परिचय
भारतीय इतिहास में सातवीं से बारहवीं शताब्दी का कालखंड नए राजवंश और राज्य के उदय का साक्षी रहा। यह वह समय था जब भारतीय उपमहाद्वीप में अनेक क्षेत्रीय शक्तियों का उदय हुआ और प्राचीन भारत की राजनीतिक संरचना में मौलिक परिवर्तन आए । NCERT की कक्षा 7 की पाठ्यपुस्तक का यह अध्याय हमें उन प्रक्रियाओं से परिचित कराता है, जिनके माध्यम से नए राजवंशों ने अपनी सत्ता स्थापित की और अपने राज्यों का विस्तार किया।
इस काल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि अब केवल क्षत्रिय ही नहीं, बल्कि विभिन्न पृष्ठभूमियों से आने वाले लोग भी राजा बनने लगे थे। बड़े जमींदार और योद्धा प्रमुख, जिन्हें ‘सामंत’ कहा जाता था, धीरे-धीरे शक्तिशाली होकर स्वतंत्र राज्य स्थापित करने लगे । इस अध्याय के माध्यम से हम गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट, पाल और चोल जैसे प्रमुख राजवंशों के उत्थान और उनके प्रशासनिक ढांचे को समझेंगे।

विषय की परिभाषा
नए राजवंश और राज्य से तात्पर्य लगभग 750 ईस्वी से 1200 ईस्वी के बीच भारत के विभिन्न भागों में स्थापित हुए नए शासक वंशों और उनके राज्यों के अध्ययन से है। यह अध्ययन निम्नलिखित पहलुओं को समाहित करता है:
- राजनीतिक परिवर्तन: सामंतों से स्वतंत्र शासक बनने की प्रक्रिया
- प्रशासनिक संरचना: राजस्व संग्रह, कर प्रणाली और स्थानीय स्वशासन
- सैन्य संघर्ष: क्षेत्रीय विस्तार और प्रभुत्व के लिए युद्ध
- सांस्कृतिक विकास: मंदिर निर्माण और कला संरक्षण
पृष्ठभूमि और इतिहास
सामंत व्यवस्था का विकास
सातवीं शताब्दी तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े जमींदार और योद्धा प्रमुख मौजूद थे। मौजूदा राजा उन्हें अपना अधीनस्थ या ‘सामंत’ मानते थे । इन सामंतों से अपेक्षा की जाती थी कि वे राजा को उपहार भेंट करें, दरबार में उपस्थित रहें और आवश्यकता पड़ने पर सैन्य सहायता प्रदान करें ।
जैसे-जैसे ये सामंत शक्तिशाली और धनवान होते गए, उन्होंने स्वयं को ‘महासामंत’ या ‘महामंडलेश्वर’ जैसी उपाधियों से विभूषित करना शुरू कर दिया । अंततः उन्होंने अपने अधिपतियों की अधीनता अस्वीकार कर स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए।
प्रमुख राजवंशों का उदय
इस काल में उत्तर भारत में गुर्जर-प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूट जैसे शक्तिशाली राजवंशों का उदय हुआ, जबकि दक्षिण भारत में चोल, पांड्य और चालुक्य वंशों का प्रभुत्व रहा । इन राजवंशों ने न केवल राजनीतिक वर्चस्व स्थापित किया, बल्कि कला, संस्कृति और स्थापत्य के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
मुख्य विशेषताएँ
प्रमुख राजवंश और उनके क्षेत्र
सत्ता प्राप्ति के साधन
नए राजवंश और राज्य स्थापित करने वाले शासकों ने अपनी वैधता स्थापित करने के लिए अनेक उपाय किए:
- हिरण्यगर्भ अनुष्ठान: दंतिदुर्ग जैसे शासकों ने ब्राह्मणों की सहायता से यह अनुष्ठान करवाया, जिसके माध्यम से उन्हें क्षत्रिय के रूप में पुनर्जन्म माना जाता था ।
- उच्च उपाधियों का प्रयोग: नए शासकों ने ‘महाराजाधिराज’ (महान राजाओं का राजा) और ‘त्रिभुवनचक्रवर्ती’ (तीनों लोकों का स्वामी) जैसी उपाधियाँ धारण कीं ।
- ब्राह्मणों को भूमि अनुदान: राजाओं ने ब्राह्मणों को भूमि दान में दी, जिसे ताम्रपत्रों पर अंकित किया जाता था ।
- प्रशस्तियाँ: विद्वान ब्राह्मणों द्वारा रचित प्रशस्तियों में राजाओं को वीर और विजयी योद्धा के रूप में चित्रित किया जाता था ।
कर और राजस्व प्रणाली
राज्य की आय का मुख्य स्रोत उत्पादकों—किसान, पशुपालक और कारीगर—से प्राप्त कर था । चोल अभिलेखों में लगभग 400 विभिन्न प्रकार के करों का उल्लेख मिलता है । प्रमुख कर थे:
