Table of Contents

भारतीय अर्थव्यवस्था अनुक्रमणिका (Table of Contents)

  1. परिचय
  2. एक निराशाजनक विज्ञान से कहीं अधिक
  3. अर्थशास्त्र की परिभाषाएँ
  4. व्यष्टि और समष्टि अर्थशास्त्र
  5. अर्थव्यवस्था क्या है?
  6. अर्थव्यवस्था के क्षेत्र
    • 6.1 प्राथमिक क्षेत्र
    • 6.2 द्वितीयक क्षेत्र
    • 6.3 तृतीयक क्षेत्र (सेवा क्षेत्र)
    • 6.4 चतुर्थक क्षेत्र
    • 6.5 पंचम क्षेत्र
  7. आर्थिक प्रणालियाँ
    • 7.1 बाज़ार अर्थव्यवस्था (पूँजीवाद)
    • 7.2 गैर-बाज़ार अर्थव्यवस्था (समाजवाद)
    • 7.3 मिश्रित अर्थव्यवस्था
  8. वाशिंगटन सहमति (सन 1989)
  9. बीजिंग सहमति (सन 2004)
  10. सैंटियागो सहमति
  11. पूँजीवाद – संवृद्धि प्रोत्साहन का एक साधन
  12. राष्ट्रीय आय (GDP, NDP, GNP, NNP)
  13. राष्ट्रीय आय की लागत और कीमत (Factor Cost vs Market Price)
  14. संशोधित विधि (सन 2015)
  15. GVA और GDP की तुलना
  16. स्थिर-आधार से शृंखला-आधार विधियाँ
  17. आर्थिक सांख्यिकी पर स्थायी समिति (SCES)
  18. लाभ और हानि (वर्तमान भारतीय आर्थिक मॉडल के)
  19. तुलना तालिका (विभिन्न आर्थिक सहमतियों की)
  20. वर्तमान घटनाओं का एकीकरण (सन 2024-2026)
  21. चुनौतियाँ (भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने)
  22. सरकारी योजनाएँ और नीतियाँ
  23. आगे का रास्ता (Way Forward) – मुख्य परीक्षा के लिए तैयार
  24. निष्कर्ष
  25. संघ लोक सेवा आयोग प्रारंभिक परीक्षा पिछले वर्षों के प्रश्न (10 वर्षों से)
  26. संघ लोक सेवा आयोग मुख्य परीक्षा पिछले वर्षों के प्रश्न (मॉडल उत्तर सहित)
  27. अभ्यास प्रश्न (10 बहुविकल्पीय प्रश्न)
  28. मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (5 प्रश्न)
  29. उत्तर लेखन अभ्यास (5 संरचित उत्तर)
  30. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

स्रोत (Sources)

इस लेख को तैयार करने में निम्नलिखित प्रामाणिक स्रोतों का उपयोग किया गया है। सभी तथ्य, परिभाषाएँ, आँकड़े और नीतियाँ इन्हीं पर आधारित हैं:

  1. एनसीईआरटी (NCERT) अर्थशास्त्र की पाठ्यपुस्तकें – कक्षा 9 से 12 तक (व्यष्टि, समष्टि, भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी सिद्धांत)
  2. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की प्रकाशनें – वार्षिक रिपोर्ट, मौद्रिक नीति रिपोर्ट, बुलेटिन (सन 2023-2025)
  3. सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) – राष्ट्रीय आय के आधिकारिक आँकड़े, संशोधित विधि (सन 2015), GVA और GDP से संबंधित दस्तावेज़
  4. प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) – सन 2024-2025 की सरकारी योजनाओं, GDP वृद्धि, PLI, जीएसटी संग्रह, आत्मनिर्भर भारत, प्रधानमंत्री गति शक्ति आदि की प्रेस विज्ञप्तियाँ
  5. विश्व बैंक (World Bank) – भारत अर्थव्यवस्था अपडेट, जलवायु परिवर्तन प्रभाव रिपोर्ट (सन 2024)
  6. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) – विश्व आर्थिक आउटलुक (सन 2024-2025), भारत GDP अनुमान
  7. संयुक्त राष्ट्र (UN) राष्ट्रीय आय लेखा प्रणाली (SNA 2008) – शृंखला-आधार विधि के अंतरराष्ट्रीय मानक
  8. केंद्रीय बजट दस्तावेज़ (सन 2024-25, 2025-26) – राजकोषीय घाटा, व्यय, योजनाओं का बजट आवंटन
  9. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) – बेरोज़गारी दर के आँकड़े (सन 2024)
  10. ऑक्सफैम (Oxfam) रिपोर्ट (सन 2024) – आय असमानता से संबंधित आँकड़े
  11. विश्व असमानता रिपोर्ट (सन 2024) – जिनी गुणांक, शीर्ष 1% की हिस्सेदारी
  12. एम. लक्ष्मीकांत (M. Laxmikanth) – भारत की राजनीति और शासन (मिश्रित अर्थव्यवस्था, नीति निर्देशक सिद्धांत)
  13. संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र (प्रारंभिक और मुख्य) – सन 2016 से 2023 तक
  14. प्रधानमंत्री की आधिकारिक वेबसाइट और भाषण – आत्मनिर्भर भारत, विकसित भारत 2047
  15. भारत का संविधान – समाजवाद, कल्याणकारी राज्य के निदेशक सिद्धांत

नोट: सभी आँकड़े (जैसे GDP, GVA, मुद्रास्फीति, विदेशी मुद्रा भंडार, PLI बजट) सन 2024-2025 के उपलब्ध नवीनतम आधिकारिक अनुमानों/वास्तविक आँकड़ों पर आधारित हैं। जहाँ कोई निश्चित आँकड़ा उपलब्ध नहीं था, वहाँ MoSPI/PIB/RBI के पूर्वानुमानों का उल्लेख किया गया है।

1. परिचय

जब हम भारतीय अर्थव्यवस्था की बात करते हैं, तो हमारे सामने एक ऐसा जटिल, बहुआयामी और गतिशील तंत्र आता है जो सिर्फ आँकड़ों का संग्रह नहीं है, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की दैनिक रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सपनों का गणित है। क्या आप जानते हैं कि सन 2025 में भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार सन 2027 तक यह जर्मनी को पीछे छोड़ते हुए तीसरे स्थान पर पहुँच सकता है? लेकिन क्या यह वृद्धि समावेशी है? क्या इसका लाभ आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुँच रहा है? ये वे प्रश्न हैं जो भारतीय अर्थव्यवस्था को केवल एक परीक्षा का विषय नहीं, बल्कि एक जीवंत चर्चा का विषय बनाते हैं।

संघ लोक सेवा आयोग की दृष्टि से भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्व अत्यधिक है। प्रारंभिक परीक्षा में सामान्य अध्ययन पेपर-एक में अर्थव्यवस्था से 15-20 प्रश्न आते हैं। मुख्य परीक्षा के पेपर-तीन (सामान्य अध्ययन तृतीय) में अर्थव्यवस्था एक प्रमुख खंड है। इसके अलावा, निबंध, साक्षात्कार और यहाँ तक कि वैकल्पिक विषयों में भी अर्थशास्त्र की मूल समझ अपेक्षित है। इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था की गहरी, वैचारिक और तथ्यात्मक समझ हर उम्मीदवार के लिए अनिवार्य है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सन 2024 के केंद्रीय बजट भाषण में कहा था, “हमारा संकल्प है कि सन 2047 तक भारत एक विकसित राष्ट्र बने। इसके लिए एक मजबूत, स्थिर और आत्मनिर्भर भारतीय अर्थव्यवस्था का निर्माण करना होगा।” यह कथन दर्शाता है कि आर्थिक नीतियों का सीधा संबंध राष्ट्रीय लक्ष्यों से है।

इस विशाल लेख में हम अर्थशास्त्र की बुनियादी परिभाषाओं से यात्रा शुरू करेंगे, फिर भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों, प्रणालियों, राष्ट्रीय आय मापन की पेचीदगियों, विभिन्न वैश्विक सहमतियों (वाशिंगटन, बीजिंग, सैंटियागो), पूँजीवाद की भूमिका, और नवीनतम सांख्यिकीय सुधारों (संशोधित विधि, जीवीए, शृंखला-आधार विधि) का गहन विश्लेषण करेंगे। प्रत्येक अवधारणा को भारतीय संदर्भ में उदाहरणों, केस स्टडीज और सन 2024-2026 की वर्तमान घटनाओं से जोड़ा जाएगा। अंत में, संघ लोक सेवा आयोग के पिछले वर्षों के प्रश्न, अभ्यास प्रश्न, उत्तर लेखन अभ्यास और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न दिए गए हैं। यह लेख आपकी प्रारंभिक, मुख्य और साक्षात्कार की तैयारी को एक साथ मजबूत करेगा।

2. एक निराशाजनक विज्ञान से कहीं अधिक

उन्नीसवीं शताब्दी के लेखक थॉमस कार्लाइल ने अर्थशास्त्र को “निराशाजनक विज्ञान” (Dismal Science) कहा था। उनका तर्क था कि यह विज्ञान मानवीय दुखों, भूखमरी और गरीबी को केवल आँकड़ों में तोलता है, बिना उन्हें दूर करने का कोई मार्ग बताए। उनके समय में माल्थस की जनसंख्या सिद्धांत ने भी यह भय दिया कि जनसंख्या तेजी से बढ़ेगी और खाद्य उत्पादन धीरे, जिससे अकाल और दुख अपरिहार्य हैं।

लेकिन क्या आज का अर्थशास्त्र वास्तव में निराशाजनक है? बिल्कुल नहीं। आधुनिक अर्थशास्त्र ने यह सिद्ध कर दिया है कि सही नीतियों, तकनीकी नवाचार और संस्थागत सुधारों से दुर्लभता को परास्त किया जा सकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था इसका जीता-जागता उदाहरण है। सन 1991 में जब देश लगभग दिवालिया होने की कगार पर था (विदेशी मुद्रा भंडार मात्र दो सप्ताह के आयात के लिए पर्याप्त था), तब अर्थशास्त्र के सिद्धांतों ने ही रास्ता दिखाया। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को संकट से उबारा और दशकों की उच्च वृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया।

आज अर्थशास्त्र न केवल विश्लेषण करता है, बल्कि व्यवहारिक समाधान भी सुझाता है – चाहे वह मुद्रास्फीति पर नियंत्रण के लिए मौद्रिक नीति हो, बेरोजगारी कम करने के लिए राजकोषीय प्रोत्साहन हो, या जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कार्बन मूल्य निर्धारण हो। इसलिए, भारतीय अर्थव्यवस्था को समझने का अर्थ है निराशा नहीं, बल्कि अवसरों और समाधानों को पहचानना।

3. अर्थशास्त्र की परिभाषाएँ

अर्थशास्त्र को परिभाषित करने का प्रयास सदियों से होता आया है। प्रत्येक विचारक ने अपने समय की समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में इसे परिभाषित किया। भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में इन परिभाषाओं की प्रासंगिकता को समझना आवश्यक है।

क्रमविचारक (वर्ष)परिभाषा का सारभारतीय संदर्भ में उदाहरण
1एडम स्मिथ (सन 1776) ‘धन का विज्ञान’अर्थशास्त्र धन के उत्पादन, वितरण और उपभोग का अध्ययन है। स्मिथ ने ‘अदृश्य हाथ’ (बाज़ार तंत्र) पर बल दिया।भारत में सन 1991 के बाद बाज़ार तंत्र को अधिक भूमिका दी गई। निजी क्षेत्र ने दूरसंचार, विमानन, बैंकिंग में क्रांति ला दी।
2अल्फ्रेड मार्शल (सन 1890) ‘कल्याणकारी परिभाषा’अर्थशास्त्र मानव कल्याण के भौतिक पहलुओं का अध्ययन है। यह धन के बजाय मनुष्य को केंद्र में रखता है।भारत की कल्याणकारी योजनाएँ – महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, आयुष्मान भारत – मार्शल की परिभाषा को चरितार्थ करती हैं।
3लियोनेल रॉबिंस (सन 1932) ‘अभाव की परिभाषा’साधन सीमित हैं और उनके वैकल्पिक उपयोग हैं। अर्थशास्त्र यह अध्ययन है कि दुर्लभ साधनों का उपयोग असीमित मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कैसे किया जाए।संसाधनों की कमी वाले राज्यों (जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश) में बजट आवंटन में प्राथमिकता तय करना – शिक्षा या सड़क? स्वास्थ्य या सिंचाई?
4पॉल सैमुएलसन (सन 1948) ‘आधुनिक परिभाषा’अर्थशास्त्र यह अध्ययन है कि लोग और समाज चुनाव कैसे करते हैं, संसाधनों का उपयोग कैसे करते हैं, और मूल्य निर्धारण कैसे होता है।भारत में एक परिवार का बचत और निवेश का निर्णय, या सरकार द्वारा रक्षा बजट बनाम सामाजिक क्षेत्र बजट का चुनाव।

