परिचय
NCERT कक्षा 6, अध्याय 9 – खुशहाल गाँव और समृद्ध शहर- प्राचीन भारत के आर्थिक और सामाजिक इतिहास की रूपरेखा प्रस्तुत करता है- यह अध्याय लोहे के औजारों के प्रसार से शुरू होकर अरिकमेडु जैसे शहरी केंद्रों तक की यात्रा कराता है- यह समझना महत्वपूर्ण है कि कैसे तकनीकी प्रगति- जैसे लोहे के औजार और सिंचाई- ने कृषि उत्पादन बढ़ाया- इससे अतिरिक्त उत्पादन पैदा हुआ जिसने समृद्ध शहरों और व्यापारिक नेटवर्क के उदय का मार्ग प्रशस्त किया- यह आर्थिक आधार ही राजनीतिक संरचनाओं का आधार बना-

अर्थ और परिभाषा
- खुशहाल गाँव और समृद्ध शहर का अर्थ है ऐसा ग्रामीण व शहरी ढांचा जहां कृषि व शिल्प एक साथ विकसित हों और विनिमय, बाजार व सामाजिक संगठन से जीवनस्तर बेहतर हो।
- सरल भाषा में यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और शहरी व्यापार-शिल्प के मेल का स्वरूप दर्शाता है – जिसमें उत्पादन, सिचाई, औजार व विनिमय के साधन मुख्य भूमिका निभाते हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- प्राचीन समाजों में लोहे के औजारों का आगमन कृषि क्रांति को और तीव्र बनाता है – जिससे उपज बढ़ी और बाजार का विकास हुआ।
- दक्षिण भारत के पुरातात्विक स्थल जैसे कि अरिकमेडु व बेरिगाज़ा से मिले अवशेषों ने नगर जीवन व समुद्री व्यापार की जानकारी दी है।
- नगरों में शिल्प जगत, मिट्टी व धातु शिल्प तथा सिक्कों से विनिमय का व्यवस्थित रूप स्पष्ट होता है।
विशेषताएँ और लक्षण
- कृषि में लोहे की औजारों का उपयोग – हल, कुल्हाड़ी व कुदाल से कठिन जमीन भी जोती जा सकती थी।
- सिचाई के उपाय – कुएँ, तालाब व नहर जैसे छोटे-स्तरीय प्रबंध से बहुमूल्य फसल सुरक्षा मिलती थी।
- नगरों में बहु-विविध गतिविधियाँ – शिल्प, व्यापार, मछली पालन और समुद्री व्यापार।
- विनिमय के अन्य साधन – सिक्के व वस्तु विनिमय के साथ साथ स्थानीय विनिमय प्रणालियाँ प्रचलित थीं।
- सामाजिक संगठन – कारीगर समुदाय, बाजार पर नियंत्रण और नियमावली जैसे सूत काटने व बुनने के नियम।
कारण व प्रेरक कारक
- लोहे की उपलब्धता – उपकरणों का सुलभ होना कृषि क्षमता बढ़ाने का मुख्य कारण था।
- सिचाई व जल व्यवस्था – पानी की उपलब्धता से बहुवर्षीय फसल सम्भव हुई।
- शिल्पकार कौशल व बाजार की माँग – शिल्पकला ने नगरों को आर्थिक केंद्र बनाया।
- व्यापार मार्ग व समुद्री संपर्क – नगरों की समृद्धि में बड़ा योगदान।
फायदे और नुकसान
- फायदे – कृषि उत्पादन में वृद्धि – जीवनस्तर में सुधार – बाज़ारिक लेनदेन से समृद्धि – सामाजिक तथा शैक्षिक विकास।
- नुकसान – संसाधनों का असमान उपयोग – शहरी-कृषि अन्तर से सामाजिक असमानताएँ – पर्यावरणीय दबाव व भूमि क्षरण।
गाँव में कौन रहते थे- सामाजिक ढाँचा
ग्रामीण समाज विभिन्न वर्गों से मिलकर बना था-
- बड़े भूस्वामी (गृहपति)– ये संपन्न किसान थे जिनके पास बड़ी जोतें होती थीं-
- छोटे किसान और खेतिहर मजदूर– ये अपनी छोटी जोत पर काम करते थे या बड़े भूस्वामियों के खेतों में मजदूरी करते थे-
- दास (गुलाम)– युद्धबंदियों या ऋण न चुका पाने वालों को दास बनाया जाता था- वे बिना मजदूरी के कठिन श्रम करते थे-
- कारीगर– जैसे लुहार- बढ़ई- कुम्हार- गाँव की दैनिक जरूरतों को पूरा करते थे-
प्राचीन तमिल रचनाएँ- साहित्यिक साक्ष्य
