परिचय
भारत में पंचायती राज व्यवस्था स्थानीय स्वशासन का एक मूलभूत स्तंभ है, जो जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करती है। यह भारतीय संविधान के 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के माध्यम से अस्तित्व में आई, जिसने इसे संवैधानिक दर्जा प्रदान किया। यह प्रणाली ग्रामीण भारत के लोगों को अपने विकास की योजना बनाने और निर्णय लेने की शक्ति सौंपती है। एनसीईआरटी कक्षा 6, अध्याय 5 इस व्यवस्था के प्राथमिक स्तर, यानी ग्राम सभा और ग्राम पंचायत, की कार्यप्रणाली को सरल तरीके से समझाता है। यूपीएससी की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए, इस अध्याय की बुनियादी समझ के साथ-साथ संवैधानिक और विकासात्मक पहलुओं को जानना अत्यंत आवश्यक है। यह लेख आपको इन्हीं सभी आयामों से परिचित कराता है।
पंचायती राज का अर्थ और परिभाषा

पंचायती राज का शाब्दिक अर्थ “गांव के बुजुर्गों का शासन” है। यह भारत में ग्रामीण स्थानीय स्वशासन की एक प्रणाली है।
- परिभाषा– पंचायती राज व्यवस्था एक ऐसी लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की प्रणाली है जिसके तहत ग्राम, मध्यवर्ती (ब्लॉक) और जिला स्तर पर स्थानीय स्वशासन संस्थाओं का गठन किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य आम नागरिकों की विकास और प्रशासन में सीधी भागीदारी सुनिश्चित करना है। यह भारत के संघीय ढांचे का तीसरा स्तर भी है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में पंचायती राज की जड़ें प्राचीन काल से ही रही हैं, जहां ग्राम सभाएं स्व-प्रशासन की इकाई थीं।
- वैदिक काल– गांव सबसे प्राथमिक प्रशासनिक इकाई थी।
- ब्रिटिश काल–
- 1882– लॉर्ड रिपन ने स्थानीय स्वशासन के लिए एक प्रस्ताव दिया, जिन्हें ‘स्थानीय स्वशासन का जनक’ कहा जाता है।
- 1907– रॉयल कमीशन ऑन डीसेंट्रलाइजेशन ने ग्राम पंचायतों के महत्व को रेखांकित किया।
- गांधीवादी दर्शन– महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज की कल्पना की, जिसके तहत गांवों को आत्मनिर्भर बनाना था। संविधान के अनुच्छेद 40 में इसका उल्लेख एक राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत (DPSP) के रूप में किया गया है।
- स्वतंत्रता के बाद की प्रमुख समितियां:
- बलवंत राय मेहता समिति (1957)– इसने लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के सिद्धांत पर आधारित त्रि-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली की सिफारिश की।
- अशोक मेहता समिति (1977)– इसने द्वि-स्तरीय प्रणाली (मंडल पंचायत और जिला परिषद) की सिफारिश की।
- एल.एम. सिंघवी समिति (1986)– इसने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता देने की सिफारिश की।
मुख्य विशेषताएं (73वां संविधान संशोधन, 1992)
73वें संविधान संशोधन ने भारतीय संविधान में एक नया भाग IX और ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी, जिसमें पंचायतों को 29 विषय प्रदान किए गए।
त्रि-स्तरीय प्रणाली
- ग्राम स्तर– ग्राम पंचायत (कार्यकारी संस्था) और ग्राम सभा (विधायी निकाय)।
- मध्यवर्ती स्तर– पंचायत समिति या जनपद पंचायत (20 लाख से कम आबादी वाले राज्यों को छूट)।
- जिला स्तर– जिला परिषद।
संवैधानिक प्रावधान
- ग्राम सभा (अनुच्छेद 243-A)– गांव स्तर पर निर्वाचक नामावली में पंजीकृत सभी व्यक्तियों का समूह।
