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परिचय

भारतीय रुपया हाल ही में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90.21 के ऐतिहासिक निम्न स्तर पर पहुँच गया है। यह घटनाक्रम भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कई महत्वपूर्ण संकेत लेकर आया है। रुपया पहली बार डॉलर के मुकाबले 90.21 पर आया-इससे देश में आयातित वस्तुओं, जैसे- कच्चा तेल (क्रूड ऑयल), सोना और इलेक्ट्रॉनिक सामानों की कीमतें बढ़ने की आशंका है, जिससे आम नागरिक और उद्योग दोनों प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, भारतीय निर्यातकों (Exporters) के लिए यह एक सकारात्मक खबर है क्योंकि उन्हें अब अपने माल के बदले अधिक रुपया मिलेगा। इसलिए, UPSC उम्मीदवारों को इस विषय की गहराई को समझना और इसके दीर्घकालिक प्रभावों का विश्लेषण करना आवश्यक है।

रुपया पहली बार डॉलर के मुकाबले 90.21 पर आया - कारण, प्रभाव और UPSC विश्लेषण
रुपया पहली बार डॉलर के मुकाबले 90.21 पर आया – कारण, प्रभाव और UPSC विश्लेषण

रुपये के मूल्य में गिरावट – अर्थ और परिभाषा

मुद्रा के मूल्य में गिरावट का अर्थ है- किसी एक मुद्रा (जैसे- भारतीय रुपया) का दूसरी मुद्रा (जैसे- अमेरिकी डॉलर) के मुकाबले कमजोर होना। इसे विनिमय दर में परिवर्तन के रूप में समझा जाता है। जब डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत 80 से बढ़कर 90.21 हो जाती है, तो इसका मतलब है कि अब एक डॉलर खरीदने के लिए पहले की तुलना में अधिक रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। यह स्थिति मुद्रा का अवमूल्यन (Currency Depreciation) कहलाती है।

यह विनिमय दर मुख्य रूप से मांग और आपूर्ति के सिद्धांतों पर आधारित होती है। जैसे-जैसे डॉलर की मांग रुपये की तुलना में बढ़ती है, वैसे-वैसे रुपये का मूल्य कम होता जाता है। इस प्रकार, यह विदेशी मुद्रा बाज़ार में रुपये की क्रय शक्ति में आई कमी को दर्शाता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि – रुपया-डॉलर का सफर

आजादी के समय, 1947 में, भारतीय रुपये और अमेरिकी डॉलर के बीच विनिमय दर $1 = ₹4 थी। भारत में 1990 के दशक तक विनिमय दर एक निश्चित सीमा में बनाए रखी जाती थी। हालाँकि, 1991 के आर्थिक संकट के बाद भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) को अपनाया।

1993 में, भारत ने विनिमय दर को बाज़ार-निर्धारित प्रणाली (Market-determined system) पर छोड़ दिया। इसका मतलब है कि अब रुपये का मूल्य बाज़ार की शक्तियों- मांग और आपूर्ति- के आधार पर तय होता है। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान और उसके बाद भी रुपये में अस्थिरता देखी गई, लेकिन यह पहली बार है कि रुपया 90 के ऐतिहासिक अंक को पार कर 90.21 पर आया है, जो एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है।

रुपये के मूल्य में गिरावट के कारण

रुपये के ऐतिहासिक रूप से कमजोर होने के पीछे कई जटिल वैश्विक और घरेलू कारण जिम्मेदार हैं।

वैश्विक कारक (Global Factors)

  • अमेरिकी फेडरल रिजर्व की कठोर नीतियाँ- जब अमेरिकी केंद्रीय बैंक (फेडरल रिजर्व) ब्याज दरें बढ़ाता है, तो निवेशक भारत जैसे विकासशील बाज़ारों से अपना पैसा निकालकर अमेरिकी बांड जैसे सुरक्षित निवेशों में लगाना शुरू कर देते हैं। परिणामस्वरूप, भारत से डॉलर का बहिर्वाह (outflow) होता है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है।
  • कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की ऊँची कीमतें- भारत अपनी कच्चे तेल की ज़रूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिसका भुगतान डॉलर में करना होता है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने पर भारत को अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे डॉलर की मांग में भारी वृद्धि होती है और रुपये पर दबाव पड़ता है।
  • वैश्विक आर्थिक मंदी की आशंका- दुनिया भर में मंदी की आशंका के चलते निवेशक सुरक्षित माने जाने वाले डॉलर की तरफ भागते हैं। इसके कारण, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) भारतीय बाज़ारों से लगातार पैसा निकाल रहे हैं, जिससे रुपये की कीमत गिरती जा रही है।

