परिचय

साइबर स्पेस, सोशल मीडिया और अभद्र सामग्री – सुप्रीम कोर्ट का नजरिया, जनरल स्टडीज पेपर 2

डिजिटल युग में सोशल मीडिया और साइबर स्पेस ने व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के अभूतपूर्व अवसर खोले हैं, लेकिन साथ ही अभद्र, अवैध और हानिकारक सामग्री के प्रसार की चुनौती भी पैदा की है। भारत का सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) इस जटिल क्षेत्र में मौलिक अधिकारों के संरक्षण और राज्य के नियामक हितों के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है। अदालत ने अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार और अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा और निजता के अधिकार की व्याख्या करते हुए कई मील के पत्थर फैसले दिए हैं। साथ ही, सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) नियम, 2025 जैसे उपायों से ऑनलाइन मध्यस्थों के लिए दिशा-निर्देश स्थापित किए हैं। यह लेख साइबर स्पेस और अश्लील सामग्री के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के evolving रुख की गहन जानकारी प्रदान करता है।

अर्थ एवं परिभाषा

इस संदर्भ में, “अभद्र सामग्री” एक व्यापक शब्द है, जिसमें वह सभी ऑनलाइन सामग्री शामिल है जो कानून द्वारा प्रतिबंधित है। इसमें अश्लीलता (obscenity), यौन शोषणकारी सामग्री, बदनामी, हैट स्पीच, घृणा फैलाने वाली सामग्री, साइबर बुलिंग, और डीपफेक (Deepfakes) जैसी तकनीकों से बनाई गई मालिकाना सामग्री शामिल है।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और इसके तहत बनाए गए आईटी नियम, 2021 (जिनमें 2025 में संशोधन प्रस्तावित हैं) ऐसी सामग्रियों को विनियमित करने का आधार हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 19(2) में दिए गए “सार्वजनिक शालीनता” के आधार पर अश्लीलता की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए कहा है कि कोई भी सामग्री तभी अश्लील मानी जाएगी जब वह सामाजिक मानकों के अनुरूप ‘शालीनता की सीमा’ को पार करती है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना 26 जनवरी, 1950 को हुई थी और यह 28 जनवरी, 1950 से कार्यशील हुआ। संविधान के अनुच्छेद 124 से 147 तक इसकी शक्तियों और संरचना का वर्णन है। शुरुआत से ही, अदालत ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सम्मान व निजता के अधिकार जैसे मौलिक अधिकारों की रक्षा करने वाले ऐतिहासिक फैसले दिए हैं।

साइबर कानून के क्षेत्र में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 एक मील का पत्थर साबित हुआ। हाल के वर्षों में, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के विस्फोटक विकास और आईटी नियम, 2021 (जिन्हें 2023 और 2025 में संशोधन के लिए प्रस्तावित किया गया) के साथ, अदालत के सामने ऑनलाइन सामग्री के विनियमन से जुड़े जटिल मामले लगातार आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने खुद को केवल कानून के व्याख्याकार तक सीमित न रखते हुए, डिजिटल युग में नागरिकों के अधिकारों के संरक्षक की भूमिका भी निभाई है।

प्रमुख विशेषताएँ एवं बिंदु

साइबर/सोशल मीडिया और अभद्र सामग्री के मामले में सुप्रीम कोर्ट के रुख की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं

  • मौलिक अधिकारों पर जोर – अदालत लगातार अनुच्छेद 19(1)(क) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और निजी स्वतंत्रता) के संरक्षण को केंद्र में रखती है। उसका मानना है कि ऑनलाइन सामग्री को हटाने या विनियमित करने के किसी भी प्रयास को इन अधिकारों का हनन किए बिना, संविधान के अनुच्छेद 19(2) में दिए गए उचित प्रतिबंधों के दायरे में रहकर किया जाना चाहिए।
  • सरकार की नियामक भूमिका का समर्थन, पर सीमाएँ भी – सुप्रीम कोर्ट ने आईटी अधिनियम, 2000 की धारा 69A के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था आदि के हित में सरकार को ऑनलाइन सामग्री को ब्लॉक करने की शक्ति को मान्यता दी है। हालाँकि, उसने यह भी स्पष्ट किया है कि ऐसा कोई भी कदम मनमाना नहीं होना चाहिए और उसमें पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए उचित प्रक्रिया (due process) का पालन अनिवार्य है।
  • पारदर्शिता और जवाबदेही पर बल – अदालत ने सरकारी एजेंसियों द्वारा सामग्री हटाने के आदेश जारी करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की आवश्यकता पर जोर दिया है। आईटी (संशोधन) नियम, 2025 में इसी दिशा में कदम उठाए गए हैं, जहाँ आदेशों को तर्कसंगत, विशिष्ट और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा जारी करने तथा उनकी मासिक समीक्षा का प्रावधान है
  • मध्यस्थों (इंटरमीडियरीज) की जिम्मेदारी – सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया कंपनियों जैसे मध्यस्थों की जिम्मेदारी तय करने वाले मामलों की सुनवाई की है। अदालत का रुख है कि प्लेटफॉर्म्स को उचित सावधानी बरतनी चाहिए और कानून द्वारा निर्धारित ढांचे के भीतर अवैध सामग्री को हटाने के लिए तंत्र विकसित करने चाहिए।

उदाहरण एवं केस अध्ययन

  • श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) – इस ऐतिहासिक मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने आईटी अधिनियम की धारा 66A को रद्द कर दिया, जो “आपत्तिजनक” ऑनलाइन संदेश भेजने को दंडनीय बनाती थी। अदालत ने फैसला सुनाया कि यह धारा अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करती है और “अस्पष्ट एवं मनमानी” थी। यह फैसला ऑनलाइन स्वतंत्रता के पक्ष में एक बहुत बड़ी जीत साबित हुआ।
  • शशि थरूर बनाम भारत संघ (2021) और आशुतोष कुमार बनाम भारत संघ (2021) – इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 67A of the IT अधिनियम (इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील सामग्री प्रकाशित करना) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। हालाँकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अश्लीलता की परिभाषा बहुत संकीर्ण और तकनीकी होनी चाहिए, और केवल वही सामग्री अश्लील मानी जाएगी जो “शालीनता की सीमा” को पार करती है और जिसका कोई गंभीर साहित्यिक, कलात्मक या वैज्ञानिक मूल्य नहीं है।

यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

  • सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना 26 जनवरी, 1950 को हुई थी
  • सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) नियम, 2025 के अनुसार, सामग्री हटाने का आदेश जारी करने का अधिकार कम से कम संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी या पुलिस में उप महानिरीक्षक (DIG) स्तर के विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी के पास होगा
  • आईटी अधिनियम, 2000 की धारा 69A केंद्र सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता, सार्वजनिक व्यवस्था आदि के हित में ऑनलाइन सामग्री को ब्लॉक करने की शक्ति देती है
  • सर्वोच्च न्यायालय ने श्रेया सिंघल मामले (2015) में आईटी अधिनियम की धारा 66A को रद्द कर दिया था।
  • वैश्विक साइबर सुरक्षा आउटलुक, 2025 (विश्व आर्थिक मंच) के अनुसार, लगभग 66% संगठनों को आशंका है कि आने वाले वर्ष में साइबर सुरक्षा पर AI का सर्वाधिक प्रभाव पड़ेगा

मुख्य परीक्षा हेतु उत्तर लेखन दृष्टिकोण

प्रश्न- सोशल मीडिया पर अभद्र और अवैध सामग्री के नियमन में सर्वोच्च न्यायालय के दृष्टिकोण का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। क्या आपको लगता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राज्य के नियामक हितों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सका है?

