परिचय

1909 का भारत परिषद अधिनियम भारतीय संवैधानिक विकास में एक निर्णायक लेकिन विवादास्पद कदम था। इसे मॉर्ले-मिंटो सुधार (Morley-Minto Reforms) के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि लॉर्ड मॉर्ले उस समय भारत के राज्य सचिव थे और लॉर्ड मिंटो वायसराय। यह अधिनियम 1892 के अधिनियम की सीमाओं और भारतीयों की बढ़ती राजनीतिक मांगों की प्रतिक्रिया स्वरूप लाया गया था।

इस अधिनियम ने विधान परिषदों के आकार और शक्तियों में वृद्धि की। हालांकि, इसका सबसे बड़ा और दूरगामी प्रभाव वाला प्रावधान था- सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की शुरुआत। इसी कारण इसे भारत में सांप्रदायिकता को वैधानिक मान्यता देने वाला अधिनियम माना जाता है। यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदलने वाला एक महत्वपूर्ण दस्तावेज था।

1909 का भारत परिषद अधिनियम
1909 का भारत परिषद अधिनियम

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1892 के अधिनियम से भारतीयों को मिली सीमित शक्तियाँ राष्ट्रवादियों को संतुष्ट नहीं कर पाईं। 20वीं सदी की शुरुआत में- विशेष रूप से 1905 के बंगाल विभाजन के बाद- भारत में राजनीतिक अशांति और उग्रवाद का उदय हुआ।

इसी दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में नरमपंथी और गरमपंथी दो धाराएं बन गईं। नरमपंथी संवैधानिक सुधार चाहते थे, जबकि गरमपंथी स्वशासन की मांग कर रहे थे। इसके अलावा, 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई, जिसने मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग रखी। इन सभी दबावों के कारण ब्रिटिश सरकार को सुधारों की घोषणा करनी पड़ी।

1909 अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं

इस अधिनियम ने केंद्रीय और प्रांतीय दोनों स्तरों पर बड़े बदलाव किए। इसकी मुख्य विशेषताओं को समझना UPSC के लिए अत्यंत आवश्यक है-

1. परिषदों के आकार में वृद्धि

केंद्रीय विधान परिषद में सदस्यों की संख्या को 16 से बढ़ाकर 60 कर दिया गया। इसी तरह, प्रांतीय विधान परिषदों में भी सदस्यों की संख्या में काफी वृद्धि की गई। जैसे- बंगाल, बॉम्बे, मद्रास, संयुक्त प्रांत आदि की परिषदों का विस्तार किया गया।

2. पहली बार भारतीय की भागीदारी

यह एक ऐतिहासिक प्रावधान था। किसी भारतीय को पहली बार वायसराय की कार्यकारी परिषद (Executive Council) का सदस्य बनाया गया। सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा वायसराय की कार्यकारी परिषद में नियुक्त होने वाले पहले भारतीय बने- उन्हें विधि सदस्य (Law Member) के रूप में शामिल किया गया था।

3. निर्वाचन की प्रकृति में परिवर्तन

केंद्रीय परिषद में सरकारी बहुमत (Official Majority) को बनाए रखा गया, लेकिन प्रांतीय परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों के बहुमत की अनुमति दी गई। हालांकि, गैर-सरकारी बहुमत का मतलब यह नहीं था कि भारतीयों का नियंत्रण हो गया, क्योंकि इन गैर-सरकारी सदस्यों में से कई नामांकित होते थे।

4. पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार

1892 के अधिनियम की एक बड़ी सीमा को दूर किया गया। अब विधान परिषद के सदस्य सार्वजनिक हित के मामलों और बजट पर प्रश्न पूछने के साथ-साथ पूरक प्रश्न (Supplementary Questions) भी पूछ सकते थे। इसके अलावा, वे बजट पर संकल्प (Resolution) भी पेश कर सकते थे।

5. सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की शुरुआत

यह अधिनियम का सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद प्रावधान था। इसने पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorates) के सिद्धांत को स्वीकार किया। इसके तहत मुस्लिम सदस्यों का चुनाव केवल मुस्लिम मतदाता ही कर सकते थे। इस प्रकार, लॉर्ड मिंटो को ‘सांप्रदायिक निर्वाचन के जनक’ के रूप में जाना जाता है।

अधिनियम के कारण

ब्रिटिश सरकार ने ये सुधार निम्नलिखित कारणों से लागू किए-

  • बंगाल विभाजन के बाद की अशांति- 1905 के विभाजन के परिणामस्वरूप भारत में विरोध और क्रांतिकारी गतिविधियों में तेजी आई। सरकार ने इसे नियंत्रित करने के लिए ‘नरमपंथियों’ को खुश करना चाहा।
  • उग्रवाद का दबाव- बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व में उग्रवादी दल स्वशासन की मांग कर रहे थे। अंग्रेजों ने सुधारों की पेशकश करके उग्रवादियों को नरमपंथियों से अलग करने का प्रयास किया।
  • मुस्लिम लीग की मांग- मुस्लिम लीग ने 1906 में ही वायसराय मिंटो से पृथक निर्वाचक मंडल की मांग की थी। अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत इसे स्वीकार कर लिया।
  • 1892 के अधिनियम की अपर्याप्तता- 1892 का अधिनियम भारतीय मांगों को पूरा करने में पूरी तरह विफल रहा था।

उदाहरण और केस स्टडी

एक केस स्टडी के तौर पर बंगाल विधायी परिषद में निर्वाचित सीटों के कारण स्थानीय नेताओं की राजनीतिक विशेषज्ञता बढ़ी – इसलिए स्थानीय मुद्दे अधिक केंद्रित होकर उठ सके। हालांकि सामुदायिक आरक्षण के कारण कुछ क्षेत्रों में साम्प्रदायिक रेखाएँ भी गहरी हुईं। यह दिखाता है कि सुधारों का प्रभाव क्षेत्रीय और सामुदायिक संदर्भ पर निर्भर करता है और सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही परिणाम सामने आये।

अधिनियम के सकारात्मक/नकारात्मक पक्ष

सकारात्मक पक्ष (Advantages)

  • प्रतिनिधित्व में वृद्धि- परिषदों में भारतीयों की भागीदारी और संख्या दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
  • कार्यपालिका में भागीदारी- पहली बार वायसराय की कार्यकारी परिषद में एक भारतीय सदस्य (एस.पी. सिन्हा) को शामिल करना एक बड़ा संवैधानिक कदम था।
  • विस्तृत चर्चा के अधिकार- पूरक प्रश्न पूछने और बजट पर संकल्प पेश करने की अनुमति मिलने से परिषदें अधिक जीवंत और प्रभावी मंच बन गईं।

नकारात्मक पक्ष (Disadvantages)

  • सांप्रदायिक विभाजन- पृथक निर्वाचक मंडल की शुरुआत ने देश में धार्मिक आधार पर विभाजन की नींव डाली। यह भारतीय राष्ट्रवाद के लिए सबसे बड़ा झटका था।
  • सीमित शक्तियां- परिषदों को शक्तियां तो दी गईं, लेकिन वे सरकार को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने में असमर्थ रहीं क्योंकि केंद्रीय स्तर पर सरकारी बहुमत बना रहा।
  • अप्रत्यक्ष चुनाव- अधिकांश सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते थे, जिससे प्रतिनिधित्व सीमित रहा और आम जनता तक नहीं पहुंच सका।

आलोचना और सीमाएं (Criticism)

