परिचय
मानव सभ्यता का इतिहास निरंतर विकास की कहानी है और मध्य पुरापाषाण काल इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह वह समय था जब मानव ने भारी और बेडौल पत्थरों को छोड़कर छोटे और अधिक नुकीले औजारों का निर्माण शुरू किया। भारत के संदर्भ में इस काल को ‘फलक संस्कृति’ (Flake Culture) के नाम से भी जाना जाता है।
UPSC की दृष्टि से यह कालखंड इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह निम्न पुरापाषाण काल और उच्च पुरापाषाण काल के बीच एक संक्रमण का दौर था। इस समय पर्यावरण में परिवर्तन हो रहे थे और मानव मस्तिष्क भी विकसित हो रहा था। एच.डी. सांकलिया ने इस काल को विशेष रूप से ‘नेवासा संस्कृति’ का नाम दिया है – जो महाराष्ट्र के प्रवरा नदी तट पर स्थित है।

मध्य पुरापाषाण काल का अर्थ
मध्य पुरापाषाण काल पाषाण युग का द्वितीय चरण है। इसका कालखंड मोटे तौर पर 1,00,000 ईसा पूर्व से 40,000 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है। इस काल की सबसे बड़ी पहचान पत्थरों के ‘फलक’ (Flakes) या पपड़ियों से बने औजार हैं। जहाँ पहले पूरा पत्थर औजार होता था, अब पत्थर की ऊपरी परत को उतारकर औजार बनाए जाने लगे थे। इसे तकनीकी भाषा में ‘फलक प्रधान संस्कृति’ कहा जाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भूगर्भीय इतिहास में यह काल प्लीस्टोसीन (Pleistocene) युग के अंतर्गत आता है। इस समय भी पृथ्वी पर हिमयुग का प्रभाव था, लेकिन जलवायु में धीरे-धीरे परिवर्तन आ रहा था। मानव प्रजाति के विकास के क्रम में यह काल ‘नियंडरथल मानव’ (Neanderthal Man) के अस्तित्व से जुड़ा हुआ है, हालाँकि भारत में इसके जीवाश्म साक्ष्य बहुत कम हैं। इस समय मानव ने गुफाओं को अपना स्थाई निवास बनाना शुरू कर दिया था और आग का उपयोग अधिक नियंत्रित तरीके से होने लगा था।
मध्य पुरापाषाण काल की विशेषताएँ
इस काल की संस्कृति को समझने के लिए इसकी तकनीकी और जीवनशैली से जुड़ी विशेषताओं को जानना आवश्यक है –
- कच्चे माल में बदलाव – निम्न पुरापाषाण काल में जहाँ ‘क्वार्टजाइट’ मुख्य पत्थर था, वहीं इस काल में मानव ने जैस्पर (Jasper), चर्ट (Chert) और एगेट (Agate) जैसे कीमती और सूक्ष्म कण वाले पत्थरों का उपयोग शुरू किया।
- फलक उपकरणों की प्रधानता – इस काल के औजार ‘कोर’ (Core) तकनीक के बजाय ‘फ्लेक’ (Flake) तकनीक पर आधारित थे।
- लेवाल्वा तकनीक (Levallois Technique) – यह पत्थर से औजार बनाने की एक उन्नत विधि थी, जिसका व्यापक उपयोग इस काल में हुआ। इससे पत्थरों को मनचाहा आकार दिया जा सकता था।
- विशिष्ट उपकरण – इस काल के मुख्य औजारों में स्क्रेपर (Scraper/खुरचनी), बोरर (Borer/वेधनी) और पॉइंट्स (Points/बेधक) शामिल थे।
- पर्यावरणीय अनुकूलन – लोग नदी घाटियों के अलावा घने जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में भी बसने लगे थे।
उपकरणों का निर्माण और तकनीक
इस काल के उपकरणों को तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है –
- वेधनी (Borers) – इसका उपयोग चमड़े या लकड़ी में छेद करने के लिए किया जाता था।
- खुरचनी (Scrapers) – यह इस काल का सबसे प्रमुख उपकरण था। इसका उपयोग जानवरों की खाल साफ करने या पेड़ों की छाल उतारने में होता था।