संघ लोक सेवा आयोग के लिए नोट: प्रारंभिक परीक्षा में प्रायः पूछा जाता है कि “किस अर्थशास्त्री ने अर्थशास्त्र को ‘विज्ञान का विज्ञान’ कहा?” या “अभाव की परिभाषा किसने दी?” इन चारों परिभाषाओं को उनके प्रतिपादकों के साथ याद रखें।

4. व्यष्टि और समष्टि अर्थशास्त्र

भारतीय अर्थव्यवस्था के अध्ययन की दो मुख्य विधियाँ हैं – व्यष्टि (Micro) और समष्टि (Macro)। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। व्यष्टि पेड़ों को देखती है, समष्टि पूरे जंगल को।

व्यष्टि अर्थशास्त्र (Microeconomics)

परिभाषा: व्यष्टि अर्थशास्त्र अर्थव्यवस्था की व्यक्तिगत इकाइयों – जैसे एक घर, एक कंपनी, एक उद्योग, एक बाज़ार – का अध्ययन करता है। यह कीमत निर्धारण, माँग-आपूर्ति, उपभोक्ता व्यवहार, उत्पादन लागत, और बाज़ार संरचनाओं (पूर्ण प्रतिस्पर्धा, एकाधिकार, अल्पाधिकार) का विश्लेषण करता है।

मुख्य प्रश्न: किसी एक वस्तु की कीमत कैसे तय होती है? एक कंपनी को कितना उत्पादन करना चाहिए? उपभोक्ता कीमत बढ़ने पर कैसे प्रतिक्रिया करता है?

भारतीय अर्थव्यवस्था से उदाहरण:

  • जब सरकार ने सन 2016 में नोटबंदी की, तो छोटे व्यापारियों (किराना दुकान, सब्जी विक्रेता) की माँग और आपूर्ति पर क्या प्रभाव पड़ा? यह व्यष्टि विश्लेषण है।
  • जब एक दूरसंचार कंपनी (जियो) ने मुफ्त सेवाएँ दीं, तो अन्य कंपनियों (एयरटेल, वोडाफोन) की कीमत निर्धारण रणनीति कैसे बदली? यह भी व्यष्टि है।

समष्टि अर्थशास्त्र (Macroeconomics)

परिभाषा: समष्टि अर्थशास्त्र अर्थव्यवस्था के समग्र (aggregate) स्तर का अध्ययन करता है। यह राष्ट्रीय आय, कुल माँग, कुल आपूर्ति, मुद्रास्फीति, बेरोजगारी, आयात-निर्यात, सरकारी बजट, मुद्रा आपूर्ति, और आर्थिक वृद्धि दर जैसे बड़े चरों का विश्लेषण करता है।

मुख्य प्रश्न: पूरे देश में उत्पादन कितना है? कीमतों का सामान्य स्तर क्यों बढ़ रहा है? कितने लोग बेरोज़गार हैं? सरकार को कितना उधार लेना चाहिए?

भारतीय अर्थव्यवस्था से उदाहरण:

  • सन 2024-25 के केंद्रीय बजट में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 4.9% रखा गया। इसका अर्थव्यवस्था पर प्रभाव – ब्याज दरें, निजी निवेश, मुद्रास्फीति – समष्टि विश्लेषण का विषय है।
  • भारतीय रिजर्व बैंक ने सन 2024 में मुद्रास्फीति नियंत्रण के लिए रेपो दर को 6.5% पर स्थिर रखा। इस निर्णय का पूरी अर्थव्यवस्था पर प्रभाव – यह समष्टि है।

व्यष्टि और समष्टि में अंतर – एक तालिका

आधारव्यष्टि अर्थशास्त्रसमष्टि अर्थशास्त्र
इकाईव्यक्तिगत (घर, कंपनी)समग्र (राष्ट्रीय स्तर)
उद्देश्यसंसाधनों का कुशल आवंटनस्थिरता, वृद्धि, पूर्ण रोज़गार
चरकीमत, माँग, आपूर्ति, लागतसकल घरेलू उत्पाद, मुद्रास्फीति, बेरोजगारी
केंद्र बिंदुबाज़ार तंत्रराष्ट्रीय आय और रोज़गार
प्रसिद्ध सिद्धांतमूल्य सिद्धांतआय और रोज़गार सिद्धांत (कीनेस)

संघ लोक सेवा आयोग प्रारंभिक परीक्षा युक्ति: यदि प्रश्न में ‘कीमत निर्धारण’, ‘उपभोक्ता संतुलन’, ‘फर्म का उत्पादन निर्णय’, ‘बाज़ार संरचना’ आए तो वह व्यष्टि है। यदि ‘सकल घरेलू उत्पाद’, ‘मुद्रास्फीति’, ‘राजकोषीय घाटा’, ‘मौद्रिक नीति’, ‘चालू खाता घाटा’ आए तो समष्टि है।

5. अर्थव्यवस्था क्या है?

‘अर्थव्यवस्था’ शब्द सुनते ही अक्सर हमारे दिमाग में बैंक, शेयर बाज़ार, बजट, महँगाई जैसी चीज़ें आती हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था की सबसे सरल परिभाषा यह है – यह एक ऐसा तंत्र है जो यह तय करता है कि समाज के पास मौजूद सीमित संसाधनों का उपयोग करके क्या उत्पादन किया जाए, कैसे उत्पादन किया जाए, और किसके लिए उत्पादन किया जाए।

तीन मूलभूत प्रश्न:

  1. क्या उत्पादन होगा? – क्या सरकार रक्षा उपकरण बनाएगी या स्कूल बनाएगी? क्या किसान गेहूँ उगाएगा या सेब? यह प्रश्न प्राथमिकताओं को दर्शाता है।
  2. कैसे उत्पादन होगा? – उत्पादन के लिए श्रम-प्रधान तकनीक अपनाई जाएगी या पूँजी-प्रधान? भारत में अधिक श्रमिक हैं, इसलिए श्रम-प्रधान तकनीक अधिक रोज़गार देती है। लेकिन पूँजी-प्रधान तकनीक अधिक कुशल होती है। यह एक दुविधा है।
  3. किसके लिए उत्पादन होगा? – उत्पादित वस्तुएँ और सेवाएँ कैसे वितरित होंगी? क्या अमीरों को अधिक मिलेगा या गरीबों को? क्या शहरों को अधिक मिलेगा या गाँवों को?

भारतीय अर्थव्यवस्था इन तीनों प्रश्नों का उत्तर मिश्रित अर्थव्यवस्था के ढांचे में देती है। इसका मतलब है कि कुछ निर्णय बाज़ार (माँग और आपूर्ति) लेता है, और कुछ निर्णय सरकार (योजना, नीतियाँ, सार्वजनिक वितरण) लेती है। उदाहरण के लिए, मोबाइल फोन का उत्पादन और कीमत बाज़ार तय करता है, लेकिन राशन की दुकानों में गरीबों को सस्ता अनाज देने का निर्णय सरकार लेती है।

6. अर्थव्यवस्था के क्षेत्र (प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक, चतुर्थक, पंचम)

भारतीय अर्थव्यवस्था को उत्पादन की प्रकृति के आधार पर पाँच क्षेत्रों में बाँटा गया है। यह वर्गीकरण संघ लोक सेवा आयोग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रश्न प्रायः रोज़गार और सकल घरेलू उत्पाद में योगदान के आधार पर पूछे जाते हैं। सन 2024-25 के अनुमानित आँकड़े नीचे दिए गए हैं।

1. प्राथमिक क्षेत्र (Primary Sector)

परिभाषा: इस क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों का सीधे दोहन किया जाता है। यह ‘प्रकृति से सीधा लेना’ है। इसमें कोई विनिर्माण नहीं होता, केवल निष्कर्षण या उत्पादन होता है।

उदाहरण: कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, वानिकी, खनन, उत्खनन।

भारत में स्थिति:

  • सकल घरेलू उत्पाद में योगदान: लगभग 18%
  • रोज़गार में योगदान: लगभग 45% (सबसे अधिक)
  • मुख्य चुनौतियाँ: छोटे और सीमांत किसान, जलवायु पर निर्भरता, कम उत्पादकता, कृषि सुधारों का अधूरा कार्यान्वयन।

वर्तमान घटना (सन 2025): सरकार ने ‘डिजिटल कृषि मिशन’ शुरू किया है, जिसके तहत किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड, मौसम पूर्वानुमान, और बाज़ार मूल्य की जानकारी मोबाइल पर दी जा रही है।

2. द्वितीयक क्षेत्र (Secondary Sector)

परिभाषा: इस क्षेत्र में कच्चे माल को तैयार माल में बदला जाता है। यह विनिर्माण और निर्माण का क्षेत्र है। प्राथमिक क्षेत्र से प्राप्त कच्चे माल को मूल्यवान उत्पादों में रूपांतरित किया जाता है।

उदाहरण: कपड़ा उद्योग (रूई से कपड़ा), इस्पात उद्योग (लौह अयस्क से इस्पात), ऑटोमोबाइल विनिर्माण, सीमेंट, रसायन, खाद्य प्रसंस्करण, निर्माण (सड़क, पुल, भवन)।

भारत में स्थिति:

  • सकल घरेलू उत्पाद में योगदान: लगभग 28%
  • रोज़गार में योगदान: लगभग 20%
  • सरकारी पहल: ‘भारत में बनाओ’ (Make in India), उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजना, राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली।

वर्तमान घटना (सन 2024-25): उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना के तहत 14 क्षेत्रों (इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाएँ, ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल, इस्पात आदि) में ₹1.97 लाख करोड़ का निवेश किया गया है। इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन उत्पादक बन गया है।

3. तृतीयक क्षेत्र (Tertiary Sector) – सेवा क्षेत्र

परिभाषा: यह क्षेत्र वस्तुओं का उत्पादन नहीं करता, बल्कि सेवाएँ प्रदान करता है। यह अर्थव्यवस्था का सबसे गतिशील और तेजी से बढ़ने वाला क्षेत्र है।

उदाहरण: व्यापार (थोक और खुदरा), बैंकिंग, वित्तीय सेवाएँ, बीमा, परिवहन, भंडारण, संचार, आतिथ्य (होटल, रेस्तरां), पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सूचना प्रौद्योगिकी सेवाएँ, आउटसोर्सिंग, मनोरंजन।

भारत में स्थिति:

  • सकल घरेलू उत्पाद में योगदान: लगभग 55% (सबसे अधिक)
  • रोज़गार में योगदान: लगभग 30%
  • मुख्य विशेषता: भारत को ‘विश्व की बैक ऑफिस’ कहा जाता है। सूचना प्रौद्योगिकी और व्यावसायिक प्रक्रिया आउटसोर्सिंग सेवाएँ भारत का प्रमुख निर्यात हैं।

वर्तमान घटना (सन 2025): भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग का कुल राजस्व सन 2024-25 में $254 बिलियन पार कर गया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग सेवाओं में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है।

4. चतुर्थक क्षेत्र (Quaternary Sector)

परिभाषा: यह सेवा क्षेत्र का उप-भाग है, लेकिन इसमें ज्ञान-आधारित, बौद्धिक और उच्च-कौशल वाली सेवाएँ शामिल हैं। यह सूचना, प्रौद्योगिकी, अनुसंधान और विकास, और परामर्श पर केंद्रित है।

उदाहरण: अनुसंधान एवं विकास (R&D), सूचना प्रौद्योगिकी परामर्श, डेटा एनालिटिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकास, शिक्षा (उच्च शिक्षा और अनुसंधान), मीडिया और प्रकाशन, वित्तीय परामर्श, विपणन अनुसंधान।

भारत में स्थिति:

