परिचय

यह लेख रमेश सिंह की किताब के अध्याय 3 यानी भारतीय अर्थव्यवस्था का उद्भव Evolution of the Indian Economy पर केंद्रित है – और साथ ही UPSC की दृष्टि से उच्च उपयोगिता के साथ नोट्स दिए गए हैं. सरल भाषा में बात की गयी है ताकि शुरुआती और उन्नत दोनों स्तर के अभ्यर्थी आसानी से समझ सकें. विषय की जड़ से पकड़ बनाने के लिये पृष्ठभूमि, कारण, लाभ-हानि और नीतिगत पहल पर बिंदुवार विश्लेषण प्रस्तुत है
परिभाषा
भारतीय अर्थव्यवस्था का उद्भव – से आशय है उस ऐतिहासिक और आर्थिक प्रक्रिया से जिससे भारत में आधुनिक आर्थिक संस्थाएँ, उत्पादन संबंध और नीतिगत ढांचे उभरे. इसके अंतर्गत कृषि से उद्योग की ओर परिवर्तन, बाजारों का विकास और राज्य की भागीदारी शामिल होती है
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास कई चरणों में हुआ – पहले पारंपरिक कृषि प्रधान व्यवस्था रही – फिर औद्योगिक क्रांति और औपनिवेशिक काल ने आर्थिक संरचना प्रभावित की – आजादी के बाद नियोजित अर्थव्यवस्था का प्रतिरूप बना और बाद में उदारीकरण की प्रक्रिया ने नया मोड़ दिया. इस अध्याय में विशेष रूप से प्रिष्ठभूमि पर जोर है ताकि कारण और परिणाम स्पष्ट हों
विशेषताएँ
- कृषि प्रधानता – शांतिपूर्वक आर्थिक आधार सबसे पहले कृषि पर टिका हुआ था
- ग्रामीणआधारित उत्पादन – अधिकांश आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में थी और कृषि से निर्भर थी
- धीमी औद्योगिकीकरण प्रक्रिया – इसलिए उद्योग का विस्तार सीमित और चरणबद्ध रहा
- बाज़ारों की आंशिकता – स्थानीय और अनिकेत बाजार प्रमुख थे
- राज्य की बढ़ती भूमिका – सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार हुआ और नियोजन अपनाया गया
कारण
- ऐतिहासिक कारण – औपनिवेशिक सत्ता द्वारा संसाधन पुनर्वितरण से कृषि व कुटीर उद्योग प्रभावित हुए
- सांस्कृतिक व सामाजिक कारक – पारिवारिक भूमि प्रणाली और कृषि पर परंपरागत निर्भरता रही
- तकनीकी कारण – तकनीकी उन्नति धीमी रही इसलिए औद्योगिक परिवर्तन धीमा रहा
- नीतिगत कारण – आजादी के बाद आर्थिक नीति ने स्वावलंबन व नियोजन को महत्व दिया – परिणामतः मिश्रित अर्थव्यवस्था का ढांचा बना
लाभ (Advantages) और हानियाँ (Disadvantages)
लाभ
- रोजगार का आधार – कृषि ने बड़ी आबादी के लिये रोजगार दिया
- आत्मनिर्भरता की भावना – नियोजन से विकास के कुछ क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता आई
- सामाजिक सुरक्षा – सार्वजनिक क्षेत्र से कुछ बुनियादी सेवाओं में सुधार हुआ
हानियाँ
- धीमी वृद्धि दर – संसाधनों का अक्षम उपयोग और पूंजी की कमी रही
- उद्योगों में नवाचार की कमी – निजी निवेश की अपर्याप्तता से तकनीकी प्रगति सीमित रही
- असमानता – क्षेत्रीय और वर्गीय असमानता बढ़ी
तुलना तालिका – कृषि बनाम उद्योग
| मापदण्ड | कृषि – प्राथमिक चलक बल | उद्योग – द्वितीयक चलक बल |
|---|---|---|
| अर्थव्यवस्था पर निर्भरता | उच्च | मध्यम |
