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1. परिचय

हड़प्पा संस्कृति, जिसे सिंधु घाटी सभ्यता भी कहा जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप की प्रथम शहरी संस्कृति है। यह लगभग 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व के बीच फली-फूली और मिस्र, मेसोपोटामिया की समकालीन थी। इस सभ्यता की खोज 1921 में दयाराम साहनी (हड़प्पा) और 1922 में राखालदास बनर्जी (मोहनजोदड़ो) ने की। बाद में सर जॉन मार्शल ने दोनों स्थलों को एक ही सभ्यता का हिस्सा बताते हुए इसे “सिंधु घाटी सभ्यता” नाम दिया।

इस सभ्यता का विस्तार उत्तर में अफगानिस्तान के शॉर्टुगाई से दक्षिण में गुजरात के भगत्रव तक, पूर्व में उत्तर प्रदेश के आलमगीरपुर से पश्चिम में बलूचिस्तान के सुत्कागेंदोर तक था। यह क्षेत्रफल में मिस्र और मेसोपोटामिया की संयुक्त सभ्यता से भी बड़ा था।

हड़प्पा संस्कृति

2. शहर योजनाएं और संरचनाएं

हड़प्पा संस्कृति की सबसे उल्लेखनीय विशेषता इसकी उन्नत नगर योजना है। प्रमुख नगर – हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धौलावीरा – सभी एक समान योजना पर बसे थे।

  • ग्रिड पैटर्न: सड़कें उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम दिशा में समकोण पर कटती थीं, जिससे शहर आयताकार खंडों में विभाजित था।
  • दुर्ग और निचला नगर: प्रत्येक नगर दो भागों में बँटा था – पश्चिम की ओर ऊँचे मिट्टी के टीले पर दुर्ग (सार्वजनिक भवन, अन्नागार, स्नानागार) और पूर्व की ओर निचला नगर (आवासीय क्षेत्र)।
  • पक्की ईंटें: दोनों प्रकार की ईंटों (धूप में सुखाई और भट्टी में पकाई) का उपयोग हुआ। मोहनजोदड़ो की ईंटों का अनुपात 1:2:4 था।
  • जल निकासी: प्रत्येक घर से सड़क के किनारे बनी ढकी हुई नालियाँ जुड़ी थीं। नालियाँ समय-समय पर साफ करने के लिए मैनहोल भी बनाए गए थे।
  • महास्नानागार (मोहनजोदड़ो): 11.88 मीटर × 7.01 मीटर का पक्की ईंटों से निर्मित स्नानागार, जिसके चारों ओर दीर्घाएँ थीं। यह धार्मिक स्नान या सार्वजनिक उपयोग के लिए था।
  • अन्नागार (हड़प्पा): ईंटों के चबूतरों पर बने गोलाकार अन्नागार, जिनकी संख्या 6 थी। मोहनजोदड़ो में भी विशाल अन्नागार मिला।
  • लोथल का डॉकयार्ड: 214 मीटर लंबा, 36 मीटर चौड़ा और 4.5 मीटर गहरा ईंटों से निर्मित जलाशय, जिसे समुद्री व्यापार के लिए गोदी माना जाता है।
  • धौलावीरा की जल संचयन प्रणाली: पत्थरों से निर्मित विशाल जलाशय, बाँध, नहरें – अर्ध-शुष्क क्षेत्र में जल प्रबंधन का अद्भुत उदाहरण।
हड़प्पा संस्कृति

3. कृषि

हड़प्पा संस्कृति की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित थी। उपजाऊ सिंधु-घग्घर घाटी में खेती होती थी।

  • फसलें: गेहूँ (दो प्रकार), जौ, मटर, तिल, सरसों, खजूर। कालीबंगा से हल के चिह्न मिले, जो जुताई की पुष्टि करते हैं। लोथल और रंगपुर से चावल के प्रमाण मिले हैं (हालाँकि यह व्यापक नहीं था)।
  • कपास: विश्व में सबसे प्राचीन कपास उत्पादन का प्रमाण हड़प्पा से मिला है। यहाँ से सूती वस्त्र के टुकड़े प्राप्त हुए।
  • सिंचाई: सिंधु नदी के जल का उपयोग, बाढ़ की कृषि। धौलावीरा जैसे स्थलों में जल संग्रहण और नहरों के प्रमाण मिले।
  • कृषि उपकरण: पत्थर और ताँबे के हल फल, कुदाल, दरांती। हालाँकि, हड़प्पा में धातु के औज़ार कम मिले हैं।

4. पशुपालन

कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग था। प्रमुख पशु:

  • गोजातीय: ज़ेबू (कूबड़ वाला गाय) और भैंस। मोहनजोदड़ो की मुहरों पर भैंस, गाय के चित्र मिले।
  • भेड़ और बकरी: विशेषकर बलूचिस्तान क्षेत्र में।
  • सूअर, कुत्ता, गधा, ऊँट? (कुछ स्थलों पर ऊँट की हड्डियाँ मिली हैं, किंतु व्यापक नहीं)।
  • हाथी: लोथल से हाथी की हड्डियाँ मिली, हाथी दाँत के शिल्प भी।
  • घोड़ा: विवादित। सुरकोतड़ा, लोथल से कुछ हड्डियाँ घोड़े की बताई गईं, लेकिन आम सहमति नहीं है। अधिकांश विद्वान घोड़े को उत्तर-हड़प्पा काल में आने वाला मानते हैं।

