परिचय
न्यायपालिका को लोकतंत्र का एक अनिवार्य स्तंभ माना जाता है, और इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि यह समाज के सबसे कमजोर वर्ग तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती है। हाल ही में, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने जोर देकर कहा कि “सुप्रीम कोर्ट आम आदमी के लिए है”, और उन्होंने मुकदमेबाजी की लागत को कम करने को अपना प्राथमिक लक्ष्य बताया है। यह टिप्पणी भारतीय न्याय प्रणाली में मौजूद न्यायिक पहुंच की व्यापक चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित करती है। यह केवल एक बयान नहीं है, बल्कि एक दार्शनिक संकल्प है जो न्यायिक प्रशासन को अधिक समावेशी और जन-केंद्रित बनाने की दिशा में प्रयास का प्रतीक है। UPSC उम्मीदवारों के लिए, इन सुधारों और चुनौतियों को समझना, भारतीय राजव्यवस्था और सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

न्याय तक पहुंच- अर्थ और भारतीय संदर्भ
न्याय तक पहुंच (Access to Justice) का अर्थ है कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को, उसकी आर्थिक या सामाजिक स्थिति की परवाह किए बिना, निष्पक्ष और प्रभावी न्यायिक प्रक्रिया उपलब्ध होनी चाहिए। यह संवैधानिक गारंटी है, जिसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) के तहत समझा जा सकता है।
न्याय तक पहुंच- चुनौतियाँ
भारतीय संदर्भ में, न्याय तक पहुंच को मुख्य रूप से दो प्रमुख कारक चुनौती देते हैं- न्यायिक विलंब (Judicial Delay) और अत्यधिक मुकदमेबाजी लागत (High Litigation Costs)। लंबी अदालती प्रक्रियाओं और महंगे वकीलों के कारण, गरीब और ग्रामीण आबादी अक्सर न्याय पाने से पीछे हट जाती है।
मुकदमेबाजी की लागत- चुनौतियाँ और कारण
मुकदमेबाजी की लागत में कानूनी फीस, अदालती शुल्क, दस्तावेज़ीकरण लागत और गवाहों के यात्रा खर्च शामिल होते हैं। ये लागतें अक्सर इतनी अधिक होती हैं कि वे गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए न्याय के दरवाजे बंद कर देती हैं।
लागत बढ़ने के मुख्य कारण
- वकीलों की ऊंची फीस – विशेष रूप से उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में, अनुभवी वकीलों की फीस बहुत अधिक होती है।
- समय का कारक – न्यायिक विलंब के कारण मुकदमे लंबे चलते हैं, जिससे प्रति तारीख खर्च बढ़ता जाता है।
- दस्तावेज़ और प्रक्रियात्मक खर्च – याचिकाएँ, हलफनामे और अन्य कानूनी दस्तावेज़ तैयार करने में भी काफी खर्च आता है।
- भौगोलिक दूरी – सुप्रीम कोर्ट केवल दिल्ली में स्थित है। देश के दूर-दराज के हिस्सों से लोगों को वहाँ तक आने-जाने, ठहरने और कानूनी कार्यवाही में भाग लेने पर भारी व्यय होता है।
CJI का दृष्टिकोण- ‘सुप्रीम कोर्ट आम आदमी के लिए’
CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका के लोकतंत्रीकरण (Democratization of Judiciary) पर जोर दिया है।
CJI के कथन का निहितार्थ
उनका लक्ष्य सुप्रीम कोर्ट को केवल एक संवैधानिक अदालत नहीं, बल्कि अंतिम अपील न्यायालय के रूप में आम नागरिक के लिए सुलभ बनाना है। इसका तात्पर्य है कि सुप्रीम कोर्ट को सिर्फ बड़े कॉरपोरेट या हाई-प्रोफाइल मामलों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि मानवाधिकार और सामाजिक न्याय से जुड़े छोटे मामलों पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
मुकदमेबाजी लागत कम करने का लक्ष्य
लागत कम करने का अर्थ केवल पैसे की बचत नहीं है, बल्कि न्याय की गुणवत्ता और समयबद्धता में सुधार करना भी है। यदि न्याय सस्ता और तेज होगा, तो आम आदमी का कानून के शासन में विश्वास बढ़ेगा।
न्यायिक सुधारों की मुख्य विशेषताएं और पहल
न्यायिक प्रणाली में सुधार के लिए CJI और सरकार दोनों ने कई महत्वपूर्ण पहलें की हैं।
तकनीकी पहल- e-Courts और वर्चुअल सुनवाई
- e-Courts परियोजना – यह परियोजना भारतीय न्यायपालिका को डिजिटल बनाने का प्रयास है। इसमें मुकदमा सूचना प्रणाली (CIS), डिजिटल केस रिकॉर्ड और ऑनलाइन शुल्क भुगतान शामिल है।
- वर्चुअल सुनवाई – COVID-19 महामारी के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई एक मानक बन गई। यह तकनीक वकीलों और वादियों के लिए यात्रा और समय की लागत को काफी कम करती है।
संस्थागत पहल- लागत कम करने के उपाय
- वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) – मध्यस्थता (Arbitration), सुलह (Conciliation) और लोक अदालत जैसे तरीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है। ये अदालत से बाहर होने के कारण सस्ते और त्वरित समाधान प्रदान करते हैं।
- फ्री लीगल एड (मुफ्त कानूनी सहायता) – NALSA (राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण) के तहत पात्र व्यक्तियों को मुफ्त कानूनी सहायता और वकील उपलब्ध कराए जाते हैं, ताकि आर्थिक बाधाओं को दूर किया जा सके।
- न्यायिक पीठों का विकेंद्रीकरण – सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय बेंच स्थापित करने की मांग पर अक्सर बहस होती है, जिससे दूर-दराज के लोगों की भौगोलिक लागत कम हो सके।
