परिचय
भारत की अर्थव्यवस्था ने जुलाई-सितंबर 2025 की तिमाही में 8.2% की उल्लेखनीय विकास दर दर्ज की है। यह दर पिछले वर्ष की समान तिमाही की 5.6% की वृद्धि दर से काफी अधिक है। यह वृद्धि अर्थव्यवस्था में मजबूती के संकेत देती है और यूपीएससी परीक्षा की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण आर्थिक संकेतक है। इस लेख में इस विकास दर के पीछे के कारकों, विभिन्न क्षेत्रों के योगदान और भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके व्यापक प्रभाव का विश्लेषण किया गया है।
सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का अर्थ

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) किसी देश की सीमा के भीतर एक विशिष्ट समयावधि में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य है। यह किसी देश के आर्थिक स्वास्थ्य और जीवन स्तर का एक प्रमुख संकेतक है। जीडीपी की गणना मुख्यतः तीन विधियों से की जा सकती है: उत्पादन विधि, आय विधि और व्यय विधि।
ऐतिहासिक संदर्भ
कोविड-19 महामारी के बाद, भारतीय अर्थव्यवस्था ने 2020-21 में ऐतिहासिक संकुचन (-5.8%) का सामना किया। इसके बाद, 2021-22 में एक मजबूत वसूली देखी गई, जहाँ विकास दर 8.7% तक पहुँच गई। हालाँकि, उसके बाद के वर्षों में वैश्विक मंदी, मुद्रास्फीति और भू-राजनीतिक तनावों के कारण विकास दर में मामूली गिरावट देखी गई। इसलिए, 8.2% की यह वर्तमान वृद्धि एक सकारात्मक वापसी का संकेत देती है।
विकास दर में वृद्धि के मुख्य कारक
- निवेश में वृद्धि – निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों में पूंजीगत व्यय (केपेक्स) में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
- निर्माण क्षेत्र में तेजी – अवसंरचना परियोजनाओं और आवासीय क्षेत्र में गति आने से निर्माण क्षेत्र ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- सेवा क्षेत्र का योगदान – आईटी, वित्तीय और पर्यटन जैसे उच्च-विकास वाले सेवा क्षेत्रों ने रोजगार सृजन और आय में वृद्धि की है।
- सरकारी नीतियों का प्रभाव – ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI)’ जैसी योजनाओं ने घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया है।
यूपीएससी प्रीलिम्स के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- जीडीपी विकास दर की गणना केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) द्वारा की जाती है।
- जीडीपी की गणना स्थिर कीमतों (वास्तविक जीडीपी) और चालू कीमतों (नाममात्र जीडीपी) पर की जा सकती है।
- भारत में जीडीपी आंकड़े त्रैमासिक और वार्षिक आधार पर जारी किए जाते हैं।
- विकास दर की तुलना करते समय आधार वर्ष (Base Year) प्रभाव को समझना महत्वपूर्ण है।
मेन्स उत्तर लेखन कोण
- विषय – भारत की हालिया जीडीपी वृद्धि टिकाऊ है या अल्पकालिक? चर्चा कीजिए।
- मूल्य वर्धित बिंदु – टिकाऊपन का विश्लेषण निवेश दर, मुद्रास्फीति, वैश्विक अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र की सेहत जैसे पैरामीटर पर करें। समावेशी विकास और रोजगार सृजन पर जोर दें।
यूपीएससी पिछले वर्ष के प्रश्न
- 2023: “भारत में आर्थिक विकास के अनुभवजन्य साक्ष्य रोजगार-वृद्धि विरोधाभास की ओर इशारा करते हैं।” चर्चा कीजिए।
- 2021: वास्तविक जीडीपी और नाममात्र जीडीपी में अंतर स्पष्ट कीजिए। विकास दर की तुलना करने के लिए कौन सा बेहतर संकेतक है?
निष्कर्ष
8.2% की जीडीपी विकास दर निस्संदेह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत है। यह घरेलू मांग और निवेश में मजबूती को दर्शाता है। हालाँकि, इस वृद्धि को टिकाऊ बनाने के लिए मुद्रास्फीति पर नियंत्रण, वैश्विक अनिश्चितताओं से निपटने और विकास के लाभों को समाज के सभी वर्गों तक पहुँचाने पर ध्यान देने की आवश्यकता है। दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के लिए संरचनात्मक सुधारों को जारी रखना महत्वपूर्ण है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. वास्तविक जीडीपी और नाममात्र जीडीपी में क्या अंतर है?
वास्तविक जीडीपी मुद्रास्फीति के प्रभाव को हटाकर वस्तुओं और सेवाओं के वास्तविक मूल्य को दर्शाती है, जबकि नाममात्र जीडीपी चालू बाजार मूल्यों पर आधारित होती है।
2. जीडीपी विकास दर का आम आदमी पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उच्च जीडीपी विकास दर आम तौर पर अधिक रोजगार के अवसर, बेहतर बुनियादी ढाँचे और जीवन स्तर में सुधार से जुड़ी होती है।
3. जीडीपी का भारत में आधार वर्ष क्या है?
वर्तमान में जीडीपी की गणना के लिए आधार वर्ष 2011-12 है।
4. जीडीपी के वैकल्पिक संकेतक कौन-से हैं?
मानव विकास सूचकांक (HDI), ग्रीन जीडीपी, और सकल राष्ट्रीय खुशहाली (GNH) जीडीपी के वैकल्पिक संकेतक हैं।
5. क्या जीडीपी अर्थव्यवस्था का पूर्ण चित्रण करती है?
नहीं, जीडीपी आय असमानता, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था या पर्यावरणीय गिरावट जैसे पहलुओं पर विचार नहीं करती है।
आंतरिक लिंकिंग सुझाव
- भारतीय अर्थव्यवस्था का ढांचा
- मुद्रास्फीति और इसके प्रभाव
- आर्थिक सर्वेक्षण और बजट
- एनईपी 2020 और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
- कोविड-19 के बाद की आर्थिक वसूली