पशुधन के अलावा मछली पकड़ना, शिकार (हिरण, सूअर, पक्षी) भी होता था।

5. कारीगरी और शिल्प

हड़प्पा संस्कृति में अनेक शिल्पों का विकास हुआ।

  • मनका निर्माण: अर्ध-कीमती पत्थरों (कारेलियन, जैस्पर, लापीस लाजुली, अगेट) से मनके बनाए जाते थे। चन्हूदड़ो में मनका बनाने की कार्यशालाएँ मिली।
  • धातु शिल्प: ताँबा, कांस्य, सीसा, सोना, चाँदी का प्रयोग। कांस्य नृत्यांगना (मोहनजोदड़ो) – 10.8 सेमी की प्रतिमा, लॉस्ट-वैक्स तकनीक से बनी। ताँबे की मूर्तियाँ, बर्तन, औज़ार।
  • शंख शिल्प: लोथल, धौलावीरा से शंख की चूड़ियाँ, बर्तन बनाने के प्रमाण।
  • लकड़ी का काम: राखीगढ़ी से लकड़ी के ताबूत, मोहनजोदड़ो में लकड़ी के पाइप।
  • वस्त्र: सूती वस्त्र के टुकड़े, रंगाई के प्रमाण।

6. व्यापार एवं वाणिज्य

हड़प्पा सभ्यता का व्यापार दूर-दूर तक फैला था।

  • आंतरिक व्यापार: ताँबा (राजस्थान से), सोना (कर्नाटक), शंख (गुजरात तट), लापीस लाजुली (अफगानिस्तान) का आदान-प्रदान।
  • अंतर्राष्ट्रीय व्यापार: मेसोपोटामिया (सुमेर, अक्काद) के साथ समुद्री और स्थल मार्ग से व्यापार। मेसोपोटामिया के अभिलेखों में “मेलुह्हा” (सिंधु क्षेत्र) का उल्लेख है। लोथल का डॉकयार्ड इसी का प्रमाण।
  • व्यापारिक वस्तुएँ: सूती वस्त्र, मनके, ताँबा, लकड़ी, शंख, हाथी दाँत, मुहरें।
  • वजन-माप की मानकीकृत प्रणाली: 16 के गुणक में बाट (0.875 ग्राम से 10.9 किग्रा तक)। माप के लिए लकड़ी के पैमाने भी मिले।

7. सामाजिक संगठन

हड़प्पा समाज स्तरीकृत था, यद्यपि कोई राजमहल या शाही कब्रें नहीं मिली हैं।

  • वर्ग विभाजन: दुर्ग और निचले नगर के आवासों के आकार से पता चलता है कि उच्च वर्ग दुर्ग में या बड़े मकानों में रहता था, जबकि श्रमिकों की बस्तियाँ (जैसे मोहनजोदड़ो का निचला नगर) छोटे कमरों वाली थीं।
  • परिवार: संयुक्त परिवार की संभावना। घरों में कई कमरे, आंगन थे।
  • महिलाओं की स्थिति: मातृदेवी मूर्तियों की प्रचुरता से मातृसत्तात्मक प्रभाव का संकेत मिलता है। कुछ मुहरों में महिला आकृतियाँ हैं। आभूषणों का प्रचुर उपयोग।
  • शिक्षा और ज्ञान: मुहरों पर लिपि का प्रयोग और माप-तौल की मानकीकृत प्रणाली से शिक्षित वर्ग के अस्तित्व का पता चलता है।

8. राजनीति

हड़प्पा सभ्यता की राजनीतिक संरचना पर विद्वानों में मतभेद है।

  • एकीकृत साम्राज्य का अभाव: कोई राजप्रासाद, राजा की मूर्ति या विशाल सैन्य व्यवस्था नहीं मिली।
  • शासन का स्वरूप: संभवतः धार्मिक नेतृत्व वाला गणतांत्रिक या वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक एकता वाला संघ। कई स्वतंत्र नगर-राज्य हो सकते हैं।
  • प्रशासनिक एकरूपता: मानकीकृत वजन, माप, ईंटों के आकार, मुहरों की समानता एक केंद्रीय प्रशासनिक ढाँचे की ओर संकेत करती है।
  • सैन्य: किलेबंदी (दुर्ग) और कुछ ताँबे के हथियार (भाला, तलवार, भाला फलक) मिले हैं, लेकिन बड़े युद्धों के प्रमाण नहीं।

9. धार्मिक परंपराएँ

हड़प्पा धर्म प्रकृति-पूजा, उर्वरता पूजा और तंत्रात्मक मान्यताओं का मिश्रण था।

  • मातृदेवी: मिट्टी की अनेक मातृदेवी मूर्तियाँ मिली हैं, जो उर्वरा शक्ति की पूजा को दर्शाती हैं।
  • पशुपति शिव: मोहनजोदड़ो की एक मुहर पर योगी मुद्रा में बैठा हुआ तीन मुख वाला पुरुष, जिसके चारों ओर हाथी, बाघ, गैंडा, भैंस, हिरण हैं। इसे “पशुपति शिव” कहा जाता है। सिर पर सींग जैसा मुकुट है।
  • योनि-लिंग पूजा: अनेक स्थलों से शिवलिंग जैसी पत्थर की आकृतियाँ और योनि के प्रतीक मिले हैं।
  • वृक्ष पूजा: पीपल, बरगद जैसे वृक्षों की पूजा के प्रमाण। मुहरों पर वृक्ष के बीच देवता की आकृति।
  • पशु पूजा: एक सींग वाले गेंडे (यूनिकॉर्न) की मुहरें सबसे अधिक मिली हैं। बैल, बाघ, हाथी आदि की भी पूजा होती थी।

