परिचय
भारत शासन अधिनियम 1935 भारतीय संवैधानिक विकास का सबसे लंबा और अंतिम विस्तृत दस्तावेज था, जिसे ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया। यह अधिनियम भारत में एक पूर्ण उत्तरदायी सरकार की स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण लेकिन अपूर्ण कदम था। यह इतना व्यापक था कि भारतीय संविधान के दो-तिहाई हिस्से को इससे सीधे लिया गया है, जिसने इसे भारत की संवैधानिक नींव बना दिया। इसने प्रांतीय स्वायत्तता की शुरुआत की और अखिल भारतीय संघ बनाने का प्रस्ताव रखा, हालांकि यह कभी पूरी तरह लागू नहीं हो सका। इसके बावजूद, इस अधिनियम ने भारत में संघीय शासन प्रणाली और शक्तियों के विभाजन की रूपरेखा तैयार की।

भारत शासन अधिनियम 1935 का अर्थ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत शासन अधिनियम 1935 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक विस्तृत और जटिल कानून था। इसका उद्देश्य भारत में उत्तरदायी शासन को बढ़ावा देना और एक संघीय ढांचे की स्थापना करना था। यह अधिनियम भारतीय शासन में संघीय सिद्धांत को औपचारिक रूप से पेश करने वाला पहला प्रयास था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस अधिनियम को लाने के पीछे कई महत्वपूर्ण घटनाएँ और कारण थे-
- साइमन आयोग की रिपोर्ट (1930) – 1919 के अधिनियम की समीक्षा के बाद इस आयोग ने प्रांतों में द्वैध शासन को समाप्त करने और उत्तरदायी शासन स्थापित करने की सिफारिश की थी।
- गोलमेज सम्मेलन (1930-32) – भारत में संवैधानिक सुधारों पर चर्चा करने के लिए ये तीन सम्मेलन आयोजित किए गए थे, जिसमें भारतीय नेताओं और ब्रिटिश प्रतिनिधियों ने भाग लिया था।
- श्वेत पत्र (White Paper) – गोलमेज सम्मेलनों में चर्चा के आधार पर ब्रिटिश सरकार द्वारा 1933 में एक संवैधानिक सुधारों पर श्वेत पत्र जारी किया गया।
- संयुक्त प्रवर समिति की रिपोर्ट – ब्रिटिश संसद की एक संयुक्त प्रवर समिति ने श्वेत पत्र की समीक्षा की, और इसी समीक्षा के आधार पर 1935 का अधिनियम तैयार किया गया।
अधिनियम 1935 के कारण
1935 का अधिनियम अनिवार्य रूप से पिछले संवैधानिक अनुभवों की विफलता और बढ़ती राष्ट्रवादी माँगों का परिणाम था-
- 1919 अधिनियम की विफलता – प्रांतीय द्वैध शासन की विफलता और अपूर्ण उत्तरदायित्व ने एक नए, अधिक व्यापक सुधार की आवश्यकता को जन्म दिया।
- संघीय शासन की माँग – भारतीय नेताओं की लगातार माँग थी कि केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन होना चाहिए, जिसे इस अधिनियम में संघीय व्यवस्था के माध्यम से पूरा करने का प्रयास किया गया।
- भारत का पृथक्करण – वर्मा (म्यांमार) को भारत से अलग करने की आवश्यकता थी, जिसके लिए इस अधिनियम में प्रावधान शामिल किया गया।
भारत शासन अधिनियम 1935 की मुख्य विशेषताएं
यह अधिनियम भारतीय राजव्यवस्था में कई मौलिक और दूरगामी परिवर्तन लेकर आया।
अखिल भारतीय संघ की स्थापना
अधिनियम ने अखिल भारतीय संघ (All India Federation) की स्थापना का प्रावधान किया।
- इस संघ में ब्रिटिश भारत के प्रांत और देशी रियासतें (Princely States) शामिल थीं।
- रियासतों के लिए संघ में शामिल होना ऐच्छिक था। चूंकि अधिकांश रियासतें इसमें शामिल नहीं हुईं, इसलिए यह प्रावधान कभी लागू नहीं हो सका।
शक्तियों का विभाजन- तीन सूचियाँ
संघीय व्यवस्था को सुनिश्चित करने के लिए, अधिनियम ने केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों को तीन सूचियों के माध्यम से विभाजित किया।
- संघीय सूची (Federal List) – इसमें 59 विषय थे, जिन पर केंद्र को कानून बनाने का अधिकार था (जैसे- विदेश मामले, रक्षा)।
- प्रांतीय सूची (Provincial List) – इसमें 54 विषय थे, जिन पर प्रांतों को विशेष अधिकार था (जैसे- पुलिस, शिक्षा)।
- समवर्ती सूची (Concurrent List) – इसमें 36 विषय थे, जिन पर केंद्र और प्रांत दोनों कानून बना सकते थे।
- अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers) – ये शक्तियाँ वायसराय (Governor-General) को दी गईं, न कि केंद्रीय विधानमंडल को।
प्रांतीय स्वायत्तता की शुरुआत
1935 के अधिनियम ने प्रांतों में द्वैध शासन (Diarchy) को समाप्त कर दिया, जो 1919 के अधिनियम की एक प्रमुख विशेषता थी।
- इसके स्थान पर प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy) शुरू की गई।
- इसका अर्थ था कि प्रांतीय स्तर पर उत्तरदायी शासन स्थापित किया गया, जहाँ गवर्नर को प्रांतीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी मंत्रियों की सलाह पर कार्य करना होता था।
- हालांकि, गवर्नर को अभी भी कुछ मामलों में विशेष अधिकार और वीटो शक्ति प्राप्त थी।
केंद्र में द्वैध शासन
प्रांतों से द्वैध शासन हटाकर इसे केंद्र में लागू किया गया।
- केंद्र में संघीय विषयों को आरक्षित (Reserved) और हस्तांतरित (Transferred) में विभाजित किया गया।
- आरक्षित विषय (जैसे- रक्षा, विदेश मामले) गवर्नर-जनरल द्वारा कार्यकारी पार्षदों की मदद से शासित होते थे।
- हस्तांतरित विषय (जैसे- अन्य सभी मामले) मंत्रियों की सलाह पर शासित होते थे, जो विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी होते थे।
- यह प्रावधान भी कभी लागू नहीं हुआ, क्योंकि अखिल भारतीय संघ अस्तित्व में नहीं आ सका।
संघीय न्यायालय की स्थापना
संघीय ढांचे के विवादों को हल करने के लिए 1937 में संघीय न्यायालय (Federal Court) की स्थापना का प्रावधान किया गया। यह न्यायालय दिल्ली में स्थापित किया गया था।
- इस न्यायालय को प्रांतों और संघीय इकाइयों के बीच तथा केंद्र और संघीय इकाइयों के बीच विवादों का निपटारा करने का अधिकार था।
- हालांकि, इसकी सर्वोच्चता प्रीवी काउंसिल (Privy Council)– लंदन में स्थित ब्रिटिश न्यायिक समिति- के पास थी।
अन्य मुख्य प्रावधान
- द्विसदनीयता का विस्तार – छह प्रांतों (असम, बंगाल, बंबई, बिहार, मद्रास और संयुक्त प्रांत) में द्विसदनीय विधानमंडल की शुरुआत की गई।
- पृथक निर्वाचक मंडल का विस्तार – पृथक निर्वाचक मंडल को दलितों, महिलाओं और श्रमिकों (मजदूरों) तक बढ़ाया गया।
- भारतीय परिषद का उन्मूलन – भारत सचिव की सहायता के लिए स्थापित भारतीय परिषद (Council of India) को समाप्त कर दिया गया।
- आरबीआई की स्थापना – इस अधिनियम के प्रावधानों के आधार पर देश की मुद्रा और साख को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India- RBI) की स्थापना की गई।
- लोक सेवा आयोग – संघीय लोक सेवा आयोग के अतिरिक्त प्रांतीय लोक सेवा आयोग और संयुक्त लोक सेवा आयोग की स्थापना का भी प्रावधान किया गया।
लाभ और नुकसान- संवैधानिक प्रभाव
लाभ (संवैधानिक प्रभाव)
- भारतीय संविधान का आधार – यह भारतीय संविधान का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। संघीय योजना, राज्यपाल का कार्यालय, न्यायपालिका, लोक सेवा आयोग और आपातकालीन प्रावधान जैसे कई हिस्से सीधे इसी अधिनियम से लिए गए हैं।
- प्रांतीय स्वायत्तता – इसने प्रांतीय सरकारों को पहली बार वास्तविक स्वायत्तता दी, जिससे भारतीय नेता प्रशासन चलाने में सक्षम हुए। 1937 के चुनावों के बाद, कांग्रेस ने कई प्रांतों में सरकार बनाई।
नुकसान (Disadvantages)
- वायसराय की अत्यधिक शक्ति – वायसराय को ‘वीटो’ और ‘विशेषाधिकार’ जैसी अपार शक्तियाँ प्राप्त थीं, जिससे भारतीय मंत्रियों का उत्तरदायित्व सीमित हो गया था।
- अपूर्ण संघ – अखिल भारतीय संघ का प्रावधान कभी लागू नहीं हो सका, क्योंकि देशी रियासतों ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया।
- कठोरता – अधिनियम में संशोधन करने की शक्ति केवल ब्रिटिश संसद के पास थी, जिससे यह भारतीय आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं था।
स्वतंत्र भारतीय संविधान पर प्रभाव
तुलनात्मक सारणी
| विशेषता | भारत शासन अधिनियम 1935 | भारतीय संविधान (1950) |
|---|---|---|