UPSC Prelims के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
UPSC Mains के लिए विश्लेषण
सामाजिक गतिशीलता और राजनीतिक वैधता
नए राजवंश और राज्य के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि इस काल में सामाजिक गतिशीलता संभव थी। दंतिदुर्ग जैसे शासक, जो मूल रूप से क्षत्रिय नहीं थे, हिरण्यगर्भ अनुष्ठान के माध्यम से क्षत्रिय का दर्जा प्राप्त कर सकते थे । इसी प्रकार, कदंब मयूरशर्मन और गुर्जर-प्रतिहार हरिचंद्र जैसे ब्राह्मणों ने अपनी पारंपरिक वृत्ति त्यागकर सैनिक कौशल के बल पर राज्य स्थापित किए ।
यह घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि जन्म के आधार पर सामाजिक स्थिति निर्धारित करने की परंपरा में लचीलापन आ चुका था और योग्यता एवं शक्ति के आधार पर लोग उच्च पद प्राप्त कर सकते थे।
चोल प्रशासन की विशेषताएँ
चोल प्रशासन इस काल की सबसे व्यवस्थित और विकसित प्रशासनिक प्रणालियों में से एक थी। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं:
- स्थानीय स्वशासन: ग्राम सभाएँ (सभा) स्थानीय प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं ।
- नाडु प्रणाली: गाँवों के समूह को ‘नाडु’ कहा जाता था, जो न्याय और कर संग्रह जैसे प्रशासनिक कार्य करता था ।
- भूमि के प्रकार: चोल अभिलेखों में विभिन्न प्रकार की भूमियों का उल्लेख मिलता है :
- वेल्लनवगै: गैर-ब्राह्मण किसानों की भूमि
- ब्रह्मदेय: ब्राह्मणों को दान दी गई भूमि
- शालाभोग: विद्यालय के रखरखाव के लिए भूमि
- देवदान: मंदिरों को दान दी गई भूमि
- उत्तरमेरुर अभिलेख: यह अभिलेख सभा की चुनाव प्रक्रिया के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है ।
मंदिर: केवल पूजा स्थल नहीं
चोल मंदिर न केवल पूजा स्थल थे, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के केंद्र भी थे । मंदिरों से जुड़ी गतिविधियाँ थीं:
- शिल्प उत्पादन का केंद्र, विशेषकर कांस्य प्रतिमाओं का निर्माण
- भूमि अनुदान से प्राप्त उपज से मंदिर से जुड़े विशेषज्ञों (पुजारी, माली, रसोइया, संगीतकार, नर्तक) का भरण-पोषण
- बस्तियों के विकास का केंद्र – मंदिरों के आसपास बस्तियाँ विकसित हुईं
केस स्टडी
केस स्टडी 1: राष्ट्रकूटों का उत्थान
राष्ट्रकूट प्रारंभ में कर्नाटक के चालुक्यों के अधीनस्थ थे। आठवीं शताब्दी के मध्य में, दंतिदुर्ग नामक राष्ट्रकूट प्रमुख ने अपने चालुक्य अधिपति को उखाड़ फेंका और ब्राह्मणों की सहायता से ‘हिरण्यगर्भ’ अनुष्ठान करवाया । यह अनुष्ठान इस विश्वास पर आधारित था कि यज्ञ करने वाले का क्षत्रिय के रूप में पुनर्जन्म होता है, भले ही वह जन्म से क्षत्रिय न हो । इस प्रकार दंतिदुर्ग ने न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की, बल्कि सामाजिक वैधता भी हासिल की।
केस स्टडी 2: चोल मंदिर और कांस्य प्रतिमाएँ
चोल काल की कांस्य प्रतिमाएँ विश्व प्रसिद्ध हैं। इनमें अधिकतर प्रतिमाएँ देवी-देवताओं की थीं, लेकिन कुछ में भक्तों को भी चित्रित किया गया था । नटराज की प्रतिमा चोल कला का उत्कृष्ट उदाहरण है । मंदिरों से जुड़े शिल्पकारों द्वारा निर्मित ये प्रतिमाएँ आज भी अपनी कलात्मक उत्कृष्टता के लिए जानी जाती हैं।
महत्व और लाभ
नए राजवंश और राज्य के अध्ययन का महत्व निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
- सामाजिक गतिशीलता की समझ: यह अध्ययन बताता है कि प्राचीन भारत में भी जन्म के आधार पर सामाजिक स्थिति निर्धारित करने की प्रथा में लचीलापन था ।
- प्रशासनिक विकास की जानकारी: चोल प्रशासन की स्थानीय स्वशासन प्रणाली वर्तमान पंचायती राज प्रणाली की पूर्ववर्ती है ।
