS Paper 1 (Art & Culture / History)

  • प्रश्न “पूर्वोत्तर भारत के इतिहास में अहोम साम्राज्य का योगदान और लाचित बोरफुकन का महत्व स्पष्ट करें।”
  • उत्तर के बिंदु – अहोमों ने 600 साल (1228-1826) तक शासन किया। उन्होंने मुगलों को 17 बार हराया। लाचित बोरफुकन न केवल एक योद्धा थे, बल्कि असमी अस्मिता (Assamese Identity) और राष्ट्रवाद के प्रतीक हैं।

GS Paper 4 (Ethics, Integrity & Aptitude)

Case Study Example – लाचित बोरफुकन का अपने मामा को दंड देना “सार्वजनिक कर्तव्य बनाम निजी संबंध” (Public Duty vs. Private Relations) का क्लासिक उदाहरण है। यह दिखाता है कि एक सिविल सेवक/लीडर के लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए (Impartiality and Dedication to Public Service)।

सारांश (Conclusion)

लाचित बोरफुकन केवल एक क्षेत्रीय योद्धा नहीं थे, वे भारत की नौसैनिक शक्ति और रणनीतिक कौशल के प्रतीक हैं। सराईघाट की जीत ने सुनिश्चित किया कि पूर्वोत्तर भारत अपनी स्वदेशी संस्कृति और परंपराओं को मुगलों के प्रभाव से बचा सके।

गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस – 350वां वर्ष (1675-2025)

(Current Affairs Notes for UPSC CSE)

संदर्भ – 24 नवंबर 2025 को सिखों के 9वें गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर जी का 350वां शहीदी दिवस मनाया जा रहा है। 1675 में मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश पर दिल्ली के चांदनी चौक में उन्हें सार्वजनिक रूप से शहीद किया गया था।

परिचय और प्रारंभिक जीवन (Introduction – Prelims Data)

स्थान – 9वें सिख गुरु (कार्यकाल: 1665–1675)।

जन्म – 1621, अमृतसर। (बचपन का नाम: त्यागमल)।

माता-पिता – गुरु हरगोबिंद साहिब (6वें गुरु) और माता नानकी।

उपाधि‘हिंद दी चादर’ (भारत की ढाल/रक्षक)।

नगर स्थापना – उन्होंने आनंदपुर साहिब शहर की स्थापना की थी (तब इसका नाम ‘चक नानकी’ था)।

साहित्यिक योगदान – गुरु ग्रंथ साहिब में उनके 116 शब्द (Hymns) और श्लोक शामिल हैं।

शहादत का ऐतिहासिक कारण (Historical Background)

राजनीतिक परिदृश्य – 17वीं शताब्दी में औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता चरम पर थी।

तात्कालिक कारण – कश्मीर के गवर्नर इफ्तिखार खान द्वारा कश्मीरी पंडितों (हिंदुओं) का जबरन धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था।

याचिका – कश्मीरी पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल मदद के लिए आनंदपुर साहिब में गुरु जी के पास आया। गुरु जी ने कहा कि इस अत्याचार को रोकने के लिए किसी “महापुरुष के बलिदान” की आवश्यकता है।

गिरफ्तारी और शहादत – गुरु जी ने चुनौती स्वीकार की। उन्हें आगरा में गिरफ्तार किया गया और दिल्ली लाया गया। इस्लाम कबूल न करने पर, 24 नवंबर 1675 को चांदनी चौक में उनका सिर कलम कर दिया गया।

प्रमुख गुरुद्वारे (Art & Culture – Mapping)

UPSC अक्सर ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़े स्थानों पर प्रश्न पूछता है

गुरुद्वारास्थानमहत्व
गुरुद्वारा सीस गंज साहिबचांदनी चौक, दिल्लीयहाँ गुरु जी को शहीद किया गया था।
गुरुद्वारा रकाब गंज साहिबनई दिल्ली (संसद के पास)यहाँ भाई लखी शाह बंजारा ने गुरु जी के धड़ (Body) का अंतिम संस्कार अपने घर को जलाकर किया था।
गुरुद्वारा सीस गंज (अंबाला/आनंदपुर)पंजाबभाई जैता जी गुरु जी का शीश (Head) लेकर आनंदपुर साहिब गए थे, जहाँ गुरु गोबिंद सिंह जी ने अंतिम संस्कार किया।

मुख्य विश्लेषण (Mains Oriented Analysis)

A. मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्षता (GS Paper 1 & 2)

  • अद्वितीय बलिदान – विश्व इतिहास में यह एक दुर्लभ उदाहरण है जहाँ किसी धार्मिक नेता ने दूसरे धर्म (हिंदू धर्म) के लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी जान दी।
  • धर्म की स्वतंत्रता (Article 25-28) – उनकी शहादत भारतीय संविधान में निहित ‘अंतरात्मा की स्वतंत्रता’ (Freedom of Conscience) के सिद्धांत का ऐतिहासिक आधार है। यह दर्शाता है कि राज्य को धर्म के मामले में जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए।

B. औरंगजेब की नीतियों का प्रभाव (History)

  • गुरु तेग बहादुर की हत्या ने सिख-मुगल संघर्ष की दिशा बदल दी।
  • इसके परिणामस्वरूप 10वें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की, जिससे सिख समुदाय एक ‘संत-सिपाही’ (Saint-Soldier) बल में बदल गया।

C. नीतिशास्त्र (GS Paper 4 – Ethics)

  • भय से मुक्ति – गुरु जी का प्रसिद्ध श्लोक है:”भय काहू को देत नहि, नहि भय मानत आन” (न मैं किसी को डराता हूँ, न किसी से डरता हूँ)। यह एक सिविल सेवक के लिए ‘Moral Courage’ (नैतिक साहस) का सर्वोच्च उदाहरण है।
  • सत्यनिष्ठा (Integrity) – प्रलोभन और मृत्यु के डर के बावजूद अपने सिद्धांतों से समझौता न करना।

तुलनात्मक अध्ययन: समकालीन नायक (Comparative Study)

(UPSC में डॉट्स कनेक्ट करना महत्वपूर्ण है)

  • 1670 का दशक: यह वह समय था जब भारत के अलग-अलग कोनों में मुगल सत्ता को चुनौती मिल रही थी
    • उत्तर में – गुरु तेग बहादुर जी (आध्यात्मिक और नैतिक प्रतिरोध)।
    • पश्चिम में – छत्रपति शिवाजी महाराज (स्वराज्य स्थापना – 1674 में राज्याभिषेक)।
    • पूर्व में – लाचित बोरफुकन (सराईघाट युद्ध – 1671)।

निष्कर्ष (Conclusion)

गुरु तेग बहादुर जी की शहादत केवल सिख इतिहास की घटना नहीं है, बल्कि यह भारत की बहुलवादी संस्कृति (Pluralistic Culture) के संरक्षण का एक निर्णायक मोड़ था। 350वें वर्ष में, उनका संदेश असहिष्णुता और कट्टरता के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देता है।

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