परिचय

भारतीय संवैधानिक इतिहास में 1892 का भारत परिषद अधिनियम एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। यह अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा भारत में विधान परिषदों के आकार और कार्यों का विस्तार करने के लिए पारित किया गया था। इस अधिनियम ने भारत में पहली बार संसदीय प्रणाली की नींव रखी, हालांकि यह बहुत सीमित थी।

यह अधिनियम 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद आया पहला प्रमुख सुधार था। इसके माध्यम से भारतीयों को प्रशासन और कानून निर्माण की प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया गया। यद्यपि इसमें पूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं अपनाई गई थी, फिर भी इसने भविष्य के सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया।

1892 का भारत परिषद अधिनियम (Indian Councils Act 1892) – विस्तृत UPSC नोट्स - 2026
1892 का भारत परिषद अधिनियम (Indian Councils Act 1892) – विस्तृत UPSC नोट्स – 2026

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

इस अधिनियम के आने के पीछे कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम थे। 1861 के अधिनियम के बाद से ही भारतीय शिक्षित वर्ग में असंतोष बढ़ रहा था। 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) का गठन हुआ, जिसने विधायी सुधारों की मांग तेज कर दी।

कांग्रेस ने मांग की थी कि परिषदों का विस्तार किया जाए और सदस्यों को चुनने का अधिकार जनता को मिले। लॉर्ड डफरिन, जो उस समय वायसराय थे, ने भी कुछ सुधारों का सुझाव दिया था। इन सब परिस्थितियों के कारण ब्रिटिश सरकार को यह अधिनियम लाना पड़ा।

1892 के अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं

इस अधिनियम ने केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों की संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव किए। इसकी मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं-

1. परिषद के आकार में वृद्धि इस अधिनियम के द्वारा केंद्रीय विधान परिषद में अतिरिक्त (गैर-सरकारी) सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई। अब कम से कम 10 और अधिकतम 16 सदस्य हो सकते थे। इसी तरह, प्रांतीय परिषदों में भी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।

2. निर्वाचन का सिद्धांत (अप्रत्यक्ष रूप से) हालांकि इस अधिनियम में ‘चुनाव’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था, लेकिन इसमें अप्रत्यक्ष चुनाव की शुरुआत हुई। कुछ गैर-सरकारी सदस्यों का नामांकन, बंगाल चैंबर ऑफ कॉमर्स और प्रांतीय विधान परिषदों की सिफारिश पर किया जाना था। इसे ‘नामांकन के माध्यम से चुनाव’ कहा जा सकता है।

3. बजट पर चर्चा का अधिकार इस अधिनियम की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसने विधान परिषद के सदस्यों को बजट पर चर्चा करने का अधिकार दिया। हालांकि, उन्हें बजट पर मतदान करने का अधिकार अभी भी नहीं मिला था।

4. प्रश्न पूछने का अधिकार सदस्यों को सार्वजनिक हित के मामलों पर कार्यपालिका से प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया। लेकिन इसके लिए 6 दिन का पूर्व नोटिस देना अनिवार्य था। पूरक प्रश्न (Supplementary Questions) पूछने की अनुमति नहीं थी।

अधिनियम के कारण

इस अधिनियम को लाने के पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण जिम्मेदार थे-

  • 1861 के अधिनियम की विफलता- 1861 का अधिनियम भारतीयों की आकांक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ रहा था। विधान परिषदों के पास बहुत सीमित शक्तियां थीं।
  • राष्ट्रवाद का उदय- भारत में राष्ट्रवाद की भावना तेजी से बढ़ रही थी। शिक्षित भारतीय अब प्रशासन में अपनी हिस्सेदारी मांग रहे थे।
  • कांग्रेस का दबाव- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने शुरुआती अधिवेशनों में विधान परिषदों में सुधार और चुनाव प्रणाली की मांग की थी।
  • इल्बर्ट बिल विवाद- इस विवाद ने भारतीयों को यह अहसास कराया कि उन्हें अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर लड़ने की आवश्यकता है।