- चुनाव (अनुच्छेद 243-K)– पंचायतों के चुनाव के लिए राज्य निर्वाचन आयोग का गठन। चुनाव हर 5 साल में अनिवार्य।
- आरक्षण (अनुच्छेद 243-D)–
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आरक्षण।
- महिलाओं के लिए कुल सीटों का एक-तिहाई से कम नहीं।
- वित्त (अनुच्छेद 243-I)– पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए राज्य वित्त आयोग का गठन।
- अवधि– 5 वर्ष, भंग होने की स्थिति में 6 महीने के भीतर नए चुनाव।
यूपीएससी प्रीलिम्स के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- लागू होने की तिथि– 24 अप्रैल, 1993 (इसलिए 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाया जाता है)।
- पहला राज्य– राजस्थान के नागौर जिले में 2 अक्टूबर, 1959 को पहली बार पंचायती राज व्यवस्था स्थापित की गई।
- अपवाद– यह अधिनियम नागालैंड, मेघालय और मिजोरम राज्यों पर लागू नहीं होता है।
- ग्यारहवीं अनुसूची– इसमें 29 कार्यात्मक विषय शामिल हैं जिन पर पंचायतों को विधि बनाने और कार्य करने का अधिकार है।
- चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु– 21 वर्ष।
मुख्य उत्तर लेखन दृष्टिकोण (Value-Added Points)
पंचायती राज पर मुख्य परीक्षा के उत्तर को प्रभावी बनाने के लिए इन बिंदुओं का उपयोग करें
पंचायती राज का महत्व
- लोकतंत्र का विकेंद्रीकरण– यह सत्ता को स्थानीय लोगों तक पहुंचाता है, जिससे वे अपने निर्णय खुद ले सकते हैं।
- समावेशी विकास– अनुसूचित जाति/जनजाति और महिलाओं के लिए आरक्षण के कारण हाशिए के समूहों की राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित होती है।
- योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन– स्थानीय जरूरतों के अनुसार सरकारी योजनाओं जैसे मनरेगा, स्वच्छ भारत मिशन को लागू करने में मदद मिलती है।
- उत्तरदायित्व और पारदर्शिता– ग्राम सभा के माध्यम से ग्राम पंचायत के कार्यों की निगरानी संभव होती है, जिससे उत्तरदायित्व (Accountability) बढ़ती है।
चुनौतियाँ और आगे की राह
| चुनौतियाँ (Challenges) | सुझावात्मक उपाय (Way Forward) |
| वित्त की कमी– पंचायतों को अधिकांश राजस्व केंद्र/राज्य अनुदान से मिलता है। | पंचायतों को संपत्ति कर, शुल्क और टोल लगाने के अधिक स्वतंत्र अधिकार देना। |
| कार्यों का अपर्याप्त हस्तांतरण– 29 विषयों पर शक्तियों का पूर्ण रूप से हस्तांतरण नहीं। | ‘फंक्शन, फंड और फंक्शनरी’ (3F) का पूर्ण रूप से पंचायतों को हस्तांतरण करना। |
| राजनीतिक हस्तक्षेप– राज्य सरकारों का अनावश्यक हस्तक्षेप। | राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य वित्त आयोग को अधिक स्वायत्तता देना। |
| मानव संसाधन की कमी– प्रशिक्षित कर्मचारियों और क्षमता निर्माण का अभाव। | प्रतिनिधियों के लिए नियमित क्षमता निर्माण (Capacity Building) प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना। |
यूपीएससी पिछले वर्ष के प्रश्न
| वर्ष | प्रश्न (Prelims / Mains) |
| 2017 (मुख्य) | “गांधी का अंतिम सपना प्रत्येक गांव को एक ‘गणतंत्र’ बनाना था, जिसमें सभी शक्तियाँ होतीं।” इस कथन के आलोक में, पंचायती राज व्यवस्था के उत्थान और सशक्तिकरण में सामने आई चुनौतियों पर विचार करें। |
| 2016 (Prelims) | निम्नलिखित में से कौन-सा एक, पंचायत से संबंधित नहीं है? (a) राज्य निर्वाचन आयोग (b) 73वाँ संविधान संशोधन (c) संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची (d) संविधान का अनुच्छेद 243-B |