भारतीयों और इतिहासकारों ने इस अधिनियम की कड़ी आलोचना की-

  • लोकतंत्र की उपेक्षा- लॉर्ड मॉर्ले ने स्वयं कहा था कि यह सुधार भारत में संसदीय व्यवस्था स्थापित करने के लिए नहीं लाए गए थे। इसमें उत्तरदायित्व का कोई प्रावधान नहीं था।
  • निर्वाचन क्षेत्र का संकीर्ण आधार- चुनाव का आधार बहुत संकीर्ण था। मताधिकार केवल कुछ संपत्तिवान और शिक्षित लोगों तक ही सीमित था।
  • फूट डालो और राज करो- यह अधिनियम जानबूझकर भारत में सांप्रदायिक मतभेदों को गहरा करने के लिए लाया गया था। इसने राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने का काम किया।
  • कार्यपालिका की प्रधानता- परिषदें केवल सलाहकारी निकाय थीं। सभी महत्वपूर्ण निर्णय अभी भी वायसराय और उसकी कार्यकारी परिषद के हाथों में थे।

UPSC मुख्य परीक्षा नोट्स

  • अधिनियम का नाम- भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 / मॉर्ले-मिंटो सुधार।
  • परिचय- मॉर्ले (राज्य सचिव) और मिंटो (वायसराय) के नाम पर।
  • सबसे बड़ा प्रावधान- मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की शुरुआत।
  • प्रमुख सुधार- केंद्रीय परिषद में 60 सदस्य, पूरक प्रश्न पूछने और बजट संकल्प पेश करने की अनुमति।
  • मुख्य आलोचना- भारत में सांप्रदायिकता का वैधानिकरण। लॉर्ड मिंटो ‘सांप्रदायिक निर्वाचन के जनक’।
  • परिणाम- नरमपंथियों को कुछ हद तक संतुष्टि, लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन में स्थायी विभाजन की नींव पड़ी।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Prelims Facts)

  • लॉर्ड मिंटो को भारत में सांप्रदायिक निर्वाचन का जनक माना जाता है।
  • यह अधिनियम 1909 में आया था।
  • वायसराय की कार्यकारी परिषद में नियुक्त होने वाले पहले भारतीय सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा थे।
  • पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार पहली बार इसी अधिनियम द्वारा दिया गया था।
  • इस अधिनियम ने विधान परिषदों को सलाहकार निकाय (Advisory Body) बनाए रखा, न कि संप्रभु निकाय।

मुख्य परीक्षा उत्तर लेखन दृष्टिकोण (Mains Answer Writing Angle)

प्रश्न- “मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने सांप्रदायिकता के बीज बोये, जिसने अंततः भारत के विभाजन में योगदान दिया।” समालोचनात्मक विश्लेषण करें।

उत्तर लेखन दिशा-

  1. भूमिका- 1909 के अधिनियम का संक्षिप्त परिचय और सांप्रदायिक निर्वाचन के प्रावधान का उल्लेख करें।
  2. बीज बोने की प्रक्रिया- बताएं कि कैसे पृथक निर्वाचक मंडल ने मुसलमानों को शेष भारतीय समुदाय से अलग कर दिया। इससे राजनीतिक पहचान धार्मिक आधार पर तय हुई।
  3. विभाजन में योगदान- उल्लेख करें कि यह प्रावधान बाद के अधिनियमों (1919, 1935) में भी जारी रहा और अंततः द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (Two-Nation Theory) का आधार बना।
  4. सकारात्मकता का उल्लेख- हालांकि, सदस्यों की संख्या में वृद्धि और पूरक प्रश्न पूछने के अधिकार जैसे सीमित सकारात्मक पहलुओं का भी उल्लेख करें।
  5. निष्कर्ष- निष्कर्ष निकालें कि यह संवैधानिक सुधार से अधिक एक राजनीतिक दांव था, जिसने अल्पकालिक शांति के लिए देश को दीर्घकालिक सांप्रदायिक क्षति पहुंचाई।

UPSC Previous Year Questions (PYQ)

  • UPSC Prelims 2014 प्रश्न- 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों का मुख्य उद्देश्य क्या था?
  • (a) केंद्रीय विधान परिषद में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाना। (b) प्रांतीय परिषदों में सुधार करना। (c) पृथक निर्वाचक मंडल के माध्यम से मुसलमानों को प्रतिनिधित्व देना। (d) संसदीय व्यवस्था लागू करना।
  • उत्तर- (c)

UPSC Prelims MCQ Practice

प्रश्न 1- 1909 के भारत परिषद अधिनियम के तहत किसे ‘सांप्रदायिक निर्वाचन का जनक’ माना जाता है?