घरेलू कारक (Domestic Factors)

  • बढ़ता व्यापार घाटा- जब किसी देश का आयात, उसके निर्यात से अधिक हो जाता है, तो उसे व्यापार घाटा (Trade Deficit) कहा जाता है। भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है क्योंकि हम बड़ी मात्रा में मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोना आयात करते हैं। इस घाटे को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में डॉलर की आवश्यकता होती है।
  • उच्च मुद्रास्फीति (Inflation)- देश में उच्च मुद्रास्फीति के कारण भी रुपये का आकर्षण कम होता है। जब चीज़ें महंगी होती हैं, तो देश की मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो जाती है, जिससे निवेशक इसे जोखिम भरा मानकर दूर हो जाते हैं।
  • विदेशी निवेश में कमी- कई कारणों से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) की गति धीमी हुई है। पूंजी का यह प्रवाह रुपये को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण होता है, और इसकी कमी रुपये को कमजोर करती है।

रुपये के मूल्य में गिरावट के फायदे और नुकसान

विनिमय दर में परिवर्तन के अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर मिश्रित प्रभाव पड़ते हैं।

फायदे (Advantages)

  • निर्यातकों को फायदा (Exporters Benefit)- रुपये के कमजोर होने से भारतीय सामान विदेशों में सस्ते हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, निर्यातकों को एक ही उत्पाद के लिए डॉलर में भुगतान होने पर अब अधिक रुपये मिलते हैं। यह भारतीय वस्तुओं की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाता है, जिससे निर्यात को बढ़ावा मिलता है।
  • पर्यटन को प्रोत्साहन- विदेशी पर्यटकों के लिए भारत में छुट्टियाँ बिताना सस्ता हो जाता है क्योंकि वे अपने डॉलर से भारत में अधिक रुपये खर्च कर सकते हैं। इससे देश में पर्यटन क्षेत्र को बढ़ावा मिल सकता है।
  • विदेशी प्रेषण का मूल्य बढ़ता है- विदेशों में काम कर रहे भारतीय जब अपने परिवार को डॉलर भेजते हैं, तो उन्हें पहले की तुलना में रुपये में अधिक राशि मिलती है। यह घरेलू खर्च और बचत को बढ़ावा देता है।

नुकसान (Disadvantages)

  • आयातित वस्तुएँ महंगी (Imported Goods become Costly)- कच्चे तेल, मशीनरी, फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और सोने जैसे आवश्यक आयात महंगे हो जाते हैं। इसका सीधा असर उत्पादन लागत और परिवहन लागत पर पड़ता है, जिससे आम आदमी के लिए महँगाई (मुद्रास्फीति) बढ़ती है।
  • बढ़ता व्यापार घाटा- तेल, गैस और पूंजीगत सामानों के आयात का बिल बढ़ जाता है, जिससे देश का व्यापार घाटा और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit – CAD) बढ़ जाता है।
  • विदेशी कर्ज का बोझ (Higher Foreign Debt Burden)- यदि भारत सरकार या भारतीय कंपनियों ने डॉलर में कर्ज लिया है, तो रुपये के मूल्य में गिरावट से उस कर्ज को चुकाने की लागत रुपये के संदर्भ में बढ़ जाती है।

मुद्रा के कमजोर होने से जुड़ी चुनौतियाँ

रुपये के कमजोर होने से भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष कई गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।

