प्रागैतिहासिक काल – एक परिचय
प्रागैतिहासिक काल मानव इतिहास का वह लंबा दौर है जब मनुष्य ने लिखित भाषा का विकास नहीं किया था। इस काल की जानकारी का एकमात्र स्रोत पुरातात्विक साक्ष्य हैं, जैसे पत्थर के औजार, गुफा चित्र, हड्डियाँ और बस्तियों के अवशेष। यह काल मानव के ‘आदिमानव’ से ‘सभ्य मानव’ बनने की एक जटिल और दीर्घकालिक यात्रा को दर्शाता है। भारतीय उपमहाद्वीप में यह यात्रा लगभग 25 लाख वर्ष पूर्व शुरू हुई मानी जाती है और लगभग 1000 ईसा पूर्व तक चली।
प्रागैतिहासिक काल का अर्थ एवं परिभाषा
प्रागैतिहासिक काल का शाब्दिक अर्थ है ‘इतिहास से पहले का काल’। इसे इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है
“वह समयावधि जो मानव के उद्भव से लेकर लिखित इतिहास के प्रारंभ तक फैली हुई है। इस काल में मानव ने तकनीकी, सामाजिक और आर्थिक विकास की लंबी यात्रा तय की, लेकिन लिखित रिकॉर्ड न होने के कारण इसकी जानकारी पुरातत्व पर निर्भर करती है।”
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

प्रागैतिहासिक काल के अध्ययन की शुरुआत 19वीं शताब्दी में यूरोप में हुई। भारत में 1863 में रॉबर्ट ब्रूस फुटे द्वारा पल्लवरम (तमिलनाडु) में पहली बार पुरापाषाणिक उपकरणों की खोज ने भारतीय प्रागैतिहास के अध्ययन की नींव रखी। इसके बाद डी. टेरा और पीटरसन, एच.डी. सांकालिया और वी.डी. कृष्णस्वामी जैसे विद्वानों ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
प्रागैतिहासिक काल की मुख्य विशेषताएं
प्रागैतिहासिक काल को मुख्यतः तीन चरणों में बांटा गया है:
- पाषाण काल: पत्थर के औजारों का प्रमुखता से उपयोग।
- पुरापाषाण काल – खाद्य संग्राहक, शिकारी जीवन, घुमंतू जीवन।
- मध्यपाषाण काल – सूक्ष्म पत्थर के उपकरण (माइक्रोलिथ्स), पालतू जानवरों का प्रारंभ।
- नवपाषाण काल – कृषि का आविष्कार, पशुपालन, स्थायी बस्तियाँ, मिट्टी के बर्तनों का निर्माण।
- ताम्र पाषाण काल – पत्थर और तांबे के औजारों का साथ-साथ प्रयोग। कृषि समाजों का विस्तार।
- लौह युग – लोहे के औजारों और हथियारों का प्रयोग। बड़े साम्राज्यों के उदय की पृष्ठभूमि तैयार हुई।
उदाहरण एवं केस स्टडी
- भीमबेटका (मध्य प्रदेश) – यह स्थल पुरापाषाण काल से ऐतिहासिक काल तक मानव गतिविधि का प्रमाण देता है। यहाँ मिली गुफा चित्रकारियाँ पशु शिकार, नृत्य और दैनिक जीवन के दृश्यों को दर्शाती हैं।
- मेहरगढ़ (बलूचिस्तान) – यह दक्षिण एशिया के नवपाषाण काल का एक प्रमुख स्थल है, जहाँ सबसे पुराने कृषि और पशुपालन के साक्ष्य मिले हैं।
- बुर्जहोम (कश्मीर) – नवपाषाण काल की एक महत्वपूर्ण बस्ती, जहाँ गड्ढेनुमा आवास और लाल-काले मृदभांड मिले हैं।
यूपीएससी प्रीलिम्स के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- सोहन घाटी (पाकिस्तान) और मद्रास (चेन्नई) पुरापाषाण काल की प्रमुख संस्कृतियाँ हैं।
- मध्यपाषाण काल में कुत्ते को सबसे पहले पालतू बनाया गया।
- नवपाषाण काल को ‘नवपाषाण क्रांति’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसी दौरान कृषि का आविष्कार हुआ।
- जोर्वे (महाराष्ट्र) ताम्र पाषाण काल की एक प्रमुख बस्ती थी, जहाँ से चावल की खेती के साक्ष्य मिले हैं।
- ‘मेगालिथ्स’ (बड़े पत्थरों के स्मारक) लौह युग की देन हैं, विशेषकर दक्षिण भारत में।
यूपीएससी मेन्स उत्तर लेखन दृष्टिकोण
प्रागैतिहासिक काल से जुड़े प्रश्न मेन्स के पेपर 1 (इतिहास) में आते हैं। उत्तर लिखते समय निम्नलिखित बिंदुओं को शामिल करें
- प्रौद्योगिकीय विकास – पत्थर के औजारों से लेकर धातु के औजारों तक के विकास क्रम को समझाएं।
- सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन – खाद्य संग्रहण से उत्पादन की ओर बढ़ते मानव समाज के स्वरूप में आए बदलावों पर चर्चा करें।
- कला और संस्कृति – भीमबेटका जैसे स्थलों पर मिली कलाकृतियों के महत्व को स्पष्ट करें।
- आधुनिक संदर्भ – आदिवासी समुदायों और उनकी जीवन शैली में प्रागैतिहासिक तत्वों की झलक दिखाई देती है, इस संबंध को स्थापित करना महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी पिछले वर्षों के प्रश्न
- प्रीलिम्स 2020 – भारतीय इतिहास के संदर्भ में ‘लेवल्ल्वा परंपरा’ और ‘मद्रास परंपरा’ क्या थीं?