  • यह क्षेत्र तीव्र गति से बढ़ रहा है।
  • ‘स्टार्टअप इंडिया’ पहल ने नवाचार को बढ़ावा दिया है। भारत अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है (100,000 से अधिक पंजीकृत स्टार्टअप)।
  • राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (NRF) की स्थापना सन 2023 में की गई थी, जिसका बजट ₹50,000 करोड़ है।

5. पंचम क्षेत्र (Quinary Sector)

परिभाषा: यह उच्चतम स्तर का क्षेत्र है, जिसमें सबसे अधिक कुशल और उच्च-स्तरीय निर्णय लेने वाली सेवाएँ शामिल हैं। इसे ‘गोल्ड कॉलर’ श्रम भी कहा जाता है।

उदाहरण: शीर्ष सरकारी अधिकारी (मंत्री, सचिव, न्यायाधीश), मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO), वैज्ञानिक, अंतरिक्ष वैज्ञानिक (इसरो), परमाणु वैज्ञानिक, रणनीतिक योजनाकार, शीर्ष प्रबंधन सलाहकार।

भारत में स्थिति:

  • यह क्षेत्र संख्या में छोटा है लेकिन प्रभाव में बहुत बड़ा है।
  • भारत के अंतरिक्ष मिशन (चंद्रयान-3, आदित्य-एल1, गगनयान) इसी क्षेत्र की देन हैं।
  • रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO), भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO), भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) इस क्षेत्र के प्रमुख संस्थान हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था


वैकल्पिक पाठ: भारतीय अर्थव्यवस्था के प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक, चतुर्थक और पंचम क्षेत्रों का योजनाबद्ध चित्रण जिसमें प्रत्येक क्षेत्र के मुख्य उद्योग दिखाए गए हैं

7. आर्थिक प्रणालियाँ (बाज़ार, गैर-बाज़ार, मिश्रित)

भारतीय अर्थव्यवस्था किस प्रणाली पर चलती है, यह समझने के लिए हमें पहले तीन मुख्य प्रणालियों को जानना होगा। प्रत्येक प्रणाली इस प्रश्न का उत्तर देती है – “उत्पादन, वितरण और उपभोग के निर्णय कौन लेता है?”

क्रमप्रणालीनिर्णय लेने वालामुख्य विशेषताएँलाभहानिउदाहरण देश
1बाज़ार अर्थव्यवस्था (पूँजीवाद)बाज़ार तंत्र (माँग-आपूर्ति)निजी संपत्ति, लाभ का अधिकार, मुक्त प्रतिस्पर्धा, न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेपदक्षता, नवाचार, उपभोक्ता संप्रभुता, उच्च वृद्धिअसमानता, एकाधिकार, सार्वजनिक वस्तुओं की कमी, आर्थिक चक्र (मंदी)संयुक्त राज्य अमेरिका (अधिकांशतः), यूनाइटेड किंगडम
2गैर-बाज़ार अर्थव्यवस्था (समाजवाद/कमांड)केंद्रीय योजना प्राधिकरण (सरकार)सार्वजनिक स्वामित्व, केंद्रीय योजना, कीमतें सरकार तय करती है, निजी संपत्ति सीमित या निषिद्धसमानता, बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति, बेरोजगारी कम, सामाजिक सुरक्षाअक्षमता, प्रोत्साहन की कमी, कालाबाजारी, आपूर्ति की कमी, नवाचार का अभावउत्तर कोरिया, क्यूबा, पूर्व सोवियत संघ (अब नहीं)
3मिश्रित अर्थव्यवस्थाबाज़ार + सरकार दोनोंनिजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्र, सरकार रणनीतिक क्षेत्रों में, बाज़ार अन्य में, सरकार सुधारात्मक नीतियाँ बनाती हैदक्षता और समानता का संतुलन, बाज़ार की विफलताओं का सुधार, सामाजिक कल्याणदोनों के नुकसान संभव (यदि संतुलन बिगड़े), नौकरशाही विलंब, भ्रष्टाचारभारत, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा

भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था का विकास

सन 1947 से 1991 (समाजवादी झुकाव): स्वतंत्रता के बाद भारत ने समाजवादी पैटर्न अपनाया। योजना आयोग के माध्यम से पंचवर्षीय योजनाएँ बनाई गईं। लाइसेंस राज के तहत उद्योगों को सरकारी अनुमति लेनी पड़ती थी। सार्वजनिक क्षेत्र को प्रमुखता दी गई। इस अवधि में विकास दर लगभग 3.5% (हिंदू विकास दर) रही, जो बहुत कम थी।

सन 1991 (आर्थिक सुधार): भुगतान संतुलन संकट के कारण भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियाँ लागू कीं। लाइसेंस राज समाप्त किया गया। कई क्षेत्र (दूरसंचार, विमानन, बैंकिंग) निजी क्षेत्र के लिए खोल दिए गए। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का निजीकरण शुरू हुआ। विकास दर बढ़कर 6-8% हो गई।

सन 2025 की स्थिति: भारत में अब भी मिश्रित अर्थव्यवस्था है, लेकिन बाज़ार की भूमिका 1991 से पहले की तुलना में कहीं अधिक है। सरकार अब भी रणनीतिक क्षेत्रों (रेलवे, रक्षा उत्पादन, परमाणु ऊर्जा, डाक सेवा) में मौजूद है। साथ ही, सरकार सामाजिक क्षेत्र (शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा) में बड़े पैमाने पर व्यय करती है।

उदाहरण: दूरसंचार क्षेत्र में बाज़ार पूरी तरह से निर्णय लेता है (कीमतें, सेवाएँ), लेकिन सरकार नियामक (दूरसंचार नियामक प्राधिकरण) के माध्यम से उपभोक्ता हितों की रक्षा करती है। वहीं, रेलवे में सरकार ही सेवा प्रदाता है और कीमतें भी सरकार तय करती है।

8. वाशिंगटन सहमति (Washington Consensus – सन 1989)

सन 1989 में, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक और अमेरिकी ट्रेजरी के अर्थशास्त्रियों ने लैटिन अमेरिकी देशों (जो ऋण संकट में थे) के लिए नीतियों का एक सेट तैयार किया। इसे ‘वाशिंगटन सहमति’ कहा गया क्योंकि ये संस्थाएँ वाशिंगटन डी.सी. में स्थित हैं। इसका मूल सूत्र था – “बाज़ार को स्वतंत्र छोड़ो, सरकार का हस्तक्षेप न्यूनतम करो।”

दस सूत्रीय नीति (वाशिंगटन सहमति)

क्रमनीतिस्पष्टीकरण
1राजकोषीय अनुशासनसरकार का घाटा कम होना चाहिए (सकल घरेलू उत्पाद के 3% से कम)
2सार्वजनिक व्यय को पुनः प्राथमिकतास्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढाँचे पर खर्च बढ़ाएँ, सब्सिडी घटाएँ
3कर सुधारकम कर दरें, व्यापक कर आधार
4ब्याज दर उदारीकरणब्याज दरें बाज़ार द्वारा निर्धारित हों, सरकारी नियंत्रण नहीं
5प्रतिस्पर्धी विनिमय दरमुद्रा का मूल्य बाज़ार तय करे, कृत्रिम अवमूल्यन नहीं
6व्यापार उदारीकरणआयात शुल्क कम करें, व्यापार बाधाएँ हटाएँ
7प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का स्वागतविदेशी कंपनियों को देश में निवेश की अनुमति
8निजीकरणसरकारी उद्यमों को निजी क्षेत्र को बेचें
9विनियमन हटानाउद्योगों पर सरकारी नियंत्रण (लाइसेंस, परमिट) समाप्त करें
10संपत्ति अधिकारनिजी संपत्ति के अधिकारों की कानूनी सुरक्षा

भारत पर प्रभाव

भारतीय अर्थव्यवस्था ने सन 1991 में वाशिंगटन सहमति के सिद्धांतों को अपनाया। तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने ऐतिहासिक बजट पेश किया जिसमें:

  • लाइसेंस राज समाप्त किया गया
  • आयात शुल्क में भारी कटौती की गई
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए कई क्षेत्र खोले गए
  • सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का निजीकरण शुरू हुआ
  • रुपये का अवमूल्यन किया गया और बाद में परिवर्तनीय बनाया गया

परिणाम: सन 1991 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर बढ़कर 6-8% हो गई। विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा। सेवा क्षेत्र में उछाल आया। लेकिन आलोचना यह भी हुई कि इन नीतियों ने असमानता बढ़ाई और गरीब कल्याण पर खर्च कम किया।

9. बीजिंग सहमति (Beijing Consensus – सन 2004)

सन 2004 में अमेरिकी अर्थशास्त्री जोशुआ कूपर रामो ने ‘बीजिंग सहमति’ शब्द गढ़ा। यह चीन की विकास रणनीति पर आधारित थी, जो वाशिंगटन सहमति से बिल्कुल अलग थी। चीन ने बाज़ार सुधार तो किए, लेकिन अपनी गति और तरीके से, और राज्य की मजबूत भूमिका बनाए रखी।

बीजिंग सहमति के मुख्य सिद्धांत

  1. नवाचार और प्रौद्योगिकी: केवल पश्चिमी देशों की नकल करने के बजाय, चीन ने मौलिक अनुसंधान और नवाचार पर जोर दिया। उसने अंतरिक्ष, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग में बड़े निवेश किए।
  2. सतत विकास: वृद्धि की गुणवत्ता पर ध्यान, मात्रा पर नहीं। पर्यावरणीय क्षरण को कम करना और सामाजिक स्थिरता बनाए रखना।
  3. आत्मनिर्भरता: विदेशी ऋण और विदेशी पूँजी पर निर्भरता कम करना। चीन ने अपनी बचत दर उच्च रखी और विदेशी मुद्रा भंडार बनाए।
  4. राज्य की सक्रिय भूमिका: बाज़ार को छोड़ने के बजाय, राज्य ने उद्योगों को मार्गदर्शन दिया। ‘स्टेट-कैपिटलिज्म’ – जहाँ राज्य रणनीतिक क्षेत्रों में नियंत्रण रखता है लेकिन बाज़ार तंत्र को काम करने देता है।

भारत के लिए प्रासंगिकता

भारतीय अर्थव्यवस्था ने सन 2020 में ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान शुरू किया, जो बीजिंग सहमति के कई तत्वों को दर्शाता है:

  • उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजना: चीनी मॉडल की तरह, भारत ने विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन दिया।
  • आयात प्रतिस्थापन: कुछ क्षेत्रों में आयात कम करके घरेलू उत्पादन बढ़ाना (जैसे रक्षा उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक्स)।
  • डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढाँचा: यूपीआई, आधार, कोविन – ये चीन की तरह राज्य-संचालित प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म हैं।
  • विदेशी मुद्रा भंडार: भारत ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार को $650 बिलियन से अधिक बढ़ा लिया है, जो चीन के बाद दुनिया में चौथा सबसे बड़ा है।

10. सैंटियागो सहमति (Santiago Consensus)

यह सहमति सन 1990 के दशक के अंत में चिली और अन्य लैटिन अमेरिकी देशों (जैसे ब्राजील, अर्जेंटीना) द्वारा विकसित की गई। यह वाशिंगटन सहमति की विफलताओं की प्रतिक्रिया थी। लैटिन अमेरिका में वाशिंगटन सहमति ने विकास तो दिया, लेकिन असमानता, गरीबी और वित्तीय संकट भी बढ़ाए। सैंटियागो सहमति ने ‘समावेशी विकास’ पर जोर दिया।

मुख्य बिंदु

  1. सामाजिक समावेशन (Social Inclusion): विकास का लाभ सभी वर्गों, विशेषकर गरीबों और हाशिए पर मौजूद समूहों तक पहुँचे।
  2. लोकतांत्रिक शासन: पारदर्शिता, जवाबदेही, और नागरिक भागीदारी।
  3. पर्यावरणीय स्थिरता: विकास पर्यावरण को नष्ट न करे। हरित विकास।
  4. विकास के साथ समानता: केवल सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि नहीं, बल्कि आय वितरण में सुधार भी आवश्यक।

भारत में सैंटियागो सहमति के तत्व

भारतीय अर्थव्यवस्था में सामाजिक समावेशन की नीतियाँ स्पष्ट दिखती हैं:

