सारांश
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण बयान में स्वीकार किया है कि भारतीय न्यायपालिका के सामने असली चुनौती जिला अदालतों के स्तर पर है । उनके अनुसार, ये अदालतें अधिकांश नागरिकों के लिए न्याय तक पहुँच का प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। जिला न्यायपालिका की कार्यकुशलता, मानवीयता और निडरता पूरे न्यायिक ढाँचे की मजबूती की आधारशिला है। CJI ने इस चुनौती से निपटने के लिए मध्यस्थता जैसे वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को मजबूत करने और न्यायाधीशों के लिए तनाव प्रबंधन हेतु मनोरंजक गतिविधियों में भागीदारी पर भी जोर दिया है।
परिचय
भारत की न्यायिक व्यवस्था एक विशाल और जटिल ढाँचा है, जिसमें जिला अदालतें आम जनता की न्यायिक आकांक्षाओं की पहली पंक्ति में खड़ी हैं। भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस तथ्य को रेखांकित करते हुए कहा है कि देश की 70% आबादी अपने मामलों का निपटारा जिला स्तर पर ही चाहती है । इसका सीधा सा अर्थ है कि यदि जिला न्यायालय प्रभावी ढंग से काम नहीं करते, तो असंख्य लोगों को न्याय नहीं मिल पाता। यह समस्या न्याय में देरी के रूप में सामने आती है, जिससे न्यायपालिका के प्रति लोगों का विश्वास कमजोर होता है। CJI के इस बयान ने भारतीय न्याय प्रणाली की सबसे बुनियादी इकाई पर जरूरी बहस को फिर से शुरू किया है।
जिला न्यायालयों की मुख्य चुनौतियाँ

भारत के जिला न्यायालय न्यायिक ढाँचे की रीढ़ हैं, लेकिन वे कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रहे हैं
- अत्यधिक लंबित मामले और कार्यभार – देश भर की विभिन्न अदालतों में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से अधिकांश जिला स्तर पर हैं । कुछ राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और केरल में तो प्रति न्यायाधीश 4000 से अधिक मामलों का बोझ है ।
- रिक्त पदों की भारी कमी – उच्च न्यायालयों में लगभग 33% और जिला न्यायालयों में 21% पद रिक्त हैं 。 न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात भी चिंताजनक है। वर्तमान में यह प्रति 10 लाख लोगों पर मात्र 15 न्यायाधीश है, जबकि विधि आयोग ने 1987 में ही इसे 50 तक बढ़ाने की सिफारिश की थी ।
- अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा – केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 37.7% न्यायिक अधिकारियों ने माना कि उनके पास कार्य करने के लिए पर्याप्त जगह नहीं है । कई जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के कार्यालय अभी भी पूरी तरह से कम्प्यूटरीकृत नहीं हैं ।
- मानव संसाधन एवं गुणवत्ता की समस्या – CJI डी. वाई. चंद्रचूड़ ने एक अन्य अवसर पर कहा था कि “जिला न्यायपालिका औसत दर्जे की समस्या का सामना कर रही है” 。 उन्होंने यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया कि न्यायपालिका में योग्य और सक्षम लोग हों ।
- डिजिटल अवसंरचना और समन्वय का अभाव – ई-कोर्ट मिशन जैसे प्रयासों के बावजूद, अधिवक्ताओं और सहायक कर्मचारियों को डिजिटल प्रक्रियाओं में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। विभिन्न विभागों के बीच सहयोग और समन्वय के अभाव से भी कार्यप्रणाली प्रभावित होती है .
