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परिचय

भारत शासन अधिनियम 1919- भारत के संवैधानिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसे मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह भारत के तत्कालीन राज्य सचिव एडविन मोंटेग्यू और वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड की रिपोर्ट पर आधारित था। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य भारत में आंशिक रूप से उत्तरदायी शासन की क्रमिक शुरुआत करना था। हालांकि, इसने भारतीयों की आकांक्षाओं को पूरी तरह से संतुष्ट नहीं किया, लेकिन भविष्य के संवैधानिक सुधारों की नींव अवश्य रखी।

भारत शासन अधिनियम 1919 (मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) - UPSC IAS परीक्षा की दृष्टि से संपूर्ण विश्लेषण-2026
भारत शासन अधिनियम 1919 (मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) – UPSC IAS परीक्षा की दृष्टि से संपूर्ण विश्लेषण-2026

अर्थ

भारत शासन अधिनियम 1919 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक कानून था, जिसका उद्देश्य भारत में प्रशासनिक सुधारों की एक श्रृंखला को लागू करना था। इस अधिनियम ने विशेष रूप से प्रांतीय सरकारों को कुछ विषयों पर अधिक अधिकार देकर उन्हें सशक्त बनाने का प्रयास किया। अधिनियम का केंद्रीय विषय प्रांतों में द्वैध शासन– यानी शासन की दोहरी प्रणाली की स्थापना करना था।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

पहले विश्व युद्ध में भारत द्वारा किए गए योगदान और देश में बढ़ती स्वशासन की मांग के दबाव के कारण ब्रिटिश सरकार को सुधारों की आवश्यकता महसूस हुई। 20 अगस्त 1917 को ब्रिटिश सरकार ने पहली बार घोषणा की कि उसका उद्देश्य भारत में धीरे-धीरे उत्तरदायी सरकार की स्थापना करना है। इस घोषणा को अगस्त घोषणा के नाम से जाना जाता है। इसी घोषणा के परिणामस्वरूप, एडविन मोंटेग्यू और लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने एक रिपोर्ट तैयार की, जिसे 1919 में अधिनियम के रूप में पारित किया गया और यह 1921 में लागू हुआ।

भारत शासन अधिनियम 1919 की विशेषताएं

इस अधिनियम ने केंद्र और प्रांतों में महत्वपूर्ण संवैधानिक परिवर्तन किए, जिनका विवरण निम्नलिखित है-

प्रांतीय विषयों का विभाजन (द्वैध शासन)

इस अधिनियम का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान प्रांतों में द्वैध शासन (Diarchy) की शुरुआत करना था। द्वैध शासन का अर्थ है- दो लोगों या दलों का शासन।

  • प्रांतीय विषयों का विभाजन– प्रांतीय विषयों को दो भागों में विभाजित किया गया- आरक्षित (Reserved) और हस्तांतरित (Transferred) विषय।
  • आरक्षित विषय– ये महत्वपूर्ण विषय (जैसे- पुलिस, वित्त, न्याय, भू-राजस्व) गवर्नर और उसकी कार्यकारी परिषद के नियंत्रण में थे। वे विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं थे।
  • हस्तांतरित विषय– ये कम महत्वपूर्ण विषय (जैसे- शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन) भारतीय मंत्रियों को सौंपे गए, जो प्रांतीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी थे।

केंद्रीय सरकार में बदलाव

अधिनियम ने केंद्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किए, हालांकि केंद्र सरकार का ढांचा एकात्मक और केंद्रीकृत बना रहा।

  • द्विसदनीय विधानमंडल– पहली बार केंद्र में द्विसदनीय विधायिका की स्थापना की गई- राज्य परिषद (Upper House) और केंद्रीय विधान सभा (Lower House)।
  • वायसराय की शक्ति– वायसराय की कार्यकारी परिषद के छह सदस्यों में से (कमांडर-इन-चीफ को छोड़कर) तीन सदस्यों का भारतीय होना अनिवार्य किया गया। हालांकि, वायसराय के पास अभी भी व्यापक अधिकार- जैसे वीटो (Veto) और अध्यादेश जारी करने की शक्ति थी।
  • केंद्र और प्रांत के बजट का पृथक्करण– पहली बार केंद्रीय बजट को प्रांतीय बजट से अलग कर दिया गया और प्रांतीय विधानसभाओं को अपना बजट बनाने का अधिकार दिया गया।

सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का विस्तार

1909 के अधिनियम में मुसलमानों के लिए शुरू किए गए पृथक निर्वाचक मंडल को और विस्तार दिया गया।

  • पृथक निर्वाचक मंडल– इस अधिनियम ने सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों और यूरोपीय लोगों के लिए भी पृथक सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का विस्तार कर दिया।
  • प्रत्यक्ष निर्वाचन– इस अधिनियम द्वारा भारत में पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली की शुरुआत की गई।
  • मताधिकार का विस्तार– संपत्ति, कर या शिक्षा के आधार पर सीमित संख्या में लोगों को वोट देने का अधिकार दिया गया, जिसमें पहली बार महिलाओं को भी सीमित रूप से मताधिकार मिला।

अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान

  • लोक सेवा आयोग– इस अधिनियम में एक लोक सेवा आयोग के गठन का प्रावधान किया गया, जिसके परिणामस्वरूप 1926 में केंद्रीय लोक सेवा आयोग की स्थापना हुई।
  • भारतीय उच्चायुक्त– लंदन में भारत के लिए एक उच्चायुक्त के कार्यालय का सृजन किया गया, जिसे भारत सचिव के कुछ कार्यों को स्थानांतरित किया गया।

द्वैध शासन- कारण, लाभ और आलोचना

द्वैध शासन इस अधिनियम की सबसे विवादास्पद विशेषता रही, जिसने मिश्रित परिणाम दिए।

द्वैध शासन के कारण

  • उत्तरदायी शासन की शुरुआत– ब्रिटिश सरकार भारत में उत्तरदायी शासन की क्रमिक शुरुआत करना चाहती थी, जिसके तहत भारतीयों को प्रशासन में भागीदारी देना आवश्यक था।
  • राष्ट्रवादी आंदोलन का दबाव– प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत में राष्ट्रवाद और स्वशासन की मांग तेज़ हो गई थी, जिसे शांत करने के लिए यह प्रतीकात्मक सुधार लाया गया।
  • प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण– केंद्रीय नियंत्रण को कुछ हद तक कम करने और प्रांतों को स्थानीय महत्व के विषयों पर अधिक स्वायत्तता देने के उद्देश्य से यह प्रणाली शुरू की गई।

द्वैध शासन – एक तुलनात्मक विश्लेषण

विशेषताआरक्षित विषय (गवर्नर के अधीन)हस्तांतरित विषय (मंत्रियों के अधीन)
विषयों के उदाहरणराजस्व- पुलिस- न्याय- सिंचाईशिक्षा- स्वास्थ्य- स्थानीय स्वशासन
उत्तरदायित्वगवर्नर ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायीमंत्री प्रांतीय विधानमंडल के प्रति
वित्त व्यवस्थापर्याप्त और निश्चित धनराशिसीमित और अनिश्चित धनराशि
नियंत्रणसीधा ब्रिटिश नियंत्रणसीमित भारतीय नियंत्रण

यह तुलना स्पष्ट करती है कि द्वैध शासन ने शक्तियों का स्पष्ट विभाजन नहीं किया- बल्कि एक टूटी हुई व्यवस्था बनाई। आरक्षित विषयों में सभी महत्वपूर्ण शक्तियां केंद्रित थीं- जबकि हस्तांतरित विषयों के मंत्रियों के पास अधिकार बहुत कम थे।

द्वैध शासन की सीमाएं

  • शक्ति का अभाव– भारतीय मंत्रियों को जो हस्तांतरित विषय दिए गए, वे अक्सर वित्त, पुलिस, और भू-राजस्व जैसे महत्वपूर्ण आरक्षित विषयों पर निर्भर थे। इससे मंत्रियों के पास वास्तविक शक्ति नहीं थी।
  • अस्पष्ट विभाजन– विषयों का विभाजन तार्किक नहीं था और आरक्षित व हस्तांतरित विषयों के बीच सहयोग का अभाव था, जिससे प्रशासन में गतिरोध उत्पन्न हुआ।
  • गवर्नर की निरंकुशता– गवर्नर को मंत्रियों के निर्णयों को ओवरराइड करने और आरक्षित विषयों पर निरंकुश अधिकार प्राप्त थे।
  • गैर-उत्तरदायी कार्यपालिका– आरक्षित विषयों के प्रभारी गवर्नर और उनकी कार्यकारी परिषद विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं थे, जिससे यह उत्तरदायी शासन की अवधारणा के विरुद्ध था।