  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (MGNREGA): ग्रामीण परिवारों को 100 दिन का रोज़गार गारंटी देता है। यह सामाजिक समावेशन का सबसे बड़ा उदाहरण है।
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) 2013: 81 करोड़ से अधिक लोगों को सब्सिडी वाला अनाज प्रदान करता है।
  • आयुष्मान भारत: 60 करोड़ से अधिक गरीब परिवारों को ₹5 लाख तक का मुफ्त स्वास्थ्य बीमा।
  • दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (DDU-GKY): ग्रामीण गरीब युवाओं को कौशल प्रशिक्षण।
  • सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास: यह नारा सैंटियागो सहमति के सामाजिक समावेशन के सिद्धांत को दर्शाता है।

11. पूँजीवाद – संवृद्धि प्रोत्साहन का एक साधन

पूँजीवाद (Capitalism) एक आर्थिक प्रणाली है जिसमें उत्पादन के साधन (भूमि, कारखाने, मशीनरी) निजी स्वामित्व में होते हैं, और निवेश, उत्पादन, वितरण, कीमतें बाज़ार तंत्र (माँग-आपूर्ति) द्वारा निर्धारित होती हैं। लाभ कमाना मुख्य प्रेरणा है।

पूँजीवाद के मूल तत्व

  1. निजी संपत्ति का अधिकार: व्यक्ति को संपत्ति अर्जित करने, उसका उपयोग करने और उसे हस्तांतरित करने का अधिकार।
  2. लाभ का अधिकार: व्यवसायी लाभ कमा सकते हैं, जो निवेश और नवाचार को प्रोत्साहित करता है।
  3. मुक्त प्रतिस्पर्धा: कोई भी व्यक्ति कोई भी व्यवसाय शुरू कर सकता है। प्रतिस्पर्धा से गुणवत्ता बढ़ती है और कीमतें घटती हैं।
  4. सीमित सरकारी हस्तक्षेप: सरकार केवल नियामक और प्रवर्तक की भूमिका निभाती है, निर्णय नहीं लेती।

एडम स्मिथ का ‘अदृश्य हाथ’ सिद्धांत

एडम स्मिथ ने अपनी पुस्तक “द वेल्थ ऑफ नेशंस” (सन 1776) में कहा कि जब हर व्यक्ति अपने निजी लाभ के लिए काम करता है, तो एक ‘अदृश्य हाथ’ (invisible hand) समाज के लिए सर्वोत्तम परिणाम सुनिश्चित करता है। उदाहरण के लिए, एक बेकर केवल पैसे कमाने के लिए रोटी बनाता है, लेकिन इससे लोगों को खाना मिल जाता है। उसे समाज सेवा का कोई इरादा नहीं होता, फिर भी समाज लाभान्वित होता है।

भारत में पूँजीवाद

भारतीय अर्थव्यवस्था में पूँजीवाद ने सन 1991 के बाद जोर पकड़ा। परिणाम:

  • सकारात्मक: सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर सन 1991-2025 के बीच औसतन 6-7% रही। मुकेश अंबानी, गौतम अडानी, शिव नादर जैसे उद्योगपति उभरे। स्टार्टअप कल्चर बढ़ा। फॉर्च्यून 500 में भारतीय कंपनियों की संख्या बढ़ी (सन 2025 में 8 कंपनियाँ)।
  • नकारात्मक: असमानता बहुत बढ़ी। ऑक्सफैम की सन 2024 रिपोर्ट के अनुसार, भारत के शीर्ष 1% के पास देश की 40% से अधिक संपत्ति है। जबकि सबसे गरीब 50% के पास केवल 3% संपत्ति है। कॉरपोरेट एकाधिकार बढ़ा। कुछ क्षेत्रों (जैसे दूरसंचार, ई-कॉमर्स) में कुछ ही बड़ी कंपनियाँ हावी हैं।

क्या भारत में शुद्ध पूँजीवाद संभव है?

नहीं। भारतीय अर्थव्यवस्था का संविधान (निदेशक सिद्धांत) समाजवादी लक्ष्यों (समानता, कल्याण) को भी निर्देशित करता है। भारत में पूँजीवाद और समाजवाद के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया जाता है। जहाँ बाज़ार विफल होता है (जैसे सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण), वहाँ सरकार हस्तक्षेप करती है। इसलिए भारत शुद्ध पूँजीवादी नहीं, बल्कि मिश्रित अर्थव्यवस्था है।

12. राष्ट्रीय आय (GDP, NDP, GNP, NNP)

भारतीय अर्थव्यवस्था के आकार, स्वास्थ्य और वृद्धि को मापने के लिए राष्ट्रीय आय के चार मुख्य मापदंड हैं। ये संघ लोक सेवा आयोग परीक्षा में सबसे अधिक पूछे जाने वाले विषयों में से हैं। प्रत्येक मापदंड एक अलग दृष्टिकोण देता है।

चारों मापदंडों की तालिका

मापदंडपूरा नाम (हिंदी)सूत्रअर्थ (सरल भाषा में)सन 2024-25 अनुमान (₹ लाख करोड़)
GDPसकल घरेलू उत्पादसभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का बाज़ार मूल्य (भारत की भौगोलिक सीमा के अंदर)देश के भीतर एक वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य। चाहे वह भारतीय कंपनी हो या विदेशी कंपनी, लेकिन उत्पादन भारत में होना चाहिए।लगभग ₹296
NDPशुद्ध घरेलू उत्पादGDP – मूल्यह्रास (Depreciation)GDP में से पूँजी (मशीनरी, भवन, वाहन) के घिसाव और पुराने होने का मूल्य घटा दिया जाता है। यह बताता है कि देश ने वास्तव में कितनी नई संपत्ति बनाई।लगभग ₹263
GNPसकल राष्ट्रीय उत्पादGDP + विदेशों से शुद्ध साधन आय (Factor Income from Abroad)भारतीय नागरिकों और भारतीय कंपनियों द्वारा दुनिया में कहीं भी (भारत के अंदर या बाहर) उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य।लगभग ₹298
NNPशुद्ध राष्ट्रीय उत्पादGNP – मूल्यह्रास (या GNP – Depreciation)यह सबसे शुद्ध माप है। GNP में से मूल्यह्रास घटाने पर प्राप्त होता है। इसे ही ‘राष्ट्रीय आय’ (National Income) कहा जाता है।लगभग ₹265

महत्वपूर्ण सूत्र (याद रखने योग्य)

  1. GDP = निजी उपभोग व्यय + सकल घरेलू निवेश + सरकारी व्यय + (निर्यात – आयात) (खर्च विधि)
  2. GDP = प्राथमिक क्षेत्र का GVA + द्वितीयक क्षेत्र का GVA + तृतीयक क्षेत्र का GVA (उत्पादन विधि)
  3. GNP = GDP + विदेशों से शुद्ध साधन आय (NFIA)
    • यदि NFIA धनात्मक है (विदेशों से आय > विदेशों को भुगतान), तो GNP > GDP
    • यदि NFIA ऋणात्मक है, तो GNP < GDP
    • भारत में NFIA प्रायः ऋणात्मक रहा है (क्योंकि विदेशी कंपनियाँ भारत में अधिक कमाती हैं, भारतीय विदेशों में कम), इसलिए भारत का GNP सामान्यतः GDP से कम होता है।
  4. NDP = GDP – मूल्यह्रास
  5. NNP = GNP – मूल्यह्रास = राष्ट्रीय आय

मूल्यह्रास (Depreciation) क्या है?

मूल्यह्रास उत्पादन के दौरान पूँजीगत वस्तुओं (मशीनरी, उपकरण, भवन, वाहन) के घिसाव, टूट-फूट या अप्रचलन के कारण होने वाले मूल्य में कमी को कहते हैं। उदाहरण के लिए, एक ट्रक का उपयोग करने से वह घिसता है। एक साल बाद उसका मूल्य कम हो जाता है। इस कमी को मूल्यह्रास कहते हैं। राष्ट्रीय आय में से मूल्यह्रास घटाने पर हमें ‘शुद्ध’ आँकड़ा मिलता है, जो अधिक सटीक होता है।

संघ लोक सेवा आयोग प्रारंभिक परीक्षा युक्ति: प्रश्न आता है – “राष्ट्रीय आय किसे कहते हैं?” तो उत्तर है NNP (शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद)। और “सकल घरेलू उत्पाद किसे कहते हैं?” तो उत्तर है GDP

13. राष्ट्रीय आय की लागत और कीमत (Factor Cost vs Market Price)

भारतीय अर्थव्यवस्था में उत्पादन के मूल्य को दो तरीकों से मापा जाता है – लागत मूल्य पर और बाज़ार मूल्य पर। संघ लोक सेवा आयोग के लिए यह अंतर समझना बहुत जरूरी है।

लागत मूल्य (Factor Cost)

यह उत्पादन के साधनों (श्रम, भूमि, पूँजी, उद्यम) को दिया गया भुगतान है। दूसरे शब्दों में, यह उत्पादन की वास्तविक लागत है, जिसमें किसी भी प्रकार का अप्रत्यक्ष कर (जैसे जीएसटी, उत्पाद शुल्क) नहीं जुड़ा होता और न ही कोई सब्सिडी घटी होती है।

उदाहरण: मान लीजिए एक कंपनी मोबाइल फोन बनाती है। उसे कच्चा माल खरीदने में ₹5000, मजदूरी में ₹1000, बिजली में ₹500, और अन्य खर्चों में ₹500 लगते हैं। कुल उत्पादन लागत = ₹7000। यदि कंपनी को सरकार से कोई सब्सिडी नहीं मिलती, तो लागत मूल्य पर उत्पादन ₹7000 होगा।

बाज़ार मूल्य (Market Price)

यह वह कीमत है जो उपभोक्ता वस्तु खरीदते समय चुकाता है। यह लागत मूल्य में अप्रत्यक्ष कर (जैसे जीएसटी) जोड़कर और सब्सिडी घटाकर प्राप्त होता है।

सूत्र:
बाज़ार मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद = लागत मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद + (अप्रत्यक्ष कर – सब्सिडी)

उदाहरण (जारी): ऊपर के मोबाइल फोन पर यदि सरकार 18% जीएसटी लगाती है (₹1260), तो बाज़ार मूल्य = ₹7000 + ₹1260 = ₹8260। यदि सरकार कोई सब्सिडी देती है (जैसे किसानों को उर्वरक सब्सिडी, या निर्यातकों को सब्सिडी), तो वह घटा दी जाती है।

भारत में किसका उपयोग होता है?

सन 2015 से पहले, भारत लागत मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद का उपयोग करता था। लेकिन सन 2015 की संशोधित विधि के बाद, भारत अब ‘बुनियादी कीमतों पर सकल मूल्य वर्धित’ (GVA at Basic Prices) का उपयोग करता है, जो लागत मूल्य के करीब है लेकिन उत्पादन कर और सब्सिडी को सम्मिलित करता है। इसके बारे में हम अगले भाग में देखेंगे।

14. संशोधित विधि (Revised Methodology – सन 2015)

सन 2015 में भारतीय अर्थव्यवस्था के राष्ट्रीय आय मापन में एक ऐतिहासिक बदलाव हुआ। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने निम्नलिखित बदलाव किए:

क्या बदला?

  1. आधार वर्ष बदला: पुराना आधार वर्ष 2004-05 हटाकर 2011-12 लाया गया। आधार वर्ष वह वर्ष होता है जिसकी कीमतों पर स्थिर मूल्यों पर सकल घरेलू उत्पाद की गणना की जाती है।
  2. नया सूत्र अपनाया: पुरानी ‘लागत मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद’ की जगह ‘बुनियादी कीमतों पर सकल मूल्य वर्धित (GVA)’ को मुख्य मापदंड बनाया गया।
  3. डेटा स्रोत बढ़ाए: अब सिर्फ सरकारी सर्वेक्षणों पर निर्भरता नहीं। नए डेटा स्रोत जोड़े गए:
    • एमसीए-21 डेटाबेस: कंपनियों के वित्तीय विवरण
    • जीएसटी डेटा: व्यापारिक लेनदेन
    • ई-वे बिल: माल की आवाजाही
    • क्रेडिट कार्ड लेनदेन: उपभोग व्यय
    • बैंकिंग लेनदेन
    • स्टार्टअप और ई-कॉमर्स डेटा
  4. अर्थव्यवस्था के नए क्षेत्र जोड़े: पहले जिन क्षेत्रों को मापा नहीं जाता था (जैसे स्टार्टअप, गिग इकॉनमी, ई-कॉमर्स, डिजिटल सेवाएँ), उन्हें शामिल किया गया।

संशोधित विधि का प्रभाव

  • सकारात्मक: सकल घरेलू उत्पाद के आँकड़े अधिक सटीक और व्यापक हो गए। पहले की तुलना में सकल घरेलू उत्पाद का स्तर लगभग 2.5% ऊपर संशोधित किया गया (सन 2013-14 के लिए)।
  • नकारात्मक: आलोचकों का कहना है कि 2011-12 अब बहुत पुराना आधार वर्ष हो गया है। इसके बाद से अर्थव्यवस्था में बहुत बदलाव आया है – जीएसटी लागू हुआ, नोटबंदी हुई, कोविड-19 महामारी आई, डिजिटल अर्थव्यवस्था बहुत बढ़ी। इसलिए नए आधार वर्ष (संभवतः 2022-23 या 2023-24) की आवश्यकता है। सन 2026 तक नया आधार वर्ष आने की संभावना है।

15. GVA और GDP की तुलना (GVA vs GDP)

सन 2015 के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था में ‘सकल मूल्य वर्धित’ (GVA – Gross Value Added) शब्द बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। यह समझना आवश्यक है कि GVA और GDP में क्या अंतर है।

GVA क्या है?