- मेन्स 2019 – भारतीय उपमहाद्वीप में नवपाषाण संस्कृतियों की विवेचना कीजिए। क्या यह कहना सही है कि नवपाषाण क्रांति ने सभ्यता के आगमन का मार्ग प्रशस्त किया?
- प्रीलिम्स 2016 – भीमबेटका के प्रागैतिहासिक शैलाश्रयों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है? (विकल्प-आधारित प्रश्न)
तुलना सारणी – पाषाण काल के चरण
| पहलू | पुरापाषाण काल | मध्यपाषाण काल | नवपाषाण काल |
|---|---|---|---|
| कालावधि | लगभग 25 लाख ई.पू. – 10,000 ई.पू. | लगभग 10,000 ई.पू. – 6,000 ई.पू. | लगभग 6,000 ई.पू. – 1000 ई.पू. |
| मुख्य उपकरण | हस्त-कुठार, विदारणी | सूक्ष्म उपकरण (माइक्रोलिथ्स) | पॉलिश किए हुए पत्थर के उपकरण |
| जीवन-यापन | शिकार एवं खाद्य-संग्रह | शिकार, मछली पकड़ना, प्रारंभिक पालतूकरण | कृषि एवं पशुपालन |
| आवास | गुफाएं एवं शैलाश्रय | अस्थायी शिविर | स्थायी गाँव और बस्तियाँ |
| महत्वपूर्ण आविष्कार | आग पर नियंत्रण | तीर-कमान | मिट्टी के बर्तन, कताई-बुनाई |
निष्कर्ष
प्रागैतिहासिक काल मानव सभ्यता की नींव का पत्थर है। यह वह युग था जब मानव ने प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाते हुए अपने अस्तित्व और विकास की राह खोजी। पत्थर के सरल औजारों से लेकर कृषि और धातुकर्म जैसी जटिल तकनीकों तक का सफर मानव की सृजनात्मकता और अनुकूलन क्षमता का प्रमाण है। यूपीएससी की दृष्टि से, इस काल को समझना केवल तथ्यों को रटने का विषय नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं की जड़ों तक पहुँचने का माध्यम है। यह अध्ययन हमें मानव विकास की निरंतरता का एहसास कराता है।
पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
- प्रागैतिहासिक काल और प्रोतो-इतिहासिक काल में क्या अंतर है?
प्रागैतिहासिक काल में लिखित साक्ष्य बिल्कुल नहीं होते, जबकि प्रोतो-इतिहासिक काल वह संक्रमणकालीन चरण है जहाँ लिखित साक्ष्य मौजूद तो होते हैं (जैसे सिंधु घाटी सभ्यता की मुहरें), लेकिन उन्हें पूरी तरह पढ़ा नहीं जा सका है। - भारत में लौह युग की शुरुआत कब हुई?
भारत में लौह युग की शुरुआत लगभग 1200 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व के बीच मानी जाती है, जिसके प्रमाण उत्तरी भारत (गंगा के मैदान) के ‘चित्रित धूसर मृदभांड’ (Painted Grey Ware – PGW) संस्कृति से मिलते हैं। - नवपाषाण क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव क्या था?
इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव था – मानव का खाद्य उत्पादक के रूप में परिवर्तन। इससे घुमंतू जीवन से स्थायी जीवन की ओर बढ़ने, जनसंख्या वृद्धि और जटिल सामाजिक संरचनाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ। - प्रागैतिहासिक काल के अध्ययन के स्रोत कौन-कौन से हैं?
मुख्य स्रोत हैं: पुरातात्विक उत्खनन से प्राप्त वस्तुएँ (पत्थर और धातु के औजार, मिट्टी के बर्तन), गुफा चित्र, मानव और जानवरों की हड्डियों के अवशेष, और बस्तियों के अवशेष। - ताम्र पाषाणिक स्थलों की मुख्य विशेषताएं क्या थीं?
ताम्र पाषाणिक स्थल ग्रामीण बस्तियाँ थीं जो कृषि और पशुपालन पर आधारित थीं। इनमें तांबे और पत्थर दोनों के औजार प्रयोग में लाए जाते थे। काले और लाल मृदभांड इनकी प्रमुख पहचान थे।
आंतरिक लिंकिंग सुझाव
- सिंधु घाटी सभ्यता
- वैदिक सभ्यता
- भारत में मेगालिथिक संस्कृतियाँ
- प्रागैतिहासिक कला: भीमबेटका के चित्र
- भारतीय इतिहास का कालक्रम
- पुरापाषाण कालीन स्थल भारत
- नवपाषाण क्रांति के प्रभाव