10. सिंधु घाटी में पुरुष देवता

“पशुपति शिव” के अलावा अन्य पुरुष देवता भी प्रतीत होते हैं:

  • तीन मुख वाला योगी: पशुपति मुहर पर स्पष्ट।
  • वीर पुरुष: कुछ मुहरों पर किसी नायक या देवता की आकृति, जो पशुओं को वश में कर रहा हो।
  • सींगधारी देवता: कई मुहरों पर सिर पर सींग या मुकुट पहने पुरुष, जो देवता माने जाते हैं।
  • मर्दाना मूर्तियाँ: मोहनजोदड़ो से एक पुरुष धड़ (लाल पत्थर) और एक पुरुष मूर्ति (चूना पत्थर) मिली है, जिन्हें देवता या शासक माना जाता है।

11. पेड़ और पशु पूजा

हड़प्पा संस्कृति में पेड़-पशु पूजा की परंपरा गहरी थी।

  • वृक्ष पूजा: मुहरों पर पीपल के वृक्ष को घेरे हुए देवता या बलि देते हुए चित्र। कालीबंगा में अग्नि कुंड के पास पीपल के पत्ते मिले।
  • यूनिकॉर्न (एक सींग वाला गेंडा): हड़प्पा मुहरों पर सबसे अधिक चित्रित पशु। यह किसी देवता या राजवंशीय प्रतीक रहा होगा।
  • बैल: कूबड़ वाले बैल (ज़ेबू) की मुहरें, साथ ही मिट्टी के बैल की मूर्तियाँ।
  • बाघ, हाथी, गैंडा, भैंस: इनकी भी मुहरों पर आकृतियाँ हैं, जो पशु पूजा या कुलदेवता मान्यता को दर्शाती हैं।

12. अन्य धार्मिक प्रतीक और अनुष्ठान

हड़प्पा संस्कृति में धार्मिक जीवन केवल मातृदेवी और पशुपति शिव तक सीमित नहीं था। अनेक अन्य प्रतीक, अनुष्ठान सामग्री और संरचनाएँ मिली हैं, जो एक समृद्ध धार्मिक परंपरा की ओर संकेत करती हैं।

  • योनि-लिंग पूजा: कालीबंगा, मोहनजोदड़ो, लोथल आदि स्थलों से पत्थर के गोलाकार और बेलनाकार पत्थर (शिवलिंग जैसे) तथा छल्लेनुमा पत्थर (योनि प्रतीक) मिले हैं। कुछ विद्वान इन्हें उर्वरता पूजा का अंग मानते हैं, तो कुछ इन्हें स्तंभ पूजा या अग्नि वेदी से जोड़ते हैं।
  • अग्नि कुंड: कालीबंगा और लोथल में ईंटों से निर्मित अग्नि कुंड मिले हैं। कालीबंगा में ये कुंड घरों के भीतर और दुर्ग क्षेत्र में पाए गए, जिनके पास हवन सामग्री (चारकोल, राख) भी मिली। यह यज्ञीय अनुष्ठानों का प्रमाण माना जाता है।
  • स्वस्तिक और अन्य ज्यामितीय प्रतीक: मुहरों, मृदभांड और टेराकोटा पर स्वस्तिक, त्रिशूल, वृत्त, मीनाकारी जैसे प्रतीक मिले हैं। स्वस्तिक का प्रयोग शुभता और धार्मिक चिह्न के रूप में होता था, जो बाद की भारतीय परंपराओं से जुड़ता है।
  • कुंड और स्नानागार: मोहनजोदड़ो का महास्नानागार सबसे प्रसिद्ध है। इसके अलावा छोटे-छोटे स्नानागार घरों में भी मिले हैं। इनका उपयोग धार्मिक शुद्धि या अनुष्ठानिक स्नान के लिए माना जाता है।
  • बलि के प्रमाण: कुछ स्थलों पर पशुओं के कंकाल (भैंस, बकरी) कुंडों के पास मिले हैं, जो पशु बलि की प्रथा की ओर संकेत करते हैं। मुहरों पर देवता के सामने बलि दृश्य भी अंकित हैं।
  • नग्न स्त्री मूर्तियाँ: कुछ टेराकोटा मूर्तियाँ अत्यधिक अलंकृत एवं नग्न हैं, जिन्हें उर्वरा देवी या तंत्र से जोड़ा जाता है। इनके मुकुट, हार, कमरबंद विस्तृत हैं।
  • स्मारक संरचनाएँ: धौलावीरा में सात मंचों वाली संरचना (स्टेज्ड टावर) मिली है, जिसे खगोलीय प्रेक्षण या धार्मिक अनुष्ठान स्थल माना गया है। हड़प्पा में विशाल अन्नागारों के पास वेदी जैसी ईंटों की चौकियाँ भी मिली हैं।
  • शवाधान से धार्मिक मान्यताएँ: हड़प्पा काल में शवों को उत्तर-दक्षिण दिशा में रखकर दफनाया जाता था। कब्रों में मिट्टी के बर्तन, आभूषण, दर्पण आदि रखे जाते थे – यह पुनर्जन्म या परलोक में उपयोग की मान्यता दर्शाता है। लोथल में दोहरी शवाधान प्रथा (शव को पहले मिट्टी के घड़े में रखकर फिर दफनाना) मिली है, जो विशिष्ट धार्मिक विश्वास को इंगित करती है।
  • वृत्ताकार और आयताकार वेदियाँ: कालीबंगा में वेदियों के आकार और संरचना से पता चलता है कि अग्नि पूजा या हवन का प्रचलन था। कुछ स्थलों पर सात वेदियों की पंक्तियाँ भी मिली हैं, जो संभवतः यज्ञीय अनुष्ठानों की जटिलता दर्शाती हैं।
हड़प्पा संस्कृति