| रोजगार सृजन क्षमता | मौसमी और अस्थायी | स्थायी और व्यवस्थित |
| पूंजी की आवश्यकता | निम्न | उच्च |
| तकनीकी उन्नति की संभावना | सीमित | उच्च |
समस्याएँ
- भूमि सुधारों का आंशिक क्रियान्वयन जिससे कृषि उत्पादकता प्रभावित हुई
- सार्वजनिक क्षेत्र की अक्षमताएँ और उपज नहीं दे पाना
- योजना व नीति में समन्वय की कमी – इसलिए संसाधनों का प्रोफेशनल उपयोग नहीं हो पाया
- बाजारों के असमर्थित खुलने पर छोटे उत्पादक अक्षम हुए
सरकारी पहल – समाधान
- भूमि सुधार और सहकारी समितियों को सशक्त बनाना – ताकि कृषि उत्पादकता बढ़े
- कृषि व उद्योग दोनों में निवेश प्रोत्साहन – जिससे संतुलित विकास संभव हो
- सार्वजनिक-निजी साझेदारी को बढ़ावा – ताकि तकनीकी व वित्तीय कमी पूरी हो सके
- मानव पूँजी में निवेश – शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार से दीर्घकालिक लाभ
UPSC मेन्स नोट्स
- भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रारंभिक स्थिति – कृषि प्रधानता और कुटीर उद्योग का वर्चस्व
- औपनिवेशिक काल के प्रभाव – कच्चा माल निर्यात और स्थानीय उद्योगों का ह्रास
- आजादी के बाद मिश्रित और नियोजित अर्थव्यवस्था का चयन – कारण और प्रभाव
- सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका व उसकी कमजोरियाँ
- कृषि बनाम उद्योग संघर्ष – रोजगार व संसाधन आवंटन के आयाम
- विकास मॉडल के विकल्प – बाजार नेतृत्व बनाम राज्य नेतृत्व
- नीति सिफारिशें – भूमि सुधार, निवेश प्रोत्साहन, मानव पूँजी में निवेश
Important Facts for UPSC Prelims
- स्वतंत्रता के बाद भारत ने सार्वजनिक उपक्रमों पर जोर दिया – इसने नियोजित अर्थव्यवस्था की नींव रखी
- कृषि आज भी कई दशकों तक रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत रहा – इसलिए कृषि नीतियाँ महत्वपूर्ण हैं
- मिश्रित अर्थव्यवस्था का मतलब है – दोनों सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की सहअस्तित्व नीति
- औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था ने भारत को कच्चा माल निर्यातक बना दिया – यह दीर्घकालिक प्रभाव डालता है
- योजना आयोग की स्थापना ने केंद्रित आर्थिक योजनाओं का मार्ग खोला
उदाहरण – केस स्टडी
- केस स्टडी 1 – हरियाणा में हरित क्रांति – उत्पादन में वृद्धि के साथ हीन और समर्थन मूल्य ने खाद्य सुरक्षा सुधारी – परन्तु क्षेत्रीय असमानता भी बढ़ी
- केस स्टडी 2 – सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ उपक्रम सफल रहे जैसे परिवहन और ऊर्जा में बुनियादी ढांचा बनाने में मदद मिली – फिर भी कुछ उपक्रम घाटे में चले गए और नीति पुनरावलोकन की आवश्यकता पड़ी
मेन्स उत्तर लिखने का एंगल – value added points
- सीधे प्रश्न के पहले भाग को स्पष्ट करें – परिभाषा व सीमाएँ दें
- मध्य भाग में कारण व परिणाम पर डेटा बिंदु व तुलनात्मक विश्लेषण रखें
- अंत में नीति सिफारिशें दे कर उत्तर को निष्कर्षत करें
- वैल्यू एडेड पॉइंट्स – केस स्टडी का संक्षिप्त हवाला – आधुनिक रिपोर्ट या योजना के उदाहरण – और समकालीन सुधारों का संक्षिप्त सुझाव
