1781 का संशोधन अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा 5 जुलाई, 1781 को पारित किया गया था। यह अधिनियम ईस्ट इंडिया कंपनी के भारतीय प्रशासन में व्याप्त न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच उत्पन्न संघर्षों, विशेष रूप से कलकत्ता की सर्वोच्च न्यायालय और गवर्नर-जनरल तथा उसकी परिषद के बीच के विवादों को समाप्त करने के उद्देश्य से लाया गया था।

Table of Contents

पृष्ठभूमि और आवश्यकता

  • रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773 की खामियाँ– 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट ने पहली बार भारत में केंद्रीय प्रशासन की नींव रखी और कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की। हालांकि, इस एक्ट ने गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद (कार्यपालिका) तथा सर्वोच्च न्यायालय (न्यायपालिका) के क्षेत्राधिकार को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया, जिससे प्रशासन और न्याय के क्षेत्र में टकराव उत्पन्न हुए।
  • कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका संघर्ष – सबसे प्रमुख विवाद यह था कि सर्वोच्च न्यायालय ने कंपनी के अधिकारियों को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए भी अपने क्षेत्राधिकार के तहत लाना शुरू कर दिया था। इसके अलावा, राजस्व संग्रह के मामलों में भी न्यायालय हस्तक्षेप कर रहा था, जिससे कंपनी के प्रशासन और राजस्व संग्रह में बाधा आ रही थी।
  • भारतीयों की शिकायतें – सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लागू किए गए अंग्रेजी कानून और उसकी कार्यप्रणाली भारतीय सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुकूल नहीं थी, जिससे कलकत्ता के निवासियों में असंतोष था।

अधिनियम के प्रमुख प्रावधान

इस अधिनियम ने 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने और गवर्नर-जनरल इन काउंसिल की स्थिति को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए

1. कार्यपालिका को न्यायिक क्षेत्राधिकार से छूट

  • गवर्नर-जनरल एवं परिषद को उन्मुक्ति – इस अधिनियम ने गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद को ऐसे किसी भी कार्य के लिए सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार से मुक्त कर दिया, जो उन्होंने पद की हैसियत से किया हो।
  • कंपनी के सेवकों को छूट– कंपनी के सेवकों को भी उनके आधिकारिक कार्यों (Official Acts) के लिए सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार से छूट प्रदान की गई। इसका अर्थ था कि उनके आधिकारिक कृत्यों पर अब सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता था।
  • राजस्व मामले में छूट – कंपनी के राजस्व से संबंधित मामले और राजस्व संग्रह संबंधी कार्य सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर कर दिए गए। राजस्व संबंधी मामलों में गवर्नर-जनरल इन काउंसिल को न्यायालय के नियंत्रण से स्वतंत्रता मिली।

2. सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार का सीमांकन

  • कलकत्ता निवासी – सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार को कलकत्ता के सभी निवासियों तक सीमित कर दिया गया।
  • व्यक्तिगत कानून – न्यायालय को निर्देश दिया गया कि वह भारतीयों के निजी मामलों, जैसे विवाह, उत्तराधिकार, धार्मिक या सामाजिक संस्थाओं से संबंधित मुकदमों का फैसला करते समय हिंदुओं के लिए हिंदू कानून और मुसलमानों के लिए मुस्लिम कानून के अनुसार करे। इस प्रावधान ने पहली बार भारत में न्यायिक प्रशासन में स्थानीय सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों का सम्मान करने का निर्देश दिया।

3. प्रांतीय न्यायालयों पर नियंत्रण

  • गवर्नर-जनरल इन काउंसिल की शक्ति – इस अधिनियम ने गवर्नर-जनरल इन काउंसिल को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की प्रांतीय परिषदों तथा प्रांतीय न्यायालयों (Provincial Courts and Councils) के लिए नियम (Rules) और विनियम (Regulations) बनाने का अधिकार दिया। इस शक्ति से प्रांतीय स्तर पर विधि निर्माण और न्याय प्रशासन में एकरूपता लाने का प्रयास किया गया।

4. अपील संबंधी प्रावधान

  • अपील का अधिकार – प्रांतीय न्यायालयों से आने वाली अपीलें सर्वोच्च न्यायालय के बजाय सीधे गवर्नर-जनरल इन काउंसिल के पास दायर की जानी थीं।
  • अंतिम अपील – गवर्नर-जनरल इन काउंसिल द्वारा तय किए गए मामलों की अंतिम अपील किंग-इन-काउंसिल (King-in-Council) के पास जानी थी, जो इंग्लैंड में स्थित था।
  • सदर दीवानी अदालत – इस प्रावधान से गवर्नर-जनरल इन काउंसिल को अपील सुनने के लिए सदर दीवानी अदालत के रूप में कार्य करने का अधिकार मिला।