अधिनियम का महत्व

संवैधानिक विकास के क्रम में इस अधिनियम का विशेष महत्व है-

  • संसदीय व्यवस्था की शुरुआत- इसने भारत में आधुनिक संसदीय प्रणाली की आधारशिला रखी।
  • भारतीयों की भागीदारी- पहली बार भारतीयों को बजट जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने विचार रखने का मौका मिला।
  • प्रतिनिधित्व का विस्तार- जिला बोर्डों, विश्वविद्यालयों, नगर पालिकाओं और वाणिज्य मंडलों को परिषदों में अपने प्रतिनिधि भेजने का अवसर मिला।
  • राजनीतिक जागरूकता- इसने भारतीयों के बीच लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाई।

आलोचना और सीमाएं (Challenges)

तमाम सुधारों के बावजूद, यह अधिनियम राष्ट्रवादियों को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर सका। इसकी प्रमुख आलोचनाएं निम्नलिखित हैं-

  • सीमित मताधिकार- ‘चुनाव’ शब्द का प्रयोग जानबूझकर नहीं किया गया था। यह प्रक्रिया बहुत जटिल और अप्रत्यक्ष थी।
  • शक्तिहीन परिषदें- सदस्यों को बजट पर चर्चा का अधिकार तो था, लेकिन वे न तो मतदान कर सकते थे और न ही उसमें संशोधन कर सकते थे।
  • सरकारी बहुमत- परिषदों में अभी भी सरकारी (Official) सदस्यों का बहुमत बना रहा, जिससे गैर-सरकारी सदस्यों की आवाज दब जाती थी।
  • पूरक प्रश्न पर रोक- सदस्य प्रश्न तो पूछ सकते थे, लेकिन उत्तर से संतुष्ट न होने पर वे पूरक प्रश्न नहीं पूछ सकते थे।

UPSC मुख्य परीक्षा नोट्स

  • अधिनियम का नाम- भारतीय परिषद अधिनियम, 1892
  • वायसराय- लॉर्ड लैंसडाउन (Lord Lansdowne)
  • मुख्य प्रावधान-
    • केंद्रीय और प्रांतीय परिषदों का विस्तार।
    • अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत (सिफारिश के आधार पर)।
    • बजट पर चर्चा का अधिकार मिला।
    • प्रश्न पूछने की शक्ति (6 दिन के नोटिस पर)।
  • सीमाएं- मतदान का अधिकार नहीं, पूरक प्रश्न नहीं, ‘चुनाव’ शब्द का अभाव।
  • परिणाम- नरमपंथियों (Moderates) की आंशिक जीत, लेकिन उग्रवादियों का असंतोष बढ़ा।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Prelims Facts)

  • इस अधिनियम के समय भारत के वायसराय लॉर्ड लैंसडाउन थे।
  • केंद्रीय विधान परिषद में गैर-सरकारी सदस्यों की अधिकतम संख्या 16 कर दी गई थी।
  • बजट पर चर्चा करने की शक्ति पहली बार इसी अधिनियम द्वारा दी गई।
  • गोपाल कृष्ण गोखले और सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे नेताओं ने इस नए मंच का उपयोग सरकार की नीतियों की आलोचना के लिए किया।
  • इस अधिनियम ने ‘नामांकन’ के सिद्धांत को ‘सिफारिश’ के सिद्धांत में बदल दिया।

मुख्य परीक्षा उत्तर लेखन दृष्टिकोण (Mains Answer Writing Angle)

प्रश्न- “1892 का अधिनियम एक साहसिक कदम था, लेकिन यह भारतीय आकांक्षाओं को पूरा करने में विफल रहा।” चर्चा करें।

उत्तर लेखन दिशा-

  1. भूमिका- अधिनियम का परिचय और इसके लागू होने के संदर्भ (कांग्रेस का उदय) का उल्लेख करें।
  2. सकारात्मक पक्ष- चर्चा करें कि कैसे इसने बजट पर बहस और प्रश्न पूछने की अनुमति देकर संसदीय प्रणाली की शुरुआत की। इसे 1861 से बेहतर बताएं।
  3. नकारात्मक पक्ष- स्पष्ट करें कि कैसे ‘विटो पावर’, ‘बजट पर मतदान का अभाव’ और ‘अप्रत्यक्ष चुनाव’ ने इसे कमजोर बना दिया।
  4. निष्कर्ष- यह निष्कर्ष निकालें कि यह पूर्ण लोकतंत्र नहीं था, लेकिन इसने भारतीयों को विधायी प्रक्रियाओं का प्रशिक्षण दिया, जो भविष्य (1909 और 1919 के अधिनियम) के लिए आधार बना।