  • मुद्रास्फीति का दबाव (Inflationary Pressure)- आयातित वस्तुओं की बढ़ी हुई लागत, विशेष रूप से कच्चे तेल की, ‘आयातित मुद्रास्फीति’ को जन्म देती है। यह मुद्रास्फीति अंततः सभी क्षेत्रों में फैलकर आम जनता के जीवन यापन की लागत को बढ़ाती है, जिससे आर्थिक स्थिरता प्रभावित होती है।
  • विदेशी निवेश पर नकारात्मक प्रभाव- रुपये में अत्यधिक अस्थिरता विदेशी निवेशकों में अनिश्चितता पैदा करती है। वे अपने निवेश को जोखिम भरा मानकर वापस खींच सकते हैं, जिससे देश में पूंजी की कमी हो सकती है।
  • सरकारी वित्त पर बोझ- सरकार को सब्सिडी बिल और आयातित वस्तुओं पर होने वाले खर्च में वृद्धि का सामना करना पड़ता है। इससे राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) बढ़ने की संभावना रहती है।

सरकार और RBI की पहल – समाधान

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और भारत सरकार रुपये को स्थिर करने तथा अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।

  • विदेशी मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप- RBI समय-समय पर डॉलर बेचकर और रुपया खरीदकर बाज़ार में हस्तक्षेप करता है। इससे डॉलर की आपूर्ति बढ़ती है और रुपये की गिरावट को धीमा करने में मदद मिलती है। हालांकि, यह कदम देश के विदेशी मुद्रा भंडार को कम करता है।
  • अनिवासी जमा दरों में वृद्धि- RBI ने अनिवासी भारतीयों (NRIs) द्वारा भारत में डॉलर में जमा किए गए पैसे पर ब्याज दरों को और अधिक आकर्षक बनाया है। इसका उद्देश्य देश में डॉलर के प्रवाह को बढ़ाना है।
  • निर्यात को बढ़ावा देने की नीतियाँ- सरकार निर्यात को बढ़ावा देने के लिए PLI (उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन) योजनाओं जैसी विभिन्न नीतियाँ लागू कर रही है। इससे देश में डॉलर की आय बढ़ेगी और रुपये पर दबाव कम होगा।
  • सोने के आयात पर नियंत्रण- सोने के आयात पर शुल्क बढ़ाकर या कुछ सीमाएं लगाकर सरकार अनावश्यक डॉलर खर्च पर नियंत्रण करने की कोशिश करती है।

तुलना तालिका – मजबूत रुपया बनाम कमजोर रुपया

मानदंडमजबूत रुपयाकमजोर रुपया
आयात की लागतकमज्यादा
निर्यातकम लाभदायकअधिक लाभदायक
महंगाईनियंत्रण मेंबढ़ने की संभावना
विदेशी निवेशस्थिरताजोखिमपूर्ण
फॉरेक्स रिजर्वस्थिरदबाव में

UPSC मुख्य परीक्षा के लिए नोट्स

  • विनिमय दर प्रणाली – भारत में प्रबंधित लचीली विनिमय दर प्रणाली (Managed Floating Exchange Rate System) अपनाई जाती है, जहाँ बाज़ार की शक्तियाँ तय करती हैं, लेकिन RBI अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करता है।
  • चालू खाता घाटा (CAD) – रुपये की गिरावट CAD को और बढ़ाती है क्योंकि आयात बिल महंगा हो जाता है। यह भारत की बाहरी भेद्यता (External Vulnerability) को दर्शाता है।
  • फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स – निर्यातक और आयातक रुपये की अस्थिरता से बचने के लिए फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स (Forward Contracts) का उपयोग करते हैं, जो भविष्य में एक निश्चित दर पर मुद्रा विनिमय की गारंटी देते हैं।
  • तेल-गैर-तेल व्यापार घाटा – कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि भारत के व्यापार घाटे का एक बड़ा कारण है, जिस पर तुरंत नियंत्रण कठिन है।
  • डॉलर का मुद्रीकरण – भारत को अपनी अर्थव्यवस्था में डॉलर के प्रवाह को बनाए रखने के लिए विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) और अन्य पूंजी प्रवाहों को आकर्षित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • वर्तमान दर – $1 = ₹90.21 (संदर्भित दर)।
  • नियंत्रक – भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भारत में विनिमय दर नीतियों को नियंत्रित करता है।
  • प्रणाली का नाम – प्रबंधित लचीली विनिमय दर प्रणाली (Managed Floating Exchange Rate System)।
  • रुपये का प्रतीक – ₹ (देवनागरी ‘र’ और रोमन ‘R’ का मिश्रण), जिसे उदय कुमार धर्मलिंगम ने डिज़ाइन किया था।
  • मुद्रा अवमूल्यन बनाम मुद्रा अवकर्षण – अवमूल्यन सरकारी कार्रवाई (निश्चित विनिमय दर प्रणाली) है, जबकि अवकर्षण बाज़ार की ताकतों (लचीली दर प्रणाली) द्वारा होता है।

