परिचय

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में, प्रत्येक 20 वर्ष पर ब्रिटिश संसद द्वारा कंपनी के शासन को जारी रखने के लिए अधिनियम पारित किए जाते थे। इसी कड़ी में 1793 का चार्टर एक्ट एक महत्वपूर्ण विधायी दस्तावेज था, जिसने कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया। यह अधिनियम लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा भारत में किए गए प्रशासनिक और न्यायिक सुधारों को वैधानिकता प्रदान करने और उन्हें स्थायी बनाने के उद्देश्य से लाया गया था। इस अधिनियम ने कंपनी के अधिकारियों की शक्तियों को स्पष्ट किया और भारत में ब्रिटिश शासन के केंद्रीकरण की प्रक्रिया को और मजबूत किया। यह भारतीय संवैधानिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसे UPSC उम्मीदवारों को गहराई से समझना आवश्यक है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)

1793 का चार्टर एक्ट, विशेषताएँ, प्रभाव और UPSC के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

1773 के रेगुलेटिंग एक्ट और 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट ने भारत में कंपनी के प्रशासन को ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण में लाने की शुरुआत की थी। 1786 में, जब लॉर्ड कॉर्नवालिस भारत के गवर्नर-जनरल बने, तो उन्होंने कुछ विशेष मांगें रखीं— जैसे कि विशेष परिस्थितियों में परिषद् के निर्णयों को रद्द करने का अधिकार। 1793 का चार्टर एक्ट मुख्य रूप से इन मांगों को पूरा करने, कॉर्नवालिस के सुधारों को औपचारिक मान्यता देने और कंपनी के चार्टर को नवीनीकृत करने के लिए लाया गया था। इसके अलावा, कंपनी के बढ़ते खर्चों को पूरा करने और प्रशासनिक व्यवस्था को और अधिक सुव्यवस्थित करने की आवश्यकता भी थी।

1793 के चार्टर एक्ट की मुख्य विशेषताएँ (Key Features)

यह अधिनियम कई महत्वपूर्ण प्रावधानों के साथ आया, जिन्होंने भारतीय प्रशासन की दिशा तय की

  • कंपनी का एकाधिकार विस्तार – कंपनी के भारतीय व्यापार के एकाधिकार को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया।
  • गवर्नर-जनरल की शक्ति में वृद्धि
    • गवर्नर-जनरल को विशेष परिस्थितियों में अपनी परिषद् के निर्णयों को रद्द करने (ओवरराइड करने) का अधिकार दिया गया। यह अधिकार पहले केवल कॉर्नवालिस के लिए था, जिसे अब भविष्य के गवर्नर-जनरल के लिए भी स्थायी बना दिया गया।
    • उसे बंबई (बॉम्बे) और मद्रास प्रेसीडेंसियों पर अधिक नियंत्रण प्रदान किया गया।
  • वेतन का भुगतान – नियंत्रण बोर्ड (Board of Control) के सदस्यों और उनके कर्मचारियों का वेतन अब भारतीय राजस्व से दिया जाना तय किया गया। यह प्रावधान 1919 तक बना रहा और इसे भारत की संपत्ति के ‘निकासी’ (Drain of Wealth) के संदर्भ में देखा जाता है।
  • भारत में कानून निर्माण – गवर्नर-जनरल को यह अधिकार दिया गया कि वह स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार नियम और कानून बना सकता है। इन नियमों को लागू करने के लिए न्यायपालिका को भी सशक्त किया गया।
  • कमांडर-इन-चीफ की स्थिति – यह अनिवार्य नहीं रहा कि गवर्नर-जनरल को कमांडर-इन-चीफ (सेनापति) होना चाहिए।
  • कंपनी के व्यय पर नियंत्रण – कंपनी को यह सुनिश्चित करना था कि वह ब्रिटिश सरकार को 5 लाख पाउंड का वार्षिक भुगतान करेगी, बशर्ते उसका व्यय कम हो और लाभांश का भुगतान हो चुका हो।

