परिचय

किसी भी देश की राजनीतिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए अध्याय 3 – संविधान की अवधारणा को समझना अत्यंत आवश्यक है। संविधान केवल नियमों की एक किताब नहीं है, बल्कि यह वह सर्वोच्च विधि है जो राज्य के अंगों की शक्तियों को निर्धारित और नियंत्रित करती है। UPSC की तैयारी में, चाहे वह प्रीलिम्स हो या मेन्स, यह टॉपिक आधारशिला का काम करता है।

आसान शब्दों में कहें तो, संविधान राज्य और नागरिकों के बीच के संबंधों को परिभाषित करता है। यह सरकार को शक्तियां देता है तो साथ ही उन शक्तियों पर सीमाएं भी लगाता है ताकि तानाशाही न हो सके। इस अध्याय में हम संविधान के विभिन्न प्रकारों, जैसे लिखित-अलिखित और एकात्मक-संघीय, के साथ-साथ ‘संवैधानिकता’ (Constitutionalism) के गहरे अर्थ को भी समझेंगे।

अध्याय 3 - संविधान की अवधारणा

संविधान का अर्थ और परिभाषा

संविधान (Constitution) लैटिन शब्द ‘Constituere’ से बना है, जिसका अर्थ है ‘महत्वपूर्ण स्थापना करना’। यह उन नियमों, उपनियमों और परंपराओं का संकलन है जिसके आधार पर किसी राज्य का शासन चलाया जाता है।

परिभाषाएं –

  • डायसी (Dicey) के अनुसार – संविधान उन नियमों का समूह है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राज्य की संप्रभु शक्ति के वितरण और प्रयोग को प्रभावित करते हैं।
  • गिलक्रिस्ट के अनुसार – संविधान उन लिखित या अलिखित नियमों का समूह है जो सरकार की रचना, नागरिकों के प्रति उसके अधिकार और शक्तियों का निर्धारण करते हैं।
  • सरल शब्दों में – यह देश का मौलिक कानून (Fundamental Law of Land) है। अन्य सभी कानून इसी के अधीन होते हैं और कोई भी कानून इसका उल्लंघन नहीं कर सकता।

संविधान के कार्य (Functions)

एक लोकतांत्रिक देश में संविधान की भूमिका बहुआयामी होती है। इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं –

  1. बुनियादी नियमों का समूह उपलब्ध कराना – यह समाज के सदस्यों के बीच न्यूनतम समन्वय और विश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक नियम तय करता है।
  2. निर्णय लेने की शक्ति का निर्धारण – यह स्पष्ट करता है कि समाज में निर्णय लेने की शक्ति किसके पास होगी। उदाहरण के लिए, कानून कौन बनाएगा? संसद या राजा?
  3. सरकार की शक्तियों पर सीमाएं – संविधान सरकार द्वारा अपने नागरिकों पर लागू किए जाने वाले कानूनों पर कुछ सीमाएं लगाता है। ये सीमाएं मौलिक होती हैं और सरकार इनका उल्लंघन नहीं कर सकती।
  4. नागरिकों की आकांक्षाओं को पूरा करना – यह सरकार को ऐसी क्षमता प्रदान करता है जिससे वह जनता की आकांक्षाओं को पूरा कर सके और एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना कर सके।

संविधान की विशेषताएँ

अध्याय 3 – संविधान की अवधारणा के अंतर्गत इसकी कुछ मुख्य विशेषताएं समझना जरूरी है –

  • सर्वोच्चता (Supremacy) – संविधान देश का सर्वोच्च कानून होता है। राष्ट्रपति से लेकर सामान्य नागरिक तक, सभी इसके दायरे में आते हैं।
  • शक्तियों का विभाजन – यह विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा करता है ताकि कोई भी अंग निरंकुश न हो।
  • अधिकारों का रक्षक – यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है और राज्य के अतिक्रमण से उनकी रक्षा करता है।
  • परिवर्तनशीलता – समय और परिस्थितियों के अनुसार इसमें संशोधन की व्यवस्था होती है, हालांकि यह प्रक्रिया सामान्य कानून बनाने से थोड़ी कठिन हो सकती है।

संविधान का वर्गीकरण (Classification)

दुनिया भर के संविधानों को उनकी प्रकृति, उत्पत्ति और संशोधन प्रक्रिया के आधार पर कई श्रेणियों में बांटा जा सकता है।