मामले का अध्ययन – 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट

2008 में जब अमेरिका में लेहमन ब्रदर्स के ढहने से वैश्विक वित्तीय संकट शुरू हुआ, तो भारतीय रुपये में भारी गिरावट देखी गई थी। इस समय, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर बाज़ार से बड़ी मात्रा में पैसा निकालना शुरू कर दिया था। इस बहिर्वाह (Outflow) के कारण डॉलर की मांग अचानक बढ़ गई, जिससे रुपया लगभग 25% तक गिर गया था। उस समय RBI ने डॉलर बेचकर और पूंजी प्रवाह को प्रोत्साहित करके रुपये को स्थिर करने के लिए हस्तक्षेप किया था। यह मामला अध्ययन दिखाता है कि रुपया कितना संवेदनशील है और वैश्विक घटनाएँ इस पर कितना गहरा असर डालती हैं।

मुख्य परीक्षा उत्तर लेखन के आयाम

मुख्य परीक्षा में रुपये की गिरावट से संबंधित प्रश्नों को संबोधित करते समय निम्नलिखित मूल्य-वर्धित बिंदुओं को शामिल किया जाना चाहिए-

  1. समस्या का मूल कारण– कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में अस्थिरता और अमेरिकी ब्याज दरों में वृद्धि- ये दोनों बाहरी कारक रुपये पर लगातार दबाव बना रहे हैं।
  2. माँग और आपूर्ति का विश्लेषण – रुपये की गिरावट मूल रूप से डॉलर की बढ़ी हुई माँग (आयात, निवेश का बहिर्वाह) और डॉलर की सीमित आपूर्ति (निर्यात की धीमी वृद्धि) के बीच असंतुलन का परिणाम है।
  3. दीर्घकालिक समाधान – सरकार को आयात पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना चाहिए (जैसे- ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल)।
  4. RBI की भूमिका का समालोचनात्मक मूल्यांकन – RBI का हस्तक्षेप केवल अस्थायी राहत देता है; दीर्घकालिक समाधान संरचनात्मक सुधारों में निहित हैं, न कि विदेशी मुद्रा भंडार के उपयोग में।

UPSC पिछले वर्ष के प्रश्न

UPSC Civil Services Mains

  • कमजोर रुपये के भारत पर क्या परिणाम होते हैं? रुपये की विनिमय दर को स्थिर करने में भारतीय रिज़र्व बैंक की भूमिका पर चर्चा कीजिए।
  • 2020 – विनिमय दर में उतार चढ़ाव का भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
  • 2016 – रुपये के अवमूल्यन के कारण और परिणाम लिखिए।

UPSC प्रारंभिक MCQ अभ्यास (5 Questions)

1. रुपये के मूल्य में गिरावट का सबसे संभावित परिणाम क्या होगा?

(a) निर्यातकों को कम रुपया प्राप्त होगा। (b) भारत का व्यापार घाटा कम हो जाएगा। (c) कच्चा तेल आयात करना सस्ता हो जाएगा। (d) भारत के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।

उत्तर – (d)

2. निम्नलिखित में से कौन-सा कारक रुपये के मूल्य में गिरावट का ‘घरेलू कारण’ नहीं है?

(a) उच्च चालू खाता घाटा (CAD) (b) अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि (c) घरेलू शेयर बाज़ार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) का बहिर्वाह (d) भारत में उच्च मुद्रास्फीति दर

उत्तर – (b)

3. प्रबंधित लचीली विनिमय दर प्रणाली (Managed Floating Exchange Rate System) का क्या अर्थ है?