- सांस्कृतिक समन्वय की समझ: मंदिरों के माध्यम से विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सांस्कृतिक समन्वय कैसे हुआ, इसे समझने में सहायता।
- आर्थिक इतिहास का ज्ञान: कर प्रणाली, भूमि अनुदान और व्यापार मार्गों के विकास के बारे में जानकारी मिलती है।
चुनौतियाँ
नए राजवंश और राज्य के अध्ययन में निम्नलिखित चुनौतियाँ हैं:
- स्रोतों की सीमाएँ: प्रशस्तियों में अतिशयोक्ति के कारण ऐतिहासिक सत्य का पता लगाना कठिन होता है ।
- क्षेत्रीय विविधता: विभिन्न क्षेत्रों में शासन प्रणाली में भिन्नता के कारण सामान्यीकरण कठिन है।
- महिलाओं की अनदेखी: अधिकांश ऐतिहासिक स्रोतों में महिलाओं की भूमिका को अनदेखा किया गया है ।
- निम्न जातियों का उपेक्षित इतिहास: मंदिर अभिलेखों में निम्न जातियों की गतिविधियों का उल्लेख नहीं मिलता ।
समाधान और सुधार
ऐतिहासिक अध्ययन को अधिक समावेशी और प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित दृष्टिकोण अपनाए जा सकते हैं:
- बहुआयामी दृष्टिकोण: केवल राजनीतिक इतिहास के बजाय सामाजिक और आर्थिक पहलुओं पर भी ध्यान देना।
- पुरातात्विक स्रोतों का उपयोग: अभिलेखों के अलावा मूर्तियों, सिक्कों और स्थापत्य के अध्ययन को शामिल करना।
- तुलनात्मक अध्ययन: विभिन्न क्षेत्रों के राजवंशों के बीच तुलनात्मक अध्ययन से अधिक व्यापक समझ विकसित होती है।
- हाशिए के समूहों का इतिहास: निम्न जातियों और महिलाओं के इतिहास को पुनर्स्थापित करने के प्रयास।
निष्कर्ष
सातवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच भारत में उभरे नए राजवंश और राज्य ने भारतीय इतिहास को एक नई दिशा प्रदान की। इस काल में सामंतों से स्वतंत्र शासक बनने की प्रक्रिया ने सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा दिया। चोल प्रशासन की स्थानीय स्वशासन प्रणाली, जिसमें सभा और नाडु जैसी संस्थाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं, भारतीय प्रशासनिक परंपरा की समृद्धि का प्रमाण है।
त्रिपक्षीय संघर्ष और महमूद गजनवी के आक्रमण इस काल के महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम थे। मंदिर न केवल पूजा स्थल थे, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के केंद्र भी थे। चोल काल की कांस्य प्रतिमाएँ आज भी विश्व स्तर पर अपनी कलात्मक उत्कृष्टता के लिए पहचानी जाती हैं।
UPSC की दृष्टि से इस अध्ययन की प्रासंगिकता इस तथ्य में है कि यह भारत के प्रशासनिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की निरंतरता को समझने में सहायक है। चोल प्रशासन की स्थानीय स्वशासन प्रणाली वर्तमान पंचायती राज प्रणाली की पूर्ववर्ती है, और हिरण्यगर्भ जैसे अनुष्ठान सामाजिक गतिशीलता की संभावना को दर्शाते हैं। इस प्रकार, यह अध्ययन भारतीय समाज की जटिलताओं और उसके ऐतिहासिक विकास को समझने की कुंजी प्रदान करता है।
UPSC Prelims के लिए 10 बहुविकल्पीय प्रश्न
- त्रिपक्षीय संघर्ष में शामिल तीन राजवंश कौन से थे?
a) चोल, चालुक्य, पांड्य
b) गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट, पाल
c) चौहान, गहड़वाल, परमार
d) सेंगम, चालुक्य, राष्ट्रकूट - हिरण्यगर्भ अनुष्ठान किसने करवाया?
a) राजराजा प्रथम
b) पृथ्वीराज चौहान
c) दंतिदुर्ग
d) महमूद गजनवी - ‘किताब-उल-हिंद’ के रचयिता कौन थे?
a) फिरदौसी
b) उत्बी
c) अल-बिरूनी
d) इब्न बतूता - चोल साम्राज्य में सभा के सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु कितनी थी?
a) 25 वर्ष
b) 30 वर्ष
c) 35 वर्ष
d) 40 वर्ष - निम्नलिखित में से कौन-सा कर बेगार के रूप में लिया जाता था?
