परिचय-

भारत की न्यायिक प्रणाली में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम – 1989 हमेशा से चर्चा का विषय रहा है। हाल ही में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में – राजस्थान हाई कोर्ट ने अहम फैसले में कहा है कि अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा केवल तभी लागू हो सकती है जब अपराध आइपीसी के तहत 10 साल या उससे अधिक की सजा वाला हो और अपराध जातिगत विद्वेष के कारण किया गया हो।

यह फैसला भारतीय दंड संहिता (IPC) और विशेष कानूनों के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है। सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए यह समझना जरूरी है कि अदालत ने ‘जातिगत पहचान’ और ‘अपराध के पीछे की मंशा’ (Mens Rea) के बीच एक स्पष्ट लकीर खींची है। यह निर्णय न केवल कानूनी व्याख्या की दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सामाजिक न्याय और मौलिक अधिकारों के संतुलन के लिए भी प्रासंगिक है।

राजस्थान हाई कोर्ट का अहम फैसला- SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(v) और जातिगत विद्वेष - UPSC विश्लेषण
राजस्थान हाई कोर्ट का अहम फैसला- SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(v) और जातिगत विद्वेष – UPSC विश्लेषण

अर्थ-

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि

  • SC ST एक्ट की कठोर धाराएँ तभी लागू होंगी जब अपराध गंभीर हो,
  • IPC में उसकी सजा कम से कम 10 वर्ष या उससे अधिक हो, और
  • अपराध का कारण जातिगत विद्वेष या भेदभाव स्पष्ट रूप से सिद्ध हो।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एक्ट का उपयोग केवल उन मामलों में हो जहाँ वास्तव में अनुसूचित जाति या जनजाति के विरुद्ध गंभीर अत्याचार हुआ हो।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को भेदभाव और अत्याचार से बचाने के लिए संसद ने कई कदम उठाए हैं।

  • नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 – यह पहला प्रयास था – लेकिन यह कमजोर साबित हुआ क्योंकि इसमें गंभीर अपराध शामिल नहीं थे।
  • SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 – बढ़ती हिंसा को देखते हुए यह सख्त कानून लाया गया। इसका उद्देश्य उन अपराधों को रोकना था जो विशेष रूप से किसी की जाति के कारण किए जाते हैं।
  • 2015 और 2018 के संशोधन – सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों के बाद सरकार ने कानून को और मजबूत करने के लिए इसमें संशोधन किए – ताकि इसका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो सके।

फैसले की मुख्य विशेषताएं

इस फैसले के तकनीकी पहलुओं को समझना UPSC मेन्स के लिए महत्वपूर्ण है –

1. मंशा (Intention) की प्रधानता कोर्ट ने कहा कि अपराध का मकसद महत्वपूर्ण है। यदि कोई अपराध व्यक्तिगत दुश्मनी या संपत्ति विवाद के कारण हुआ है – और संयोग से पीड़ित SC/ST है – तो यह धारा लागू नहीं होगी जब तक कि जाति ही अपराध का मूल कारण न हो।

2. सजा की गंभीरता यह धारा छोटे-मोटे अपराधों पर लागू नहीं होती। इसके लिए मूल अपराध गंभीर प्रकृति का होना चाहिए (जिसमें 10 साल या उससे ज्यादा सजा हो)।

3. सबूत का भार (Burden of Proof) अभियोजन पक्ष (Prosecution) को यह साबित करना होगा कि आरोपी ने अपराध इसलिए किया क्योंकि वह जानता था कि पीड़ित SC/ST समुदाय से है।

इस व्याख्या के पीछे संभावित कारण

  • SC ST Act में बढ़ते फर्जी मामलों पर न्यायिक टिप्पणी।
  • कठोर दंड प्रावधानों का अनुचित उपयोग रोकना।
  • सच्चे पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
  • न्यायिक प्रक्रिया को संतुलित और साक्ष्य आधारित बनाना।
  • IPC की सजा और अपराध की गंभीरता के बीच सामंजस्य स्थापित करना।

लाभ

  • कानून का दुरुपयोग नियंत्रित होता है।
  • जांच और अभियोजन अधिक तथ्यात्मक और निष्पक्ष बनता है।
  • असली पीड़ितों को न्याय मिलने की संभावना बढ़ती है।
  • न्यायपालिका और पुलिस पर अनावश्यक दबाव कम होता है।
  • कानून की विश्वसनीयता बढ़ती है।