न्यायिक सक्रियता और PIL की भूमिका
जनहित याचिका (PIL) न्यायिक सक्रियता का एक उपकरण है, जिसने आम आदमी को सीधे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने का रास्ता दिया है। नामांकित शुल्क पर भी गंभीर सार्वजनिक महत्व के मामलों को उठाया जा सकता है, जिससे न्यायिक पहुंच का लोकतंत्रीकरण हुआ है।
चुनौतियाँ और समालोचना
न्यायिक सुधारों के बावजूद, न्याय तक पहुंच और लागत कम करने के रास्ते में कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
- डिजिटल डिवाइड – ग्रामीण क्षेत्रों में अपर्याप्त इंटरनेट कनेक्टिविटी और तकनीकी साक्षरता की कमी e-Courts पहल की सफलता में बाधा डालती है।
- न्यायाधीशों की कमी – अदालतों में न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों के स्वीकृत पदों की तुलना में वास्तविक संख्या काफी कम है, जिससे लंबित मामलों की संख्या बढ़ती है।
- सरकारी मुकदमेबाजी – सरकार स्वयं ही सबसे बड़ी मुकदमेबाज है। सरकार द्वारा अनावश्यक रूप से अपील दायर करने से न्यायिक समय और लागत दोनों में वृद्धि होती है।
- बार और बेंच का प्रतिरोध – कुछ वकील वर्चुअल सुनवाई जैसी तकनीकी पहलों का विरोध करते हैं, जिससे उनके पारंपरिक कार्यशैली और भौगोलिक लाभ प्रभावित होते हैं।
UPSC मेन्स नोट्स
- न्यायपालिका की भूमिका – CJI का कथन संविधान के सामाजिक न्याय दर्शन के प्रति न्यायपालिका की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जहाँ न्यायालय को “सामाजिक अभियांत्रिकी” (Social Engineering) का उपकरण बनना चाहिए।
- अनुच्छेद 39-A – यह अनुच्छेद राज्य को गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करने का निर्देश देता है। न्यायिक लागत को कम करना इस संवैधानिक लक्ष्य को प्राप्त करने की कुंजी है।
- ADR का महत्व – वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली, ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस और ईज ऑफ लिविंग दोनों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह व्यापार और नागरिक विवादों को जल्दी निपटाती है।
UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- मुफ्त कानूनी सहायता का संवैधानिक आधार – अनुच्छेद 39-A (42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया)।
- NALSA का गठन – विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत।
- e-Courts परियोजना का चरण – वर्तमान में e-Courts परियोजना का तीसरा चरण चल रहा है।
- CJI की नियुक्ति – भारत के राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की सलाह के बाद होती है।
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन कोण
प्रश्न – “भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा मुकदमेबाजी की लागत को कम करने का लक्ष्य, भारतीय न्यायपालिका में न्याय के लोकतंत्रीकरण के लिए आवश्यक है।” वर्तमान न्यायिक सुधारों के संदर्भ में आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 अंक/250 शब्द)
उत्तर-लेखन के मूल्य-वर्धित बिंदु
- न्याय का लोकतंत्रीकरण – न्याय केवल कानून की किताबें नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता है। लागत कम होने से न्याय अमीरों का विशेषाधिकार नहीं रहेगा।
- सुधारों का समालोचनात्मक मूल्यांकन – वर्चुअल सुनवाई ने भौगोलिक और वित्तीय पहुंच बढ़ाई है, लेकिन डिजिटल डिवाइड ने नए वर्ग भेद पैदा किए हैं।
- समाधान – स्थायी समाधान के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति में तेजी लाना, मध्यस्थता को अनिवार्य बनाना, और सरकारी मुकदमों को तर्कसंगत बनाना आवश्यक है।
- राज्य की जिम्मेदारी – सरकार को कानूनी सहायता योजनाओं के लिए पर्याप्त धन आवंटित करना चाहिए, जो अनुच्छेद 39-A के लक्ष्य को पूरा करेगा।
UPSC पिछले वर्ष के प्रश्न
- UPSC Prelims 2019 – भारतीय न्यायपालिका के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है? (a) भारत के संविधान के अनुसार, उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान है, (b) उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को बनाए रखने के लिए कानून और नियम बनाए गए हैं।
- UPSC Mains 2021 – “न्यायिक स्वतंत्रता के लिए एक मजबूत, सुव्यवस्थित और कुशल न्याय वितरण प्रणाली आवश्यक है।” भारत के न्यायिक सुधारों के संदर्भ में टिप्पणी कीजिए।
UPSC प्रारंभिक परीक्षा MCQ अभ्यास
- राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है? (a) यह एक संवैधानिक निकाय है। (b) इसका गठन भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत हुआ है। (c) यह कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत स्थापित किया गया है। (d) इसका मुख्य उद्देश्य मध्यस्थता को बढ़ावा देना है। उत्तर – (c)
- भारत में, निम्नलिखित में से कौन-सा वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) का रूप है?