a) कड़मई
b) वेत्ति
c) इराई
d) उपरिकर - चोल वंश का संस्थापक किसे माना जाता है?
a) राजराजा प्रथम
b) राजेंद्र प्रथम
c) विजयालय
d) आदित्य प्रथम - गुर्जर-प्रतिहार राजवंश का संबंध किस क्षेत्र से था?
a) बंगाल
b) गुजरात और राजस्थान
c) दक्कन
d) तमिलनाडु - महमूद गजनवी ने किस प्रसिद्ध मंदिर पर आक्रमण किया?
a) कोणार्क
b) सोमनाथ
c) खजुराहो
d) महाबलीपुरम - चोल अभिलेखों में विद्यालय के रखरखाव के लिए दी गई भूमि क्या कहलाती थी?
a) ब्रह्मदेय
b) देवदान
c) शालाभोग
d) वेल्लनवगै - पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गोरी के बीच प्रथम युद्ध कब हुआ?
a) 1191 ई.
b) 1192 ई.
c) 1206 ई.
d) 1210 ई.
5 संभावित UPSC Mains प्रश्न
- “सातवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच भारत में उभरे नए राजवंशों ने अपनी सत्ता की वैधता स्थापित करने के लिए कौन-कौन से उपाय किए? उदाहरण सहित चर्चा कीजिए।”
- “त्रिपक्षीय संघर्ष के कारणों और परिणामों का विश्लेषण कीजिए। यह संघर्ष उस काल की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को किस प्रकार दर्शाता है?”
- “चोल प्रशासन की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए। स्थानीय स्वशासन की दृष्टि से इसका क्या महत्व था?”
- “मध्यकालीन भारत में मंदिरों के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों का विश्लेषण कीजिए। चोल काल के मंदिर इसका उदाहरण किस प्रकार हैं?”
- “सामंत व्यवस्था ने नए राजवंशों के उदय में क्या भूमिका निभाई? राष्ट्रकूटों के उदय के संदर्भ में इसकी व्याख्या कीजिए।”
FAQ
- प्रश्न: त्रिपक्षीय संघर्ष क्या था और इसमें कौन-कौन से राजवंश शामिल थे?
उत्तर: त्रिपक्षीय संघर्ष कन्नौज पर नियंत्रण के लिए गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट और पाल राजवंशों के बीच हुआ दीर्घकालिक संघर्ष था। इसे त्रिपक्षीय संघर्ष इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें तीन पक्ष शामिल थे । - प्रश्न: चोल साम्राज्य में सभा के सदस्य बनने के लिए क्या योग्यताएँ आवश्यक थीं?
उत्तर: सभा के सदस्य बनने के लिए व्यक्ति की आयु 35-70 वर्ष के बीच होनी चाहिए, वह वेदों का ज्ञाता हो, भूमि का स्वामी हो और राजस्व अदा करता हो, अपना घर हो, प्रशासनिक मामलों में निपुण और ईमानदार हो। कोई व्यक्ति तीन वर्षों में किसी अन्य समिति का सदस्य नहीं रह सकता था । - प्रश्न: हिरण्यगर्भ अनुष्ठान का क्या महत्व था?
उत्तर: हिरण्यगर्भ का शाब्दिक अर्थ ‘स्वर्ण गर्भ’ है। यह एक अनुष्ठान था जिसे ब्राह्मणों की सहायता से संपन्न करवाया जाता था। ऐसा माना जाता था कि इस अनुष्ठान को करने वाले का क्षत्रिय के रूप में पुनर्जन्म होता है, भले ही वह जन्म से क्षत्रिय न हो। इसके माध्यम से नए शासक अपनी सत्ता को वैधता प्रदान करते थे । - प्रश्न: चोल मंदिरों की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर: चोल मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं थे, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के केंद्र थे। वे शिल्प उत्पादन के केंद्र थे, विशेषकर कांस्य प्रतिमाओं के निर्माण के लिए प्रसिद्ध थे। मंदिरों के आसपास बस्तियाँ विकसित हुईं और मंदिरों को दान दी गई भूमि की उपज से विभिन्न कर्मचारियों का भरण-पोषण होता था । - प्रश्न: चोल अभिलेखों में भूमि के कौन-कौन से प्रकार बताए गए हैं?
उत्तर: चोल अभिलेखों में भूमि के निम्नलिखित प्रकार बताए गए हैं: वेल्लनवगै (गैर-ब्राह्मण किसानों की भूमि), ब्रह्मदेय (ब्राह्मणों को दान दी गई भूमि), शालाभोग (विद्यालय के रखरखाव के लिए भूमि), देवदान (मंदिरों को दान दी गई भूमि), और पल्लिच्छंदम (जैन संस्थाओं को दान दी गई भूमि) ।

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