नुकसान

  • कुछ मामलों में पीड़ित को अतिरिक्त साक्ष्य जुटाने की चुनौती बढ़ सकती है।
  • अपराध की मंशा सिद्ध करना कठिन हो सकता है।
  • पुलिस जांच अधिक लंबी हो सकती है।
  • सामाजिक संवेदनशीलता वाले मामलों पर विवाद बढ़ सकता है।

एससी एसटी एक्ट बनाम आईपीसी गंभीर अपराध

आधारSC ST ActIPC की गंभीर धाराएँ
उद्देश्यजातिगत अत्याचार रोकनाआपराधिक दंड व्यवस्था
सजाकठोर और विशेष प्रावधानअपराध पर आधारित
लागू होने की शर्तजातिगत विद्वेषअपराध की गंभीरता
जांचविशेष प्रोटोकॉलसामान्य आपराधिक प्रक्रिया
संवेदनशीलतासामाजिक न्याय केंद्रितविधिक अपराध केंद्रित

चुनौतियां और आलोचनाएं

हालांकि यह फैसला कानूनी रूप से ठोस है – लेकिन इसके कुछ सामाजिक पहलू भी हैं –

  • साबित करने की कठिनाई – जातिगत विद्वेष को कोर्ट में साबित करना बहुत मुश्किल होता है। अपराधी के मन में क्या था – यह साक्ष्यों से सिद्ध करना जटिल प्रक्रिया है।
  • दोषसिद्धि दर में कमी – आलोचकों का मानना है कि इस तरह की व्याख्या से SC/ST एक्ट के तहत सजा की दर (Conviction Rate) और कम हो सकती है।
  • जागरूकता की कमी – ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी सामंती मानसिकता हावी है। ऐसे में कानून की तकनीकी व्याख्या पीड़ितों को न्याय से वंचित कर सकती है।

सरकारी पहल और समाधान

  • SC/ST संशोधन अधिनियम 2018 – इसके द्वारा धारा 18A जोड़ी गई – जिसने प्रारंभिक जांच की आवश्यकता को समाप्त किया और तुरंत गिरफ्तारी का प्रावधान बहाल किया।
  • फास्ट ट्रैक कोर्ट्स – इन मामलों के त्वरित निपटान के लिए विशेष अदालतों का गठन किया गया है।
  • ऑनलाइन शिकायत पोर्टल – सरकार ने अत्याचार की शिकायतों के लिए ई-पोर्टल लॉन्च किए हैं ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

Case Studies

  • सुप्रीम कोर्ट 2018 आदेश – दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की गई।
  • संसद ने उसी वर्ष संशोधन कर सख्त प्रावधान बहाल किए।
  • कई राज्यों में फर्जी मामलों की रिपोर्ट, परंतु वास्तविक मामलों में न्याय की देरी अभी भी चुनौती।

UPSC Mains Notes

मुख्य परीक्षा (GS Paper 2 – Social Justice & Constitution) के लिए नोट्स –

  • संविधान के अनुच्छेद – अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत) और अनुच्छेद 46 (कमजोर वर्गों के हितों को बढ़ावा देना) इस अधिनियम का आधार हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण मामले
    • हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य (2020) – सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि घर की चारदीवारी के भीतर किया गया अपमान अपराध नहीं है यदि वह सार्वजनिक दृष्टि में न हो।
    • सुभाष महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य (2018) – जिसमें कोर्ट ने दुरुपयोग रोकने के लिए कुछ दिशा-निर्देश दिए थे (बाद में संसद ने इसे पलट दिया)।
  • प्रमुख शब्दावली – ‘जातिगत विद्वेष’ (Caste based malice) और ‘वैधानिक व्याख्या’ (Statutory Interpretation)।

Important Facts for UPSC Prelims

  • अधिनियम का वर्ष – 1989 (लागू हुआ 30 जनवरी 1990 से)।
  • नोडल मंत्रालय – सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय।
  • धारा 3(2)(v) – इसमें आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है।
  • अनुसूची – यह अधिनियम संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल नहीं है (अक्सर छात्र इसमें कंफ्यूज होते हैं)।