इन विविध प्रतीकों, संरचनाओं और अनुष्ठान सामग्रियों से स्पष्ट होता है कि हड़प्पा धर्म एक जटिल प्रणाली थी, जिसमें प्रकृति पूजा, उर्वरता अनुष्ठान, पशु-बलि, अग्नि पूजा, और पुनर्जन्म की मान्यताएँ सम्मिलित थीं। यह परंपरा बाद की भारतीय धार्मिक चेतना से कई बिंदुओं पर जुड़ती है।

13. हड़प्पा लिपि

हड़प्पा लिपि विश्व की सबसे रहस्यमयी लिपियों में से एक है।

  • प्रकार: चित्रलिपि (pictographic)। प्रतीकों की संख्या लगभग 400-600 है, जिनमें से 200-300 मूल चिह्न माने जाते हैं।
  • लेखन दिशा: दाएँ से बाएँ, कभी बाएँ से दाएँ (बस्ट्रोफेडन)।
  • माध्यम: अधिकतर मुहरों पर, कभी ताँबे की पट्टिकाओं, मिट्टी के बर्तनों पर।
  • अपठित: अब तक यह लिपि पढ़ी नहीं जा सकी है। द्रविड़, प्रोटो-द्रविड़, मुंडा, संस्कृत आदि से संबंध जोड़ने के प्रयास हुए हैं, पर कोई सर्वमान्य सफलता नहीं।
  • सबसे लंबा शिलालेख: धौलावीरा से 10 बड़े अक्षरों वाला चिन्ह मिला, जो सार्वजनिक स्थान पर था।
हड़प्पा संस्कृति

14. माप तौल

हड़प्पा संस्कृति में वजन और माप की अत्यधिक मानकीकृत प्रणाली थी।

  • वजन: छोटे-बड़े पत्थर के बाट। आधार इकाई 0.875 ग्राम थी, फिर 16 के गुणक में (0.875, 1.75, 3.5, 7, 14, 28, 56, 112, 224, 448, 896, 1792, 3584, 7168, 14336, 28672) – 16 का गुणक।
  • लंबाई माप: हाथी दाँत के पैमाने मिले हैं। एक पैमाने पर 1.75 इंच के अंतराल पर निशान थे।
  • समय: खगोलीय ज्ञान के प्रमाण हैं, किंतु समय मापन के उपकरण नहीं मिले।

15. हड़प्पा बर्तन

हड़प्पा के मृदभांड उच्च कोटि के थे।

  • मुख्य प्रकार: लाल मिट्टी पर काले चित्रित मृदभांड (Black-on-Red Ware)। चित्रों में पेड़, पशु, पक्षी, ज्यामितीय आकृतियाँ।
  • आकृतियाँ: बड़े घड़े, ढक्कनदार बर्तन, प्याले, कटोरे, सुराही, गोल तले वाले घड़े।
  • उत्पादन: चाक पर बने। कुछ बर्तनों पर मिट्टी की मोहरें लगी थीं, जो संभवतः निर्माता की पहचान थी।
  • वैशिष्ट्य: रंगाई और चमकाने की तकनीक उन्नत थी। कालीबंगा में लाल और हरे रंग के बर्तन भी मिले।

16. मुहर और मुद्रण

हड़प्पा मुहरें इस सभ्यता की सबसे पहचान योग्य कलाकृतियाँ हैं।

  • सामग्री: स्टीटाइट (साबुन पत्थर) – अधिकतर। कुछ ताँबे, मिट्टी, चीनी मिट्टी की भी।
  • आकार: 2.5 सेमी × 2.5 सेमी तक, अधिकतर चौकोर या आयताकार।
  • चित्र: पशु (यूनिकॉर्न, बैल, बाघ, हाथी, गैंडा), पेड़, मानव आकृतियाँ, लिपि।
  • उपयोग: व्यापार में माल की पहचान (स्टाम्प), प्रशासनिक या धार्मिक प्रतीक, संभवतः पहचान पत्र।
  • मुद्रण: कुछ मुहरों पर उल्टी नक्काशी थी, जिनसे मिट्टी या मोम पर छाप छोड़ी जाती थी – यह विश्व की प्राचीनतम मुद्रण तकनीकों में से एक है।

