परिचय
मनुष्य के इतिहास में भोजन संग्रह से उत्पादन तक का सफर एक क्रांतिकारी मोड़ था। लाखों वर्षों तक इंसान शिकारी और संग्राहक के रूप में रहा, लेकिन लगभग 12,000 साल पहले एक बड़ा बदलाव आया। इस बदलाव ने न केवल उनकी जीवनशैली को बदला, बल्कि सभ्यता की नींव भी रखी। यह वह समय था जब मनुष्य ने पहली बार खेती करना और पशु पालना सीखा। इस प्रक्रिया ने उसे खानाबदोश जीवन से निकालकर स्थाई जीवन की ओर प्रेरित किया। यह अध्याय हमें इस नवीन जीवन शैली और इसके साथ आए सांस्कृतिक बदलावों से परिचित कराता है।

भोजन संग्रह से उत्पादन तक – अर्थ एवं परिभाषा
भोजन संग्रह से उत्पादन तक संक्रमण का तात्पर्य उस ऐतिहासिक चरण से है जब मानव ने जंगली पौधों पर अपनी निर्भरता कम की और जानबूझकर फसलें उगाना शुरू किया। इसी प्रकार, जंगली जानवरों का शिकार करने के बजाय उन्हें पालतू बनाया गया। इसे ही अक्सर नवपाषाण क्रांति भी कहा जाता है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे विकसित हुई, जिसने मनुष्य को एक सुरक्षित और स्थिर खाद्य आपूर्ति प्रदान की। यह परिवर्तन मानव इतिहास में आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
लगभग 12 हजार वर्ष पहले जलवायु में बदलाव आया. जंगल सिकुड़ने लगे और घास के मैदान बढ़े. इससे जंगली अनाज और अनाज खाने वाले जानवरों की संख्या बढ़ी. मनुष्य ने इन संसाधनों के साथ नियमित संपर्क में रहकर धीरे-धीरे खेती और पशुपालन को अपनाया. मेहरगढ़, दाओजली हेडिंग और अन्य नवपाषाण स्थलों से इसके प्रमाण मिलते हैं.
खेती और पशुपालन की शुरुआत
जलवायु में बड़े बदलाव आने के कारण, लगभग 12,000 साल पहले, खेती और पशुपालन की शुरुआत हुई। जब दुनिया के कई क्षेत्रों में गरमी बढ़ी, तो गेहूँ, जौ और धान जैसे अनाज प्राकृतिक रूप से उगने लगे। महिलाओं, पुरुषों और बच्चों ने इन अनाजों को इकट्ठा करना, उनके उगने के स्थानों को जानना और उन्हें उपयोग करने के तरीके सीखने शुरू किए।
- खेती की शुरुआत – मनुष्य ने बीजों को बोना, मिट्टी की देखभाल करना और फसलों को चिड़ियों और जानवरों से बचाना सीखा। इस तरह, वे किसान बन गए। गेहूँ और जौ प्रमुख शुरुआती फसलें थीं।
- पशुपालन की शुरुआत – सबसे पहले जिस जानवर को पालतू बनाया गया, वह कुत्ता का जंगली पूर्वज था। बाद में, भेड़, बकरी, गाय और सूअर जैसे जानवरों को पालतू बनाया गया। इन जानवरों को झुंड में रखा जाता था और ये अक्सर हिंसक जानवरों से सुरक्षित रहते थे।
बसने की प्रक्रिया – नवीन जीवन शैली का जन्म
जैसे ही लोगों ने पौधे उगाना शुरू किया, उन्हें उनकी देखभाल के लिए एक ही जगह पर लंबे समय तक रहना पड़ा। बीज बोने से लेकर फसल के पकने तक, सिंचाई करने और खरपतवार हटाने तक, इसमें काफी समय लगता था। इसलिए, लोगों ने स्थाई घर बनाना शुरू कर दिया, जो बसने की प्रक्रिया की शुरुआत थी।
नवीन जीवन शैली
खेती और पशुपालन ने मनुष्य के जीवन में एक नवीन जीवन शैली को जन्म दिया-
- भंडारण की आवश्यकता – अनाज को भोजन और बीज दोनों के रूप में सुरक्षित रखना आवश्यक था। इसके लिए मिट्टी के बड़े बर्तन बनाए गए, टोकरियाँ बुनी गईं, या फिर ज़मीन में गड्ढे खोदे गए।
- नए उपकरण – खेती के लिए नए तरह के औजारों की ज़रूरत पड़ी। अनाज पीसने और कूटने के लिए ओखली और मूसल का उपयोग किया जाने लगा।
जानवर – चलते फिरते खाद्य भंडार