भारतीय प्रशासन पर प्रभाव (Impact on Indian Administration)

पहलूपक्ष (Pros)विपक्ष (Cons)
प्रशासनिक स्थिरताकंपनी के शासन को 20 वर्ष का विस्तार मिला, जिससे दीर्घकालिक योजनाएँ बनाना संभव हुआ।भारतीय राजस्व का उपयोग ब्रिटिश अधिकारियों के वेतन के लिए किया गया, जो भारत पर एक वित्तीय बोझ था।
केंद्रीकरणगवर्नर-जनरल की शक्तियों में वृद्धि से प्रशासनिक कार्यों में शीघ्रता और एकता आई।बंबई और मद्रास प्रेसीडेंसियों की स्वायत्तता कम हुई, जिससे शक्तियों का अत्यधिक केंद्रीकरण हुआ।
न्यायिक सुधारभारत में लागू कानूनों की व्याख्या करने का अधिकार न्यायपालिका को मिला, जिससे कानून का शासन मजबूत हुआ।यह अधिनियम भारतीयों के अधिकारों पर कोई ध्यान नहीं देता था और पूरी तरह से ब्रिटिश हितों पर केंद्रित था।

UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Important Facts for UPSC Prelims)

  • इस एक्ट के तहत, कंपनी के भारतीय राजस्व पर ब्रिटिश नियंत्रण बोर्ड का अधिकार स्थापित हुआ।
  • यह प्रावधान किया गया कि सभी खर्च, वेतन और लाभांश के भुगतान के बाद, कंपनी को ब्रिटिश सरकार को 5 लाख पाउंड वार्षिक देना होगा।
  • नियंत्रण बोर्ड के सदस्यों को भारतीय राजस्व से भुगतान करने का प्रावधान इसी एक्ट में किया गया था।
  • एक्ट में स्पष्ट किया गया कि सभी कानून और विनियम अंग्रेजी भाषा में बनाए जाने थे, जिससे प्रशासन में एकरूपता आए।
  • यह अधिनियम लॉर्ड कॉर्नवालिस के कार्यकाल के दौरान किए गए सुधारों को स्थायी रूप प्रदान करने के लिए महत्वपूर्ण था।

मुख्य परीक्षा उत्तर लेखन का दृष्टिकोण (Mains Answer Writing Angle)

मुख्य परीक्षा में 1793 के चार्टर एक्ट से संबंधित प्रश्न इसके प्रभावों और भारतीय संवैधानिक विकास में इसकी भूमिका पर केंद्रित हो सकते हैं।

मूल्य-वर्धित बिंदु (Value-Added Points)

  1. केंद्रीकरण की प्रक्रिया को बल – यह अधिनियम भारत में ब्रिटिश शासन के अंतर्गत शक्तियों के केंद्रीकरण की प्रक्रिया को और मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण चरण था, जो 1833 के चार्टर एक्ट में चरम पर पहुंचा।
  2. धन का बहिर्वाह (Drain of Wealth) – भारतीय राजस्व से नियंत्रण बोर्ड के सदस्यों के वेतन के भुगतान का प्रावधान दादाभाई नौरोजी के ‘धन का बहिर्वाह’ सिद्धांत का एक प्रारंभिक उदाहरण था।
  3. कानूनी ढाँचे का विस्तार – इस एक्ट ने भारत में लिखित कानूनों (Regulations) और उनके क्रियान्वयन के लिए एक सशक्त न्यायिक मशीनरी की नींव रखी। इससे ‘विधि का शासन’ (Rule of Law) धीरे-धीरे स्थापित होने लगा।
  4. प्रशासनिक ओवरराइड की शक्ति – गवर्नर-जनरल को परिषद् के निर्णयों को रद्द करने की शक्ति देना, उसे वास्तविक शासक के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक निर्णायक कदम था।

मॉडल प्रश्न – “1793 का चार्टर एक्ट भारतीय संवैधानिक इतिहास में महज एक विस्तार नहीं था, बल्कि इसने ब्रिटिश शासन के केंद्रीकरण और धन के बहिर्वाह की प्रक्रिया को संस्थागत बनाया।” समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (150 शब्द)