महत्व और प्रभाव (UPSC मुख्य परीक्षा हेतु)

1781 का संशोधन अधिनियम भारत के संवैधानिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ, जिसके दूरगामी परिणाम हुए

पहलूमहत्व/प्रभाव
कार्यपालिका की सर्वोच्चताइस अधिनियम ने गवर्नर-जनरल इन काउंसिल को सर्वोच्च न्यायालय के नियंत्रण से मुक्त करके कार्यपालिका की स्थिति को मजबूत किया, जिससे कंपनी के प्रशासन पर उनका नियंत्रण प्रभावी हो सका।
शक्ति पृथक्करण का प्रयासयह अधिनियम कार्यपालिका (गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद) और न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय) के अधिकार क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करके शक्तियों के पृथक्करण की दिशा में पहला प्रयास था, हालाँकि यह पूर्ण नहीं था।
राजस्व प्रशासनराजस्व संबंधी मामलों को न्यायालय के नियंत्रण से बाहर रखने से राजस्व संग्रह का कार्य अबाध रूप से सुनिश्चित हुआ, जो कंपनी की वित्तीय सुदृढ़ता के लिए आवश्यक था।
भारतीय विधि का सम्मानहिंदू और मुस्लिम कानूनों को निजी मामलों में मान्यता देकर इस अधिनियम ने पहली बार ब्रिटिश न्यायिक प्रणाली में भारतीय सामाजिक और धार्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान दिखाया, जो भविष्य के कानूनों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बना।
संवैधानिक सुधारों का मार्गइस अधिनियम की सफलता ने ब्रिटिश संसद को कंपनी के मामलों में हस्तक्षेप करने और भारत में शासन के लिए अधिक प्रभावी कानून बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। इसने 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट जैसे आगे के सुधारों की नींव रखी।

संक्षेप में, 1781 का अधिनियम 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट की विफलता को कम करने और कंपनी के प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए आवश्यक था, जिसने भारत में ब्रिटिश शासन के केंद्रीयकरण और शक्ति संरचना को और अधिक दृढ़ बनाया।

निश्चित रूप से। यहाँ 1781 के संशोधन अधिनियम (बंदोबस्त अधिनियम) पर आधारित 10 गैर-इंटरैक्टिव UPSC प्रारंभिक परीक्षा बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) और उनके सही उत्तर के साथ विस्तृत व्याख्या दी गई है।

1781 के संशोधन अधिनियम (बंदोबस्त अधिनियम) पर UPSC MCQs

प्रश्न 1

1781 के संशोधन अधिनियम को अन्य किस नाम से जाना जाता है? (A) भारत शासन अधिनियम (B) पिट्स इंडिया एक्ट (C) घोषणात्मक अधिनियम (Declaratory Act) (D) चार्टर अधिनियम

सही उत्तर (C) घोषणात्मक अधिनियम (Declaratory Act)

व्याख्या– 1781 का संशोधन अधिनियम, जो 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट की अस्पष्टताओं को स्पष्ट करने के लिए लाया गया था, को बंदोबस्त अधिनियम (Act of Settlement) या घोषणात्मक अधिनियम भी कहा जाता है।

प्रश्न 2

1781 के संशोधन अधिनियम का प्राथमिक उद्देश्य क्या था? (A) कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त करना (B) भारत में द्वैध शासन लागू करना (C) सर्वोच्च न्यायालय और गवर्नर-जनरल की परिषद के बीच के क्षेत्राधिकार विवाद को समाप्त करना (D) गवर्नर-जनरल को वीटो शक्ति प्रदान करना

सही उत्तर (C) सर्वोच्च न्यायालय और गवर्नर-जनरल की परिषद के बीच के क्षेत्राधिकार विवाद को समाप्त करना

व्याख्या– 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट के बाद कार्यपालिका (गवर्नर-जनरल इन काउंसिल) और न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय) के बीच क्षेत्राधिकार को लेकर लगातार टकराव हो रहा था। इस अधिनियम का मूल लक्ष्य इसी विवाद को सुलझाना था।

प्रश्न 3

1781 के संशोधन अधिनियम के तहत, निम्नलिखित में से किसे सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर कर दिया गया था?

