परिचय

ब्रिटिश संसद द्वारा पारित संवैधानिक इतिहास की श्रृंखला में 1853 के चार्टर अधिनियम अंतिम चार्टर एक्ट था। यह अधिनियम संवैधानिक विकास की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है। इसने ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया, जो पिछले चार्टर एक्ट्स की 20 वर्षों की निश्चित अवधि से अलग था।

यह अधिनियम लॉर्ड डलहौजी के कार्यकाल के दौरान पारित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में कंपनी के प्रशासन में सुधार करना और विधायी कार्यों को कार्यपालिका से अलग करना था। यह आधुनिक भारतीय संसदीय प्रणाली की नींव रखने वाला पहला कदम माना जाता है, जिसने भविष्य के प्रशासनिक ढांचे को आकार दिया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1853 के चार्टर अधिनियम,विशेषताएं,UPSC नोट्स
1853 के चार्टर अधिनियम,विशेषताएं,UPSC नोट्स

1793, 1813 और 1833 के चार्टर अधिनियमों के विपरीत, इस अधिनियम के पीछे कुछ विशेष परिस्थितियां थीं। 1833 का चार्टर अधिनियम 20 वर्षों के लिए था और 1853 में इसकी अवधि समाप्त हो रही थी। उस समय भारत में कंपनी के शासन को लेकर ब्रिटेन में काफी असंतोष था।

कंपनी के क्षेत्रीय विस्तार और प्रशासनिक जिम्मेदारियों में भारी वृद्धि हो चुकी थी। लॉर्ड डलहौजी ने प्रशासन में सुधार और केंद्रीकरण की कमियों को दूर करने के लिए एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इसके अलावा, भारतीयों और ब्रिटेन के उदारवादी नेताओं द्वारा कंपनी के एकाधिकार को समाप्त करने और सिविल सेवाओं में भेदभाव को खत्म करने की मांग जोर पकड़ रही थी। इन्हीं कारणों से ब्रिटिश संसद ने जांच की और अंततः इस अधिनियम को पारित किया।

1853 के चार्टर अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं

इस अधिनियम ने भारतीय प्रशासन के ढांचे में व्यापक बदलाव किए। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं

  • विधायी और कार्यकारी कार्यों का पृथक्करण गवर्नर-जनरल की परिषद (Council) के विधायी (Legislative) और कार्यकारी (Executive) कार्यों को पहली बार अलग किया गया। कानून बनाने की प्रक्रिया को प्रशासन चलाने की प्रक्रिया से पृथक माना गया।
  • केंद्रीय विधान परिषद का गठन विधायी कार्यों के लिए परिषद में 6 नए सदस्य जोड़े गए। इन्हें ‘विधान पार्षद’ कहा गया। इस प्रकार एक अलग ‘केंद्रीय विधान परिषद’ (Indian Central Legislative Council) अस्तित्व में आई। इसने ब्रिटिश संसद की तर्ज पर कार्य करना शुरू किया, जिसे ‘लघु संसद’ (Mini Parliament) भी कहा गया।
  • स्थानीय प्रतिनिधित्व की शुरुआत भारतीय केंद्रीय विधान परिषद में पहली बार स्थानीय प्रतिनिधित्व को स्थान दिया गया। गवर्नर-जनरल की परिषद में जोड़े गए 6 नए विधायी सदस्यों में से 4 का चुनाव मद्रास, बॉम्बे, बंगाल और आगरा की प्रांतीय सरकारों द्वारा किया जाना था।
  • कंपनी के शासन का विस्तार इस अधिनियम ने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारतीय क्षेत्रों और राजस्व को ‘क्राउन’ (ब्रिटिश ताज) की ओर से ट्रस्ट के रूप में रखने की अनुमति दी। हालाँकि, इसमें पिछले एक्ट्स की तरह किसी निश्चित समय सीमा का उल्लेख नहीं किया गया था। इसका स्पष्ट संकेत था कि ब्रिटिश संसद किसी भी समय कंपनी का शासन समाप्त कर सकती थी।

सिविल सेवा में सुधार

1853 के चार्टर एक्ट का सबसे क्रांतिकारी कदम सिविल सेवाओं के संबंध में था।

  • खुली प्रतियोगिता का आरंभ इसने सिविल सेवकों की भर्ती और चयन के लिए ‘खुली प्रतियोगिता प्रणाली’ (Open Competition System) की शुरुआत की। अब सिविल सेवा केवल कंपनी के निदेशकों की सिफारिश (Patronage) तक सीमित नहीं रही।
  • भारतीयों के लिए अवसर विशिष्ट सिविल सेवा (Covenanted Civil Services) के दरवाजे भारतीयों के लिए भी खोल दिए गए। इससे पहले उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति लगभग असंभव थी।
  • मैकाले समिति इस प्रावधान को लागू करने के लिए 1854 में ‘भारतीय सिविल सेवा पर समिति’ (मैकाले समिति) नियुक्त की गई।

UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

UPSC प्रीलिम्स में इस टॉपिक से सीधे तथ्यात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं। नीचे दिए गए बिंदु याद रखें

