1. परिचय (Introduction)
संविधान की प्रस्तावना (Preamble of the Constitution) भारतीय संविधान का परिचय पत्र, भूमिका और सार है। प्रख्यात न्यायविद् एन.ए. पालकीवाला ने इसे ‘संविधान का परिचय पत्र’ (Identity Card of the Constitution) कहा है। UPSC के पाठ्यक्रम (GS-2: भारतीय संविधान) में यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उन आदर्शों और दर्शन को परिभाषित करता है जिन पर पूरा भारतीय राज्य आधारित है। एक प्रशासक के रूप में, आपको संविधान की मूल भावना को समझने के लिए प्रस्तावना का गहन ज्ञान होना अनिवार्य है।
2. अवधारणा और मुख्य समझ (Concept & Core Understanding)

संविधान की प्रस्तावना लैटिन शब्द ‘Praeambulus’ से निकली है, जिसका अर्थ है “पहले चलने वाला”। यह एक कानूनी दस्तावेज का परिचयात्मक भाग है जो इसके दर्शन, उद्देश्यों और उपयोग को स्पष्ट करता है।
- स्रोत (Source): “हम भारत के लोग” (We, the People of India) – यह दर्शाता है कि संविधान भारत के लोगों से अपनी शक्ति प्राप्त करता है।
- प्रकृति (Nature): भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और गणतंत्र (Sovereign, Socialist, Secular, Democratic, Republic) राष्ट्र है।
- उद्देश्य (Objective): न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व।
- अंगीकरण की तिथि: 26 नवंबर, 1949।
महत्वपूर्ण नोट: प्रस्तावना न तो विधायिका की शक्ति का स्रोत है और न ही उसकी शक्तियों पर प्रतिबंध। यह गैर-न्यायिक (Non-justiciable) है, अर्थात इसके प्रावधानों को न्यायालयों में चुनौती नहीं दी जा सकती (सिवाय व्याख्या के लिए)।
3. पृष्ठभूमि और विकास (Background & Evolution)
संविधान की प्रस्तावना का ऐतिहासिक आधार पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा में पेश किया गया ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ (Objective Resolution) है।
- ऐतिहासिक संदर्भ: इसे 22 जनवरी, 1947 को संविधान सभा द्वारा अपनाया गया।
- संशोधन: प्रस्तावना में अब तक केवल एक बार संशोधन किया गया है – 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा। इसके तहत तीन नए शब्द जोड़े गए:
- समाजवादी (Socialist)
- धर्मनिरपेक्ष (Secular)
- अखंडता (Integrity)
- वैश्विक प्रेरणा: अमेरिकी संविधान (USA) प्रस्तावना के साथ शुरू होने वाला पहला संविधान था, जिससे भारत ने प्रेरणा ली।
4. संवैधानिक और कानूनी आधार (Constitutional & Legal Base)
संविधान की प्रस्तावना की कानूनी स्थिति को लेकर सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के निर्णयों में बदलाव आया है। UPSC मेन्स के लिए यह अनुभाग सबसे महत्वपूर्ण है।
प्रमुख निर्णय (Key Judgments):
- बेरुबारी यूनियन मामला (1960): सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रस्तावना संविधान का हिंसा नहीं है।
- केशवानंद भारती मामला (1973): ऐतिहासिक निर्णय में कोर्ट ने पूर्व के फैसले को पलट दिया और कहा कि प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग (Integral Part) है। इसे संविधान के ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) का हिस्सा माना गया।
- एल.आई.सी. ऑफ इंडिया मामला (1995): पुनः पुष्टि की गई कि प्रस्तावना संविधान का आंतरिक हिस्सा है।
5. मुख्य विश्लेषणात्मक आयाम (Core Analytical Dimensions)
संविधान की प्रस्तावना के मुख्य शब्दों (Keywords) का विश्लेषण GS के विभिन्न पेपर्स के लिए अनिवार्य है।
प्रस्तावना के मुख्य शब्द (Keywords):
- संप्रभुता (Sovereignty): भारत न तो किसी अन्य देश पर निर्भर है और न ही किसी का डोमिनियन है। यह अपने आंतरिक और बाहरी मामलों में निर्णय लेने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है।
- समाजवादी (Socialist): भारत ‘लोकतांत्रिक समाजवाद’ (Democratic Socialism) में विश्वास करता है, न कि साम्यवादी समाजवाद में। इसका उद्देश्य गरीबी, उपेक्षा और अवसर की असमानता को समाप्त करना है (गांधीवादी + मार्क्सवादी विचारधारा का मिश्रण)।
- धर्मनिरपेक्ष (Secular): राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है। सभी धर्मों को समान सम्मान और संरक्षण प्राप्त है (अनुच्छेद 25-28)।
- लोकतांत्रिक (Democratic): सर्वोच्च शक्ति जनता के हाथ में है। भारत में ‘अप्रत्यक्ष लोकतंत्र’ (संसदीय प्रणाली) है।
- गणतंत्र (Republic): राज्य का प्रमुख (राष्ट्रपति) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है, न कि वंशानुगत होता है (जैसे ब्रिटेन में राजा)।
न्याय, स्वतंत्रता और समानता (Justice, Liberty, Equality):
- न्याय: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक (रूसी क्रांति से प्रेरित)।
- स्वतंत्रता: विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की (फ्रांसीसी क्रांति से प्रेरित)।
- समानता: प्रतिष्ठा और अवसर की।
- बंधुत्व: व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता व अखंडता सुनिश्चित करना।
6. हितधारक विश्लेषण (Stakeholder Analysis)