भारत शासन अधिनियम 1919- UPSC मुख्य परीक्षा के नोट्स

  • संवैधानिक विकास में योगदान– इसने भारत के संघीय ढांचे की दिशा में पहला कदम बढ़ाया और केंद्र-प्रांत के विषयों को अलग किया।
  • आंशिक विकेन्द्रीकरण– हालांकि केंद्र का नियंत्रण बना रहा, फिर भी इसने प्रांतों को कुछ प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्तता प्रदान की।
  • प्रतिनिधित्व का विस्तार– प्रत्यक्ष चुनाव और महिलाओं को मताधिकार देने से राजनीतिक जागरूकता बढ़ी और संवैधानिक राजनीति की शुरुआत हुई।
  • कमियों के बावजूद महत्व– द्वैध शासन की विफलता ने 1935 के अधिनियम के लिए मार्ग प्रशस्त किया, जहां प्रांतों में स्वायत्तता दी गई और केंद्र में द्वैध शासन लागू करने का प्रयास किया गया।
  • सांप्रदायिकता का पोषण– पृथक निर्वाचक मंडल का विस्तार करके ब्रिटिश सरकार ने ‘बांटो और राज करो’ की नीति को और मजबूत किया।

UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • अन्य नाम– मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार।
  • घोषणा तिथि– 20 अगस्त 1917 (अगस्त घोषणा)।
  • लागू वर्ष– 1921।
  • द्वैध शासन– केवल प्रांतों में लागू किया गया (आरक्षित और हस्तांतरित विषय)।
  • केंद्रीय विधायिका– पहली बार द्विसदनीय बनाई गई।
  • पृथक निर्वाचन– सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों और यूरोपीय लोगों तक विस्तारित किया गया।
  • लोक सेवा आयोग– इसके गठन का प्रावधान किया गया।

मेन्स उत्तर लेखन दृष्टिकोण

प्रश्न- भारत शासन अधिनियम 1919 की विशेषताओं का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए और भारतीय संवैधानिक विकास में इसके महत्व को रेखांकित कीजिए।

उत्तर की संरचना-

  1. परिचय– अधिनियम का नाम (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) और उद्देश्य (उत्तरदायी शासन की क्रमिक शुरुआत) बताते हुए शुरुआत करें।
  2. मुख्य विशेषताएं– प्रांतीय द्वैध शासन, केंद्रीय द्विसदनीयता, प्रत्यक्ष चुनाव, सांप्रदायिक विस्तार, लोक सेवा आयोग का प्रावधान।
  3. समालोचनात्मक विश्लेषण (सीमाएं)
    • द्वैध शासन की विफलता– वित्त और प्रशासनिक नियंत्रण गवर्नर के पास।
    • सीमित मताधिकार– आम जनता तक पहुंच नहीं।
    • वायसराय की व्यापक शक्ति– वीटो और अध्यादेश से विधायिका प्रभावहीन।
    • सांप्रदायिक आधार का विस्तार– राष्ट्रीय एकता को नुकसान।
  4. महत्व
    • संवैधानिक नींव– संघीय और प्रांतीय स्वायत्तता की दिशा में पहला कदम।
    • प्रशासनिक अनुभव– भारतीय मंत्रियों को पहली बार प्रशासनिक जिम्मेदारी मिली।
    • राजनीतिक जागरूकता– प्रत्यक्ष चुनाव से जनता की भागीदारी बढ़ी।
    • साइमन कमीशन का आधार– 10 वर्ष बाद समीक्षा का प्रावधान था।
  5. निष्कर्ष– यह अधिनियम “अपेक्षित उत्तरदायी शासन की दिशा में एक छोटा, सीमित और दोषपूर्ण कदम” था, जिसने भविष्य के अधिक व्यापक सुधारों (1935 अधिनियम) के लिए एक मंच तैयार किया।

UPSC पिछले वर्षों के प्रश्न

  • 2013 – “मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के विश्लेषण से पता चलता है कि ब्रिटिश सरकार का इरादा भारत में पूरी तरह से उत्तरदायी सरकार स्थापित करने का नहीं था।” टिप्पणी कीजिए।
  • 2019 – भारत शासन अधिनियम 1919 में शुरू की गई ‘द्वैध शासन’ प्रणाली की प्रमुख विशेषताओं की व्याख्या कीजिए।