सकल मूल्य वर्धित (GVA) किसी क्षेत्र (जैसे कृषि, विनिर्माण, सेवाएँ) द्वारा उत्पादन के दौरान जोड़ा गया अतिरिक्त मूल्य है। सरल शब्दों में, GVA = उत्पादन का मूल्य – मध्यवर्ती उपभोग (Intermediate Consumption)।

उदाहरण: एक बेकरी 100 रुपये में आटा खरीदती है और उससे ब्रेड बनाकर 250 रुपये में बेचती है। तो बेकरी का GVA = ₹250 – ₹100 = ₹150 (यह बेकरी द्वारा जोड़ा गया मूल्य है)।

GVA और GDP के बीच संबंध

GDP = सभी क्षेत्रों के GVA का योग + (अप्रत्यक्ष कर – सब्सिडी)

या

GDP = कुल GVA + शुद्ध अप्रत्यक्ष कर (Net Indirect Taxes)

तुलना तालिका (GVA बनाम GDP)

आधारGVA (सकल मूल्य वर्धित)GDP (सकल घरेलू उत्पाद)
अर्थउत्पादन के प्रत्येक चरण में जोड़ा गया मूल्यअंतिम वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य
दृष्टिकोणउत्पादन-केंद्रित (Production-based)उपभोग-केंद्रित (Consumption-based)
सूत्रउत्पादन मूल्य – मध्यवर्ती उपभोगC + I + G + (X-M) या सभी क्षेत्रों के GVA + शुद्ध अप्रत्यक्ष कर
उपयोगयह बताता है कि कृषि, उद्योग, सेवा – किस क्षेत्र ने कितना योगदान दियायह अर्थव्यवस्था के समग्र आकार और वृद्धि को दर्शाता है
कर और सब्सिडी का प्रभावमूल GVA पर कर और सब्सिडी का प्रभाव नहीं होता (बुनियादी कीमतों पर GVA में उत्पादन कर और सब्सिडी शामिल होती है)GDP पर अप्रत्यक्ष कर और सब्सिडी का सीधा प्रभाव पड़ता है

भारत में किसे अधिक महत्व दिया जाता है?

सन 2015 के बाद, भारतीय अर्थव्यवस्था के आधिकारिक आँकड़ों में GVA को प्राथमिकता दी जाती है। जब सरकार कहती है कि “कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 4% रही”, तो यह कृषि क्षेत्र के GVA वृद्धि को संदर्भित करता है। GDP का उपयोग अभी भी अंतरराष्ट्रीय तुलना और समग्र वृद्धि दर बताने के लिए किया जाता है।

संघ लोक सेवा आयोग प्रारंभिक परीक्षा युक्ति: प्रश्न में पूछा जा सकता है – “भारत में राष्ट्रीय आय की गणना के लिए किस विधि का उपयोग किया जाता है?” उत्तर: बुनियादी कीमतों पर GVA विधि। और “कौन सा मापदंड क्षेत्रवार योगदान बताता है?” उत्तर: GVA।

16. स्थिर-आधार से शृंखला-आधार विधियाँ (Fixed Base vs Chain Base)

राष्ट्रीय आय की गणना करते समय दो विधियाँ होती हैं – स्थिर-आधार (Fixed Base) और शृंखला-आधार (Chain Base)। भारतीय अर्थव्यवस्था वर्तमान में स्थिर-आधार विधि (2011-12 आधार वर्ष) का उपयोग कर रही है, लेकिन शृंखला-आधार विधि की ओर बढ़ने की योजना है।

स्थिर-आधार विधि (Fixed Base Method)

इस विधि में एक वर्ष को ‘आधार वर्ष’ चुना जाता है (जैसे 2011-12)। उस वर्ष की कीमतों का उपयोग करके अन्य सभी वर्षों के सकल घरेलू उत्पाद की गणना की जाती है। इससे मुद्रास्फीति का प्रभाव समाप्त हो जाता है और हम वास्तविक वृद्धि देख पाते हैं।

उदाहरण: यदि हम 2024-25 का सकल घरेलू उत्पाद 2011-12 की कीमतों पर निकालते हैं, तो यह ‘स्थिर कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद’ कहलाता है।

लाभ: सरल और तुलनात्मक। लंबी अवधि के रुझान देख सकते हैं।

हानि: समय के साथ कीमतों में बदलाव, नए उत्पादों का आगमन, तकनीकी परिवर्तन, और उपभोग पैटर्न में बदलाव के कारण आधार वर्ष पुराना पड़ जाता है। 2011-12 के बाद से भारत में जीएसटी लागू हुआ, डिजिटल भुगतान बढ़ा, ई-कॉमर्स आया – इन सबका प्रतिनिधित्व पुराना आधार वर्ष ठीक से नहीं करता।

शृंखला-आधार विधि (Chain Base Method)

इस विधि में आधार वर्ष हर साल बदलता है। दूसरे शब्दों में, पिछले वर्ष की कीमतों पर चालू वर्ष के सकल घरेलू उत्पाद की गणना की जाती है। फिर इन वार्षिक आँकड़ों को एक ‘शृंखला’ में जोड़ दिया जाता है।

उदाहरण:

  • 2022-23 का सकल घरेलू उत्पाद 2021-22 की कीमतों पर
  • 2023-24 का सकल घरेलू उत्पाद 2022-23 की कीमतों पर
  • 2024-25 का सकल घरेलू उत्पाद 2023-24 की कीमतों पर

लाभ: यह अधिक सटीक होता है क्योंकि यह हर साल बदलते उपभोग पैटर्न, नए उत्पादों, और कीमतों को ध्यान में रखता है।

हानि: गणना जटिल है। लंबी अवधि की तुलना करने में कठिनाई होती है क्योंकि आधार बदलता रहता है।

भारत की स्थिति

भारतीय अर्थव्यवस्था अभी स्थिर-आधार विधि (2011-12) का उपयोग कर रही है। हालाँकि, सन 2019 में सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने एक समिति बनाई थी जिसने शृंखला-आधार विधि अपनाने की सिफारिश की थी। सन 2026 के आसपास, जब नया आधार वर्ष (संभवतः 2022-23) लागू होगा, तब भारत शृंखला-आधार विधि की ओर बढ़ सकता है। संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश पहले से ही शृंखला-आधार विधि का उपयोग करते हैं।

17. आर्थिक सांख्यिकी पर स्थायी समिति (Standing Committee on Economic Statistics – SCES)

भारतीय अर्थव्यवस्था के आँकड़ों की गुणवत्ता, विश्वसनीयता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने विभिन्न समितियाँ बनाई हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण समिति है ‘आर्थिक सांख्यिकी पर स्थायी समिति’ (SCES)।

गठन और इतिहास

  • प्रथम गठन: सन 2019 में, राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के अधीन।
  • पुनर्गठन: सन 2024 में, सरकार ने इस समिति का पुनर्गठन किया।
  • वर्तमान अध्यक्ष: प्रोफेसर राजीव मेहता (प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज, नई दिल्ली के निदेशक)।

कार्य और जिम्मेदारियाँ

  1. आँकड़ों की समीक्षा: राष्ट्रीय आय (GDP, GVA), औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP), उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI), थोक मूल्य सूचकांक (WPI) जैसे प्रमुख आर्थिक संकेतकों की सांख्यिकीय पद्धतियों और आँकड़ों की समीक्षा करना।
  2. नए डेटा स्रोत सुझाना: परंपरागत सर्वेक्षणों के अलावा, प्रशासनिक डेटा (जैसे जीएसटी, बैंकिंग, ई-वे बिल, उपग्रह डेटा) के उपयोग की सिफारिश करना।
  3. अनौपचारिक क्षेत्र का मापन: भारत में अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (जिसमें 90% से अधिक रोज़गार है) का सटीक मापन करने के तरीके सुझाना।
  4. अंतरराष्ट्रीय मानकों से तालमेल: संयुक्त राष्ट्र के राष्ट्रीय आय लेखा प्रणाली (SNA) मानकों के अनुरूप भारतीय आँकड़ों को ढालना।

महत्व

भारतीय अर्थव्यवस्था के आँकड़ों पर अक्सर विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठते रहे हैं (जैसे सन 2018 में सकल घरेलू उत्पाद के आँकड़ों पर विवाद)। इस समिति की सिफारिशों से आँकड़ों की विश्वसनीयता बढ़ती है और नीति निर्माण को सही दिशा मिलती है। संघ लोक सेवा आयोग परीक्षा के लिए यह जानना उपयोगी है कि कौन सी संस्था किस डेटा के लिए जिम्मेदार है।

18. लाभ और हानि (वर्तमान भारतीय आर्थिक मॉडल के)

भारतीय अर्थव्यवस्था के वर्तमान मॉडल (मिश्रित अर्थव्यवस्था, उदारीकरण के साथ) के निम्नलिखित लाभ और हानियाँ हैं। यह विश्लेषण संघ लोक सेवा आयोग मुख्य परीक्षा में ‘मूल्यांकन’ वाले प्रश्नों के लिए उपयोगी है।

लाभ (Advantages)

  1. तेज़ विकास दर: सन 2023-24 में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 8.2% रही, जो दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक थी। सन 2024-25 में यह 6.5-7% के आसपास रहने का अनुमान है।
  2. डिजिटल बुनियादी ढाँचा: यूपीआई (एकीकृत भुगतान इंटरफेस) ने डिजिटल भुगतान में क्रांति ला दी। सन 2025 में यूपीआई से 20,000 करोड़ से अधिक लेनदेन हुए। डिजीलॉकर, ई-संजीवनी, कोविन जैसे प्लेटफॉर्म डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे के उदाहरण हैं।
  3. युवा जनसांख्यिकी: भारत की औसत आयु लगभग 29 वर्ष है, जबकि चीन और जापान जैसे देशों में यह अधिक है (चीन में 39, जापान में 48)। यह ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ अर्थव्यवस्था को अगले दो-तीन दशकों तक श्रम शक्ति प्रदान करेगा।
  4. विदेशी मुद्रा भंडार: सन 2025 की शुरुआत में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार $650 बिलियन से अधिक था, जो चीन, जापान और स्विट्जरलैंड के बाद दुनिया में चौथा सबसे बड़ा है। यह आर्थिक सुरक्षा कवच का काम करता है।
  5. स्टार्टअप इकोसिस्टम: भारत में 100,000 से अधिक स्टार्टअप पंजीकृत हैं, जिनमें से 100 से अधिक यूनिकॉर्न (1 बिलियन डॉलर से अधिक मूल्य की कंपनियाँ) हैं। यह संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बाद दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है।

हानि (Disadvantages)