संगम साहित्य उस काल के जीवन का अनमोल स्रोत है- ये रचनाएँ लगभग 2300 साल पुरानी हैं-
- इनमें तिनै (भूमि) के आधार पर विभाजन मिलता है- जैसे- कुरिन्जी (पहाड़ी इलाका)- मुल्लई (वन प्रदेश)- मरुथम (उपजाऊ भूमि)- नेईथल (तटीय इलाका) और पालई (बंजर भूमि)-
- इन क्षेत्रों के निवासियों के व्यवसाय- रीति-रिवाज और जीवन शैली का सजीव वर्णन मिलता है-
- ये रचनाएँ उस समय के सामाजिक- आर्थिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर प्रकाश डालती हैं-
नगरों की कहानी- विविध स्रोत
प्राचीन नगरों के बारे में जानकारी कई स्रोतों से मिलती है-
- साहित्यिक कहानियाँ– जातक कथाओं और अन्य ग्रंथों में व्यापारियों- शिल्पियों और नगर जीवन का उल्लेख है-
- यात्रा विवरण– मेगस्थनीज (यूनानी राजदूत) और फाह्यान जैसे विदेशी यात्रियों ने पाटलिपुत्र जैसे शहरों का विस्तृत वर्णन किया है-
- मूर्ति कला और पुरातत्व– खुदाई में मिली मूर्तियाँ- बर्तन- आभूषण और इमारतों के अवशेष सीधे प्रमाण उपलब्ध कराते हैं-
एक नगर का सूक्ष्म निरीक्षण- अरिकमेडु
अरिकमेडु (पांडिचेरी के पास) एक प्रमुख रोमन व्यापारिक केंद्र था-
- यहाँ एम्फोरा (शराब रखने के मटके) और अरेटाइन वेयर (लाल चमकदार बर्तन) जैसी रोमन वस्तुएँ मिली हैं- जो भूमध्यसागरीय क्षेत्र से व्यापार की पुष्टि करती हैं-
- यहाँ से माणिक्य और कार्नेलियन जैसे बहुमूल्य पत्थरों के मनके बनाने के कारखाने के साक्ष्य मिले हैं-
- यह बंदरगाह भारत और रोम के बीच सक्रिय व्यापार का केंद्र था- जहाँ से मसाले- मोती- रत्न और मलमल निर्यात होते थे-
तुलना सारणी
| पहलू – ग्रामीण व्यवस्था | शहरी व्यवस्था | प्रभाव |
|---|---|---|
| उत्पादन के साधन – कृषि केंद्रित | शिल्प व व्यापार केंद्रित | आर्थिक परस्पर निर्भरता |
| विनिमय – वस्तु व स्थानीय | सिक्का व अंतरक्षेत्रीय व्यापार | बाजार विस्तार |
| सामाजिक संरचना – ग्राम पंचायत जैसी | कारीगर गिल्ड व व्यापारिक समूह | नियम व कस्टम भिन्नता |
मुद्दे व चुनौतियाँ
- सिंचाई की अनियमितता व मौसमी जोखिम – परिणामस्वरूप फसल अस्थिरता।
- बाज़ार में असमानता – कुछ नगर अत्यधिक समृद्ध, पर ग्रामीण पिछड़े रहे।
- विनिमय के मानकीकृत साधनों की कमी पहले अधिक थी, जिससे लेनदेन कठिन हुया करता था।
सरकार प्रयास व समाधान
- कृषि सुधारों में सिंचाई परियोजनाओं का विकास – नहर, तालाब और कुएँ सुधारने के प्रयास।
- शिल्पकारों के प्रशिक्षण व संरक्षण हेतु योजनाएँ – कौशल संवर्धन व विपणन समर्थन।
- बाजार अभिकरण व मुद्रा मानकीकरण से व्यापार आसान बनाना।
- ग्रामीण बुनियादी सेवाओं में निवेश से असमानता कम करना।
बेरिगाज़ा- एक महत्वपूर्ण बंदरगाह
बेरिगाज़ा (आधुनिक गुजरात में भड़ौच) पश्चिमी तट का प्रमुख बंदरगाह था-
- पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी नामक यात्रा-वृत्तांत में इसका विस्तृत वर्णन है-
- यहाँ से काली मिर्च- हाथी दाँत- रेशम और सूती कपड़ा जैसी वस्तुएँ निर्यात की जाती थीं-
- यह व्यापारिक मार्ग रोम- अफ्रीका और पश्चिमी एशिया से जुड़ता था-
आर्थिक जीवन- सिक्के और विनिमय
व्यापार के विस्तार ने मुद्रा के प्रचलन को बढ़ावा दिया-
- आहत सिक्के (पंच-मार्क्ड कोइन्स) सबसे पुराने सिक्कों में से थे- जिन पर विभिन्न चिह्न अंकित होते थे-