- बेधक (Points) – ये तीर या भाले की नोक के रूप में इस्तेमाल होते थे, जिससे शिकार करना आसान हो गया।
तुलनात्मक अध्ययन (Lower vs Middle Paleolithic)
| विशेषता | निम्न पुरापाषाण काल | मध्य पुरापाषाण काल |
| मुख्य पत्थर | क्वार्टजाइट | जैस्पर, चर्ट, एगेट |
| उपकरण प्रकार | कोर उपकरण (Core Tools) | फलक उपकरण (Flake Tools) |
| मुख्य औजार | हैंड एक्स, क्लीवर | स्क्रेपर, बोरर, पॉइंट्स |
| संस्कृति का नाम | सोहन/ऐश्यूलियन | नेवासा संस्कृति |
| तकनीक | ब्लॉक ऑन ब्लॉक | लेवाल्वा तकनीक |
प्रमुख स्थल और वितरण
भारत में इस काल के साक्ष्य विभिन्न राज्यों में मिले हैं। UPSC मुख्य परीक्षा के लिए इनका भौगोलिक वितरण समझना जरूरी है –
- महाराष्ट्र (नेवासा) – प्रवरा नदी के तट पर स्थित यह स्थल इस संस्कृति का प्रारूप स्थल (Type Site) माना जाता है। एच.डी. सांकलिया ने यहाँ विस्तृत उत्खनन किया था।
- कर्नाटक – यहाँ घाटप्रभा और मालप्रभा नदियों के बेसिन में कई औजार मिले हैं।
- उत्तर प्रदेश (बेलन घाटी) – यह क्षेत्र पाषाण काल के तीनों चरणों का क्रमिक विकास दर्शाता है।
- राजस्थान (लूनी घाटी) – पश्चिमी राजस्थान के थार मरुस्थल क्षेत्र में, विशेषकर डीडवाना और जैसलमेर के पास कई स्थल मिले हैं।
- मध्य प्रदेश (भीमबेटका) – यहाँ की गुफाओं (जैसे गुफा संख्या III F-23) में मध्य पुरापाषाण काल के औजारों का जमाव मिला है।
चुनौतियाँ और सीमाएँ
इतिहासकारों के समक्ष इस काल के अध्ययन में कुछ विशिष्ट समस्याएँ हैं –
- अस्पष्ट काल निर्धारण – भारत में कई स्थानों पर निम्न और मध्य पुरापाषाण काल के औजार मिले-जुले रूप में पाए जाते हैं, जिससे उन्हें अलग करना कठिन होता है।
- जैविक साक्ष्यों की कमी – पत्थर के औजार तो बहुत मिले हैं, लेकिन मानव कंकाल या जीवाश्म बहुत कम मिले हैं। इससे उस समय के मानव की शारीरिक संरचना के बारे में सटीक जानकारी नहीं मिल पाती।
सरकारी पहल और संरक्षण
पुरातत्व महत्व के स्थलों को बचाने के लिए प्रयास जारी हैं –
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) – नेवासा और भीमबेटका जैसे स्थलों को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है।
- संग्रहालयों की भूमिका – राष्ट्रीय संग्रहालय (नई दिल्ली) और डेक्कन कॉलेज (पुणे) में इस काल के दुर्लभ औजारों को शोध और प्रदर्शन के लिए रखा गया है।
UPSC Mains Notes
- संक्रमण काल – यह निम्न और उच्च पुरापाषाण के बीच का पुल है।
- अन्य नाम – नेवासा संस्कृति, फलक संस्कृति।
- प्रौद्योगिकी – लेवाल्वा तकनीक का उदय।
- जीवनशैली – शिकार और खाद्य संग्रहण (Hunting-Gathering), लेकिन पहले से अधिक व्यवस्थित।
- धार्मिक विश्वास – यूरोप में इस काल के ‘नियंडरथल’ मानव द्वारा शवों को दफनाने के प्रमाण मिले हैं, जो परलोक में विश्वास का संकेत है (भारत में इसके स्पष्ट साक्ष्य कम हैं)।
- भाषा – संभवतः भाषा या संकेतों का प्रारंभिक विकास इसी दौर में हुआ।
Important Facts for UPSC Prelims
- मध्य पुरापाषाण काल के औजारों को सर्वप्रथम पहचानने का श्रेय एच.डी. सांकलिया को जाता है।
- ‘बड़ाबाग’ (राजस्थान) से इस काल के महत्वपूर्ण साक्ष्य मिले हैं।
- इस काल के औजारों को ‘मौस्तेरियन’ (Mousterian) संस्कृति से भी जोड़ा जाता है, जो मूल रूप से यूरोप की संस्कृति है।
- भारत में इस काल के जमाव तिब्बत के पठार और पोटवार पठार (पाकिस्तान) में भी मिले हैं।