1. विकसित और अधिनियमित (Evolved and Enacted)

  • विकसित संविधान – इसका निर्माण किसी विशेष समय पर किसी संविधान सभा द्वारा नहीं किया जाता। यह रीति-रिवाजों, परंपराओं और न्यायिक निर्णयों के माध्यम से धीरे-धीरे विकसित होता है। उदाहरण – ब्रिटेन का संविधान।
  • अधिनियमित संविधान – इसका निर्माण एक विशेष संविधान सभा द्वारा एक निश्चित समय पर किया जाता है। यह एक सचेत प्रयास का परिणाम होता है। उदाहरण – भारत और अमेरिका का संविधान।

2. लिखित और अलिखित (Written and Unwritten)

  • लिखित संविधान – इसमें अधिकांश प्रावधान एक एकल दस्तावेज़ या दस्तावेजों की श्रृंखला के रूप में लिखित होते हैं। यह अधिनियमित होता है। उदाहरण – भारत, यूएसए।
  • अलिखित संविधान – इसमें संवैधानिक नियम किसी एक दस्तावेज में नहीं मिलते, बल्कि परंपराओं और अलग-अलग समय पर बने कानूनों में बिखरे होते हैं। उदाहरण – ब्रिटेन, न्यूज़ीलैंड।

3. अनम्य और लचीला (Rigid and Flexible)

  • अनम्य (कठोर) – इसमें संशोधन करना बहुत मुश्किल होता है। इसके लिए विशेष बहुमत या विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। उदाहरण – अमेरिका का संविधान।
  • लचीला (नम्य) – इसे सामान्य कानून बनाने की प्रक्रिया की तरह ही आसानी से बदला जा सकता है। उदाहरण – ब्रिटेन का संविधान।
    • नोट – भारत का संविधान दोनों का मिश्रण है।

4. संघीय और एकात्मक (Federal and Unitary)

  • संघीय संविधान – इसमें शक्तियों का स्पष्ट विभाजन केंद्र और राज्य सरकारों के बीच होता है। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र होते हैं। उदाहरण – अमेरिका।
  • एकात्मक संविधान – इसमें सारी शक्तियां केंद्र सरकार के पास होती हैं। राज्य सरकारें केंद्र के एजेंट के रूप में कार्य करती हैं। उदाहरण – ब्रिटेन, फ्रांस।

5. कार्य विधि परक और निर्देशात्मक (Procedural and Prescriptive)

  • कार्य विधि परक (Procedural) – यह मुख्य रूप से सरकार की संरचना, प्रक्रियाओं और शक्तियों के बंटवारे पर ध्यान केंद्रित करता है। यह बताता है कि सरकार ‘कैसे’ काम करेगी।
  • निर्देशात्मक (Prescriptive) – यह न केवल प्रक्रिया बताता है, बल्कि यह भी निर्धारित करता है कि सरकार को ‘क्या’ हासिल करना चाहिए। इसमें राज्य के लक्ष्य, विचारधारा और मूल्य शामिल होते हैं (जैसे भारत के नीति निर्देशक तत्व)।

संवैधानिकता और संवैधानिक सरकार

अध्याय 3 – संविधान की अवधारणा में यह सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक हिस्सा है।

अर्थ और परिभाषा

संवैधानिकता (Constitutionalism) – यह एक विचारधारा है जो मानती है कि सरकार की शक्तियां सीमित होनी चाहिए। इसका मूल मंत्र है- “सीमित सरकार” (Limited Government)। जरूरी नहीं कि जिस देश में संविधान हो, वहां संवैधानिकता भी हो। अगर संविधान तानाशाह को असीमित शक्तियां देता है, तो वहां संविधान तो है, लेकिन संवैधानिकता नहीं है।

संवैधानिक सरकार – वह सरकार जो संविधान के नियमों के अनुसार चलती है और जहां शासक की इच्छा के बजाय कानून का शासन (Rule of Law) सर्वोच्च होता है।

तत्व (Elements)

  1. कानून का शासन – कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है।
  2. शक्तियों का पृथक्करण – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका अलग-अलग हों।
  3. स्वतंत्र न्यायपालिका – सरकार के कार्यों की समीक्षा करने के लिए।
  4. मौलिक अधिकार – नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए।
  5. जवाबदेह सरकार – सरकार जनता या उसके प्रतिनिधियों के प्रति उत्तरदायी होनी चाहिए।