(a) विनिमय दर पूरी तरह से बाज़ार की शक्तियों द्वारा तय होती है। (b) विनिमय दर पूरी तरह से सरकार द्वारा तय की जाती है। (c) विनिमय दर बाज़ार शक्तियों द्वारा तय होती है, लेकिन केंद्रीय बैंक बड़े उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करता है। (d) RBI मुद्रा का अवमूल्यन करता है, जबकि बाज़ार मुद्रा का अवकर्षण करता है।

उत्तर – (c)

4. रुपये के कमजोर होने पर, विदेशी कर्ज का बोझ (डॉलर में लिया गया) रुपये के संदर्भ में-

(a) कम हो जाता है। (b) बढ़ जाता है। (c) अपरिवर्तित रहता है। (d) शुरू में कम होता है, फिर बढ़ता है।

उत्तर – (b)

5. यदि RBI रुपये को मज़बूत करने के लिए विदेशी मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप करता है, तो वह सामान्यतः क्या करेगा?

(a) डॉलर खरीदता है और रुपया बेचता है। (b) डॉलर बेचता है और रुपया खरीदता है। (c) केवल रुपये का मुद्रण करता है। (d) सोने के भंडार को बेचता है।

उत्तर – (b)

निष्कर्ष

रुपया पहली बार डॉलर के मुकाबले 90.21 पर आया- यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चेतावनी है, जो वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के सामने हमारी भेद्यता को उजागर करती है। यह ऐतिहासिक गिरावट आयातित मुद्रास्फीति को बढ़ावा देगी और देश के व्यापार घाटे को बढ़ाएगी। हालांकि, यह भारतीय निर्यातकों के लिए एक अवसर भी प्रस्तुत करती है। UPSC उम्मीदवारों के लिए, इस विषय की तैयारी में विनिमय दर की गतिशीलता, RBI की हस्तक्षेप नीतियाँ, और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए संरचनात्मक सुधारों के महत्व को समझना महत्वपूर्ण है। सरकार और RBI को मिलकर ऐसे दीर्घकालिक और व्यापक समाधानों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से सुरक्षित रख सकें और रुपये में स्थायी स्थिरता सुनिश्चित कर सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. विनिमय दर में गिरावट का महंगाई (Inflation) पर क्या असर होता है?

A1. विनिमय दर में गिरावट से आयातित वस्तुएँ, विशेषकर कच्चा तेल, महंगे हो जाते हैं, जिससे ‘आयातित मुद्रास्फीति’ बढ़ती है और अंततः देश में आम महंगाई बढ़ जाती है।

Q2. रुपया पहली बार डॉलर के मुकाबले 90.21 पर आया- इससे निर्यातकों को फायदा क्यों होता है?

A2. रुपये के कमजोर होने पर, एक निर्यातक को अपने माल के बदले में हर डॉलर के लिए पहले की तुलना में अधिक रुपये मिलते हैं, जिससे उनका लाभ मार्जिन बढ़ता है और उनके उत्पाद वैश्विक बाज़ार में अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं।

Q3. चालू खाता घाटा (CAD) रुपये की विनिमय दर को कैसे प्रभावित करता है?

A3. उच्च CAD का मतलब है कि देश को निर्यात से मिलने वाले डॉलर की तुलना में आयात पर अधिक डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर गिरावट का दबाव पड़ता है।

Q4. RBI रुपये को स्थिर करने के लिए किन उपकरणों का उपयोग करता है?

A4. RBI मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप करता है, जहाँ वह डॉलर बेचता है और रुपया खरीदता है। वह अनिवासी जमा (Non-Resident Deposits) दरों को आकर्षक बनाकर पूंजी प्रवाह को भी प्रोत्साहित करता है।

Q5. मुद्रा अवमूल्यन (Devaluation) और मुद्रा अवकर्षण (Depreciation) में मुख्य अंतर क्या है?

A5. अवमूल्यन वह स्थिति है जब सरकार जानबूझकर अपनी मुद्रा का मूल्य घटाती है (निश्चित विनिमय दर प्रणाली में), जबकि अवकर्षण बाज़ार की मांग और आपूर्ति की शक्तियों के कारण मुद्रा के मूल्य में होने वाली स्वाभाविक गिरावट है (लचीली विनिमय दर प्रणाली में)।

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