17. मूर्तियाँ

हड़प्पा में पत्थर और धातु दोनों की मूर्तियाँ मिली हैं।

  • कांस्य नृत्यांगना (मोहनजोदड़ो): 10.8 सेमी, लॉस्ट-वैक्स तकनीक, नग्न आकृति, गर्दन पर मनके, बायाँ हाथ कमर पर, दायाँ हाथ उठा हुआ। यह विश्व कला का उत्कृष्ट नमूना है।
  • पुरुष मूर्ति (मोहनजोदड़ो): चूना पत्थर, 17.5 सेमी, दाढ़ी, आँखें अर्ध-बंद, वस्त्र पर तिपतिया पत्तियों की नक्काशी। यह किसी पुजारी या राजा की मूर्ति मानी जाती है।
  • लाल पत्थर का धड़ (हड़प्पा): एक पुरुष की धड़, कंधे पर चूड़ियाँ, संभवतः देवता।
  • पत्थर की छोटी मूर्तियाँ: कुत्ते, भेड़, बैल आदि की।

18. टेराकोटा मूर्तियाँ

मिट्टी (टेराकोटा) से बनी असंख्य मूर्तियाँ मिली हैं, जो जन-जीवन का चित्रण करती हैं।

  • मातृदेवी: अधिकतर मूर्तियाँ स्त्री की हैं, जिन्हें मातृदेवी कहा गया। इनमें उर्वरा के प्रतीक, कभी गर्भवती, कभी बच्चा लिए।
  • पशु-पक्षी: बैल, भैंस, कुत्ता, सूअर, मुर्गी, बंदर, गैंडा आदि की छोटी मूर्तियाँ।
  • मानव आकृतियाँ: नर्तक, संगीतकार, सामान्य जन – कुछ वाहन (बैलगाड़ी) पर भी।
  • शैली: अर्ध-यथार्थवादी, सरल पर अभिव्यंजक।

19. पत्थर का काम

हड़प्पा में पत्थर की कलाकृतियाँ भी महत्वपूर्ण हैं।

  • पत्थर के बर्तन: अलाबास्टर, स्टीटाइट, मार्बल से बने बर्तन, कुछ पर नक्काशी।
  • मनके: कारेलियन, लापीस लाजुली, जैस्पर, अगेट से सुंदर मनके, जिन पर ड्रिलिंग और पॉलिशिंग की गई।
  • मूर्तियाँ: पत्थर की छोटी मूर्तियाँ (पुरुष धड़, पशु)।
  • वास्तुशिल्पीय पत्थर: धौलावीरा में पत्थर की चिनाई, बाँध, जलाशय।

20. सिंधु संस्कृति का अंत

लगभग 1900 ईसा पूर्व से परिपक्व हड़प्पा संस्कृति का पतन आरंभ हुआ। इसके कारण बहु-आयामी हैं:

  • जलवायु परिवर्तन: मानसून कमजोर होना, घघ्घर-हाकड़ा नदी का सूखना। हाल के अध्ययन (येल विश्वविद्यालय) ने 2200 ईसा पूर्व के आसपास सूखे के प्रमाण दिए हैं।
  • व्यापार पतन: मेसोपोटामिया के साथ व्यापार में गिरावट, विशेषकर अक्काद साम्राज्य के पतन के बाद।
  • आर्य आक्रमण सिद्धांत (मोर्टिमर व्हीलर): आर्यों के आक्रमण से नगर नष्ट हुए, लेकिन बाद में यह सिद्धांत कमजोर हुआ क्योंकि हड़प्पा स्थलों पर सामूहिक हिंसा के प्रमाण नहीं मिले।
  • भू-गर्भीय परिवर्तन: सिंधु नदी के मार्ग में बदलाव, बाढ़, भूकंप।
  • आर्थिक और सामाजिक विघटन: अत्यधिक शहरीकरण, संसाधनों का दोहन, महामारी, आंतरिक विद्रोह।

पतन के बाद उत्तर-हड़प्पा (देर हड़प्पा) संस्कृतियाँ विकसित हुईं, जिनमें झुकर (सिंध), रंगपुर, लोथल बी, हड़प्पा सी जैसी काल-क्रमिक परंपराएँ शामिल हैं।

21. परिपक्वता (परिपक्व हड़प्पा काल)

परिपक्व हड़प्पा काल (लगभग 2600-1900 ईसा पूर्व) वह समय था जब सभ्यता अपने चरम पर थी।

  • प्रमुख विशेषताएँ: नगर नियोजन, मानकीकृत मुहरें, वजन-माप, लिपि, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का विकास।
  • प्रमुख स्थल: हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धौलावीरा, राखीगढ़ी, बनवाली।
  • सांस्कृतिक एकरूपता: पूरे क्षेत्र में एक समान मृदभांड शैली, मुहरें, वास्तुकला।
  • प्रशासनिक केंद्र: प्रत्येक बड़ा नगर स्वतंत्र प्रशासनिक केंद्र रहा होगा।
हड़प्पा संस्कृति

22. उत्तर शहरीकरण का काल (उत्तर हड़प्पा / देर हड़प्पा)

1900 ईसा पूर्व के बाद सिंधु घाटी में शहरी संस्कृति का क्षरण हुआ और उत्तर-हड़प्पा संस्कृतियाँ उभरीं।

  • लक्षण: बड़े नगरों का परित्याग, छोटी-छोटी ग्रामीण बस्तियाँ, मृदभांड शैलियों में विविधता, लिपि का लुप्त होना।
  • प्रमुख उत्तर-हड़प्पा संस्कृतियाँ:
    • झुकर संस्कृति (सिंध)
    • रंगपुर संस्कृति (गुजरात)
    • हड़प्पा सी (पंजाब)
    • लोथल बी (गुजरात)
    • स्वात घाटी संस्कृति (गांधार कब्र संस्कृति)
  • नए तत्व: ताँबे के औजारों में बदलाव, मृदभांड पर चित्रकारी में कमी, कुछ नए पशु (घोड़े?) के प्रमाण।
  • निरंतरता: कई गाँवों में हड़प्पा परंपरा जारी रही, जो बाद में लौह युग की संस्कृतियों में समा गई।