- सरकार (Government): प्रस्तावना सरकार के लिए एक ‘लाइटहाउस’ की तरह है, जो नीति निर्माण (Policy Making) में मार्गदर्शन करती है (विशेषकर DPSP के कार्यान्वयन में)।
- नागरिक (Citizens): यह नागरिकों को उनके अधिकारों (स्वतंत्रता, समानता) और कर्तव्यों (बंधुत्व) की याद दिलाती है।
- कमजोर वर्ग (Vulnerable Sections): ‘सामाजिक और आर्थिक न्याय’ तथा ‘अवसर की समानता’ सीधे तौर पर वंचित वर्गों के उत्थान (आरक्षण, कल्याणकारी योजनाएं) का आधार बनते हैं।
- न्यायपालिका (Judiciary): जब संविधान की भाषा अस्पष्ट होती है, तो न्यायपालिका व्याख्या के लिए प्रस्तावना का सहारा लेती है।
7. लाभ बनाम चुनौतियां (Advantages vs Challenges)
| लाभ (Advantages) | चुनौतियां (Challenges) |
| संविधान की व्याख्या में सहायक (Interpretation Tool)। | यह ‘न्याययोग्य’ (Justiciable) नहीं है, इसे कोर्ट द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता। |
| राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बढ़ावा देती है। | ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ जैसे शब्दों की परिभाषा स्पष्ट नहीं है, जिससे राजनीतिक बहस होती है। |
| भारत के राजनीतिक, नैतिक और धार्मिक मूल्यों का सार है। | वैश्वीकरण (Globalization) के दौर में ‘संप्रभुता’ की अवधारणा बदल रही है। |
8. समसामयिक घटनाक्रम (Current Affairs Integration)
संविधान की प्रस्तावना अक्सर चर्चा में रहती है:
- नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) विरोध: प्रदर्शनकारियों द्वारा प्रस्तावना का पाठ (Preamble Reading) किया गया, जो संवैधानिक मूल्यों के प्रति जागरूकता को दर्शाता है।
- शब्द हटाने की मांग: समय-समय पर जनहित याचिकाएं (PIL) दायर की जाती हैं कि ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाया जाए, क्योंकि ये मूल संविधान (1950) में नहीं थे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ये अब ‘मूल ढांचे’ का हिस्सा हैं।
- संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality): हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों (जैसे सबरीमाला, समलैंगिकता) में प्रस्तावना में निहित ‘गरिमा’ और ‘स्वतंत्रता’ के आधार पर निर्णय दिए हैं।
9. विगत वर्षों के प्रश्न विश्लेषण (PYQ Analysis)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims):
- 2020: “भारत के संविधान की उद्देशिका…” (उत्तर: संविधान का भाग है किंतु उसके अन्य भागों से स्वतंत्र होकर उसका कोई विधिक प्रभाव नहीं है)।
- 2017: “आर्थिक न्याय” को संविधान के किन भागों में उद्देश्यों के रूप में प्रदान किया गया है? (उत्तर: प्रस्तावना और DPSP)।
- 2013: “आर्थिक न्याय” (दोहराव)।
मुख्य परीक्षा (Mains):
- 2016: “संविधान की प्रस्तावना में ‘गणराज्य’ शब्द के साथ जुड़े विशेषणों पर चर्चा कीजिए। क्या वे वर्तमान परिस्थितियों में प्रासंगिक हैं?”
10. प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Prelims MCQ Section)
Q1. भारतीय संविधान की प्रस्तावना के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:
- यह विधायिका की शक्तियों का स्रोत है।
- 42वें संशोधन द्वारा इसमें ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘लोकतांत्रिक’ शब्द जोड़े गए।
- यह गैर-न्यायिक है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? (a) केवल 1 और 2 (b) केवल 2 (c) केवल 3 (d) 1, 2 और 3
सही उत्तर: (c) (व्याख्या: कथन 1 गलत है, यह शक्ति का स्रोत नहीं है। कथन 2 गलत है, ‘लोकतांत्रिक’ मूल संविधान में था; ‘समाजवादी’, ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ जोड़े गए थे।)
Q2. प्रस्तावना में वर्णित शब्दों का सही क्रम क्या है? (a) संप्रभु, समाजवादी, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, गणतंत्र (b) संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक, गणतंत्र (c) संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणतंत्र (d) समाजवादी, संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष, गणतंत्र, लोकतांत्रिक
सही उत्तर: (c) (ट्रिक याद रखें: S-S-S-D-R = Sovereign, Socialist, Secular, Democratic, Republic)
11. मेन्स उत्तर लेखन ढांचा (Mains Answer Writing Framework)
प्रश्न: “क्या प्रस्तावना भारतीय संविधान का अभिन्न अंग है? संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के आलोक में चर्चा कीजिये।” (150 शब्द)
ढांचा (Structure):
- परिचय: प्रस्तावना को परिभाषित करें और इसके स्रोत (उद्देश्य प्रस्ताव) का उल्लेख करें।
- मुख्य भाग (Body):
- बेरुबारी यूनियन (1960) – अंग नहीं माना।
- केशवानंद भारती (1973) – अंग माना और मूल ढांचे का सिद्धांत दिया।
- तर्क: यह अन्य भागों की तरह ही संविधान सभा द्वारा पारित किया गया था।
- निष्कर्ष: वर्तमान स्थिति – यह अभिन्न अंग है, संशोधन योग्य है (मूल ढांचे को छोड़कर) और संविधान की व्याख्या में मार्गदर्शक है।
12. मॉडल उत्तर (Model Answer)
प्रश्न: “प्रस्तावना में निहित ‘बंधुत्व’ (Fraternity) का आदर्श भारत की एकता और अखंडता के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?”