UPSC विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs)

UPSC Prelims (उदाहरण के लिए)

  • 2019/2020 (थीम आधारित): ब्रिटिश भारत में निम्नलिखित में से किस अधिनियम ने नियंत्रण बोर्ड के कर्मचारियों के वेतन का भुगतान भारतीय राजस्व से करने का प्रावधान किया?
    • (a) 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट
    • (b) 1793 का चार्टर एक्ट
    • (c) 1813 का चार्टर एक्ट
    • (d) 1833 का चार्टर एक्ट

UPSC Mains (उदाहरण के लिए)

  • 2017/2018 (थीम आधारित): ‘विधि के शासन’ की स्थापना में 1793 के चार्टर अधिनियम की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। (150 शब्द)

निष्कर्ष (Conclusion)

1793 का चार्टर एक्ट, जो ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को 20 वर्षों के लिए विस्तारित करने के लिए लाया गया था, भारतीय संवैधानिक और प्रशासनिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ। इसने गवर्नर-जनरल की शक्तियों में अभूतपूर्व वृद्धि की, प्रशासनिक दक्षता और केंद्रीकरण को बढ़ावा दिया, और सबसे महत्वपूर्ण रूप से, नियंत्रण बोर्ड के व्यय का बोझ भारतीय राजस्व पर डालकर भारत की वित्तीय स्वायत्तता को प्रभावित किया। यह अधिनियम, यद्यपि ब्रिटिश हितों की पूर्ति के लिए था, लेकिन इसने भारत में एक व्यवस्थित, लिखित कानूनी ढाँचे की शुरुआत की। इस प्रकार, यह भविष्य के संवैधानिक विकास, विशेष रूप से 1813 और 1833 के चार्टर अधिनियमों के लिए एक मजबूत आधार तैयार करने में सफल रहा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) – 5 Simple Q&A for UPSC Exam

Q1. 1793 का चार्टर एक्ट किस उद्देश्य से लाया गया था?

A – यह एक्ट ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को 20 वर्षों के लिए विस्तारित करने, लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा मांगे गए अधिकारों को औपचारिक रूप देने और प्रशासनिक व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के उद्देश्य से लाया गया था।

Q2. इस एक्ट के तहत गवर्नर-जनरल को कौन सा महत्वपूर्ण अधिकार मिला?

A – गवर्नर-जनरल को अपनी परिषद् के निर्णयों को विशेष परिस्थितियों में ओवरराइड (रद्द) करने का अधिकार मिला।

Q3. 1793 के एक्ट में भारतीय राजस्व से किसका वेतन देने का प्रावधान किया गया था?

A -इस एक्ट में ब्रिटिश नियंत्रण बोर्ड (Board of Control) के सदस्यों और उनके कर्मचारियों का वेतन भारतीय राजस्व से देने का प्रावधान किया गया था।

Q4. यह एक्ट 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट से किस प्रकार भिन्न था?

A – 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्यिक कार्यों को अलग करने पर केंद्रित था, जबकि 1793 का एक्ट मुख्य रूप से कंपनी के चार्टर का नवीनीकरण और गवर्नर-जनरल की शक्तियों को स्थायी रूप से बढ़ाने पर केंद्रित था।

Q5. 1793 के एक्ट के तहत कंपनी के एकाधिकार को कितने वर्षों के लिए बढ़ाया गया?

A – कंपनी के भारतीय व्यापार के एकाधिकार को 20 वर्षों के लिए बढ़ाया गया था।

आंतरिक लिंकन सुझाव कीवर्ड (Internal Linking Suggestion Keywords)

  • 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट
  • 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट
  • 1813 का चार्टर एक्ट
  • 1833 का चार्टर एक्ट
  • लॉर्ड कॉर्नवालिस
  • ईस्ट इंडिया कंपनी का संवैधानिक विकास
  • धन का बहिर्वाह सिद्धांत

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