- मध्यस्थता (Arbitration)
- सुलह (Conciliation)
- लोक अदालत
- न्यायिक समीक्षा (a) केवल 1 और 2 (b) केवल 3 और 4 (c) केवल 1, 2 और 3 (d) 1, 2, 3 और 4
- भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद राज्य को गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करने का निर्देश देता है? (a) अनुच्छेद 14 (b) अनुच्छेद 21 (c) अनुच्छेद 39-A (d) अनुच्छेद 44
- भारत में ‘e-Courts’ परियोजना का प्राथमिक उद्देश्य क्या है? (a) सभी न्यायालयों में केवल वर्चुअल सुनवाई करना। (b) न्यायिक अधिकारियों के लिए आवास उपलब्ध कराना। (c) भारतीय न्यायपालिका को डिजिटल बनाना और कुशल बनाना। (d) वकीलों की फीस का निर्धारण करना।
- भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की नियुक्ति कौन करता है? (a) प्रधानमंत्री (b) भारत के राष्ट्रपति (c) सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश (d) भारत के अटॉर्नी जनरल उत्तर – (b)
निष्कर्ष
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का यह उद्घोष कि “सुप्रीम कोर्ट आम आदमी के लिए है”, न्यायिक प्रशासन के मूल दर्शन को दर्शाता है। यह कथन न्यायिक सुधारों के प्रति एक मजबूत संकल्प है, जिसका उद्देश्य न्याय तक पहुंच को केवल कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि एक सुलभ वास्तविकता बनाना है। e-Courts, वर्चुअल सुनवाई और NALSA जैसी पहलें इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं, जो मुकदमेबाजी की लागत और समय को कम करने में सहायक हो सकती हैं। हालांकि, न्यायाधीशों की कमी और डिजिटल डिवाइड जैसी संरचनात्मक चुनौतियों को दूर किए बिना, न्यायिक लोकतंत्रीकरण का यह लक्ष्य पूरी तरह से प्राप्त नहीं किया जा सकता। न्यायपालिका को वास्तव में ‘आम आदमी’ के लिए बनाने हेतु तकनीकी नवाचार और संस्थागत इच्छाशक्ति का समन्वय आवश्यक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. मुकदमेबाजी की लागत कम करने का क्या महत्व है?
A1. यह सामाजिक न्याय और कानून के समक्ष समानता के संवैधानिक लक्ष्यों को सुनिश्चित करने, तथा गरीब और कमजोर वर्गों के लिए न्याय तक पहुंच बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।
Q2. e-Courts परियोजना का मुख्य लाभ क्या है?
A2. इसका मुख्य लाभ न्यायिक रिकॉर्ड को डिजिटल करना, पारदर्शिता बढ़ाना और वर्चुअल सुनवाई के माध्यम से वादियों की यात्रा लागत को कम करना है।
Q3. भारत में वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) के कौन-से तरीके प्रचलित हैं?
A3. मध्यस्थता (Arbitration), सुलह (Conciliation), समझौता (Negotiation) और लोक अदालत प्रचलित तरीके हैं।
Q4. भारत के मुख्य न्यायाधीश का कार्यकाल कितना होता है?
A4. CJI का कार्यकाल 65 वर्ष की आयु तक होता है।
Q5. न्यायपालिका के लोकतंत्रीकरण से क्या तात्पर्य है?
A5. इसका तात्पर्य यह सुनिश्चित करना है कि न्यायपालिका की प्रक्रियाएँ, पहुँच और निर्णय सभी नागरिकों के लिए सुलभ और समझने योग्य हों, खासकर समाज के कमजोर वर्गों के लिए।