Mains Answer Writing Angle
प्रश्न की प्रकृति – प्रौद्योगिकी में बदलाव या क्षेत्रीय संस्कृतियाँ।
उत्तर का ढांचा –
- परिचय – कालखंड और ‘फलक संस्कृति’ शब्द का उल्लेख करें।
- बदलाव – कैसे मनुष्य क्वार्टजाइट से चर्ट/जैस्पर की ओर बढ़ा और औजार छोटे हुए, इस पर फोकस करें।
- उदाहरण – नेवासा (महाराष्ट्र) का उदाहरण अवश्य दें।
- निष्कर्ष – इसे मानव की बढ़ती बौद्धिक क्षमता का परिचायक बताएं।
UPSC Previous Year Questions (PYQ)
- Mains (General Context) – भारतीय प्रागैतिहासिक काल के औजारों के विकास क्रम का वर्णन करें।
- Prelims (Trend) – अक्सर स्थलों और संस्कृतियों के मिलान (जैसे नेवासा – मध्य पुरापाषाण) पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
UPSC Prelims MCQ Practice
Q1. मध्य पुरापाषाण काल को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
A) कोर संस्कृति B) फलक संस्कृति C) ब्लेड संस्कृति D) सूक्ष्म पाषाण संस्कृति
Q2. ‘नेवासा’ नामक पुरापाषाणिक स्थल किस नदी के तट पर स्थित है?
A) गोदावरी B) नर्मदा C) प्रवरा D) ताप्ती
Q3. मध्य पुरापाषाण काल में औजार बनाने के लिए मुख्य रूप से किस पत्थर का उपयोग किया गया?
A) क्वार्टजाइट B) ग्रेनाइट C) जैस्पर और चर्ट D) बलुआ पत्थर
Q4. ‘लेवाल्वा तकनीक’ (Levallois technique) का संबंध किस काल से है?
A) नवपाषाण काल B) मध्य पुरापाषाण काल C) ताम्रपाषाण काल D) लौह युग
Q5. निम्नलिखित में से कौन सा उपकरण मध्य पुरापाषाण काल की विशेषता नहीं है?
A) खुरचनी (Scraper) B) वेधनी (Borer) C) हस्त कुल्हाड़ी (Hand Axe) D) बेधक (Point)
(उत्तर: 1-B, 2-C, 3-C, 4-B, 5-C) (नोट – हस्त कुल्हाड़ी निम्न पुरापाषाण काल की विशेषता है, यद्यपि यह बाद में भी मिलती रही लेकिन मुख्य पहचान नहीं थी)
निष्कर्ष
मध्य पुरापाषाण काल मानव के तकनीकी विकास की एक मौन क्रांति थी। भले ही इस काल में कृषि या पशुपालन नहीं था, लेकिन पत्थरों को तराशने की नई तकनीकों ने यह साबित कर दिया कि मानव अब केवल प्रकृति पर निर्भर नहीं था, बल्कि वह प्रकृति के संसाधनों को अपने अनुसार ढालने लगा था। UPSC अभ्यर्थियों के लिए नेवासा संस्कृति और उपकरणों के प्रकारों को समझना इस विषय पर पकड़ बनाने के लिए अनिवार्य है।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
Q1. मध्य पुरापाषाण काल और निम्न पुरापाषाण काल में क्या अंतर है? मुख्य अंतर औजारों का है। निम्न पुरापाषाण में ‘कोर’ औजार (हैंड एक्स) बनते थे, जबकि मध्य पुरापाषाण में ‘फलक’ (Flake) औजार प्रमुख थे।
Q2. नेवासा संस्कृति किसे कहते हैं? महाराष्ट्र के नेवासा में मध्य पुरापाषाण काल के विशिष्ट औजार मिले हैं। इसलिए एच.डी. सांकलिया ने इस पूरे काल को भारत में ‘नेवासा संस्कृति’ का नाम दिया।
Q3. इस काल के मानव कहाँ रहते थे? वे मुख्य रूप से गुफाओं, शैलाश्रयों (Rock Shelters) और नदी घाटियों के पास खुले आसमान के नीचे रहते थे।
Q4. क्या इस काल में कला का विकास हुआ था? बहुत सीमित स्तर पर। कुछ पत्थरों पर रेखांकन मिले हैं, लेकिन चित्रकला का वास्तविक विकास उच्च पुरापाषाण काल में हुआ।
Q5. इस काल की समय सीमा क्या है? भारत के संदर्भ में इसे लगभग 1,00,000 ईसा पूर्व से 40,000 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है।