उत्तर: संविधान की प्रस्तावना में ‘बंधुत्व’ का अर्थ है – भाईचारे की भावना। डॉ. बी.आर. अंबेडकर के अनुसार, बंधुत्व के बिना स्वतंत्रता और समानता के आदर्श अधूरे हैं।
महत्व:
- विविधता में एकता: भारत जैसी बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक भूमि में, बंधुत्व ही वह गोंद है जो समाज को जोड़े रखता है।
- गरिमा का आश्वासन: प्रस्तावना स्पष्ट करती है कि बंधुत्व दो चीजों को सुनिश्चित करता है – व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता।
- अलगाववाद का विरोध: यह क्षेत्रवाद, सांप्रदायिकता और जातिवाद जैसी संकीर्ण विचारधाराओं के खिलाफ एक मनोवैज्ञानिक बाधा के रूप में कार्य करता है।
- मौलिक कर्तव्य: अनुच्छेद 51A(e) भी भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना के निर्माण को मौलिक कर्तव्य बनाता है।
निष्कर्षतः, एक मजबूत और एकीकृत भारत के निर्माण के लिए बंधुत्व केवल एक संवैधानिक आदर्श नहीं, बल्कि एक सामाजिक आवश्यकता है।
13. आरेख/फ्लोचार्ट सुझाव (Diagram Suggestions)
(नोट: परीक्षा में हाथ से बनाएँ)
- स्तंभ आरेख (Pillar Diagram): 4 स्तंभ दिखाएं – न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व -> इनके ऊपर टिका है ‘संविधान’।
- प्रवाह चार्ट (Flowchart): विकास क्रम: उद्देश्य प्रस्ताव (1946) -> संविधान सभा द्वारा अंगीकरण (1949) -> 42वां संशोधन (1976) -> वर्तमान स्वरूप।
14. आगे की राह (Way Forward)

संविधान की प्रस्तावना के मूल्यों को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रखना चाहिए।
- नीति निर्माण: सरकार को हर नीति बनाते समय ‘अंत्योदय’ (अंतिम व्यक्ति का उदय) और ‘सामाजिक न्याय’ को प्राथमिकता देनी चाहिए।
- नागरिक चेतना: स्कूलों और कॉलेजों में संवैधानिक मूल्यों की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए ताकि एक जिम्मेदार नागरिक वर्ग तैयार हो सके।
15. रिविजन ट्रिगर्स (Revision Triggers – Quick Recap)
- स्रोत: हम भारत के लोग।
- स्वरूप: S-S-S-D-R (संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणतंत्र)।
- उद्देश्य: J-L-E-F (न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व)।
- तारीख: 26 नवंबर 1949 (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत 2006 विक्रमी)।
- संशोधन: केवल एक बार (42वां, 1976)।
- महत्वपूर्ण केस: केशवानंद भारती (1973) – प्रस्तावना ‘मूल ढांचा’ है।
16. एक पृष्ठ का अंतिम सारांश (One-Page Final Summary)
(परीक्षा से ठीक पहले देखने के लिए)
- परिभाषा: संविधान का सार/आत्मा/कुंजी।
- उद्देश्य प्रस्ताव: जे.एल. नेहरू (13 दिसंबर 1946)।
- क्या यह न्याययोग्य है? नहीं (Non-justiciable)।
- क्या यह संविधान का भाग है? हाँ (केशवानंद भारती केस, 1973 के बाद से)।
- क्या इसमें संशोधन हो सकता है? हाँ (अनुच्छेद 368 के तहत), लेकिन ‘मूल ढांचे’ से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।
- न्याय: 3 प्रकार (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक)।
- स्वतंत्रता: 5 प्रकार (विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना)।
- समानता: 2 प्रकार (प्रतिष्ठा, अवसर)।
- महत्व: जहां संविधान की भाषा अस्पष्ट हो, वहां व्याख्या के लिए इसका उपयोग होता है।