  • गवर्नर-जनरल यह एक्ट लॉर्ड डलहौजी के समय पारित हुआ।
  • अंतिम चार्टर यह ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अंतिम चार्टर अधिनियम था।
  • सदस्य संख्या कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स (Court of Directors) की संख्या 24 से घटाकर 18 कर दी गई, जिनमें से 6 क्राउन द्वारा मनोनीत होते थे।
  • विधि सदस्य गवर्नर-जनरल की परिषद के विधि सदस्य (Law Member) को पूर्ण सदस्य का दर्जा दिया गया।
  • प्रथम भारतीय सदस्य? ध्यान दें, इस एक्ट के तहत केंद्रीय विधान परिषद में किसी भी ‘भारतीय’ को शामिल नहीं किया गया था। स्थानीय प्रतिनिधित्व का अर्थ ‘ब्रिटिश अधिकारियों’ से था जो प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते थे।

मुख्य परीक्षा विश्लेषण

UPSC मेन्स में आपको इस अधिनियम का आलोचनात्मक मूल्यांकन (Critical Analysis) करना होता है।

सकारात्मक पक्ष (Significance) यह अधिनियम आधुनिक संसदीय व्यवस्था का आधार बना। कार्यपालिका और विधायिका के बीच शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत यहीं से शुरू हुआ। खुली प्रतियोगिता ने योग्यता (Meritocracy) को प्रशासन का आधार बनाया।

आलोचना (Limitations) इस अधिनियम में भारतीयों को प्रशासन में शामिल करने का दावा तो किया गया, लेकिन विधान परिषद में किसी भी भारतीय को जगह नहीं मिली। यह पूरी तरह से अंग्रेजों द्वारा डोमिनेटेड थी। इसके अलावा, यह स्पष्ट हो गया था कि कंपनी का शासन अब गिनती के दिनों का मेहमान है, जिससे प्रशासन में अनिश्चितता बनी रही।

UPSC Previous Year Questions

  • 2003 (Prelims) निम्नलिखित में से किस अधिनियम ने भारत में सिविल सेवा के लिए प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली के सिद्धांत को स्वीकार किया? (उत्तर: 1853 का चार्टर अधिनियम)
  • 2010 (Prelims) चार्टर अधिनियम 1853 के संदर्भ में, विधान परिषद में स्थानीय प्रतिनिधित्व के सिद्धांत का क्या अर्थ था?
  • Mains Practice Question “1853 का चार्टर अधिनियम भारतीय संवैधानिक विकास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने संसदीय प्रणाली के बीज बोए।” टिप्पणी करें।

तुलनात्मक अध्ययन

विशेषता1833 का चार्टर अधिनियम1853 का चार्टर अधिनियम
समय सीमा20 वर्षों के लिए शासन बढ़ाया गया।अनिश्चित काल के लिए बढ़ाया गया।
सिविल सेवाखुली प्रतियोगिता का प्रयास (विफल)।खुली प्रतियोगिता पूरी तरह लागू।
विधायिकाकार्यपालिका और विधायिका एक ही थी।पहली बार विधायिका और कार्यपालिका अलग हुई।
प्रतिनिधित्वकोई स्थानीय प्रतिनिधित्व नहीं।4 सदस्यों का प्रांतीय प्रतिनिधित्व।

निष्कर्ष

1853 ka Charter Adhiniyam ब्रिटिश शासन के दौरान संवैधानिक विकास की प्रक्रिया का एक निर्णायक मोड़ था। यद्यपि इसमें भारतीयों की प्रत्यक्ष भागीदारी की कमी थी, लेकिन इसने संसदीय स्वरूप और स्वतंत्र सिविल सेवा चयन प्रक्रिया की नींव रखी। इस अधिनियम ने स्पष्ट कर दिया कि ईस्ट इंडिया कंपनी की राजनीतिक भूमिका समाप्त होने वाली है। अंततः, 1857 के विद्रोह के बाद 1858 का भारत शासन अधिनियम आया, जिसने 1853 के अधिनियम द्वारा छोड़ी गई कमियों को भरकर शासन सीधे ब्रिटिश ताज को सौंप दिया।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1- 1853 के चार्टर एक्ट का मुख्य उद्देश्य क्या था? Ans: इसका मुख्य उद्देश्य कंपनी के शासन को अनिश्चित काल के लिए बढ़ाना और विधायी व प्रशासनिक कार्यों को अलग करके संसदीय प्रणाली की शुरुआत करना था।

Q2- किस समिति ने सिविल सेवा में सुधारों को लागू किया? Ans: 1854 में गठित मैकाले समिति (Macaulay Committee) ने भारतीय सिविल सेवा में खुली प्रतियोगिता प्रणाली को लागू किया।

Q3- क्या 1853 के एक्ट ने भारतीयों को विधान परिषद में शामिल किया? Ans: नहीं, इसमें केवल प्रांतीय सरकारों के ब्रिटिश अधिकारियों को स्थानीय प्रतिनिधित्व मिला। भारतीयों का प्रवेश 1861 के अधिनियम से शुरू हुआ।

Q4- इसे ‘लघु संसद’ क्यों कहा जाता है? Ans: क्योंकि केंद्रीय विधान परिषद ने प्रक्रियाओं के मामले में ब्रिटिश संसद की तर्ज पर काम करना शुरू किया था।

Q5- 1853 के एक्ट के समय गवर्नर-जनरल कौन था? Ans: लॉर्ड डलहौजी (Lord Dalhousie) उस समय भारत के गवर्नर-जनरल थे।

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