UPSC Previous Year Questions (PYQ)

  • UPSC Prelims 2003 प्रश्न- निम्नलिखित में से किस अधिनियम ने भारत में विधान परिषद को बजट पर चर्चा करने की शक्ति प्रदान की?
  • (a) भारत परिषद अधिनियम, 1861 (b) भारत परिषद अधिनियम, 1892 (c) भारत परिषद अधिनियम, 1909 (d) भारत शासन अधिनियम, 1919
  • उत्तर- (b)

UPSC Prelims MCQ Practice

प्रश्न 1- 1892 के भारत परिषद अधिनियम के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें-

  1. इसने केंद्रीय विधान परिषद में गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या बढ़ाई।
  2. सदस्यों को बजट पर मतदान करने का अधिकार दिया गया।
  3. इसमें पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली अपनाई गई। उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सत्य है/हैं? A) केवल 1 B) केवल 1 और 2 C) केवल 2 और 3 D) 1, 2 और 3

प्रश्न 2- किस अधिनियम द्वारा भारतीयों को कार्यपालिका से प्रश्न पूछने का अधिकार मिला? A) 1858 का अधिनियम B) 1861 का अधिनियम C) 1892 का अधिनियम D) 1909 का अधिनियम

प्रश्न 3- 1892 के अधिनियम के तहत केंद्रीय विधान परिषद में न्यूनतम कितने अतिरिक्त सदस्य हो सकते थे? A) 6 B) 10 C) 12 D) 16

प्रश्न 4- इस अधिनियम के समय भारत का वायसराय कौन था? A) लॉर्ड रिपन B) लॉर्ड कर्जन C) लॉर्ड डफरिन D) लॉर्ड लैंसडाउन

प्रश्न 5- 1892 के अधिनियम की मुख्य सीमा क्या थी? A) इसमें भारतीयों को शामिल नहीं किया गया। B) बजट पर चर्चा की अनुमति नहीं थी। C) पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं था। D) प्रांतीय परिषदों को समाप्त कर दिया गया।

(उत्तर- 1.A, 2.C, 3.B, 4.D, 5.C)

निष्कर्ष

1892 का भारत परिषद अधिनियम ब्रिटिश भारत के संवैधानिक इतिहास में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम था। इसने निरंकुश शासन में पहली बार दरार डाली और प्रतिनिधिक सरकार की अवधारणा को पेश किया। यद्यपि इसके प्रावधान सीमित थे और इससे भारतीय राष्ट्रवादी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुए, फिर भी इसने विधानमंडलों को केवल एक “पंजीकरण मशीन” से बदलकर एक “विचार-विमर्श मंच” बना दिया। इसने भविष्य के स्वतंत्रता संग्राम और संवैधानिक सुधारों के लिए एक ठोस जमीन तैयार की।

FAQs (UPSC Aspirants के लिए)

Q1- क्या 1892 के अधिनियम ने भारत में चुनाव की शुरुआत की? हाँ, लेकिन यह बहुत सीमित और अप्रत्यक्ष रूप में थी। अधिनियम में ‘चुनाव’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया था, इसे ‘नामांकन’ कहा गया जो कुछ निकायों की सिफारिश पर होता था।

Q2- 1892 के अधिनियम में बजट पर क्या अधिकार मिले? सदस्यों को वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) पर चर्चा करने का अधिकार मिला, लेकिन वे उस पर मतदान नहीं कर सकते थे और न ही उसमें कटौती प्रस्ताव ला सकते थे।

Q3- क्या सदस्य पूरक प्रश्न पूछ सकते थे? नहीं, 1892 के अधिनियम के तहत सदस्य केवल प्रश्न पूछ सकते थे। पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों में मिला।

Q4- केंद्रीय विधान परिषद में सदस्यों की संख्या कितनी बढ़ाई गई? इस अधिनियम के तहत अतिरिक्त सदस्यों की संख्या न्यूनतम 10 और अधिकतम 16 निर्धारित की गई थी।

Q5- 1892 का अधिनियम क्यों लाया गया? 1885 में कांग्रेस की स्थापना और राष्ट्रवादियों द्वारा विधायी सुधारों की बढ़ती मांग के कारण ब्रिटिश सरकार को यह अधिनियम लाना पड़ा।

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