UPSC Previous Year Questions
- 2018 – भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका पर चर्चा करिए और इसकी सीमाएँ बताइए
- 2016 – भारत में कृषि-आधारित विकास के अस्थायी और दीर्घकालिक प्रभाव पर टिप्पणी कीजिये
- 2014 – मिश्रित अर्थव्यवस्था के मॉडल को अपनाने के कारण और लाभ समझाइए
- 2012 – औपनिवेशिक काल के आर्थिक प्रभावों ने स्वतंत्र भारत के आर्थिक विकल्पों को कैसे प्रभावित किया
- 2010 – योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था और बाजार आधारित सुधारों के बीच संतुलन कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है
UPSC Prelims MCQ Practice – 5 Questions
1 – किसने भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार को स्वतंत्रता के बाद प्राथमिकता दी
A) नेहरू B) गांधी C) पटेल D) भगत सिंह
2 – मिश्रित अर्थव्यवस्था का अर्थ क्या है
A) केवल निजी क्षेत्र B) केवल सार्वजनिक क्षेत्र C) सार्वजनिक और निजी दोनों का मिश्रण D) अनौपचारिक अर्थव्यवस्था
3 – हरित क्रांति का मुख्य लाभ क्या रहा
A) निर्यात वृद्धि B) खाद्य उत्पादन में वृद्धि C) औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि D) श्रम निकासी
4 – औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की एक विशेषता क्या थी
A) तकनीकी निवेश का विकास B) कच्चा माल का निर्यात C) समसामयिक सामाजिक कल्याण D) समान भूमि वितरण
5 – नियोजित अर्थव्यवस्था में क्या प्रमुख उपकरण है
A) बाजार प्रतिस्पर्धा B) सरकारी योजनाएँ और योजना आयोग C) केवल निजी निवेश D) स्थानीय स्वशासन
निष्कर्ष
रमेश सिंह के अध्याय 3 से स्पष्ट होता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का उद्भव जटिल और बहुस्तरीय प्रक्रिया रही है – जिसमें ऐतिहासिक प्रभाव, सामाजिक संरचना और नीतिगत विकल्प मिलकर काम करते हैं. इसलिए UPSC उम्मीदवारों के लिये जरूरी है कि वे केवल तात्कालिक तथ्यों पर नहीं, बल्कि कारण-परिणाम और नीति विकल्पों पर भी पकड़ बनाएं. अंततः संतुलित नीतियाँ, क्षेत्रीय समन्वय और मानव पूँजी में निवेश ही दीर्घकालिक विकास सुनिश्चित कर सकते हैं
FAQs – 5 सरल प्रश्न उत्तर UPSC के लिए
Q1 – मिश्रित अर्थव्यवस्था क्या है
A1 – यह व्यवस्था है जहाँ सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों का योगदान रहता है
Q2 – क्यों सार्वजनिक क्षेत्र स्वतंत्रता के बाद महत्व रखता था
A2 – क्योंकि प्रारंभिक पूँजी व बुनियादी ढांचे के लिये राज्य निवेश आवश्यक था
Q3 – हरित क्रांति का मुख्य नुकसान क्या रहा
A3 – क्षेत्रीय असमानता और मिट्टी व जल संसाधन पर दबाव
Q4 – नियोजित अर्थव्यवस्था का मुख्य लक्ष्य क्या था
A4 – समतावादी और नियंत्रित विकास ताकि बुनियादी सेवाएँ उपलब्ध हों
Q5 – UPSC मेन्स में इस विषय पर लिखते समय क्या जोड़ें
A5 – कारण, प्रभाव, नीति विकल्प और केस स्टडी का संक्षिप्त हवाला