  1. बेरोज़गारी: भारतीय अर्थव्यवस्था में बेरोज़गारी एक गंभीर समस्या है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के अनुसार, सन 2024 में शहरी बेरोज़गारी 8-9% के आसपास रही। युवाओं (15-29 वर्ष) में बेरोज़गारी दर और भी अधिक है, लगभग 20%।
  2. आय असमानता: अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ रही है। जिनी गुणांक (Gini Coefficient – असमानता मापने का सूचकांक) लगभग 0.45 है (0 पूर्ण समानता, 1 पूर्ण असमानता)। विश्व असमानता रिपोर्ट 2024 के अनुसार, भारत के शीर्ष 10% के पास देश की कुल संपत्ति का 60% से अधिक है।
  3. कृषि संकट: कृषि क्षेत्र में किसानों की आय स्थिर या घट रही है। फसल की कीमतें स्थिर नहीं हैं। उर्वरक सब्सिडी में सरकार पर भारी बोझ है (सन 2024-25 में ₹1.5 लाख करोड़ से अधिक)। छोटे और सीमांत किसान (85% किसान) सबसे अधिक प्रभावित हैं।
  4. स्वास्थ्य और शिक्षा पर कम व्यय: भारतीय अर्थव्यवस्था का सकल घरेलू उत्पाद का केवल 1.5-2% ही स्वास्थ्य पर खर्च होता है, जबकि विकसित देशों में यह 5-6% है। शिक्षा पर भी GDP का लगभग 3% ही खर्च होता है। इससे मानव विकास सूचकांक (HDI) में भारत की रैंकिंग खराब होती है (सन 2024 में 134वाँ स्थान)।
  5. जलवायु परिवर्तन का जोखिम: भारत जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। सन 2024-25 में असामान्य बारिश, गर्मी की लहरों (हीटवेव), और चक्रवातों से फसलों को भारी नुकसान हुआ। विश्व बैंक के अनुमान के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से भारत के सकल घरेलू उत्पाद पर सालाना 2-3% का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था

लेखक: एमडी अफजाल अंसारी, 4 वर्षों के सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग अनुभव वाले संघ लोक सेवा आयोग उम्मीदवार हैं। उनका वैकल्पिक विषय लोक प्रशासन है।

19. तुलना तालिका (विभिन्न आर्थिक सहमतियों की)

क्रमपैरामीटरवाशिंगटन सहमतिबीजिंग सहमतिसैंटियागो सहमति
1समयसन 1989सन 2004सन 1990 के दशक के अंत
2प्रस्तोताअंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक, अमेरिकी ट्रेजरीजोशुआ कूपर रामोचिली और लैटिन अमेरिकी देश
3मुख्य फोकसबाज़ार उदारीकरण, निजीकरण, न्यूनतम सरकारनवाचार, आत्मनिर्भरता, राज्य की सक्रिय भूमिकासामाजिक समावेशन, पर्यावरण, लोकतांत्रिक शासन
4सरकार की भूमिकान्यूनतम (Minimal)सक्रिय (Proactive)संतुलित (Balanced)
5वृद्धि का मॉडलपश्चिमी मॉडल (अमेरिका, ब्रिटेन)चीनी मॉडललैटिन अमेरिकी मॉडल
6भारत पर प्रभावसन 1991 की उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण नीतियाँ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान, उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनामहात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, आयुष्मान भारत, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम

20. वर्तमान घटनाओं का एकीकरण (सन 2024-2026)

भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी नवीनतम घटनाएँ और आँकड़े (संघ लोक सेवा आयोग के लिए अत्यंत प्रासंगिक):

  1. सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि (तिमाही 1, सन 2024-25): 6.7% (प्रेस सूचना ब्यूरो, अगस्त 2024)। सेवा क्षेत्र और विनिर्माण में सुधार के कारण यह वृद्धि हुई।
  2. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति: अक्टूबर 2024 में 4.9% दर्ज की गई। यह भारतीय रिजर्व बैंक के 4% लक्ष्य के करीब है, जिससे मौद्रिक नीति में ढील की संभावना बनी है।
  3. उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना का विस्तार: सन 2025 तक 14 क्षेत्रों (इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल, इस्पात, एयरक्राफ्ट, सौर मॉड्यूल आदि) में ₹1.97 लाख करोड़ का निवेश किया जा चुका है। इससे विनिर्माण क्षेत्र में रोज़गार और निर्यात बढ़ा है।
  4. वस्तु एवं सेवा कर संग्रह: मई 2025 में जीएसटी संग्रह ₹1.73 लाख करोड़ रहा, जो अब तक का सर्वोच्च मासिक संग्रह है। यह आर्थिक गतिविधियों में मजबूत सुधार का संकेत है।
  5. भारत-यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ व्यापार समझौता: जनवरी 2025 में हस्ताक्षरित। इस समझौते के तहत स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड, लिकटेंस्टीन से अगले 15 वर्षों में $100 बिलियन का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भारत में आने की उम्मीद है। बदले में भारत ने इन देशों से आयात शुल्क में कटौती की है।
  6. राष्ट्रीय आय के नए आँकड़े: सन 2026 में संभावित रूप से नया आधार वर्ष (2022-23) लागू होगा। साथ ही, शृंखला-आधार विधि अपनाने की भी योजना है।

21. चुनौतियाँ (भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने)

भारतीय अर्थव्यवस्था को सन 2025-26 में निम्नलिखित प्रमुख चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ये मुख्य परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं:

  1. भू-राजनीतिक तनाव: रूस-यूक्रेन युद्ध (सन 2022 से जारी), इज़राइल-ईरान तनाव (सन 2024 में बढ़ा), और चीन-ताइवान के बीच तनाव (लगातार बढ़ रहा) ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बाधित किया है। भारत कच्चे तेल, उर्वरक, इलेक्ट्रॉनिक्स घटकों के आयात के लिए इन देशों पर निर्भर है। इसलिए मुद्रास्फीति का जोखिम बना रहता है।
  2. कच्चे तेल की कीमतें: ब्रेंट क्रूड की कीमत सन 2025 में $85-90 प्रति बैरल के स्तर पर बनी हुई है। भारत अपनी तेल आवश्यकता का 85% आयात करता है। तेल की ऊँची कीमतें आयात बिल बढ़ाती हैं, चालू खाता घाटा बढ़ाती हैं, और मुद्रास्फीति को बढ़ावा देती हैं।
  3. जलवायु परिवर्तन (एल नीनो प्रभाव): सन 2024-25 में एल नीनो के कारण मानसून अनियमित रहा। कई राज्यों (बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक) में सूखे जैसे हालात बने, तो कुछ राज्यों (गुजरात, राजस्थान) में अत्यधिक बारिश से बाढ़ आई। इससे खरीफ फसलों (धान, सोयाबीन, मूंगफली) का उत्पादन प्रभावित हुआ। कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर घटकर 1.5% रह गई।
  4. पूंजी बहिर्वाह: अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने सन 2024-25 में ब्याज दरों में कटौती नहीं की (अपेक्षा के विपरीत), जिससे अमेरिकी बॉन्ड पर रिटर्न आकर्षक हो गया। परिणामस्वरूप, विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय बाजारों से पैसा निकालना शुरू कर दिया। सन 2024 में शुद्ध पूंजी बहिर्वाह लगभग $15 बिलियन रहा, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ा।
  5. ऋण-से-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात: भारतीय अर्थव्यवस्था का कुल सार्वजनिक ऋण (केंद्र और राज्य मिलाकर) सकल घरेलू उत्पाद का 81% से अधिक है (सन 2024-25)। विकासशील देशों में यह उच्चतम स्तरों में से एक है। ब्याज भुगतान अकेले सरकार के राजस्व का लगभग 20-25% खा जाता है। इससे विकास पर खर्च (बुनियादी ढाँचा, शिक्षा, स्वास्थ्य) के लिए बजट सीमित हो जाता है।
  6. अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (Informal Economy): भारत की लगभग 50% सकल घरेलू उत्पाद और 90% से अधिक रोज़गार अनौपचारिक क्षेत्र (छोटे ठेके, घरेलू उद्योग, कृषि, रेहड़ी-पटरी, निर्माण श्रम) में है। इस क्षेत्र का सटीक मापन मुश्किल है। साथ ही, इस क्षेत्र के श्रमिकों के पास सामाजिक सुरक्षा (बीमा, पेंशन, छुट्टी) नहीं है। कोविड-19 के दौरान इस क्षेत्र को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ा था।

22. सरकारी योजनाएँ और नीतियाँ

भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने और सामाजिक कल्याण सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने अनेक योजनाएँ शुरू की हैं। संघ लोक सेवा आयोग के लिए नाम, वर्ष, उद्देश्य और वर्तमान स्थिति जानना आवश्यक है।

क्रमयोजना का नामआरंभ वर्ष (विस्तार/अद्यतन)उद्देश्यसन 2025-26 की स्थिति
1प्रधानमंत्री गति शक्तिसन 2021 (सन 2024 में अद्यतन)बहु-मोडल परिवहन योजना (सड़क, रेल, हवाई, जल, बंदरगाह) को एकीकृत करना। लागत कम करना और माल ढुलाई को तेज़ करना।100 से अधिक प्रमुख परियोजनाएँ पूर्ण। राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार 1.5 लाख किमी से अधिक।
2राष्ट्रीय बुनियादी ढाँचा पाइपलाइनसन 2020 (अब सन 2047 तक बढ़ा दी गई)₹111 लाख करोड़ का निवेश बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं (सड़क, रेल, बंदरगाह, हवाई अड्डा, डिजिटल) में।50% से अधिक परियोजनाएँ कार्यान्वित या निर्माणाधीन।
3उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनासन 2020 (14 क्षेत्रों में विस्तार)विनिर्माण को बढ़ावा देना, निर्यात बढ़ाना, रोज़गार सृजन करना। कंपनियों को उत्पादन के प्रतिशत के हिसाब से प्रोत्साहन दिया जाता है।₹1.97 लाख करोड़ का बजट आवंटन। इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, ऑटो क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता।
4प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधिसन 2019छोटे और सीमांत किसानों को प्रति वर्ष ₹6,000 की आय सहायता (तीन किश्तों में)।11 करोड़ से अधिक लाभार्थी। कुल हस्तांतरण ₹2.5 लाख करोड़ से अधिक।
5आयुष्मान भारतसन 2018गरीब परिवारों (लगभग 60 करोड़ लोग) को ₹5 लाख तक का मुफ्त स्वास्थ्य बीमा। द्वितीयक और तृतीयक देखभाल कवर।60 करोड़ से अधिक लाभार्थी। 15 करोड़ से अधिक अस्पताल में भर्ती को मंजूरी। दुनिया की सबसे बड़ी सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना।
6डिजिटल इंडिया 2.0सन 2024 (विस्तार)कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, ब्लॉकचेन, और अन्य उभरती प्रौद्योगिकियों में निवेश। डिजिटल सेवाओं का विस्तार।₹20,000 करोड़ का बजट। 5 भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था

23. आगे का रास्ता (Way Forward) – मुख्य परीक्षा के लिए तैयार

संघ लोक सेवा आयोग मुख्य परीक्षा में अर्थव्यवस्था से संबंधित प्रश्नों के उत्तर में नीचे दिए गए बिंदुओं का उपयोग करें। यह संतुलित और विश्लेषणात्मक है।

  1. कृषि सुधार: किसान उत्पादक संगठनों (FPO) को मजबूत करना, राष्ट्रीय कृषि बाज़ार (e-NAM) को अनिवार्य बनाना, कृषि उपज विपणन समिति (APMC) में सुधार करना, मृदा स्वास्थ्य कार्ड को अधिक प्रभावी बनाना, और कृषि में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग बढ़ाना।
  2. शिक्षा और कौशल विकास: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का पूर्ण कार्यान्वयन – 5+3+3+4 पैटर्न, व्यावसायिक प्रशिक्षण को कक्षा 10 से ही आरंभ करना। कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय की योजनाओं (जैसे प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना 4.0) को उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना।
  3. स्वास्थ्य क्षेत्र: स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद का कम से कम 3% व्यय (वर्तमान 1.5%)। आयुष्मान भारत का विस्तार करते हुए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना। राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन को तेजी से लागू करना।
  4. राजकोषीय समेकन: राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 3% के लक्ष्य की ओर ले जाना (राजकोषीय उत्तरदायित्व बजट प्रबंधन अधिनियम के अनुसार सन 2025-26 में 4.5% लक्षित है, सन 2026-27 तक 4% और सन 2027-28 तक 3.5% किया जाना चाहिए)। सब्सिडी में सुधार (लक्षित सब्सिडी), कर आधार बढ़ाना, और राजस्व व्यय पर नियंत्रण।
  5. निर्यात संवर्धन: रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देना (भारत ने पहले ही यूएई, रूस, श्रीलंका के साथ स्थानीय मुद्रा में व्यापार शुरू कर दिया है)। यूनाइटेड किंगडम, यूरोपीय संघ, खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों के साथ व्यापार समझौते पूरे करना। निर्यातकों के लिए ऋण सुविधाएँ बढ़ाना।
  6. हरित अर्थव्यवस्था: राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (लक्ष्य – सन 2030 तक 5 मिलियन मीट्रिक टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन) को तेजी से आगे बढ़ाना। सौर ऊर्जा क्षमता (वर्तमान 70 गीगावाट) को बढ़ाकर सन 2030 तक 280 गीगावाट करना। ऊर्जा दक्षता परियोजनाओं (परफेक्ट, उन्नत) का विस्तार।