तुलनात्मक चार्ट (Comparison Table)

आधारलिखित संविधानअलिखित संविधान
उत्पत्तिविशेष समय पर अधिनियमित।ऐतिहासिक रूप से विकसित।
स्वरूपसंहिताबद्ध (Codified)।असंहिताबद्ध (Uncodified)।
सर्वोच्चतासंविधान सर्वोच्च होता है।संसद सर्वोच्च होती है (जैसे ब्रिटेन में)।
लचीलापनप्रायः कठोर या अनम्य होता है।प्रायः लचीला होता है।
न्यायपालिकान्यायपालिका के पास अधिक शक्ति होती है।न्यायपालिका की शक्ति सीमित हो सकती है।

संविधान के समक्ष चुनौतियां

आज के दौर में संविधानों के सामने कई नई चुनौतियां आ रही हैं –

  • राजनीतिक अस्थिरता – बार-बार बदलती सरकारें संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर कर सकती हैं।
  • आपातकालीन प्रावधानों का दुरुपयोग – कई बार ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर नागरिकों के अधिकारों को कुचला जाता है।
  • न्यायिक सक्रियता बनाम संयम – न्यायपालिका और विधायिका के बीच टकराव संवैधानिक संतुलन को बिगाड़ सकता है।
  • सामाजिक परिवर्तन – पुराने संवैधानिक नियम तेजी से बदलते समाज (जैसे डिजिटल राइट्स, AI) के साथ तालमेल बिठाने में पिछड़ सकते हैं।

UPSC Mains Notes

  • संविधान का मूल उद्देश्य – राज्य की अराजकता को रोकना और कानून का शासन स्थापित करना।
  • भारतीय संदर्भ – भारतीय संविधान ‘उधार का थैला’ नहीं बल्कि विभिन्न संविधानों का एक अनूठा ‘मिश्रण’ है जो भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाया गया है।
  • के.सी. व्हीयर का कथन – भारतीय संविधान को ‘अर्द्ध-संघीय’ (Quasi-federal) कहा है।
  • संवैधानिकता की पहचान – जिस देश में सरकार मनमानी नहीं कर सकती, वहीं सच्ची संवैधानिकता है।
  • लचीलापन और कठोरता – भारत का संविधान अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन की शक्ति देता है, लेकिन ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) को बदला नहीं जा सकता।

Important Facts for UPSC Prelims

  • विश्व का पहला लिखित संविधान – संयुक्त राज्य अमेरिका (1787)।
  • विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान – भारत।
  • मैग्ना कार्टा (1215) – इसे संवैधानिक सरकार की दिशा में पहला कदम माना जाता है (ब्रिटेन)।
  • एकात्मक लक्षण – राज्यपाल की नियुक्ति, एकल नागरिकता, आपातकालीन प्रावधान।
  • संघीय लक्षण – लिखित संविधान, शक्तियों का विभाजन, स्वतंत्र न्यायपालिका।
  • अनुच्छेद 368 – संविधान संशोधन की प्रक्रिया (दक्षिण अफ्रीका से प्रेरित)।

Mains Answer Writing Angle

प्रश्न – “संविधान होने और संवैधानिकता होने में क्या अंतर है? चर्चा करें।”

उत्तर का दृष्टिकोण (Approach) – सबसे पहले ‘संविधान’ को नियमों के दस्तावेज के रूप में परिभाषित करें। फिर ‘संवैधानिकता’ को एक विचारधारा के रूप में समझाएं जो सरकार की शक्तियों को सीमित करती है। मुख्य बिंदु –

  1. हर तानाशाही देश में संविधान हो सकता है (जैसे हिटलर का जर्मनी), लेकिन वहां संवैधानिकता नहीं थी।
  2. संवैधानिकता के लिए कानून का शासन, स्वतंत्र न्यायपालिका और लोकतंत्र जरूरी है।
  3. निष्कर्ष में लिखें कि भारत में ‘मूल ढांचे’ का सिद्धांत संवैधानिकता को सुनिश्चित करता है।

UPSC Previous Year Questions

  • 2020 (Prelims) – संवैधानिक सरकार का आशय क्या है?
    • (a) किसी राष्ट्र की संघीय संरचना वाली एक प्रतिनिधि सरकार।
    • (b) कोई सरकार जिसके प्रमुख के पास नाममात्र की शक्तियाँ हों।
    • (c) कोई सरकार जिसके प्रमुख के पास वास्तविक शक्तियाँ हों।
    • (d) कोई सरकार जो संविधान की सीमाओं से परिबद्ध हो। (उत्तर – d)
  • 2019 (Mains) – “भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें जो इसे अन्य देशों के संविधानों से अलग बनाती हैं।”