23. नए लोगों का आगमन

उत्तर-हड़प्पा काल में नए लोगों के आगमन के प्रमाण मिलते हैं।

  • आर्य प्रवास सिद्धांत: वैदिक साहित्य में आर्यों के आगमन का उल्लेख। पुरातात्विक रूप से, स्वात घाटी की गांधार कब्र संस्कृति (लगभग 1600-500 ईसा पूर्व) को आर्यों से जोड़ा जाता है। इसमें घोड़े, लोहे के प्रारंभिक प्रयोग, नई प्रकार की कब्रें मिली हैं।
  • सांस्कृतिक संपर्क: कुछ विद्वान (जिम शाफ़र) कहते हैं कि कोई बड़े पैमाने पर प्रवास नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान था।
  • नई पहचान: उत्तर-हड़प्पा संस्कृतियों और प्रारंभिक वैदिक संस्कृति के बीच निरंतरता या विच्छेद पर बहस जारी है।

24. उत्पत्ति और समस्या – क्या हड़प्पा संस्कृति वैदिक थी? निरंतरता की समस्या

उत्पत्ति के सिद्धांत

  • प्रवास सिद्धांत: प्रारंभिक विद्वानों (व्हीलर) ने हड़प्पा को मेसोपोटामिया से प्रभावित माना। बाद में स्थानीय उत्पत्ति पर जोर बढ़ा।
  • स्वदेशी उत्पत्ति: प्राक हड़प्पा संस्कृतियों (मेहरगढ़, अमरी, कोट दिजी) से निरंतर विकास का प्रमाण मिला है। आर.एस. बिष्ट, बी.बी. लाल, जिम शाफ़र ने स्थानीय उत्पत्ति का समर्थन किया।
  • प्राक हड़प्पा चरण: मेहरगढ़ (7000 ईसा पूर्व) से लेकर 2600 ईसा पूर्व तक नवपाषाण, कैलकोलिथिक चरणों से हड़प्पा का विकास हुआ।

क्या हड़प्पा संस्कृति वैदिक थी?

यह एक विवादास्पद प्रश्न है।

  • हड़प्पा वैदिक नहीं थी – क्योंकि वैदिक संस्कृति में अश्वमेध यज्ञ, सोम रस, वर्ण व्यवस्था का उल्लेख है, जबकि हड़प्पा में घोड़े के अस्तित्व पर बहस है, कोई यज्ञशाला नहीं मिली, और सामाजिक स्तरीकरण भिन्न है।
  • निरंतरता की समस्या: कुछ विद्वान (बी.बी. लाल, एस.पी. गुप्त) हड़प्पा और वैदिक में समानताएँ खोजते हैं – पशुपति शिव, योनि-लिंग, स्नानागार, पीपल पूजा आदि। वे कहते हैं कि हड़प्पा वैदिक का ही एक चरण था।
  • वर्तमान राय: अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि हड़प्पा सभ्यता अपनी स्वतंत्र सांस्कृतिक परंपरा थी, जिसका वैदिक संस्कृति के साथ कुछ अंशों में सम्मिलन हुआ, पर दोनों भिन्न हैं।

निरंतरता की समस्या

उत्तर-हड़प्पा के बाद लगभग 1300-1000 ईसा पूर्व तक गंगा घाटी में नई संस्कृतियाँ (पेंटेड ग्रे वेयर) आईं। प्रश्न है: क्या हड़प्पा के लोग विलुप्त हो गए या वे ही बाद की संस्कृतियों के रूप में विकसित हुए? पुरातात्विक प्रमाण बताते हैं कि कई हड़प्पा बस्तियाँ उत्तर-हड़प्पा चरण में जारी रहीं, और उनकी कुछ तकनीकें (मनका निर्माण, कृषि) बाद में भी देखी गईं। लेकिन लिपि, नगर नियोजन जैसी विशेषताएँ समाप्त हो गईं। इसलिए सांस्कृतिक विच्छेद के साथ-साथ सीमित निरंतरता दोनों स्वीकार की जाती है।

25. कालक्रम

हड़प्पा संस्कृति का कालक्रम विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रस्तावित किया गया। सर्वमान्य कालक्रम इस प्रकार है:

कालअवधि (ईसा पूर्व)विशेषताएँ
प्रारंभिक हड़प्पा (प्राक हड़प्पा)3500-2600मेहरगढ़, अमरी, कोट दिजी, कालीबंगा-1; ग्रामीण कृषि बस्तियाँ, पूर्व-शहरी चरण
परिपक्व हड़प्पा2600-1900नगर नियोजन, मानकीकृत मुहरें, लिपि, व्यापार, प्रमुख स्थलों का विकास
उत्तर हड़प्पा (देर हड़प्पा)1900-1300शहरी पतन, ग्रामीण बस्तियाँ, झुकर, रंगपुर, लोथल बी; लिपि का लुप्त होना

हालिया शोध: राखीगढ़ी में मिले कार्बन-14 तिथियों ने परिपक्व हड़प्पा का समय 2600-1900 की पुष्टि की है। कुछ स्थलों पर 1800-1500 ईसा पूर्व तक उत्तर-हड़प्पा बस्तियाँ जारी रहीं।