जानवर केवल पालन-पोषण के लिए ही नहीं थे, बल्कि उन्हें चलते फिरते खाद्य भंडार भी माना जाता था।
- खाद्य स्रोत – इन पालतू जानवरों से दूध प्राप्त होता था, जो भोजन का एक अच्छा स्रोत है।
- मांस आपूर्ति – जब ज़रूरत होती थी, तो इन जानवरों का मांस भी खाया जाता था।
- खेती में सहायक – कुछ जानवरों का इस्तेमाल खेती और सामान ढोने के लिए भी किया जाता था। इस प्रकार, ये मनुष्य के जीवन की सुरक्षा और स्थिरता दोनों को बढ़ाते थे।
स्थाई जीवन की ओर
कृषि के कारण, लोग झोपड़ियों और घरों में रहने लगे। पुरातत्वविदों को कई स्थलों पर झोपड़ियों और घरों के अवशेष मिले हैं।
- बुर्जहोम (कश्मीर) – यहाँ के लोग गड्ढे के नीचे घर बनाते थे, जिन्हें गर्तवास कहा जाता है। इनमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ होती थीं। इससे उन्हें ठंड से सुरक्षा मिलती थी।
- स्थाई जीवन के प्रमाण – मिट्टी के बर्तन मिले हैं, जिनका उपयोग भंडारण के लिए किया जाता था। ये बर्तन सजावटी भी होते थे और इनमें भोजन पकाया भी जाता था।
अलग-अलग तरह के भोजन
पुरातत्वविदों ने खुदाई में कई अनाज और जानवरों की हड्डियाँ पाई हैं, जिनसे पता चलता है कि लोग अलग-अलग क्षेत्रों में किस तरह के भोजन का उपयोग करते थे।
| स्थल का नाम | अनाज और हड्डियाँ | वर्तमान स्थान |
| मेहरगढ़ | गेहूँ, जौ, भेड़, बकरी | पाकिस्तान |
| कोलडिहवा | चावल, जानवरों की हड्डियाँ | उत्तर प्रदेश |
| महागढ़ा | चावल, पालतू सूअर | उत्तर प्रदेश |
| गुफकराल | गेहूँ, दलहन, भेड़, बकरी | कश्मीर |
| चिरांद | गेहूँ, जौ, दलहन, बैल | बिहार |
| हल्लूर | ज्वार-बाजरा, भेड़, बकरी | आंध्र प्रदेश |
| पय्यांपल्ली | काला चना, ज्वार-बाजरा, भेड़ | तमिलनाडु |
मेहरगढ़ में जीवन और मृत्यु
मेहरगढ़ (जो अब पाकिस्तान में है) संभवतः वह स्थान है जहाँ सबसे पहले गेहूँ और जौ उगाए गए और भेड़-बकरी पाली गईं। यह ईरान जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण रास्ते- बोलन दर्रे के पास स्थित है।
- आवास के प्रमाण – पुरातत्वविदों ने यहाँ चौकोर और आयताकार चार या उससे अधिक कमरों वाले घरों के अवशेष खोजे हैं।
- मृत्यु के बाद जीवन – मेहरगढ़ के लोग मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास करते थे। इसलिए, कब्रों में मृतक के साथ कुछ सामान भी रखे जाते थे। एक कब्र में मृतक के साथ एक बकरी भी मिली है, जिसे संभवतः अगले जन्म में भोजन के रूप में इस्तेमाल करने के लिए रखा गया होगा।
दाओजली हेडिंग
दाओजली हेडिंग असम में ब्रह्मपुत्र की घाटी की पहाड़ियों पर स्थित है। यह चीन और म्यांमार की ओर जाने वाले रास्ते पर स्थित है।
- पुरातात्विक खोज – यहाँ खल और मूसल जैसे औजार मिले हैं। इससे पता चलता है कि यहाँ लोग भोजन के लिए अनाज उगाते थे।
- जेडाइट पत्थर – दाओजली हेडिंग में जेडाइट पत्थर भी मिला है। यह पत्थर संभवतः चीन से आया होगा। इससे पता चलता है कि इन क्षेत्रों में व्यापार और संपर्क था।
चुनौतियां
- जलवायु पर निर्भरता बनी रही
- अनाज भंडारण की सीमित तकनीक
- रोगों का बढ़ता खतरा
- भूमि विवाद और संसाधन प्रतिस्पर्धा
सरकारी पहल
(यद्यपि ऐतिहासिक विषय है, UPSC संदर्भ में आधुनिक पहल जोड़ना आवश्यक है)
- कृषि अनुसंधान को बढ़ावा
- जनजातीय विकास कार्यक्रम
- पुरातत्व उत्खनन संरक्षण
- संग्रहालय और शिक्षण संस्थानों में इतिहास जागरूकता कार्यक्रम
UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- नवपाषाण युग की शुरुआत – लगभग 12,000 साल पहले।
- मेहरगढ़ की भौगोलिक स्थिति – बोलन दर्रे के पास, पाकिस्तान।
- गर्तवास – कश्मीर के बुर्जहोम में गड्ढे के नीचे बने घर।
- पहला पालतू पशु – कुत्ते का जंगली पूर्वज।
- जेडाइट पत्थर – दाओजली हेडिंग से प्राप्त हुआ, जो संभवतः चीन से आया था।
- कोल्डिहवा (U.P.) – चावल के सबसे पुराने प्रमाण यहीं से मिले हैं।
UPSC मुख्य परीक्षा – उत्तर लेखन कोण
भोजन संग्रह से उत्पादन तक का परिवर्तन भारतीय सभ्यता की नींव थी- चर्चा करें।
- खाद्य सुरक्षा की गारंटी – उत्पादन से पहले अनिश्चितता थी। कृषि ने स्थाई और सुनिश्चित खाद्य आपूर्ति दी, जिससे जनसंख्या बढ़ी।
- स्थाई बस्तियों का विकास – कृषि के कारण लोगों ने नदी घाटियों में स्थाई गाँव बसाना शुरू किए। इससे सामाजिक संगठन और समुदायों का जन्म हुआ।
- श्रम विभाजन की शुरुआत – खेती के काम के अलावा, लोग बर्तन बनाने, टोकरियाँ बुनने और औजार बनाने जैसे कार्यों में भी संलग्न होने लगे। यह विशिष्टीकरण की शुरुआत थी।
- नए धार्मिक विश्वास – मृत्यु के बाद जीवन (मेहरगढ़) और प्रकृति की पूजा जैसे नए रीति-रिवाज और विश्वास विकसित हुए।
- आर्थिक विकास – अनाज और पशुओं के आदान-प्रदान से व्यापार की शुरुआत हुई, जैसा कि दाओजली हेडिंग में पाए गए जेडाइट पत्थर से संकेत मिलता है।
निष्कर्ष
भोजन संग्रह से उत्पादन तक का सफर सिर्फ एक आर्थिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह मानव के सामाजिक, सांस्कृतिक और तकनीकी विकास का एक अभूतपूर्व अध्याय था। कृषि और पशुपालन ने मनुष्य को प्रकृति पर अधिक नियंत्रण दिया और खानाबदोशी के जीवन से निकालकर ग्रामीण जीवन की ओर अग्रसर किया। मेहरगढ़ और दाओजली हेडिंग जैसे स्थल इस बात के प्रमाण हैं कि इस नवीन जीवन शैली ने भारतीय उपमहाद्वीप में किस प्रकार स्थाई बस्तियों और जटिल समाजों की नींव रखी। यह क्रांति आज की हमारी सभ्यता और संस्कृति का मूल आधार है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. नवपाषाण क्रांति (Neolithic Revolution) क्या है? A. नवपाषाण क्रांति उस समय को कहते हैं जब मानव ने शिकार और संग्रहण छोड़कर खेती करना और पशुपालन शुरू कर दिया, जिससे उसकी जीवनशैली में मौलिक परिवर्तन आया।
Q2. मेहरगढ़ क्यों प्रसिद्ध है? A. मेहरगढ़ वह स्थल है जहाँ गेहूँ और जौ उगाने और भेड़-बकरी पालने के सबसे पुराने ज्ञात प्रमाण मिले हैं, जो स्थाई जीवन के आरंभ का संकेत देते हैं।
Q3. दाओजली हेडिंग (Daojali Hading) का UPSC के लिए क्या महत्व है? A. दाओजली हेडिंग असम में स्थित एक नवपाषाण स्थल है जहाँ से कृषि उपकरण और जेडाइट पत्थर मिला है, जो इस क्षेत्र में प्रारंभिक कृषि और संभवतः चीन के साथ व्यापारिक संपर्क को दर्शाता है।
Q4. गर्तवास (Pit Dwellings) क्या थे? A. गर्तवास ज़मीन के नीचे खोदे गए घर थे, जैसे कि कश्मीर के बुर्जहोम में पाए गए। ये शुरुआती लोग ठंड से बचने के लिए इनका उपयोग करते थे।
Q5. बसने की प्रक्रिया से क्या अभिप्राय है? A. बसने की प्रक्रिया वह है जिसमें मनुष्य ने अपनी ज़रूरतों के लिए पौधों को उगाना और जानवरों को पालना शुरू किया। यह चयन पौधों और जानवरों दोनों के लिए किया गया, जिसमें उन्हीं को चुना जाता था जो रोग-प्रतिरोधी होते थे और जिनका व्यवहार शांत होता था।