  1. गवर्नर-जनरल एवं उसकी परिषद, उनके आधिकारिक कार्यों के लिए।
  2. कंपनी के सेवकों को, उनके आधिकारिक कार्यों के लिए।
  3. कंपनी के राजस्व से संबंधित मामले।

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए: (A) केवल 1 और 2 (B) केवल 2 और 3 (C) केवल 1 (D) 1, 2 और 3

सही उत्तर (D) 1, 2 और 3

व्याख्या इस अधिनियम ने स्पष्ट किया कि गवर्नर-जनरल, उनकी परिषद, कंपनी के कर्मचारी (उनके आधिकारिक कार्यों के लिए) और राजस्व से संबंधित मामले सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार से मुक्त थे।

प्रश्न 4

1781 के संशोधन अधिनियम के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए

  1. इसने गवर्नर-जनरल एवं उसकी परिषद को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के लिए भी विधि बनाने का अधिकार दिया।
  2. इसने सर्वोच्च न्यायालय को यह निर्देश दिया कि वह मुकदमों का फैसला करते समय भारतीयों के सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों का सम्मान करे।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (A) केवल 1 (B) केवल 2 (C) 1 और 2 दोनों (D) न तो 1 और न ही 2

सही उत्तर (C) 1 और 2 दोनों

व्याख्या

  • कथन 1 सही है– अधिनियम ने गवर्नर-जनरल इन काउंसिल को प्रांतीय परिषदों और न्यायालयों के लिए नियम और विनियम (Rules and Regulations) बनाने की शक्ति दी।
  • कथन 2 सही है– अधिनियम ने निर्देश दिया कि हिंदुओं के निजी मामलों का निपटारा हिंदू कानून के अनुसार और मुसलमानों के निजी मामलों का निपटारा मुस्लिम कानून के अनुसार किया जाए, जिससे भारतीय रीति-रिवाजों का सम्मान सुनिश्चित हुआ।

प्रश्न 5

1781 के अधिनियम के तहत, प्रांतीय न्यायालयों से आने वाली अपीलों को किसके पास दायर किया जाना था? (A) इंग्लैंड में स्थित प्रिवी काउंसिल (B) कलकत्ता का सर्वोच्च न्यायालय (C) गवर्नर-जनरल एवं उसकी परिषद (D) निदेशक मंडल (Court of Directors)

सही उत्तर (C) गवर्नर-जनरल एवं उसकी परिषद

व्याख्या– इस अधिनियम ने गवर्नर-जनरल इन काउंसिल को प्रांतीय न्यायालयों की अपीलें सुनने के लिए सदर दीवानी अदालत के रूप में कार्य करने का अधिकार दिया। अंतिम अपील किंग-इन-काउंसिल (प्रिवी काउंसिल) के पास की जा सकती थी।

प्रश्न 6

इस अधिनियम ने किस सिद्धांत को स्थापित करने की दिशा में पहला प्रयास किया, जिसके तहत दो प्रमुख अंगों के कार्यों को अलग किया गया? (A) उत्तरदायी सरकार का सिद्धांत (B) शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत (C) कानून का शासन (Rule of Law) (D) सामुदायिक प्रतिनिधित्व का सिद्धांत

सही उत्तर– (B) शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत

व्याख्या– 1781 के अधिनियम ने कार्यपालिका (गवर्नर-जनरल) और न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय) के अधिकार क्षेत्रों को परिभाषित करके उन्हें एक-दूसरे के हस्तक्षेप से बचाने की कोशिश की, जो शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत की ओर पहला कदम था।

प्रश्न 7

1781 के संशोधन अधिनियम के बाद, गवर्नर-जनरल इन काउंसिल द्वारा तय किए गए मामलों की अंतिम अपील कहाँ की जा सकती थी? (A) ब्रिटिश संसद (British Parliament) (B) कलकत्ता का सर्वोच्च न्यायालय (C) किंग-इन-काउंसिल (King-in-Council) (D) निदेशक मंडल का न्यायालय

सही उत्तर (C) किंग-इन-काउंसिल (King-in-Council)

व्याख्या– गवर्नर-जनरल इन काउंसिल द्वारा दीवानी अपीलें सुनने के बाद, उन पर अंतिम अपील ब्रिटिश क्राउन से जुड़ी न्यायिक निकाय, किंग-इन-काउंसिल (जो बाद में प्रिवी काउंसिल बन गई) के पास दायर की जा सकती थी।

प्रश्न 8

1781 के अधिनियम का मुख्य परिणाम क्या था? (A) भारत में केंद्रीय शासन को समाप्त करना (B) कार्यपालिका की स्थिति को न्यायिक नियंत्रण से मुक्त कर मजबूत करना (C) ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारियों को न्यायिक जांच के अधीन लाना (D) सर्वोच्च न्यायालय को बंगाल, बिहार और उड़ीसा का सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय घोषित करना