24. निष्कर्ष

भारतीय अर्थव्यवस्था आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। एक ओर जनसांख्यिकीय लाभांश, डिजिटल क्रांति, उद्यमशीलता का उभार और वैश्विक स्तर पर बढ़ता भारत का कद – दूसरी ओर बेरोज़गारी, आय असमानता, कृषि संकट, और जलवायु परिवर्तण का खतरा। सन 1991 के सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को 2 ट्रिलियन डॉलर से 4 ट्रिलियन डॉलर (सन 2025) तक पहुँचाया, लेकिन अब अगले 3 ट्रिलियन डॉलर के लिए गुणात्मक बदलावों की आवश्यकता है – जहाँ वृद्धि के साथ समावेशिता, स्थिरता और मानव विकास भी हो।

संघ लोक सेवा आयोग के दृष्टिकोण से, भारतीय अर्थव्यवस्था को समझने का अर्थ है – सकल घरेलू उत्पाद, सकल मूल्य वर्धित, मुद्रास्फीति, बेरोज़गारी, राजकोषीय नीति, मौद्रिक नीति, और विभिन्न क्षेत्रों के बीच अंतर्संबंधों को पहचानना। जैसा कि नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने कहा है – “अर्थव्यवस्था का अंतिम उद्देश्य लोगों की स्वतंत्रता और क्षमताओं का विस्तार करना है, न कि केवल संख्याओं में वृद्धि करना।” यही दर्शन भारतीय अर्थव्यवस्था की नीतियों का मार्गदर्शक होना चाहिए – जहाँ विकास का फल अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक भी पहुँचे।

25. संघ लोक सेवा आयोग प्रारंभिक परीक्षा पिछले वर्षों के प्रश्न (10 वर्षों से)

प्रश्न 1 (प्रारंभिक परीक्षा सन 2022)

प्रश्न: “भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. बाज़ार मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) हमेशा लागत मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद से अधिक होता है।
  2. बुनियादी कीमतों पर सकल मूल्य वर्धित (GVA) लागत मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद के बराबर होता है जिसमें उत्पादन कर जोड़े और उत्पादन सब्सिडी घटाई जाती है।

उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?”

उत्तर: केवल 2

व्याख्या:

  • कथन 1 गलत है क्योंकि बाज़ार मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद तभी लागत मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद से बड़ा होता है जब अप्रत्यक्ष कर > सब्सिडी। यदि सब्सिडी अधिक हो, तो बाज़ार मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद छोटा हो सकता है।
  • कथन 2 सही है क्योंकि बुनियादी कीमतों पर सकल मूल्य वर्धित = लागत मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद + उत्पादन कर – उत्पादन सब्सिडी। (यह सन 2015 की संशोधित विधि पर आधारित है)

प्रश्न 2 (प्रारंभिक परीक्षा सन 2020)

प्रश्न: “निम्नलिखित में से कौन सा/से भारत के सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) में शामिल है/हैं?

  1. विदेशों में कार्यरत भारतीय नागरिकों की आय
  2. भारत में कार्यरत विदेशी नागरिकों की आय
  3. विदेशी शाखाओं से भारतीय कंपनियों की आय

उत्तर: केवल 1 और 3

व्याख्या: सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) में भारतीय नागरिकों (चाहे वे भारत में हों या विदेश में) और भारतीय कंपनियों (चाहे उनकी शाखा भारत में हो या विदेश में) द्वारा अर्जित सभी आय शामिल होती है। इसके विपरीत, भारत में कार्यरत विदेशी नागरिकों और भारत में स्थित विदेशी कंपनियों की आय सकल राष्ट्रीय उत्पाद में शामिल नहीं होती (वह सकल घरेलू उत्पाद में शामिल होती है)।

प्रश्न 3 (प्रारंभिक परीक्षा सन 2018)

प्रश्न: “निम्नलिखित में से कौन सा ‘राष्ट्रीय आय’ का घटक नहीं है?”

A. वृद्धावस्था पेंशन
B. शेयरधारकों द्वारा प्राप्त लाभांश
C. एक भवन का किराया
D. एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम का लाभ

उत्तर: A (वृद्धावस्था पेंशन)

व्याख्या: राष्ट्रीय आय में केवल उत्पादन से प्राप्त आय शामिल होती है – जैसे मजदूरी, किराया, ब्याज, लाभ। पेंशन एक ‘हस्तांतरण भुगतान’ (transfer payment) है, जो बिना किसी उत्पादन के सरकार द्वारा नागरिकों को दिया जाता है। इसलिए यह राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं होता। लाभांश कंपनी के लाभ का हिस्सा है, इसलिए वह शामिल है।

प्रश्न 4 (प्रारंभिक परीक्षा सन 2016)

प्रश्न: “राष्ट्रीय आय लेखांकन के संदर्भ में ‘आधार वर्ष’ शब्द का अर्थ है:”

A. वह वर्ष जिसमें अधिकतम सकल घरेलू उत्पाद दर्ज किया गया था
B. वह वर्ष जिसका उपयोग स्थिर मूल्य गणना के लिए बेंचमार्क के रूप में किया जाता है
C. वर्तमान पंचवर्षीय योजना का पहला वर्ष
D. वह वर्ष जब अर्थव्यवस्था सबसे अधिक स्थिर थी

उत्तर: B

व्याख्या: आधार वर्ष वह वर्ष होता है जिसकी कीमतों का उपयोग करके अन्य वर्षों के सकल घरेलू उत्पाद को मापा जाता है (स्थिर कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद)। यह मुद्रास्फीति के प्रभाव को हटाकर वास्तविक वृद्धि दिखाता है। भारत का वर्तमान आधार वर्ष 2011-12 है।

प्रश्न 5 (प्रारंभिक परीक्षा सन 2021)

प्रश्न: “सकल घरेलू उत्पाद की गणना की ‘शृंखला-आधार विधि’ के बारे में निम्नलिखित में से कौन सा सही है?”

A. यह दशकों के लिए एक निश्चित आधार वर्ष का उपयोग करती है
B. यह हर साल आधार वर्ष बदलती है
C. यह केवल नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद की गणना करती है
D. यह सेवा क्षेत्र को बाहर करती है

उत्तर: B

व्याख्या: शृंखला-आधार विधि में हर साल आधार वर्ष बदलता है – पिछले वर्ष की कीमतों पर चालू वर्ष के सकल घरेलू उत्पाद की गणना की जाती है। फिर इन वार्षिक आँकड़ों को एक शृंखला में जोड़ दिया जाता है। यह अधिक सटीक होती है लेकिन गणना जटिल होती है। भारत अभी स्थिर-आधार विधि (2011-12) का उपयोग करता है, लेकिन शृंखला-आधार विधि की ओर बढ़ रहा है।

मुख्य परीक्षा सन 2023 (सामान्य अध्ययन पेपर-3)

प्रश्न: “भारतीय अर्थव्यवस्था में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के साथ-साथ सकल मूल्य वर्धित (GVA) के महत्व का विश्लेषण कीजिए। उन कारणों की चर्चा करें जिनके कारण भारत ने सन 2015 में GVA को अपनाया।”

मॉडल उत्तर (लगभग 200 शब्द):

परिचय: सन 2015 में भारत ने राष्ट्रीय आय मापन की पद्धति बदलते हुए ‘बुनियादी कीमतों पर सकल मूल्य वर्धित (GVA)’ को प्राथमिकता दी। यह बदलाव आँकड़ों को अधिक पारदर्शी और क्षेत्र-विशिष्ट बनाने के लिए किया गया।

मुख्य भाग: GDP अर्थव्यवस्था के समग्र आकार और अंतिम माँग (उपभोग, निवेश, सरकारी व्यय, शुद्ध निर्यात) को दर्शाता है। जबकि GVA उत्पादन के हर चरण में जोड़े गए मूल्य को दिखाता है। GVA से पता चलता है कि कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्रों में से किस क्षेत्र ने कितना योगदान दिया। भारत ने GVA को इसलिए अपनाया क्योंकि: (1) यह कर और सब्सिडी के प्रभाव को अलग करता है, जिससे उत्पादन का वास्तविक चित्र मिलता है, (2) यह क्षेत्रवार तुलना को सरल बनाता है, (3) अंतरराष्ट्रीय मानकों (SNA 2008) के अनुरूप है।

निष्कर्ष: GDP और GVA दोनों महत्वपूर्ण हैं। GDP विकास दर बताता है, GVA यह बताता है कि विकास किन क्षेत्रों से आ रहा है। नीति निर्माण के लिए दोनों का साथ-साथ उपयोग आवश्यक है।

मुख्य परीक्षा सन 2022 (सामान्य अध्ययन पेपर-3)

प्रश्न: “मिश्रित अर्थव्यवस्था की अवधारणा की व्याख्या करें। सन 1991 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में मिश्रित अर्थव्यवस्था की प्रकृति कैसे बदली है?”

मॉडल उत्तर (लगभग 200 शब्द):

परिचय: मिश्रित अर्थव्यवस्था वह प्रणाली है जिसमें बाज़ार तंत्र और सरकार दोनों मिलकर आर्थिक निर्णय लेते हैं। निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र साथ-साथ कार्य करते हैं।

मुख्य भाग: सन 1947 से 1991 तक भारत में समाजवादी झुकाव वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था थी, जहाँ सरकार की भूमिका प्रमुख थी – लाइसेंस राज, सार्वजनिक क्षेत्र का वर्चस्व, विदेशी व्यापार पर प्रतिबंध। सन 1991 के सुधारों (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) ने इस प्रकृति को बदल दिया। अब बाज़ार को अधिक स्वतंत्रता दी गई – कई क्षेत्र (दूरसंचार, विमानन, बैंकिंग) निजी क्षेत्र के लिए खोले गए, सार्वजनिक क्षेत्र का दायरा सिकुड़ा (केवल रणनीतिक क्षेत्रों में), विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया गया। हालाँकि, सरकार अब भी सामाजिक क्षेत्र (शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा) और बुनियादी ढाँचे में सक्रिय है।

निष्कर्ष: भारत अब भी मिश्रित अर्थव्यवस्था है, लेकिन पहले की तुलना में बाज़ार की भूमिका अधिक है। यह बदलाव विकास दर बढ़ाने और दक्षता लाने के लिए किया गया, लेकिन इसने असमानता जैसी चुनौतियाँ भी पैदा की हैं।

मुख्य परीक्षा सन 2021 (सामान्य अध्ययन पेपर-3)

प्रश्न: “वाशिंगटन सहमति, बीजिंग सहमति और सैंटियागो सहमति के मुख्य सिद्धांतों की तुलना करें। भारत के लिए इनमें से कौन सी सहमति अधिक प्रासंगिक है?”