संक्षिप्त पुनरावृत्ति (बुलेट समरी)

  • हड़प्पा संस्कृति (2600-1900 ईसा पूर्व) प्रथम शहरी सभ्यता।
  • नगर योजना: ग्रिड, दुर्ग-निचला नगर, जल निकासी, महास्नानागार, डॉकयार्ड।
  • कृषि: गेहूँ-जौ, कपास, चावल (लोथल); पशुपालन: गाय, भैंस, भेड़-बकरी।
  • शिल्प: मनके, कांस्य नृत्यांगना, टेराकोटा मूर्तियाँ, मुहरें, बर्तन।
  • व्यापार: मेसोपोटामिया से समुद्री व्यापार, मानकीकृत वजन (16 का गुणक)।
  • धर्म: मातृदेवी, पशुपति शिव, योनि-लिंग, वृक्ष-पशु पूजा।
  • लिपि: चित्रलिपि, अपठित।
  • पतन: जलवायु परिवर्तन, व्यापार पतन, आर्य आक्रमण (विवादित) – बहु-कारणीय।
  • उत्तर हड़प्पा (1900-1300) – ग्रामीण संस्कृतियाँ, नई कब्र संस्कृतियाँ।
  • उत्पत्ति: प्राक हड़प्पा (मेहरगढ़) से स्थानीय विकास।
  • हड़प्पा वैदिक नहीं, पर सांस्कृतिक निरंतरता के कुछ तत्व मौजूद।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. हड़प्पा संस्कृति की खोज किसने की?
1921 में दयाराम साहनी (हड़प्पा) और 1922 में राखालदास बनर्जी (मोहनजोदड़ो) ने। जॉन मार्शल ने दोनों को एक सभ्यता बताया।

2. हड़प्पा संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
नगर योजना, जल निकासी, मानकीकृत वजन, मुहरें, लिपि, मातृदेवी, पशुपति मुहर, कांस्य नृत्यांगना, व्यापार, कपास उत्पादन।

3. हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल कौन-सा है?
राखीगढ़ी (हरियाणा) – लगभग 350 हेक्टेयर में फैला, अब तक का सबसे बड़ा।

4. क्या हड़प्पा सभ्यता वैदिक थी?
नहीं। हड़प्पा सभ्यता अपनी स्वतंत्र शहरी संस्कृति थी, जबकि वैदिक संस्कृति ग्रामीण, अश्व-केंद्रित और यज्ञ प्रधान थी। हालाँकि कुछ सांस्कृतिक तत्व (पशुपति, पीपल पूजा) बाद में सम्मिलित हुए।

5. हड़प्पा सभ्यता का पतन क्यों हुआ?
जलवायु परिवर्तन (मानसून कमजोर, नदी सूखना), व्यापार में गिरावट, आंतरिक विघटन, संभवतः आर्य प्रवास – सब मिलकर। अब बहु-कारणीय पतन स्वीकार किया जाता है।

6. हड़प्पा लिपि पढ़ी गई या नहीं?
अब तक नहीं पढ़ी गई। द्रविड़, मुंडा, संस्कृत आदि से संबंध जोड़ने के प्रयास हुए, पर सफलता नहीं मिली।

पिछले 10 वर्षों के PYQs (प्रारंभिक परीक्षा – 2015-2024)

वर्षप्रश्नउत्तर / टिप्पणी
2024“निम्नलिखित में से कौन-सा स्थल अपने डॉकयार्ड के लिए प्रसिद्ध है?”लोथल
2024“हड़प्पा सभ्यता के किस स्थल से ‘पशुपति’ मुहर प्राप्त हुई?”मोहनजोदड़ो
2023“हड़प्पा सभ्यता में ‘सीवरेज सिस्टम’ की उन्नति किस स्थल पर सबसे स्पष्ट दिखती है?”मोहनजोदड़ो
2023“कालीबंगा स्थल से निम्नलिखित में से कौन-सा प्रमाण मिला था?”हल के चिह्न
2022“मेहरगढ़ स्थल किस काल का प्रतिनिधित्व करता है?”प्राक हड़प्पा (नवपाषाण)
2022“धौलावीरा स्थल की विशेषता क्या है?”जल संचयन प्रणाली
2021“हड़प्पा संस्कृति के किस स्थल से चावल के प्रमाण मिले हैं?”लोथल, रंगपुर
2021“नृत्य करती कांस्य प्रतिमा (डांसिंग गर्ल) कहाँ से प्राप्त हुई?”मोहनजोदड़ो
2020“हड़प्पा सभ्यता की लिपि किस प्रकार की है?”चित्रलिपि (अपठित)
2020“हड़प्पा संस्कृति का सबसे बड़ा स्थल कौन-सा है?”राखीगढ़ी
2019“निम्नलिखित में से किस स्थल से ‘अग्नि कुंड’ के प्रमाण मिले हैं?”कालीबंगा
2019“सिंधु घाटी सभ्यता के किस स्थल पर ‘गोदी’ (डॉकयार्ड) मिला?”लोथल
2018“हड़प्पा सभ्यता में ‘महास्नानागार’ कहाँ स्थित है?”मोहनजोदड़ो
2018“हड़प्पा संस्कृति के किस स्थल से ‘कब्रों में दोहरी शवाधान’ प्रथा मिली?”लोथल
2017“हड़प्पा सभ्यता के किस स्थल से ‘ऊँट’ की हड्डियाँ मिली हैं?”कालीबंगा (विवादित)
2017“हड़प्पा सभ्यता में ‘मातृदेवी’ की मूर्तियाँ किस स्थल से सर्वाधिक मिली हैं?”मोहनजोदड़ो
2016“हड़प्पा सभ्यता की मुहरों पर सबसे अधिक किस पशु का चित्र मिलता है?”एक सींग वाला गेंडा (यूनिकॉर्न)
2016“निम्नलिखित में से कौन-सा स्थल प्राक हड़प्पा काल का नहीं है?”मोहनजोदड़ो
2015“हड़प्पा सभ्यता के किस स्थल से ‘लकड़ी की नाली’ मिली?”कालीबंगा
2015“हड़प्पा सभ्यता के लोग किस धातु से परिचित नहीं थे?”लोहा