सही उत्तर (B) कार्यपालिका की स्थिति को न्यायिक नियंत्रण से मुक्त कर मजबूत करना

व्याख्या– इस अधिनियम ने गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर करके कार्यपालिका (Executive) को न्यायपालिका (Judiciary) के हस्तक्षेप से पर्याप्त स्वतंत्रता प्रदान की।

प्रश्न 9

अधिनियम में ‘राजस्व से संबंधित मामले’ (Matters concerning Revenue) को सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर रखने का क्या निहितार्थ था? (A) कंपनी ने अब भारत में राजस्व संग्रह बंद कर दिया। (B) राजस्व संग्रह अब पूरी तरह से भारतीय अधिकारियों को सौंप दिया गया। (C) राजस्व संग्रह और प्रशासन में न्यायालय का हस्तक्षेप समाप्त हो गया। (D) राजस्व संग्रह के मामलों की अपील सीधे किंग-इन-काउंसिल में की जाने लगी।

सही उत्तर– (C) राजस्व संग्रह और प्रशासन में न्यायालय का हस्तक्षेप समाप्त हो गया।

व्याख्या – राजस्व मामले सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर होने का अर्थ था कि कंपनी के राजस्व प्रशासन और संग्रह की प्रक्रिया पर अब न्यायालय द्वारा कोई बाधा या न्यायिक जांच नहीं की जा सकती थी, जिससे कंपनी की वित्तीय कार्यप्रणाली सुचारू रूप से चल सके।

प्रश्न 10

निम्नलिखित में से कौन-सा अधिनियम 1781 के संशोधन अधिनियम के तुरंत बाद भारत में संवैधानिक विकास की दिशा में अगला महत्वपूर्ण कदम था? (A) चार्टर अधिनियम, 1793 (B) पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 (C) रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773 (D) भारत सरकार अधिनियम, 1858

सही उत्तर (B) पिट्स इंडिया एक्ट, 1784

व्याख्या– 1781 के अधिनियम ने 1773 के दोषों को सुधारा, लेकिन कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्यिक कार्यों को अलग करने तथा भारत में ब्रिटिश नियंत्रण को और मजबूत करने के लिए इसके तुरंत बाद 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट लाया गया।

1781 के संशोधन अधिनियम पर UPSC मुख्य परीक्षा के प्रश्न

ये प्रश्न सामान्य अध्ययन (GS) पेपर II के ‘भारतीय संविधान का ऐतिहासिक आधार’ खंड के लिए प्रासंगिक हैं।

1. विश्लेषणात्मक प्रश्न (150 शब्द / 10 अंक)

प्रश्न– 1781 के संशोधन अधिनियम को ‘घोषणात्मक अधिनियम’ क्यों कहा जाता है? इसने 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट द्वारा उत्पन्न संवैधानिक गतिरोध को किस प्रकार सुलझाया?

2. आलोचनात्मक मूल्यांकन प्रश्न (250 शब्द / 15 अंक)

प्रश्न– “1781 का बंदोबस्त अधिनियम ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन में कार्यपालिका को न्यायपालिका पर सर्वोच्चता प्रदान करने की दिशा में एक निर्णायक कदम था।” आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए और इसके निहितार्थों की विवेचना कीजिए।

3. तुलनात्मक/व्यापक प्रश्न (250 शब्द / 15 अंक)

प्रश्न1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट की विफलता ने 1781 के संशोधन अधिनियम को जन्म दिया। इस अधिनियम के उन प्रमुख प्रावधानों की व्याख्या कीजिए जिन्होंने पहली बार भारत में ब्रिटिश न्यायिक प्रणाली के भीतर व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) और राजस्व प्रशासन के महत्व को सुनिश्चित किया।

उत्तर लिखते समय ध्यान देने योग्य बिंदु

  • परिचय– 1781 के अधिनियम की पृष्ठभूमि (1773 के एक्ट की कमियाँ) संक्षेप में बताएं।
  • मुख्य भाग (Body)– प्रश्नों की मांग के अनुसार प्रमुख प्रावधानों और उनके महत्व को स्पष्ट करें।
    • कार्यपालिका की सर्वोच्चता– गवर्नर-जनरल और कंपनी के सेवकों को न्यायिक क्षेत्राधिकार से मिली छूट का उल्लेख करें।
    • शक्ति पृथक्करण– क्षेत्राधिकार के सीमांकन के प्रयास को समझाएं।
    • भारतीय कानून– हिंदू/मुस्लिम कानूनों के प्रयोग के प्रावधान को महत्व दें।
  • निष्कर्ष– संक्षेप में बताएं कि यह अधिनियम आगे के संवैधानिक विकास (जैसे पिट्स इंडिया एक्ट, 1784) के लिए मार्ग प्रशस्त करने वाला एक आवश्यक कदम था।

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