A) लॉर्ड मॉर्ले B) लॉर्ड मिंटो C) सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा D) लॉर्ड कर्जन

प्रश्न 2- किस अधिनियम के तहत पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार पहली बार दिया गया?

A) 1861 का अधिनियम B) 1892 का अधिनियम C) 1909 का अधिनियम D) 1919 का अधिनियम

प्रश्न 3- निम्नलिखित में से कौन 1909 के अधिनियम का सबसे विवादास्पद प्रावधान था?

A) वायसराय की कार्यकारी परिषद में भारतीय की नियुक्ति। B) केंद्रीय परिषद में सरकारी बहुमत बनाए रखना। C) मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल। D) बजट पर संकल्प पेश करने का अधिकार।

प्रश्न 4- वायसराय की कार्यकारी परिषद में नियुक्त होने वाले पहले भारतीय सदस्य कौन थे?

A) गोपाल कृष्ण गोखले B) फिरोजशाह मेहता C) सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा D) दादाभाई नौरोजी

प्रश्न 5- 1909 के अधिनियम के संबंध में लॉर्ड मॉर्ले का प्रसिद्ध कथन क्या था?

A) “भारत को स्वशासन देना हमारा लक्ष्य है।” B) “यह सुधार भारत में संसदीय प्रणाली स्थापित करने के लिए नहीं लाए गए हैं।” C) “फूट डालो और राज करो हमारी नीति है।” D) “यह अधिनियम एक महान और उदार प्रयास है।”

(उत्तर- 1.B, 2.C, 3.C, 4.C, 5.B)

निष्कर्ष

1909 का भारत परिषद अधिनियम संवैधानिक इतिहास में एक द्वंद्व प्रस्तुत करता है। एक ओर, इसने विधान परिषदों का विस्तार किया, भारतीयों को कार्यपालिका में स्थान दिया और बहस के अधिकारों को बढ़ाया। वहीं दूसरी ओर, इसके सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान- पृथक निर्वाचक मंडल ने भारतीय राजनीति में ऐसा विषाक्त बीज बोया, जिसका फल अंततः देश को विभाजन के रूप में भुगतना पड़ा। यह अधिनियम सुधार के नाम पर भारतीय राष्ट्रवाद को तोड़ने और ब्रिटिश शासन को लम्बा खींचने का एक सुविचारित प्रयास था।

FAQs (UPSC Aspirants के लिए)

Q1- 1909 के अधिनियम को मॉर्ले-मिंटो सुधार क्यों कहा जाता है? लॉर्ड मॉर्ले उस समय भारत के राज्य सचिव थे और लॉर्ड मिंटो भारत के वायसराय थे। इन्हीं दोनों के प्रयासों से यह अधिनियम तैयार किया गया था।

Q2- पृथक निर्वाचक मंडल का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि एक विशेष समुदाय (जैसे- मुस्लिम) के प्रतिनिधियों का चुनाव केवल उसी समुदाय के मतदाता ही करेंगे।

Q3- 1909 के अधिनियम में बजट पर क्या अधिकार मिले? सदस्यों को बजट पर चर्चा करने और उस पर संकल्प (Resolution) पेश करने का अधिकार मिला, लेकिन वे अभी भी उस पर मतदान नहीं कर सकते थे।

Q4- क्या 1909 के अधिनियम ने भारत में उत्तरदायी सरकार की स्थापना की? नहीं। इस अधिनियम ने परिषदों को केवल सलाहकार निकाय बनाए रखा और केंद्रीय स्तर पर सरकारी बहुमत कायम रखा, जिससे यह उत्तरदायी सरकार की स्थापना नहीं कर सका।

Q5- 1909 के अधिनियम के बाद केंद्रीय विधान परिषद में सदस्यों की संख्या कितनी हो गई थी? केंद्रीय विधान परिषद में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या 16 से बढ़ाकर 60 कर दी गई थी।

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