| संरचना | संघीय ढांचे की परिकल्पना | सहकारी संघवाद को अपनाया |
| केंद्र-राज्य सम्बन्ध | केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाया | संघ सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची की व्यवस्था |
| आपातकालीन प्रावधान | गवर्नर के अधिकार | राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) का आधार |
| न्यायपालिका | संघीय न्यायालय की स्थापना | सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय |
| संवैधानिक संशोधन | कोई प्रावधान नहीं | संशोधन प्रक्रिया (भाग XX) |
आलोचना और चुनौतियाँ
भारतीय नेताओं ने भारत शासन अधिनियम 1935 की कड़ी आलोचना की-
- जवाहरलाल नेहरू – उन्होंने इसे “ब्रेक वाली, लेकिन इंजन रहित मशीन” (a machine with strong brakes but no engine) कहा। उन्होंने यह भी कहा कि यह “दासता का नया चार्टर” है।
- एम.ए. जिन्ना – उन्होंने इस अधिनियम को “पूरी तरह सड़ा हुआ और अस्वीकार्य” बताया।
- औपनिवेशिक नियंत्रण – आलोचना थी कि यह अधिनियम केवल प्रशासन के तरीके को बदलता है, लेकिन ब्रिटिश औपनिवेशिक नियंत्रण को बनाए रखता है।
- प्रांतीय स्वायत्तता का दिखावा – गवर्नर को दिए गए विशेष अधिकार (जैसे- अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, शांति और कानून-व्यवस्था) के कारण प्रांतीय स्वायत्तता केवल एक दिखावा बनकर रह गई थी।
UPSC मेन्स नोट्स
- भारतीय संविधान पर प्रभाव – भारतीय संविधान के लगभग 250 अनुच्छेद या तो भारत शासन अधिनियम 1935 से लिए गए हैं या उनमें मामूली बदलाव किए गए हैं। यह अधिनियम राजव्यवस्था खंड के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- संघीय बनाम एकात्मक – यह अधिनियम सैद्धांतिक रूप से संघीय था, लेकिन वायसराय की सर्वोच्चता और केंद्र सरकार की व्यापक शक्तियाँ इसे एकात्मक स्वरूप प्रदान करती थीं।
- आरबीआई की भूमिका – अधिनियम ने आरबीआई की स्थापना करके भारत में एक केंद्रीय मौद्रिक प्राधिकरण की आवश्यकता को पूरा किया, जो आज भी देश की अर्थव्यवस्था में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- अधिनियम का लागू न होना – अखिल भारतीय संघ का प्रावधान, और केंद्र में द्वैध शासन का प्रावधान कभी लागू नहीं हो सका।
- अधिनियम द्वारा अलग किया गया क्षेत्र – बर्मा (म्यांमार) को भारत से अलग किया गया, और एडन को बॉम्बे प्रेसीडेंसी से अलग करके औपनिवेशिक कार्यालय के अधीन कर दिया गया।
- संघीय न्यायालय का उद्घाटन – 1937 में।
- प्रांतीय चुनाव – अधिनियम के प्रावधानों के तहत 1937 में प्रांतीय विधानमंडलों के लिए चुनाव कराए गए।
- शक्तियों का स्रोत – संघीय सूची (59), प्रांतीय सूची (54), समवर्ती सूची (36)।
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन कोण
प्रश्न – “जहाँ भारत शासन अधिनियम 1935 पूर्ण स्वतंत्रता की राष्ट्रवादी माँगों को पूरा करने में विफल रहा, वहीं इसने भारतीय संविधान की रूपरेखा तैयार की।” समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (15 अंक/250 शब्द)
उत्तर-लेखन के मूल्य-वर्धित बिंदु
- विफलता के कारण – वायसराय की अपरिमित शक्तियाँ, अखिल भारतीय संघ का लागू न होना, देशी रियासतों को वीटो शक्ति, और औपनिवेशिक नियंत्रण को बनाए रखना।
- संवैधानिक रूपरेखा – संघीय योजना, शक्तियों का विभाजन (सूचियाँ), संघीय न्यायालय, लोक सेवा आयोग, और प्रांतीय स्वायत्तता की शुरुआत।
- दृष्टिकोण – भारतीय संविधान निर्माताओं ने अधिनियम की सकारात्मक प्रशासनिक और संरचनात्मक विशेषताओं को अपनाया, लेकिन इसके राजनीतिक प्रतिबंधों (जैसे- गवर्नर की वीटो शक्ति) को समाप्त कर दिया।
- केस स्टडी – 1937 के चुनाव और बाद में कांग्रेस मंत्रिमंडलों का गठन प्रांतीय स्वायत्तता की सफलता को दर्शाता है, भले ही वह सीमित थी।
UPSC पिछले वर्ष के प्रश्न
- UPSC Prelims 2018 – निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन भारत शासन अधिनियम 1935 के बारे में सही है/हैं?
- इसने प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त किया।
- इसने संघीय न्यायालय (Federal Court) की स्थापना का प्रावधान किया।
- इसने अखिल भारतीय संघ की स्थापना की। (a) केवल 1 और 2 (b) केवल 2 और 3 (c) केवल 1 और 3 (d) 1, 2 और 3
- UPSC Mains 2016 – भारत के संविधान पर भारत सरकार अधिनियम, 1935 के प्रभाव को स्पष्ट कीजिए।
UPSC प्रारंभिक परीक्षा MCQ अभ्यास
- भारत शासन अधिनियम 1935 के तहत, अवशिष्ट शक्तियाँ किसे प्रदान की गई थीं? (a) संघीय विधानमंडल (b) प्रांतीय विधानमंडल (c) गवर्नर-जनरल (वायसराय) (d) भारत सचिव उत्तर – (c)
- 1935 के अधिनियम द्वारा किस संस्था की स्थापना का प्रावधान किया गया था? (a) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (b) भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) (c) लोक सेवा आयोग (केवल संघ) (d) प्रीवी काउंसिल
- 1935 अधिनियम की सबसे विवादास्पद विशेषता क्या थी, जिसने इसे भारतीय राष्ट्रीय नेताओं द्वारा अस्वीकार करवाया? (a) वायसराय को दी गई विशेषाधिकार और वीटो शक्तियाँ (b) प्रांतों को पूर्ण स्वायत्तता देना (c) अखिल भारतीय संघ का गठन (d) शक्तियों का स्पष्ट विभाजन
- 1935 के अधिनियम द्वारा किस देश को भारत से अलग किया गया था? (a) श्रीलंका (b) नेपाल (c) बर्मा (म्यांमार) (d) अफगानिस्तान
- 1935 के अधिनियम के तहत स्थापित संघीय न्यायालय के संबंध में कौन सा कथन असत्य है? (a) इसकी स्थापना 1937 में हुई थी। (b) यह केंद्र और संघीय इकाइयों के बीच विवादों का निपटारा कर सकता था। (c) यह भारत का सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय था। (सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय प्रीवी काउंसिल थी) (d) यह दिल्ली में स्थापित था। उत्तर – (c)
निष्कर्ष
भारत शासन अधिनियम 1935 भारतीय संवैधानिक इतिहास में एक जलविभाजक (Watershed) घटना है। भले ही यह अखिल भारतीय संघ स्थापित करने और केंद्र में द्वैध शासन लागू करने में सफल नहीं हो सका, और इसे “दासता का नया चार्टर” कहकर आलोचना मिली- लेकिन इसने भारतीय राजव्यवस्था में संघीय सिद्धांत, शक्तियों का विभाजन, और प्रांतीय स्वायत्तता की नींव रखी। आज भी, भारतीय संविधान की अधिकांश संरचना और प्रशासनिक ढाँचा इसी अधिनियम से गहराई से प्रेरित है। UPSC उम्मीदवारों के लिए, इसके प्रावधानों, इसकी आलोचनाओं और भारतीय संविधान पर इसके स्थायी प्रभाव को समझना अनिवार्य है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. भारत शासन अधिनियम 1935 भारतीय संविधान का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत क्यों माना जाता है?
A1. क्योंकि भारतीय संविधान के लगभग दो-तिहाई हिस्से (लगभग 250 अनुच्छेद) या तो सीधे इस अधिनियम से लिए गए हैं या उनमें मामूली बदलाव किए गए हैं।
Q2. अखिल भारतीय संघ का प्रावधान 1935 में लागू क्यों नहीं हो सका?
A2. क्योंकि संघ में शामिल होना देशी रियासतों के लिए ऐच्छिक था, और अधिकांश रियासतों ने ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण के कारण इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया था।
Q3. 1935 अधिनियम के तहत कौन-सी तीन सूचियाँ शक्तियों का विभाजन करती थीं?
A3. संघीय सूची, प्रांतीय सूची, और समवर्ती सूची।
Q4. 1935 अधिनियम द्वारा प्रांतों में किस प्रकार के शासन की शुरुआत हुई?
A4. प्रांतों में द्वैध शासन को समाप्त करके प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy) की शुरुआत की गई।
Q5. जवाहरलाल नेहरू ने इस अधिनियम के बारे में क्या प्रसिद्ध टिप्पणी की थी?
A5. उन्होंने इसे “ब्रेक वाली, लेकिन इंजन रहित मशीन” कहा था।