| 2015 (मुख्य) | पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण का भारतीय राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ा है? |
पंचायती राज संस्थाओं का तुलनात्मक अवलोकन
| संस्था | स्तर | सदस्य | कार्य |
| ग्राम सभा | ग्राम | 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के सभी मतदाता | ग्राम पंचायत के कार्यों की निगरानी, योजना को मंजूरी देना। |
| ग्राम पंचायत | ग्राम | निर्वाचित सरपंच/प्रधान और पंच/वार्ड सदस्य | ग्रामीण विकास, स्वच्छता, पेयजल, स्ट्रीट लाइट जैसे 29 विषयों पर कार्य करना। |
| पंचायत समिति | मध्यवर्ती (ब्लॉक) | संबंधित ग्राम पंचायतों के सदस्य, विधायक आदि। | ब्लॉक स्तर पर ग्राम पंचायतों के विकास कार्यों का समन्वय। |
| जिला परिषद | जिला | निर्वाचित सदस्य, जिले के सांसद/विधायक आदि। | पूरे जिले के लिए विकास योजनाएं बनाना और पंचायत समितियों का पर्यवेक्षण करना। |
निष्कर्ष
पंचायती राज संस्थाएं भारतीय लोकतंत्र की आत्मा हैं और ग्राम स्वराज के गांधीवादी आदर्शों को साकार करने का माध्यम हैं। 73वें संविधान संशोधन ने इन्हें संवैधानिक वैधता देकर न केवल ग्रामीण विकास की गति को तेज किया है, बल्कि महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय को भी बढ़ावा दिया है। हालांकि, वित्तीय स्वायत्तता की कमी और कार्यों के अपर्याप्त हस्तांतरण जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। इन संस्थाओं को सही मायने में सशक्त बनाने के लिए, केंद्र और राज्य सरकारों को ‘ट्रस्ट डिफिसिट’ को कम करते हुए, इन्हें पर्याप्त फंड, फंक्शन और फंक्शनरी प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा, ताकि ये ग्रामीण भारत की वास्तविक आवश्यकताओं को पूरा कर सकें और स्थानीय लोकतंत्र के प्रकाश स्तंभ के रूप में चमक सकें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. पंचायती राज का मुख्य उद्देश्य क्या है? Ans. पंचायती राज का मुख्य उद्देश्य सत्ता का विकेंद्रीकरण करना, ग्रामीण जनता की स्थानीय प्रशासन में भागीदारी सुनिश्चित करना और ग्रामीण विकास को बढ़ावा देना है।
Q2. 73वाँ संविधान संशोधन कब लागू हुआ? Ans. 73वाँ संविधान संशोधन 24 अप्रैल, 1993 को लागू हुआ, जिसे भारत में राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के रूप में मनाया जाता है।
Q3. ग्राम सभा क्या है? Ans. ग्राम सभा ग्राम स्तर पर पंजीकृत सभी मतदाताओं से मिलकर बनी एक स्थायी संस्था है, जो ग्राम पंचायत की नीतियों की समीक्षा और निगरानी करती है।
Q4. पंचायतों में सीटों का आरक्षण किस आधार पर किया जाता है? Ans. पंचायतों में SC/ST के लिए आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात में होता है, जबकि महिलाओं के लिए एक तिहाई से कम नहीं सीटों का आरक्षण अनिवार्य है।
Q5. पंचायतों को कौन-सी अनुसूची के तहत कार्य करने की शक्ति प्राप्त है? Ans. पंचायतों को संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची के तहत सूचीबद्ध 29 विषयों पर विधि बनाने और कार्य करने की शक्ति प्राप्त है।
आंतरिक लिंकिंग सुझाव (Internal Linking Suggestion Keywords)
- स्थानीय स्वशासन
- 74वां संविधान संशोधन (नगरपालिकाएं)
- राज्य निर्वाचन आयोग
- राज्य वित्त आयोग
- भारतीय संविधान का भाग IX
- बलवंत राय मेहता समिति
- अनुच्छेद 40
- विकेन्द्रीकरण
- ग्यारहवीं अनुसूची