प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी हेतु नोट:

  • प्रत्येक वर्ष 1-2 प्रश्न इस विषय से आते हैं।
  • स्थल-विशेषता, मुहर, मूर्तियाँ, कालक्रम, पतन के सिद्धांत पर ध्यान दें।
  • हाल के वर्षों में राखीगढ़ी, धौलावीरा जैसे स्थलों पर जोर बढ़ा है।

पिछले 10 वर्षों के PYQs (मुख्य परीक्षा – 2015-2024)

वर्षप्रश्नविषय / टिप्पणी
2024“हड़प्पा संस्कृति की नगर योजना और जल प्रबंधन व्यवस्था का विस्तृत वर्णन करें।”नगर योजना, ग्रिड पैटर्न, महास्नानागार, सीवरेज, डॉकयार्ड, धौलावीरा के जलाशय।
2023“प्राक हड़प्पा चरण से परिपक्व हड़प्पा चरण के विकास की प्रक्रिया को स्पष्ट करें।”मेहरगढ़, अमरी, कोट दिजी, कालीबंगा-1 से नगरीकरण तक का क्रम।
2022“हड़प्पा संस्कृति की धार्मिक मान्यताओं और मूर्तिकला पर प्रकाश डालें।”मातृदेवी, पशुपति शिव, योनि-लिंग, वृक्ष-पशु पूजा, मुहरें, कांस्य नृत्यांगना।
2021“हड़प्पा सभ्यता के पतन के विभिन्न सिद्धांतों की चर्चा करें।”जलवायु परिवर्तन, व्यापार पतन, आर्य आक्रमण (व्हीलर), बहु-कारणीय पतन।
2020“हड़प्पा संस्कृति में व्यापार और अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ बताइए।”अंतर्राष्ट्रीय व्यापार (मेसोपोटामिया), मानकीकृत वजन-माप, लोथल डॉकयार्ड, कृषि-पशुपालन।
2019“हड़प्पा संस्कृति की मुहरों से सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के बारे में क्या जानकारी मिलती है?”व्यापार, धर्म, लिपि, शासन व्यवस्था, कला, पशु-पूजा, वैविध्य।
2018“क्या हड़प्पा संस्कृति एक साम्राज्य थी? अपने तर्क दीजिए।”एकीकृत संस्कृति बनाम राजनीतिक एकता – विभिन्न मत, मानकीकरण बनाम स्थानीय स्वायत्तता।
2017“हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख स्थलों की स्थिति और विशेषताओं का उल्लेख करें।”मानचित्र आधारित उत्तर: हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल, धौलावीरा, कालीबंगा, राखीगढ़ी।
2016“हड़प्पा सभ्यता की वैज्ञानिक उपलब्धियों पर प्रकाश डालें।”वजन-माप (16 का गुणक), जल प्रबंधन, ईंट निर्माण तकनीक, खगोलीय ज्ञान।
2015“हड़प्पा संस्कृति की खोज के ऐतिहासिक सोपानों का वर्णन करें।”1921 दयाराम साहनी (हड़प्पा), 1922 राखालदास बनर्जी (मोहनजोदड़ो), जॉन मार्शल, मैके, व्हीलर आदि का योगदान।

मुख्य परीक्षा की तैयारी हेतु नोट:

  • प्रश्न अक्सर नगर योजना, अर्थव्यवस्था, धर्म, पतन, स्थल-विशेषता, उत्पत्ति और निरंतरता पर केंद्रित रहे हैं।
  • उत्तर में तथ्यात्मकता, पुरातात्विक साक्ष्यों का उल्लेख, विद्वानों के मतों का संतुलित प्रस्तुतिकरण आवश्यक है।
  • हाल के वर्षों में राखीगढ़ी, धौलावीरा जैसे स्थलों की खोजों पर भी प्रश्न आ सकते हैं।

लेखक:
मो. अफजाल अंसारी
4+ वर्ष UPSC अनुभवी aspirant
BCA, एडवांस्ड डिप्लोमा इन सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग
सॉफ्टवेयर इंजीनियर

स्रोत: NCERT (प्राचीन भारत – रामशरण शर्मा, आर.एस. शर्मा), “भारत का प्राचीन इतिहास” – आर.एस. शर्मा, “द हड़प्पा सिविलाइजेशन” – ब्रिज बिहारी लाल, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) प्रकाशन, UPSC पिछले वर्ष प्रश्न पत्र, हाल की खुदाई रिपोर्टें (राखीगढ़ी, धौलावीरा)।

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