उत्तर लेखन के मुख्य बिंदु

  1. संवैधानिक ढाँचे की व्याख्या – सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 19(1)(क) और अनुच्छेद 21 के तहत डिजिटल अधिकारों को मजबूती से परिभाषित किया है, जबकि अनुच्छेद 19(2) में दिए गए उचित प्रतिबंधों को भी मान्यता दी है।
  2. न्यायिक सक्रियता और संतुलन – श्रेया सिंघल मामले में धारा 66A को रद्द करना अदालत द्वारा मनमाने प्रतिबंधों पर अंकुश लगाने का एक उदाहरण है। वहीं, शशि थरूर मामले में अश्लील सामग्री से निपटने वाले प्रावधान को बरकरार रखना सार्वजनिक नैतिकता के हित में नियमन की आवश्यकता को स्वीकार करना है।
  3. प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों पर जोर – अदालत ने सरकारी एजेंसियों द्वारा सामग्री हटाने के आदेशों में मनमानेपन पर रोक लगाने के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्व पर बल दिया है। आईटी (संशोधन) नियम, 2025 में वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा आदेश जारी करना और मासिक समीक्षा जैसे प्रावधान इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं
  4. मध्यस्थों की भूमिका और चुनौतियाँ – सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी तय करने वाले मामलों की सुनवाई की है, लेकिन इस क्षेत्र में एक स्पष्ट और सुसंगत कानूनी ढाँचा अभी भी विकसित हो रहा है। डीपफेक और जेनरेटिव AI जैसी उभरती प्रौद्योगिकियाँ नई चुनौतियाँ पेश कर रही हैं
  5. मूल्यांकन – निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय ने संवैधानिक सिद्धांतों को मजबूत करते हुए एक मजबूत ढाँचा प्रदान किया है। हालाँकि, तकनीक के तेजी से बदलते स्वरूप और इसके दुरुपयोग को देखते हुए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नियमन के बीच संतुलन बनाए रखना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।

यूपीएससी पिछले वर्षों के प्रश्न

प्रारंभिक परीक्षा

  1. 2023 – सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए –
    1. इन नियमों के अंतर्गत, एक सोशल मीडिया मध्यस्थ को भारत में एक मुख्य अनुपालन अधिकारी, एक नोडल संपर्क अधिकारी, और एक आवासीय अनुपालन अधिकारी नियुक्त करना अनिवार्य है।
    2. इन नियमों के अंतर्गत, एक सोशल मीडिया मध्यस्थ को अपनी सेवाओं का उपयोग करने वाले प्रथम उद्गमकर्ता (first originator) की पहचान का खुलासा करना अनिवार्य है।
      उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

मुख्य परीक्षा (सामान्य अध्ययन पेपर-2)

  1. 2022 – “सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021, ऑनलाइन सामग्री के विनियमन हेतु एक विस्तृत ढाँचा प्रस्तुत करते हैं, लेकिन ये नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकते हैं।” विश्लेषण कीजिए।
  2. 2021 – सोशल मीडिया के उदय ने लोकतंत्र और शासन व्यवस्था पर क्या प्रभाव डाला है? भारत के संदर्भ में चर्चा कीजिए।

तुलना सारणी, सर्वोच्च न्यायालय बनाम सरकारी नियमन का दृष्टिकोण

पहलूसर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोणसरकारी नियमन का दृष्टिकोण (आईटी नियम, 2021/2025 के आधार पर)
मुख्य फोकसमौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19(1)(क) व 21) का संरक्षणराष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, और नैतिकता सुनिश्चित करना
अभद्र सामग्री से निपटना“शालीनता की सीमा” जैसी संकीर्ण परिभाषा; अभिव्यक्ति पर अनावश्यक प्रतिबंधों पर रोकआईटी नियम, 2021 के नियम 3(1)(b) के तहत अवैध सामग्री (भ्रामक जानकारी, डीपफेक्स सहित) की एक व्यापक सूची
सामग्री हटाने की प्रक्रियापारदर्शिता, उचित प्रक्रिया, और मनमानेपन पर रोक पर बलआईटी (संशोधन) नियम, 2025 में वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा तर्कसंगत आदेश और मासिक समीक्षा जैसे सुरक्षा उपाय
मध्यस्थों की जिम्मेदारीउचित सावधानी बरतने और उपयोगकर्ता अधिकारों का सम्मान करने पर जोरअनुपालन अधिकारियों की नियुक्ति, शिकायत निवारण तंत्र, और सुरक्षित आश्रय (safe harbour) की शर्तों का सख्ती से पालन करना अनिवार्य