UPSC Prelims MCQ Practice

प्रश्न 1 – निम्नलिखित में से कौन-सा संवैधानिकता का मुख्य तत्व नहीं है? (a) सीमित सरकार (b) विधि का शासन (c) मनमानी शक्तियाँ (d) मौलिक अधिकार उत्तर – (c)

प्रश्न 2 – भारतीय संविधान को ‘वकीलों का स्वर्ग’ (Paradise of Lawyers) किसने कहा था? (a) के.सी. व्हीयर (b) आइवर जेनिंग्स (c) बी.आर. अंबेडकर (d) ग्रेनविले ऑस्टिन उत्तर – (b)

प्रश्न 3 – निम्नलिखित में से कौन-सा एकात्मक संविधान का लक्षण है? (a) शक्तियों का विकेंद्रीकरण (b) एकीकृत न्यायपालिका (c) द्विसदनीय विधायिका (d) लिखित संविधान उत्तर – (b)

प्रश्न 4 – विकसित संविधान का सर्वोत्तम उदाहरण कौन सा देश है? (a) भारत (b) अमेरिका (c) ब्रिटेन (d) जापान उत्तर – (c)

प्रश्न 5 – ‘सरकार के अंगों के बीच शक्तियों का पृथक्करण’ किस सिद्धांत का हिस्सा है? (a) संसदीय संप्रभुता (b) संवैधानिकता (c) निरंकुशता (d) इनमें से कोई नहीं उत्तर – (b)

निष्कर्ष

अंततः, अध्याय 3 – संविधान की अवधारणा हमें यह सिखाती है कि एक सभ्य समाज के लिए केवल कानूनों का होना काफी नहीं है, बल्कि उन कानूनों का न्यायपूर्ण होना भी जरूरी है। संविधान राष्ट्र की आत्मा होता है।

एक प्रशासक के रूप में, आपको न केवल संविधान के प्रावधानों (Provisions) को जानना चाहिए, बल्कि उसकी भावना (Spirit) को भी समझना होगा। भारतीय संविधान, जो कठोरता और लचीलेपन का अद्भुत संतुलन है, ‘संवैधानिकता’ का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहां सरकार की शक्ति और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाया गया है।

FAQs

1. क्या लिखित संविधान हमेशा कठोर होता है? जरूरी नहीं। हालांकि लिखित संविधानों में बदलाव की प्रक्रिया अक्सर थोड़ी कठिन होती है ताकि स्थिरता बनी रहे, लेकिन यह पूरी तरह से अनम्य नहीं होता। भारत का संविधान इसका उदाहरण है जो अंशतः कठोर और अंशतः लचीला है।

2. भारतीय संविधान को ‘उधार का थैला’ क्यों कहा जाता है? क्योंकि इसके कई प्रावधान विभिन्न देशों (जैसे ब्रिटेन, अमेरिका, आयरलैंड) के संविधानों से प्रेरित हैं। हालांकि, इसे भारतीय परिस्थितियों के अनुसार संशोधित करके अपनाया गया है, इसलिए यह आलोचना पूरी तरह सही नहीं है।

3. संवैधानिक सरकार का सबसे सरल अर्थ क्या है? एक ऐसी सरकार जो अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि संविधान में लिखे नियमों और सीमाओं के दायरे में रहकर काम करती है। इसे ‘सीमित सरकार’ भी कहते हैं।

4. क्या ब्रिटेन में संविधान नहीं है? ब्रिटेन में ‘लिखित’ और ‘संहिताबद्ध’ (Codified) संविधान नहीं है, लेकिन वहां ‘अलिखित’ संविधान है। वहां का शासन परंपराओं, चार्टर और संसद द्वारा पारित कानूनों के आधार पर चलता है।

5. ‘मूल ढांचा’ (Basic Structure) का सिद्धांत क्या है? यह भारतीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा केशवानंद भारती केस (1973) में दिया गया सिद्धांत है। इसके अनुसार, संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है, लेकिन उसके बुनियादी स्वरूप (जैसे लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता) को खत्म नहीं कर सकती।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *