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परिचय

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 भारतीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था, जिसने लगभग दो सौ वर्षों के ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को समाप्त कर दिया। यह अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया अंतिम प्रमुख कानून था, जिसके द्वारा 15 अगस्त 1947 को भारत को संप्रभु राष्ट्र घोषित किया गया। इसने न केवल भारत को स्वतंत्रता दी, बल्कि भारत को भारत और पाकिस्तान नामक दो अलग-अलग अधिराज्यों (Dominions) में विभाजित कर दिया। इस अधिनियम ने भारतीय संविधान सभा को भी पूरी तरह से संप्रभु निकाय बना दिया, जिससे उसे अपने नए राष्ट्र के लिए संविधान बनाने और ब्रिटिश कानून को समाप्त करने की शक्ति मिली।

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 का अर्थ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 एक ऐसा कानून था, जिसके माध्यम से ब्रिटेन की संसद ने भारत में अपना शासन समाप्त कर, उपमहाद्वीप को दो स्वतंत्र और संप्रभु देशों- भारत और पाकिस्तान में विभाजित कर दिया। यह ब्रिटिश सरकार के भारत पर किसी भी प्रकार के नियंत्रण को समाप्त करने वाला अंतिम कानूनी दस्तावेज था।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

इस अधिनियम के पारित होने के लिए निम्नलिखित घटनाएँ जिम्मेदार थीं-

  • कैबिनेट मिशन योजना (1946) की विफलता – मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच सहमति न बन पाने के कारण यह योजना सफल नहीं हो सकी, जिससे विभाजन लगभग अपरिहार्य हो गया।
  • प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस – मुस्लिम लीग द्वारा अगस्त 1946 में प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस मनाए जाने के बाद देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे, जिसने विभाजन को एकमात्र समाधान बना दिया।
  • एटली की घोषणा (फरवरी 1947) – ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने जून 1948 तक भारत में ब्रिटिश शासन समाप्त करने की घोषणा की।
  • माउंटबेटन का आगमन – लॉर्ड माउंटबेटन को अंतिम वायसराय के रूप में भारत भेजा गया, जिसका मुख्य उद्देश्य सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को शीघ्र पूरा करना था।

अधिनियम 1947 के कारण- माउंटबेटन योजना

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 सीधे 3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा प्रस्तुत माउंटबेटन योजना पर आधारित था।

माउंटबेटन योजना के मुख्य बिंदु

  • भारत का विभाजन – योजना में स्पष्ट रूप से भारत के विभाजन का प्रस्ताव था, जिससे भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र राज्य बनेंगे।
  • बंगाल और पंजाब का विभाजन – योजना के अनुसार बंगाल और पंजाब को दो अलग-अलग प्रांतों (पूर्वी और पश्चिमी) में विभाजित किया जाना था।
  • देशी रियासतें – देशी रियासतों को यह स्वतंत्रता दी गई कि वे या तो भारत में, पाकिस्तान में शामिल हों, या स्वतंत्र रहें।
  • तत्काल स्वतंत्रता – यह योजना इस बात पर सहमत थी कि स्वतंत्रता की तिथि को जून 1948 से पहले लाया जाए।

कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने इस योजना को स्वीकार कर लिया, जिसके बाद इसे कानून का रूप देने के लिए ब्रिटिश संसद में विधेयक प्रस्तुत किया गया।

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 की मुख्य विशेषताएं

यह अधिनियम 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद में पारित हुआ, जिसमें निम्नलिखित प्रमुख प्रावधान थे-

ब्रिटिश शासन की समाप्ति और दो अधिराज्यों का निर्माण

  • समाप्ति तिथि – अधिनियम ने 15 अगस्त 1947 को भारत में ब्रिटिश राज की समाप्ति की घोषणा की।
  • दो अधिराज्य – भारत को भारत और पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र अधिराज्यों (Dominions) में विभाजित किया गया। इन अधिराज्यों को ब्रिटिश राष्ट्रमंडल (Commonwealth) से अलग होने का अधिकार भी था।
  • सीमा निर्धारण – दोनों अधिराज्यों के बीच सीमा निर्धारण के लिए सर सिरिल रैडक्लिफ की अध्यक्षता में सीमा आयोग (Boundary Commission) का गठन किया गया।

संप्रभु संविधान सभाएं

  • अधिनियम ने दोनों अधिराज्यों की संविधान सभाओं को संप्रभु (Sovereign) शक्तियाँ प्रदान कीं।
  • इन सभाओं को अपने-अपने देशों के लिए कोई भी संविधान बनाने का अधिकार मिला, और वे ब्रिटिश संसद के किसी भी कानून को समाप्त या बदल सकती थीं, जिसमें यह अधिनियम भी शामिल था।
  • दोनों विधानसभाएं नए संविधान बनने तक विधानमंडल के रूप में भी कार्य करेंगी।

गवर्नर-जनरल का पद

  • प्रत्येक अधिराज्य के लिए एक गवर्नर-जनरल का पद सृजित किया गया।
  • गवर्नर-जनरल को ब्रिटिश सम्राट द्वारा नियुक्त किया जाना था, लेकिन यह नियुक्ति अधिराज्य की कैबिनेट की सलाह पर की जाती थी।
  • वह अब केवल एक संवैधानिक प्रमुख (Constitutional Head) था, जिसके पास कोई वास्तविक शक्ति नहीं थी।

देशी रियासतें और संधि संबंध

  • 15 अगस्त 1947 से देशी रियासतों पर ब्रिटिश संप्रभुता (Paramountcy) समाप्त कर दी गई।
  • रियासतों और ब्रिटिश क्राउन के बीच हुए सभी संधि संबंध समाप्त हो गए।
  • रियासतों को यह स्वतंत्रता मिली कि वे या तो भारत में शामिल हों, पाकिस्तान में शामिल हों, या स्वतंत्र रहें।
  • इस प्रावधान ने रियासतों के एकीकरण की एक बड़ी समस्या खड़ी कर दी, जिसे बाद में सरदार वल्लभभाई पटेल ने हल किया।

भारत सचिव के पद की समाप्ति

  • अधिनियम के साथ ही भारत सचिव (Secretary of State for India) का पद और भारतीय परिषद (Council of India) समाप्त कर दी गई।
  • भारत सचिव के कार्य राष्ट्रमंडल मामलों के सचिव (Secretary of State for Commonwealth Affairs) को हस्तांतरित कर दिए गए।

अस्थायी प्रावधान

  • नए संविधान बनने तक, दोनों अधिराज्यों का शासन मुख्य रूप से भारत शासन अधिनियम 1935 के प्रावधानों के तहत चलता रहा, लेकिन आवश्यक संशोधनों के साथ।
  • ब्रिटिश सम्राट को किसी भी विधेयक को वीटो करने या उसके नाम पर आरक्षित रखने का अधिकार भी समाप्त हो गया।

लाभ और नुकसान- संवैधानिक निहितार्थ

लाभ (संवैधानिक निहितार्थ)

  • संप्रभुता की प्राप्ति – अधिनियम ने संविधान सभा को संप्रभु बना दिया, जिससे भारतीय नेता बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के अपने देश का भविष्य तय करने में सक्षम हुए।
  • संवैधानिक निरंतरता – 1935 अधिनियम के उपयोग ने अचानक आए राजनीतिक शून्य को भरने में मदद की और प्रशासनिक एवं संवैधानिक निरंतरता बनाए रखी।
  • शांत सत्ता हस्तांतरण – कानून ने सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को कानूनी और शांतिपूर्ण आधार प्रदान किया, जिससे एक प्रशासनिक ढांचे का निर्माण संभव हुआ।

नुकसान (Disadvantages)

  • विभाजन की त्रासदी – अधिनियम का सबसे बड़ा नकारात्मक पहलू भारत का विभाजन था, जिसके कारण व्यापक सांप्रदायिक दंगे और भारी संख्या में लोगों का विस्थापन हुआ। यह एक मानवीय त्रासदी थी।
  • रियासतों की समस्या – रियासतों को स्वतंत्र रहने का विकल्प देने से भारत की क्षेत्रीय अखंडता के सामने गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया। जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर जैसे क्षेत्रों में समस्याएँ पैदा हुईं।

आलोचना और चुनौतियाँ

  • शीघ्रता और हड़बड़ी – आलोचकों का मानना है कि सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया अत्यधिक शीघ्रता में की गई। माउंटबेटन ने जून 1948 की अंतिम तिथि को अगस्त 1947 तक खींच लिया, जिससे सीमा आयोग को ठीक से काम करने का समय नहीं मिला।
  • अव्यवस्थित विभाजन – अत्यधिक जल्दबाजी के कारण संसाधनों, सेना, और नागरिक सेवाओं का विभाजन अव्यवस्थित रहा, जिसके गंभीर परिणाम हुए और दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा।
  • रैडक्लिफ रेखा का विवाद – सीमा आयोग द्वारा खींची गई सीमा (रैडक्लिफ रेखा) कई स्थानों पर अव्यवहारिक और विवादित थी, जो आज भी भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव का कारण बनी हुई है।

UPSC मेन्स नोट्स

  • कानून से संप्रभुता – भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक कानून था, जिसने हमें कानूनी रूप से स्वतंत्रता दी। हालांकि, भारतीय संविधान सभा ने बाद में इस अधिनियम को भी समाप्त करके वास्तविक संप्रभुता स्थापित की।
  • अंतरिम मंत्रिमंडल – 15 अगस्त 1947 के बाद, जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में गठित अंतरिम मंत्रिमंडल ने एक स्वतंत्र भारत की पहली सरकार के रूप में कार्य करना शुरू किया।
  • गवर्नर-जनरल – स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन थे, जबकि पहले भारतीय गवर्नर-जनरल सी. राजगोपालाचारी थे।

UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • ब्रिटिश प्रधानमंत्री – क्लेमेंट एटली (लेबर पार्टी)।
  • भारत के अंतिम वायसराय/प्रथम गवर्नर-जनरल – लॉर्ड माउंटबेटन।
  • भारत के प्रथम भारतीय गवर्नर-जनरल – सी. राजगोपालाचारी।
  • अधिनियम पारित होने की तिथि – 18 जुलाई 1947।
  • सत्ता हस्तांतरण की तिथि – 15 अगस्त 1947।
  • सीमा आयोग के अध्यक्ष – सर सिरिल रैडक्लिफ।

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन कोण

प्रश्न – “भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 केवल स्वतंत्रता का कानूनी दस्तावेज नहीं था, बल्कि यह भारत के संवैधानिक विकास में अंतिम चरण और एक नए संप्रभु युग का आरंभ बिंदु था।” विश्लेषण कीजिए। (15 अंक/250 शब्द)

उत्तर-लेखन के मूल्य-वर्धित बिंदु

  1. कानूनी दस्तावेज से अधिक – यह केवल ब्रिटिश शासन की समाप्ति नहीं थी, बल्कि इसने भारत की संविधान सभा को पूर्ण संप्रभु शक्ति दी, जिससे वह भारत के लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व कर सके।
  2. संवैधानिक विकास का अंत – यह 1773 के नियामक अधिनियम से शुरू हुए ब्रिटिश संवैधानिक विकास की श्रृंखला का अंतिम चरण था, जिसने भारत को एक संवैधानिक लोकतंत्र के रूप में स्थापित किया।
  3. राष्ट्र निर्माण की चुनौती – अधिनियम ने देशी रियासतों को स्वतंत्र रहने का विकल्प देकर राष्ट्र निर्माण और एकीकरण की एक गंभीर चुनौती पेश की, जिसे राजनीतिक बुद्धिमत्ता से हल किया गया।
  4. लोकतंत्र की नींव – इस अधिनियम ने भारत को ब्रिटिश मॉडल पर आधारित संसदीय लोकतंत्र की ओर अग्रसर किया, जिसे हमारी संविधान सभा ने सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया।

UPSC पिछले वर्ष के प्रश्न

  • UPSC Prelims 2005 – भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के संबंध में निम्नलिखित कथनों में से कौन सा सही नहीं है? (a) इसने ब्रिटिश संसद को भारत के संबंध में कोई भी कानून पारित करने से रोक दिया, (b) इसने दोनों अधिराज्यों को राष्ट्रमंडल से अलग होने की अनुमति दी, (c) इसने ब्रिटिश सम्राट को वीटो करने के अधिकार से वंचित कर दिया, (d) इसने भारत सचिव के पद को समाप्त कर दिया।
  • UPSC Mains 2020 – भारत में संप्रभु संविधान सभा के गठन और उसके कार्यों पर भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के प्रभाव का मूल्यांकन कीजिए।

UPSC प्रारंभिक परीक्षा MCQ अभ्यास

  1. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत, निम्नलिखित में से कौन-सा अधिकार समाप्त कर दिया गया? (a) संविधान सभा को कानून बनाने का अधिकार। (b) अधिराज्यों के लिए गवर्नर-जनरल का पद। (c) देशी रियासतों पर ब्रिटिश संप्रभुता (Paramountcy)। (d) दोनों अधिराज्यों को राष्ट्रमंडल में बने रहने का विकल्प। उत्तर – (c)
  2. 1947 अधिनियम ने दोनों अधिराज्यों के लिए नए संविधान बनने तक शासन चलाने हेतु किस अधिनियम को आधार बनाया? (a) भारत शासन अधिनियम 1919 (b) भारत शासन अधिनियम 1935 (c) रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 (d) चार्टर अधिनियम 1833
  3. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के पारित होने के समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कौन थे? (a) विंस्टन चर्चिल (b) नेविल चेम्बरलेन (c) क्लेमेंट एटली (d) लॉर्ड नॉर्थ
  4. निम्नलिखित में से किसे भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 का परिणाम माना जा सकता है?
    1. संप्रभु संविधान सभा का निर्माण।
    2. भारत सचिव के पद का उन्मूलन।
    3. रियासतों का भारतीय संघ में विलय। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (a) केवल 1 और 2 (b) केवल 2 और 3 (c) केवल 1 और 3 (d) 1, 2 और 3
  5. भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा निर्धारण के लिए गठित आयोग के अध्यक्ष कौन थे? (a) लॉर्ड माउंटबेटन (b) सी. राजगोपालाचारी (c) सर सिरिल रैडक्लिफ (d) लॉर्ड वेवेल उत्तर – (c)

निष्कर्ष

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 ब्रिटिश राज के एक युग का समापन और भारतीय उपमहाद्वीप में एक नए, संप्रभु युग का आरंभ था। यह अधिनियम माउंटबेटन योजना पर आधारित था, जिसने दुर्भाग्य से विभाजन की त्रासदी भी लाई। हालांकि, इस कानून ने भारत की संविधान सभा को पूर्ण संप्रभु शक्ति देकर, भारतीय संविधान के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। इसके प्रावधानों ने एक सुचारु, यद्यपि तेजी से, सत्ता हस्तांतरण सुनिश्चित किया। UPSC उम्मीदवारों के लिए, यह अधिनियम न केवल भारत के इतिहास में स्वतंत्रता की तिथि को चिह्नित करता है, बल्कि भारत के संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बनने की कानूनी प्रक्रिया को भी दर्शाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 कब लागू हुआ था?

A1. यह अधिनियम 15 अगस्त 1947 को लागू हुआ था।

Q2. इस अधिनियम के माध्यम से कितने अधिराज्यों का निर्माण किया गया?

A2. दो अधिराज्यों- भारत और पाकिस्तान

Q3. स्वतंत्रता अधिनियम के बाद देशी रियासतों को क्या स्वतंत्रता दी गई?

A3. उन्हें भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या स्वतंत्र रहने का विकल्प दिया गया था।

Q4. भारत के प्रथम भारतीय गवर्नर-जनरल कौन थे?

A4. चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (सी. राजगोपालाचारी)।

Q5. इस अधिनियम के तहत, किस पद को समाप्त कर दिया गया था?

A5. भारत सचिव (Secretary of State for India) के पद को समाप्त कर दिया गया था।

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