निष्कर्ष

साइबर स्पेस और सोशल मीडिया पर अभद्र सामग्री के संबंध में भारत के सर्वोच्च न्यायालय का रुख एक सतर्क और सिद्धांतों पर आधारित संतुलन को दर्शाता है। अदालत ने अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को डिजिटल युग में भी उतना ही महत्वपूर्ण माना है, जैसा कि श्रेया सिंघल मामले में देखने को मिला। साथ ही, उसने अनुच्छेद 19(2) के तहत राज्य को प्रदत्त वैध नियामक शक्तियों को भी स्वीकार किया है। सुप्रीम कोर्ट की भूमिका केवल विवादों का निपटारा करने तक सीमित नहीं रही है, बल्कि उसने सरकारी कार्रवाइयों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को भी मजबूती से प्रोत्साहित किया है। तकनीक के निरंतर विकास और AI व डीपफेक जैसी नई चुनौतियों के मद्देनजर, सर्वोच्च न्यायालय का यह न्यायिक दृष्टिकोण भविष्य में भी डिजिटल भारत के लिए एक मार्गदर्शक ढाँचा प्रदान करता रहेगा।

पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

1. सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियम, 2025 की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
आईटी (संशोधन) नियम, 2025 की मुख्य विशेषताओं में सामग्री हटाने के आदेश केवल वरिष्ठ अधिकारियों (संयुक्त सचिव या पुलिस डीआईजी स्तर) द्वारा जारी किए जाना, आदेशों में तर्क और सामग्री का स्पष्ट उल्लेख होना, और सभी निष्कासन निर्देशों की महीने में एक बार सचिव स्तर के अधिकारी द्वारा समीक्षा शामिल है

2. सुप्रीम कोर्ट ने आईटी अधिनियम की धारा 66A को क्यों रद्द किया?
सुप्रीम कोर्ट ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) मामले में धारा 66A को इस आधार पर रद्द कर दिया क्योंकि यह धारा “अस्पष्ट, मनमानी और अनियंत्रित” थी और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत गारंटीशुदा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करती थी।

3. ऑनलाइन अश्लील सामग्री की कानूनी परिभाषा क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि कोई सामग्री तभी अश्लील मानी जाएगी जब वह सामाजिक मानकों के अनुरूप ‘शालीनता की सीमा’ को पार करती है और जिसका कोई गंभीर साहित्यिक, कलात्मक या वैज्ञानिक मूल्य नहीं है। यह परिभाषा संकीर्ण है ताकि अभिव्यक्ति पर अनावश्यक रोक न लगे।

4. सोशल मीडिया कंपनियों (मध्यस्थों) की क्या जिम्मेदारियाँ हैं?
आईटी नियम, 2021 के तहत, सोशल मीडिया मध्यस्थों को एक शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना, भारत में विशेष अनुपालन अधिकारी नियुक्त करना, और अवैध सामग्री को हटाने सहित कुछ दायित्वों का पालन करना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि मध्यस्थों को उचित सावधानी बरतनी चाहिए।

5. क्या सुप्रीम कोर्ट का साइबर मामलों में फैसला सर्वोपरि है?
हाँ, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित कानून देश के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है। इसलिए, साइबर स्पेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में उसके फैसले सबसे ऊपर हैं और पूरे देश के लिए मान्य हैं।

आंतरिक लिंकिंग सुझाव

  • भारत का सर्वोच्च न्यायालय: संरचना, शक्तियाँ और कार्य
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार
  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000: एक विस्तृत विश्लेषण
  • आईटी नियम 2021 बनाम 2025: प्रमुख अंतर और प्रभाव
  • डिजिटल भारत और साइबर सुरक्षा चुनौतियाँ
  • मौलिक अधिकार और उनपर उचित प्रतिबंध
  • सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले: श्रेया सिंघल केस और इसका महत्व
  • यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा हेतु करंट अफेयर्स: साइबर सुरक्षा

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