Mains Answer Writing Angle

प्रश्न – “अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम का उद्देश्य ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करना है – लेकिन इसकी कानूनी व्याख्याओं को आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के साथ संतुलित करना आवश्यक है। राजस्थान उच्च न्यायालय के हालिया निर्णय के संदर्भ में चर्चा करें।”

उत्तर में शामिल करें (Value Added Points)

  1. अधिनियम की मूल भावना (Transformation of Society)।
  2. राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले का विश्लेषण (धारा 3(2)(v) की शर्तें)।
  3. संतुलन कैसे बनाएं – कठोर कानून आवश्यक है लेकिन उसका यांत्रिक (Mechanical) उपयोग नहीं होना चाहिए।
  4. निष्कर्ष – न्यायपालिका का काम कानून की रक्षा करना है – चाहे वह पीड़ित के लिए हो या आरोपी के लिए।

UPSC Previous Year Questions

2018 (Mains GS-2) – क्या भारत में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए विभिन्न आयोगों की बहुलता की आवश्यकता है?

2019 (Mains GS-2) – क्या कारण है कि अनुसूचित जातियों के विरुद्ध अपराधों में वृद्धि हो रही है? विद्यमान कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन में क्या कमियां हैं?

UPSC Prelims MCQ Practice

प्रश्न 1 – अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम – 1989 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें –

  1. इस अधिनियम के तहत अपराध संज्ञेय (Cognizable) और गैर-जमानती (Non-bailable) होते हैं।
  2. अधिनियम की धारा 3(2)(v) तभी लागू होती है जब अपराध का कारण पीड़ित की जाति हो।

उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?

A) केवल 1 B) केवल 2 C) 1 और 2 दोनों D) न तो 1 और न ही 2

उत्तर – C

प्रश्न 2 – भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद ‘अस्पृश्यता’ के उन्मूलन की बात करता है?

A) अनुच्छेद 16 B) अनुच्छेद 17 C) अनुच्छेद 18 D) अनुच्छेद 23

उत्तर – B

निष्कर्ष

निष्कर्षतः – राजस्थान उच्च न्यायालय का यह निर्णय न्यायशास्त्र (Jurisprudence) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून का उद्देश्य न्याय देना है – न कि प्रतिशोध लेना। राजस्थान हाई कोर्ट ने अहम फैसले में कहा है कि अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा केवल तभी लागू हो सकती है जब अपराध आइपीसी के तहत 10 साल या उससे अधिक की सजा वाला हो और अपराध जातिगत विद्वेष के कारण किया गया हो। यह व्याख्या भविष्य में पुलिस जांच को और अधिक वैज्ञानिक और तर्कसंगत बनाने में मदद करेगी – जिससे वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलेगा और कानून का दुरुपयोग भी रुकेगा।

FAQs for UPSC

Q1. SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(v) क्या है?

Ans. यह धारा उन अपराधों के लिए कठोर सजा (आजीवन कारावास तक) का प्रावधान करती है जो IPC के तहत 10 साल या उससे अधिक की सजा वाले हैं और विशेष रूप से जाति के आधार पर किए गए हैं।

Q2. क्या SC/ST एक्ट के तहत अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) मिलती है?

Ans. सामान्यतः धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत वर्जित है। हालांकि – यदि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) कोई मामला नहीं बनता है – तो कोर्ट सीमित परिस्थितियों में जमानत दे सकता है।

Q3. इस फैसले का आम आदमी पर क्या असर होगा?

Ans. इससे पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करते समय और चार्जशीट फाइल करते समय अधिक सावधानी बरती जाएगी – ताकि बिना ठोस सबूत के गंभीर धाराएं न लगाई जाएं।

Q4. IPC और SC/ST एक्ट में क्या अंतर है?

Ans. IPC एक सामान्य दंड संहिता है जो सभी नागरिकों पर लागू होती है – जबकि SC/ST एक्ट एक विशेष कानून है जो ऐतिहासिक रूप से शोषित वर्गों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है।

Q5. क्या जातिगत गाली-गलौज धारा 3(2)(v) में आती है?

Ans. नहीं – जातिगत गाली-गलौज धारा 3(1) के तहत आती है। धारा 3(2)(v) केवल गंभीर अपराधों (जैसे हत्या – बलात्कार – डकैती आदि) के लिए है।

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