जिला न्यायालयों के लिए सुझाए गए सुधार एवं पहल
इन चुनौतियों से निपटने के लिए विभिन्न स्तरों पर सुधारों की पहल की जा रही है-
- वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) को बढ़ावा – CJI सूर्यकांत ने मध्यस्थता को “एक सक्षम हथियार” बताते हुए कहा कि “मध्यस्थता इस पेशे का एक मजबूत स्तंभ बनती जा रही है” 。 लोक अदालतों और मध्यस्थता जैसे तरीकों से अदालतों के बोझ को कम करने में मदद मिलती है।
- डिजिटल परिवर्तन और तकनीकी एकीकरण– ई-कोर्ट परियोजना और राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) के माध्यम से पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है 。 जिला स्तर पर स्वतंत्र IT विभाग स्थापित करने की सिफारिश भी की गई है ।
- न्यायिक क्षमता का निर्माण– CJI ने न्यायाधीशों के दीर्घकालिक तनाव प्रबंधन के लिए मनोरंजक गतिविधियों (जैसे बैडमिंटन चैंपियनशिप) में भाग लेने की सलाह दी है 。 इससे न्यायाधीशों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
- फास्ट ट्रैक कोर्ट (FTCs) का गठन – देश भर में 800 से अधिक फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित किए गए हैं, जो महिलाओं, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े संवेदनशील मामलों की शीघ्र सुनवाई सुनिश्चित करते हैं ।
- रिक्तियों को शीघ्र भरना और कानूनी सहायता को मजबूत करना – भारत न्याय रिपोर्ट 2025 में न्यायाधीशों के रिक्त पदों को तेजी से भरने और कानूनी सहायता पर प्रति व्यक्ति खर्च (वर्तमान में मात्र ₹6.46) बढ़ाने की सिफारिश की गई है .
यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- भारत में वर्तमान में 5 करोड़ से अधिक मामले विभिन्न न्यायालयों में लंबित हैं ।
- उच्च न्यायालयों में 33% और जिला न्यायालयों में 21% न्यायाधीशों के पद रिक्त हैं ।
- भारत में न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात प्रति 10 लाख लोगों पर केवल 15 न्यायाधीश है ।
- राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो देश भर की 18,735 से अधिक जिला एवं अधीनस्थ अदालतों के मामलों का डेटा एकत्रित करता है ।
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 7(1)(h) बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को विधिक शिक्षा के मानक तय करने का अधिकार देती है .
यूपीएससी मुख्य परीक्षा हेतु उत्तर लेखन की रणनीति
प्रश्न विचार: “भारतीय न्यायपालिका के समक्ष मौजूद चुनौतियों की व्याख्या कीजिए। क्या जिला न्यायालय इन चुनौतियों का केंद्रबिंदु हैं? समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।”
मूल्यवर्धित बिंदु:
- सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक पहलू – अपने उत्तर की शुरुआत CJI सूर्यकांत के उस बयान से करें जिसमें उन्होंने जिला अदालतों को न्यायपालिका की सबसे बड़ी चुनौती बताया है 。 इसके बाद इसकी व्यावहारिक पुष्टि करने के लिए भारत न्याय रिपोर्ट 2025 के आँकड़ों (जैसे 5 करोड़ लंबित मामले, रिक्त पद) का उपयोग करें ।
- बहुआयामी प्रभाव – स्पष्ट कीजिए कि जिला न्यायालयों की अक्षमता का असर केवल न्यायिक प्रणाली तक सीमित नहीं है। यह आम नागरिक के मौलिक अधिकारों और सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। न्याय में देरी अपराधों को बढ़ावा दे सकती है और निवेश के माहौल को भी प्रभावित कर सकती है।
- सुधारों का समग्र मूल्यांकन – केवल समस्याएँ गिनाने के बजाय, चल रहे सुधारों जैसे ई-कोर्ट, एडीआर, FTCs का जिक्र करें 。 साथ ही, इन सुधारों की सीमाओं (जैसे डिजिटल डिवाइड, बुनियादी ढाँचे की कमी) पर भी चर्चा करें । इससे आपके उत्तर में संतुलन आएगा।
- निष्कर्ष – अपने उत्तर का समापन एक भविष्योन्मुखी और समाधान-उन्मुख दृष्टिकोण के साथ करें। जिला न्यायालयों को मजबूत करने के लिए मानव संसाधन, बुनियादी ढाँचा, तकनीक और वैकल्पिक तंत्रों पर एक साथ काम करने की आवश्यकता पर जोर दें।
यूपीएससी परीक्षा के पिछले वर्षों के प्रश्न
- प्रारंभिक परीक्षा 2023 – भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति किसके द्वारा की जाती है? (अनुच्छेद 124 के तहत राष्ट्रपति द्वारा) ।
- मुख्य परीक्षा 2021 – “भारत में न्यायिक सुधारों की आवश्यकता केवल लंबित मामलों की संख्या को कम करने से कहीं अधिक है।” चर्चा कीजिए।
- प्रारंभिक परीक्षा 2020 – उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने का अधिकार किस अनुच्छेद के तहत प्राप्त है? (अनुच्छेद 226) .