- सोने- चाँदी और ताँबे के सिक्के राजाओं और व्यापारिक गिल्डों द्वारा जारी किए जाते थे-
- विनिमय के अन्य साधन भी प्रचलन में थे- जैसे निष्क और शतमान जैसी माप की इकाइयाँ- सीधा वस्तु विनिमय भी होता था-
नगर- शिल्प और उद्योगों का केंद्र
शहर विभिन्न आर्थिक गतिविधियों के केंद्र थे-
- शिल्प तथा शिल्पकार– शहरों में विशेषज्ञ शिल्पकारों की बस्तियाँ होती थीं- जैसे बुनकर- धातुकार- मूर्तिकार- बढ़ई आदि-
- श्रेणी (गिल्ड्स)– एक ही शिल्प के कारीगर संगठन बना लेते थे- जिन्हें श्रेणी कहा जाता था- ये प्रशिक्षण- गुणवत्ता नियंत्रण और व्यापार में सहायता करती थीं-
- सूत काटने और बुनने के नियम– कपड़ा उत्पादन एक प्रमुख उद्योग था- शास्त्रों में सूत की गुणवत्ता- बुनाई के तरीकों और रंगाई के नियमों का उल्लेख मिलता है- मलमल जैसे बारीक कपड़े विश्वप्रसिद्ध थे-
यूपीएससी मेन्स के लिए नोट्स
- लोहे के औजारों ने कृषि अधिशेष पैदा किया- जो राज्य- नगर और व्यापार के उदय का आधार बना-
- सिंचाई परियोजनाओं ने कृषि को मौसमी अनिश्चितता से बचाया और स्थायी बस्तियों को बढ़ावा दिया-
- ग्रामीण सामाजिक स्तरीकरण (भूस्वामी- छोटे किसान- दास) ने बाद की जटिल जाति व्यवस्था की नींव रखी-
- अरिकमेडु और बेरिगाज़ा जैसे बंदरगाह प्राचीन भारत के व्यापक समुद्री व्यापार नेटवर्क और वैश्विक संपर्कों के प्रमाण हैं-
- श्रेणी (गिल्ड्स) प्राचीन भारत में संगठित उद्योग और व्यावसायिक स्वशासन का एक महत्वपूर्ण रूप थीं-
यूपीएससी प्रीलिम्स के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- लोहे का प्रयोग लगभग 3000 वर्ष पूर्व उत्तरी भारत में शुरू हुआ-
- संगम साहित्य की रचना लगभग 2300 वर्ष पूर्व हुई-
- अरिकमेडु से मिले ‘अरेटाइन वेयर’ रोमन व्यापार के साक्ष्य हैं-
- ‘पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी’ एक यूनानी नाविक द्वारा लिखित पहली शताब्दी का समुद्री मार्गदर्शक है- जिसमें भारतीय बंदरगाहों का वर्णन है-
- आहत सिक्के आमतौर पर चाँदी और ताँबे के बने होते थे-
मेन्स उत्तर लेखन दृष्टिकोण
प्रश्न संभावना– “प्राचीन भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया में तकनीकी प्रगति और आर्थिक अधिशेष की भूमिका की विवेचना कीजिए-“
वैल्यू एडेड पॉइंट्स–
- लोहे के औजारों द्वारा कृषि उत्पादकता में वृद्धि को आर्थिक आधार के रूप में प्रस्तुत करें-
- सिंचाई जैसी तकनीकी जानकारी को ‘स्थिरता’ के कारक के रूप में जोड़ें-
- अरिकमेडु के उदाहरण से दिखाएँ कि यह अधिशेष स्थानीय नहीं रहा- बल्कि दूरगामी व्यापार नेटवर्क से जुड़कर शहरी समृद्धि का कारण बना-
- निष्कर्ष में- आज के ‘स्मार्ट सिटी’ मिशन और प्राचीन शहरों के विकास के आर्थिक आधार में समानता/अंतर पर एक संक्षिप्त टिप्पणी कर सकते हैं-
पिछले वर्षों के प्रश्न
2023 प्रीलिम्स– ‘पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी’ के संदर्भ में- निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है? (इसमें बेरिगाज़ा का उल्लेख था)।
2019 प्रीलिम्स– भारतीय उपमहाद्वीप में लोहे के प्रयोग के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
यूपीएससी प्रीलिम्स एमसीक्यू अभ्यास
- अरिकमेडु से प्राप्त ‘अरेटाइन वेयर’ किस सभ्यता के साथ व्यापार का संकेत देते हैं?