मॉडल उत्तर (लगभग 220 शब्द):

परिचय: ये तीनों सहमतियाँ विकासशील देशों के लिए नीति सुझावों के सेट हैं, जो अलग-अलग समय और संदर्भों में उभरीं।

मुख्य भाग:

  • वाशिंगटन सहमति (1989): बाज़ार उदारीकरण, निजीकरण, न्यूनतम सरकार, मुक्त व्यापार। यह पश्चिमी मॉडल है।
  • बीजिंग सहमति (2004): राज्य की सक्रिय भूमिका, नवाचार, आत्मनिर्भरता, सतत विकास। यह चीनी मॉडल है।
  • सैंटियागो सहमति (1990 के दशक के अंत): सामाजिक समावेशन, लोकतांत्रिक शासन, पर्यावरणीय स्थिरता, विकास के साथ समानता।

भारत के लिए प्रासंगिकता: भारत ने 1991 में वाशिंगटन सहमति के सिद्धांतों को अपनाया, जिससे विकास दर बढ़ी। लेकिन असमानता और सामाजिक विसंगतियों ने सैंटियागो सहमति के तत्वों (MGNREGA, आयुष्मान भारत) को आवश्यक बना दिया। हाल के वर्षों में ‘आत्मनिर्भर भारत’, PLI योजना बीजिंग सहमति के करीब हैं। कोई एक सहमति पूरी तरह लागू नहीं हो सकती।

निष्कर्ष: भारत को तीनों सहमतियों के उपयुक्त तत्वों को मिलाकर अपना अनूठा मॉडल विकसित करना चाहिए – जो विकास, समावेशन और आत्मनिर्भरता को संतुलित करे।

27. अभ्यास प्रश्न (10 बहुविकल्पीय प्रश्न)

प्रश्न 1: ‘राष्ट्रीय आय’ शब्द का अर्थ है:
A) सकल घरेलू उत्पाद
B) सकल राष्ट्रीय उत्पाद
C) शुद्ध घरेलू उत्पाद
D) शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद

उत्तर: D

प्रश्न 2: निम्नलिखित में से कौन सा क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद में सबसे अधिक योगदान देता है?
A) प्राथमिक क्षेत्र
B) द्वितीयक क्षेत्र
C) तृतीयक क्षेत्र
D) पंचम क्षेत्र

उत्तर: C (तृतीयक क्षेत्र, लगभग 55%)

प्रश्न 3: ‘अदृश्य हाथ’ (Invisible Hand) का सिद्धांत किस अर्थशास्त्री ने दिया?
A) अल्फ्रेड मार्शल
B) एडम स्मिथ
C) जॉन मेनार्ड कीनेस
D) पॉल सैमुएलसन

उत्तर: B

प्रश्न 4: भारत में राष्ट्रीय आय की गणना का वर्तमान आधार वर्ष क्या है?
A) 2004-05
B) 2011-12
C) 2014-15
D) 2017-18

उत्तर: B (2011-12)

प्रश्न 5: सकल मूल्य वर्धित (GVA) और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के बीच क्या संबंध है?
A) GVA = GDP + शुद्ध अप्रत्यक्ष कर
B) GDP = GVA + शुद्ध अप्रत्यक्ष कर
C) GVA = GDP – मूल्यह्रास
D) GDP = GVA – मूल्यह्रास

उत्तर: B (GDP = GVA + शुद्ध अप्रत्यक्ष कर)

प्रश्न 6: निम्नलिखित में से कौन सा व्यष्टि अर्थशास्त्र का विषय है?
A) राष्ट्रीय मुद्रास्फीति
B) एक फर्म का उत्पादन निर्णय
C) राजकोषीय घाटा
D) विदेशी मुद्रा भंडार

उत्तर: B

प्रश्न 7: ‘बीजिंग सहमति’ किस देश के विकास मॉडल पर आधारित है?
A) जापान
B) दक्षिण कोरिया
C) चीन
D) सिंगापुर

उत्तर: C

प्रश्न 8: भारत में सबसे अधिक रोज़गार किस क्षेत्र में है?
A) प्राथमिक क्षेत्र
B) द्वितीयक क्षेत्र
C) तृतीयक क्षेत्र
D) चतुर्थक क्षेत्र

उत्तर: A (प्राथमिक क्षेत्र, लगभग 45% रोज़गार)

प्रश्न 9: ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान किस वर्ष शुरू किया गया था?
A) 2018
B) 2019
C) 2020
D) 2021

उत्तर: C (सन 2020)

प्रश्न 10: शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNP) किसके बराबर होता है?
A) सकल राष्ट्रीय उत्पाद + मूल्यह्रास
B) सकल राष्ट्रीय उत्पाद – मूल्यह्रास
C) सकल घरेलू उत्पाद + मूल्यह्रास
D) सकल घरेलू उत्पाद – मूल्यह्रास

उत्तर: B

28. मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (5 प्रश्न, प्रत्येक 150-200 शब्द)

प्रश्न 1: “भारतीय अर्थव्यवस्था में स्थिर-आधार विधि के स्थान पर शृंखला-आधार विधि अपनाने के क्या लाभ और हानियाँ हैं?” विश्लेषण करें।

प्रश्न 2: उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजना ने भारतीय विनिर्माण क्षेत्र को किस प्रकार प्रभावित किया है? उदाहरण सहित समझाएँ।

प्रश्न 3: “भारतीय अर्थव्यवस्था में अनौपचारिक क्षेत्र (Informal Sector) एक चुनौती और अवसर दोनों है।” चर्चा करें।

प्रश्न 4: वाशिंगटन सहमति और बीजिंग सहमति के बीच मुख्य अंतर बताते हुए बताएँ कि भारत ने किन तत्वों को अपनाया है?

प्रश्न 5: जलवायु परिवर्तन भारतीय अर्थव्यवस्था के किन क्षेत्रों को सबसे अधिक प्रभावित कर रहा है? सरकार ने क्या कदम उठाए हैं?

29. उत्तर लेखन अभ्यास (5 संरचित उत्तर)

उत्तर 1 (प्रश्न 1 के लिए)

परिचय: राष्ट्रीय आय मापन की दो विधियाँ हैं – स्थिर-आधार (Fixed Base) और शृंखला-आधार (Chain Base)। भारत वर्तमान में स्थिर-आधार विधि (2011-12) का उपयोग करता है, लेकिन शृंखला-आधार विधि की ओर बढ़ रहा है।

मुख्य भाग: शृंखला-आधार विधि के लाभ: (1) यह हर साल आधार वर्ष बदलती है, इसलिए कीमतों और उपभोग पैटर्न में बदलाव तुरंत परिलक्षित होता है। (2) नए उत्पाद (जैसे स्मार्टफोन, ई-कॉमर्स) का योगदान सही से मापा जाता है। (3) अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप, तुलना आसान होती है। हानियाँ: (1) गणना अत्यधिक जटिल होती है, डेटा की अधिक आवश्यकता होती है। (2) लंबी अवधि (दशकों) की तुलना करने में कठिनाई होती है क्योंकि आधार बदलता रहता है।

निष्कर्ष: शृंखला-आधार विधि अधिक सटीक है, लेकिन इसके कार्यान्वयन के लिए मजबूत सांख्यिकीय प्रणाली चाहिए। भारत को धीरे-धीरे इस ओर बढ़ना चाहिए।

उत्तर 2 (प्रश्न 2 के लिए)

परिचय: उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजना सन 2020 में शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य विनिर्माण को बढ़ावा देना, निर्यात बढ़ाना और रोज़गार सृजन करना है।

मुख्य भाग: प्रभाव: (1) इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण – भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन उत्पादक बन गया है। (2) फार्मास्यूटिकल्स में निर्यात बढ़ा है। (3) ऑटोमोबाइल क्षेत्र में निवेश बढ़ा है। उदाहरण – एप्पल, सैमसंग, टाटा मोटर्स, अडानी ग्रुप ने PLI के तहत बड़े निवेश किए हैं। चुनौतियाँ – (1) अभी तक रोज़गार सृजन सीमित रहा है। (2) छोटे उद्योग इस योजना का लाभ नहीं उठा पा रहे।

निष्कर्ष: PLI एक अच्छी पहल है, लेकिन इसे छोटे उद्योगों तक पहुँचाने और रोज़गार सृजन पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

(इसी प्रकार अन्य प्रश्नों के उत्तर संरचित किए जा सकते हैं। समय और स्थान सीमा के कारण शेष तीन उत्तर संक्षिप्त दिए जा रहे हैं।)

उत्तर 3 (प्रश्न 3 – अनौपचारिक क्षेत्र)

अनौपचारिक क्षेत्र चुनौती है क्योंकि: (1) श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा नहीं, (2) कर दायरे से बाहर, (3) मापन कठिन। अवसर है क्योंकि: (1) अधिकांश रोज़गार यहीं, (2) लचीला और अनुकूलनशील, (3) स्टार्टअप और गिग इकॉनमी का आधार। सरकार ने ई-श्रम पोर्टल, कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी 2020, और प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना शुरू की है।

उत्तर 4 (प्रश्न 4 – वाशिंगटन बनाम बीजिंग)

वाशिंगटन – न्यूनतम सरकार, बाज़ार स्वतंत्रता, निजीकरण। बीजिंग – सक्रिय राज्य, नवाचार, आत्मनिर्भरता। भारत ने 1991 में वाशिंगटन अपनाया, 2020 में बीजिंग के तत्व (आत्मनिर्भर भारत, PLI) अपनाए। भारत का मिश्रित मॉडल दोनों का संतुलन है।

उत्तर 5 (प्रश्न 5 – जलवायु प्रभाव)

जलवायु परिवर्तन कृषि (अनियमित मानसून), जल संसाधन (ग्लेशियर पिघलना, नदियाँ सूखना), तटीय क्षेत्र (समुद्र स्तर वृद्धि), और स्वास्थ्य (हीटवेव, बीमारियाँ) को प्रभावित कर रहा है। सरकार ने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, सौर मिशन, जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना, और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसे कदम उठाए हैं।

30. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) (स्कीमा-तैयार)

प्रश्न 1: भारतीय अर्थव्यवस्था किस प्रकार की अर्थव्यवस्था है?
उत्तर: भारतीय अर्थव्यवस्था एक मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) है, जिसमें बाज़ार तंत्र और सरकार दोनों मिलकर निर्णय लेते हैं। निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्र साथ-साथ कार्य करते हैं।

प्रश्न 2: सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और सकल मूल्य वर्धित (GVA) में क्या अंतर है?
उत्तर: GDP अर्थव्यवस्था के समग्र आकार को मापता है (उपभोग + निवेश + सरकारी व्यय + शुद्ध निर्यात)। GVA उत्पादन के हर चरण में जोड़े गए मूल्य को मापता है। GDP = GVA + शुद्ध अप्रत्यक्ष कर।

प्रश्न 3: भारत में राष्ट्रीय आय की गणना कौन करता है?
उत्तर: भारत में राष्ट्रीय आय की गणना सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के अंतर्गत केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) करता है।

प्रश्न 4: ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान क्या है?
उत्तर: यह सन 2020 में शुरू किया गया एक अभियान है जिसका उद्देश्य भारत को आयात पर निर्भरता कम करके आत्मनिर्भर बनाना, घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना, और सप्लाई चेन को मजबूत करना है।

प्रश्न 5: व्यष्टि और समष्टि अर्थशास्त्र में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: व्यष्टि अर्थशास्त्र व्यक्तिगत इकाइयों (घर, कंपनी) का अध्ययन करता है। समष्टि अर्थशास्त्र समग्र अर्थव्यवस्था (GDP, मुद्रास्फीति, बेरोजगारी) का अध्ययन करता है।

प्रश्न 6: वाशिंगटन सहमति क्या है?
उत्तर: सन 1989 में IMF, विश्व बैंक और अमेरिकी ट्रेजरी द्वारा प्रस्तावित 10 नीतियों का समूह, जो बाज़ार उदारीकरण, निजीकरण और न्यूनतम सरकार पर जोर देता है।

प्रश्न 7: भारत में कृषि क्षेत्र की मुख्य समस्या क्या है?
उत्तर: मुख्य समस्याएँ हैं: छोटी और बिखरी जोतें, मानसून पर निर्भरता, कम उत्पादकता, किसानों को उचित मूल्य न मिलना, और उर्वरक सब्सिडी का भारी बोझ।

प्रश्न 8: सकल घरेलू उत्पाद की गणना की शृंखला-आधार विधि क्या है?
उत्तर: यह एक ऐसी विधि है जिसमें हर साल आधार वर्ष बदलता है – पिछले साल की कीमतों पर चालू साल के GDP की गणना की जाती है। यह अधिक सटीक होती है।

प्रश्न 9: उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजना के तहत कितने क्षेत्र कवर हैं?
उत्तर: वर्तमान में 14 क्षेत्र कवर हैं – इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल, इस्पात, एयरक्राफ्ट, सौर मॉड्यूल, और अन्य।

प्रश्न 10: भारत का वर्तमान विदेशी मुद्रा भंडार कितना है?
उत्तर: सन 2025 की शुरुआत में, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार $650 बिलियन से अधिक है, जो दुनिया में चौथा सबसे बड़ा है।

लेखक: एमडी अफजाल अंसारी, 4 वर्षों के सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग अनुभव वाले संघ लोक सेवा आयोग उम्मीदवार हैं। उनका वैकल्पिक विषय लोक प्रशासन है।

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