चुनौतियाँ एवं सुधार: एक तुलनात्मक विश्लेषण
निष्कर्ष
भारत के प्रधान न्यायाधीश का यह बयान कि “न्यायपालिका के सामने असली चुनौती जिला अदालतों के स्तर पर है”, एक स्पष्ट और सटीक निदान है 。 जिला न्यायालय ही वह स्थान है जहाँ संविधान में निहित न्याय के आश्वासन को वास्तविकता में बदलने की परीक्षा होती है। इन अदालतों की मजबूती के बिना, उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के सभी प्रयास अधूरे रह जाएँगे। इसलिए, न्यायिक सुधारों का फोकस जिला स्तर पर बुनियादी ढाँचा, मानव संसाधन और तकनीकी उन्नयन पर होना चाहिए। साथ ही, मध्यस्थता जैसे वैकल्पिक रास्तों को मजबूत करना और न्यायाधीशों के कल्याण पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है। एक मजबूत, कुशल और स्वतंत्र जिला न्यायपालिका ही “न्याय सबके लिए” के संकल्प को साकार कर सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. CJI ने यह क्यों कहा कि न्यायपालिका की सबसे बड़ी चुनौती जिला अदालतों के स्तर पर है?
CJI के अनुसार, जिला अदालतें अधिकांश (लगभग 70%) नागरिकों के लिए न्याय तक पहुँच का पहला और अक्सर अंतिम साधन हैं। इन अदालतों की कार्यकुशलता और निष्पक्षता पूरे न्यायिक तंत्र की विश्वसनीयता की आधारशिला है .
2. जिला अदालतों की प्रमुख समस्याएँ क्या हैं?
मुख्य समस्याओं में मामलों की अत्यधिक संख्या, न्यायाधीशों के रिक्त पद, अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा, डिजिटल सुविधाओं की कमी और कर्मचारियों के प्रशिक्षण का अभाव शामिल हैं .
3. न्यायाधीशों को मनोरंजक गतिविधियों में भाग लेने की सलाह क्यों दी गई है?
न्यायाधीशों का कार्य अत्यंत तनावपूर्ण और दबाव भरा होता है। मनोरंजक गतिविधियाँ जैसे खेल, तनाव कम करने, मानसिक स्वास्थ्य बेहतर बनाने और टीम भावना विकसित करने में मदद करती हैं, जिससे उनकी कार्यकुशलता बढ़ती है .
4. जिला अदालतों की स्थिति सुधारने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं?
ई-कोर्ट परियोजना, फास्ट ट्रैक कोर्ट, वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) को बढ़ावा, राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) और रिक्त पदों को भरने जैसे उपाय किए जा रहे हैं .
5. भारत में न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
वर्तमान में यह अनुपात प्रति 10 लाख लोगों पर केवल 15 न्यायाधीश है, जबकि विधि आयोग ने इसे 50 तक बढ़ाने की सिफारिश की थी। पर्याप्त न्यायाधीश न होने से मामलों का निपटारा देरी से होता है और न्यायिक बोझ बढ़ता है .
आंतरिक लिंकिंग के लिए कीवर्ड सुझाव: भारत न्याय रिपोर्ट 2025, ई-कोर्ट परियोजना, राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड, वैकल्पिक विवाद समाधान, फास्ट ट्रैक कोर्ट, भारतीय न्यायपालिका का ढाँचा, न्यायिक सुधार, मध्यस्थता अधिनियम, अधिवक्ता अधिनियम 1961.