(क) चीनी
(ख) मेसोपोटामिया
(ग) रोमन
(घ) यूनानी - संगम साहित्य में वर्णित ‘मरुथम’ भू-प्रकार किससे संबंधित है?
(क) पहाड़ी इलाका
(ख) उपजाऊ मैदानी क्षेत्र
(ग) तटीय इलाका
(घ) बंजर भूमि - प्राचीन भारत में शिल्पकारों के संगठन को क्या कहा जाता था?
(क) निगम
(ख) श्रेणी
(ग) सभा
(घ) नगरम् - बेरिगाज़ा बंदरगाह किस राज्य में स्थित था?
(क) तमिलनाडु
(ख) गुजरात
(ग) केरल
(घ) ओडिशा - कृषि उत्पादन बढ़ाने में लोहे के किस औजार ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?
(क) तलवार
(ख) हल का फाल
(ग) छुरी
(घ) कैंची
(उत्तर- 1-ग, 2-ख, 3-ख, 4-ख, 5-ख)
निष्कर्ष
NCERT कक्षा 6 का यह अध्याय स्पष्ट करता है कि प्राचीन भारत के खुशहाल गाँव और समृद्ध शहर एक-दूसरे से जुड़े हुए थे- लोहे के औजार और सिंचाई जैसी तकनीकी प्रगति ने कृषि अधिशेष पैदा किया- यही अधिशेष व्यापार- शिल्प और विशिष्टीकरण का आधार बना- जिससे शहर फले-फूले- अरिकमेडु और बेरिगाज़ा जैसे बंदरगाह इस बात के प्रमाण हैं कि यह अर्थव्यवस्था वैश्विक व्यापार नेटवर्क से जुड़ी हुई थी- इस प्रकार- तकनीक- अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना ने मिलकर प्राचीन भारत के ग्रामीण और नगरीय जीवन को आकार दिया-
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- प्रश्न- लोहे के औजारों ने कृषि को कैसे बदला?
उत्तर- लोहे के मजबूत हलों से गहरी जुताई हुई- कुल्हाड़ियों से जंगल साफ हुए और करछी- दरांती से कटाई आसान हुई- इससे अधिक भूमि पर खेती होने लगी और उत्पादन बढ़ा- - प्रश्न- अरिकमेडु की खोज का क्या महत्व है?
उत्तर- अरिकमेडु से रोमन साम्राज्य (अरेटाइन वेयर- एम्फोरा) के साथ सीधे समुद्री व्यापार के सबूत मिलते हैं- यह प्राचीन भारत के विदेश व्यापार और शिल्प उत्पादन (मनके बनाना) को दर्शाता है- - प्रश्न- प्राचीन भारत में विनिमय के कौन-कौन से साधन थे?
उत्तर- विनिमय के मुख्य साधन थे- आहत एवं राजकीय सिक्के (सोना- चाँदी- ताँबा)- वस्तु विनिमय और निष्क- शतमान जैसी मानक माप इकाइयाँ- - प्रश्न- संगम साहित्य से हमें क्या जानकारी मिलती है?
उत्तर- संगम साहित्य से तमिल क्षेत्र के भूदृश्यों (तिनै)- लोगों के व्यवसाय- सामाजिक जीवन- आर्थिक गतिविधियों और प्रारंभिक राज्यों के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है- - प्रश्न- बेरिगाज़ा बंदरगाह क्यों प्रसिद्ध था?
उत्तर- बेरिगाज़ा पश्चिमी तट का एक प्रमुख बंदरगाह था- जहाँ से काली मिर्च- हाथी दाँत- रत्न और कपड़े का निर्यात रोम- अफ्रीका और पश्चिमी एशिया को होता था- ‘पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी’ में इसका वर्णन है-