UPSC प्रीलिम्स MCQ अभ्यास प्रश्न

  1. भारत शासन अधिनियम 1919 के संदर्भ में- ‘द्वैध शासन’ किस स्तर पर लागू किया गया था?
    (a) केंद्रीय सरकार
    (b) प्रांतीय सरकार
    (c) रियासतों की सरकार
    (d) स्थानीय नगर पालिकाएं
  2. निम्नलिखित में से कौन सा विषय भारत शासन अधिनियम 1919 के तहत ‘हस्तांतरित विषय’ था?
    (a) पुलिस
    (b) राजस्व
    (c) शिक्षा
    (d) सिंचाई
  3. मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की सिफारिशें किस वर्ष प्रकाशित हुई थीं?
    (a) 1917
    (b) 1918
    (c) 1919
    (d) 1920
  4. अधिनियम के तहत केंद्रीय विधानमंडल के संबंध में कौन सा कथन सही है?
    (a) यह एक सदनीय बना रहा
    (b) इसे द्विसदनीय बना दिया गया
    (c) इसे भंग कर दिया गया
    (d) इसमें केवल मनोनीत सदस्य थे
  5. भारत शासन अधिनियम 1919 की एक प्रमुख आलोचना यह थी कि इसमें:
    (a) मताधिकार का अत्यधिक विस्तार किया गया
    (b) केंद्र में उत्तरदायी सरकार की स्थापना की गई
    (c) साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली को समाप्त कर दिया गया
    (d) केंद्र में वायसराय की कार्यकारिणी विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं थी

उत्तर: 1-b, 2-c, 3-b, 4-b, 5-d

निष्कर्ष

भारत शासन अधिनियम 1919- एक ऐसा दस्तावेज था जिसने ब्रिटिश सरकार के भारत में धीरे-धीरे उत्तरदायी शासन स्थापित करने के इरादे को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त किया। प्रांतीय स्तर पर द्वैध शासन की शुरुआत- सीमित भारतीय भागीदारी का एक प्रयोग थी, जो अंततः अव्यावहारिक साबित हुई। बावजूद इसके, केंद्र में द्विसदनीयता, प्रत्यक्ष चुनाव और लोक सेवा आयोग जैसे प्रावधानों ने भारतीय संवैधानिक और प्रशासनिक ढांचे को एक नया आकार दिया। इस अधिनियम की कमियां ही आगे चलकर 1935 के अधिनियम में अधिक व्यापक और सार्थक सुधारों का आधार बनीं। यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम और संवैधानिक विकास की यात्रा में एक अनिवार्य कड़ी के रूप में स्थापित है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. द्वैध शासन (Diarchy) क्या था?

A. द्वैध शासन 1919 के अधिनियम द्वारा प्रांतों में शुरू की गई दोहरी शासन प्रणाली थी, जिसके तहत प्रांतीय विषयों को आरक्षित (गवर्नर के नियंत्रण में) और हस्तांतरित (भारतीय मंत्रियों के नियंत्रण में) विषयों में बाँटा गया था।

Q2. 1919 के अधिनियम के तहत केंद्र में कौन सी दो सदन बनाए गए थे?

A. 1919 के अधिनियम ने केंद्र में द्विसदनीय विधायिका की शुरुआत की- एक राज्य परिषद (Council of State) और दूसरी केंद्रीय विधान सभा (Central Legislative Assembly)।

Q3. इस अधिनियम का मुख्य दोष क्या था?

A. अधिनियम का मुख्य दोष प्रांतों में द्वैध शासन की अव्यावहारिकता और असफलता थी, क्योंकि भारतीय मंत्रियों को वास्तविक शक्ति और वित्त का नियंत्रण नहीं मिला था।

Q4. यूपीएससी के लिए 1919 अधिनियम क्यों महत्वपूर्ण है?

A. यह अधिनियम भारत के संवैधानिक विकास में एक महत्वपूर्ण चरण है। यह प्रत्यक्ष चुनाव, द्विसदनीयता और लोक सेवा आयोग की नींव रखता है, जो आधुनिक भारतीय राजव्यवस्था की उत्पत्ति को समझने के लिए आवश्यक है।

Q5. किस प्रावधान ने भारतीय प्रशासन में सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया?

A. अधिनियम द्वारा पृथक निर्वाचक मंडल को मुसलमानों के अलावा सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों और यूरोपीय लोगों तक विस्तारित करने के प्रावधान ने सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया।

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