सच कहूं तो, UPSC की तैयारी में राष्ट्रपति एक ऐसा विषय है जिसे अक्सर उतना गहराई से नहीं समझा जाता जितनी इसकी गुंजाइश है। संविधान के भाग-V के तहत राष्ट्रपति से जुड़े अनुच्छेद 52 से 78 को समझना किसी भी गंभीर उम्मीदवार के लिए बेहद ज़रूरी है।
यह लेख आपको राष्ट्रपति से जुड़े हर पहलू को विस्तार से समझाएगा — चुनाव प्रक्रिया (राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया Process of Election of President of India), योग्यता, शपथ, महाभियोग से लेकर वीटो, अध्यादेश और क्षमादान जैसी महत्वपूर्ण शक्तियों तक। इसे पढ़ने के बाद आप Prelims के MCQs से लेकर Mains के विश्लेषणात्मक प्रश्नों तक आसानी से हल कर पाएंगे।
आइए अब सबसे पहले ये समझते हैं कि आखिर ये राष्ट्रपति चुना जाता कैसे है।
1. राष्ट्रपति का चुनाव Process of Election of President of India (अनुच्छेद 54 एवं 55)
भारत के राष्ट्रपति का चुनाव किसी आम चुनाव की तरह प्रत्यक्ष रूप से न होकर, अप्रत्यक्ष (Indirect) रूप से होता है। यानी आम नागरिक सीधे राष्ट्रपति को वोट नहीं देते, बल्कि उनके निर्वाचित प्रतिनिधि उनका प्रतिनिधित्व करते हैं।
क्यों अप्रत्यक्ष चुनाव?
संविधान निर्माताओं ने प्रत्यक्ष चुनाव की तुलना में अप्रत्यक्ष चुनाव को बेहतर माना, क्योंकि:
- संसदीय प्रणाली: भारत में राष्ट्रपति केवल संवैधानिक प्रमुख (नाममात्र का प्रमुख) है, वास्तविक शक्तियाँ प्रधानमंत्री के पास होती हैं। एक प्रत्यक्ष चुनाव से उसे अत्यधिक जनादेश मिल जाता, जिससे वह निर्वाचित प्रधानमंत्री को चुनौती दे सकता था।
- व्यय और समय: सीधा चुनाव बेहद खर्चीला और समयसाध्य होता।
निर्वाचक मंडल (Electoral College)

राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया में सबसे अहम भूमिका होती है निर्वाचक मंडल की। यह एक ऐसा निकाय है जिसमें केवल निर्वाचित सदस्य ही शामिल होते हैं, मनोनीत सदस्य नहीं।
इस Nिर्वाचक मंडल में सदस्य होते हैं:
निर्वाचक मंडल की संरचना का सारांश नीचे दिए गए तालिका में देखा जा सकता है:
| सदस्य | विवरण |
|---|---|
| लोकसभा (Lok Sabha) | सभी निर्वाचित सांसद |
| राज्यसभा (Rajya Sabha) | सभी निर्वाचित सांसद (मनोनीत सदस्य शामिल नहीं) |
| विधानसभाएँ (Vidhan Sabhas) | सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य |
| केंद्र शासित प्रदेश (Union Territories) | केवल दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य |
महत्वपूर्ण बात: निर्वाचक मंडल में राज्यों की विधान परिषदों (Legislative Councils) के सदस्य शामिल नहीं होते हैं।
कैसे होता है चुनाव? (प्रक्रिया)
राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव पूरी तरह से आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) प्रणाली के तहत, एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) के माध्यम से किया जाता है।
इसका सीधा सा मतलब है कि प्रत्येक सदस्य (सांसद या विधायक) के पास एक ही वोट होता है, लेकिन वह उम्मीदवारों को अपनी पहली, दूसरी, तीसरी प्राथमिकता (Preference) के क्रम में वोट देता है।
चुनाव का फैसला Vोटों की संख्या से नहीं, बल्कि वोट के मूल्य (Value) से होता है। विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के वोट का मूल्य समान नहीं होता है। यह मूल्य राज्य की जनसंख्या के आधार पर तय किया जाता है, ताकि हर राज्य को समान प्रतिनिधित्व मिले और बड़ी जनसंख्या वाले राज्यों का प्रभुत्व न बढ़े। उद्देश्य यह है कि राष्ट्रपति पूरे देश का प्रतिनिधि (National Leader) हो, न कि केवल बहुमत वाले राज्यों का।
वोट के मूल्य की गणना
इए थोड़ा गणित समझें।
- विधायक (MLA) के वोट का मूल्य (Value of an MLA’s Vote) :इसकी गणना इस सूत्र से की जाती है:एक विधायक के वोट का मूल्य = (राज्य की कुल जनसंख्या) ÷ (राज्य की विधानसभा में कुल निर्वाचित सीटें) × 1/1000स्पष्टीकरण: जनसंख्या को 1000 से विभाजित इसलिए किया जाता है ताकि संख्या को प्रबंधनीय बनाया जा सके।
- सांसद (MP) के वोट का मूल्य (Value of an MP’s Vote) :एक सांसद के वोट का मूल्य = (सभी राज्यों के विधायकों के वोटों का कुल मूल्य Total Value of all MLAs) ÷ (संसद के दोनों सदनों में निर्वाचित सांसदों की कुल संख्या)जनगणना 1971 के आंकड़ों का उपयोग अब भी किया जाता है। 2026 के बाद 2001 की जनगणना लागू होगी (जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम का सम्मान करने के लिए 42वें संशोधन द्वारा यह प्रावधान किया गया है)।
जीत का आंकड़ा (Winning Quota)
किसी उम्मीदवार को जीतने के लिए सिर्फ सबसे ज़्यादा वोट लाना काफी नहीं है। उसे कोटा (Quota) पूरा करना होता है। कोटा का सूत्र है:
Quota = (कुल वैध मतों का योग Total Valid Votes) ÷ (2) + 1
यह सुनिश्चित करता है कि विजेता को 50% से अधिक वोट मिले (Absolute Majority)।
चूंकि वोटिंग गुप्त मतदान (Secret Ballot) द्वारा होती है, इसलिए सांसदों को पार्टी व्हिप (Whip) लगाने की अनुमति नहीं है। राष्ट्रपति चुनाव “फ्री वोट” होता है, क्योंकि राष्ट्रपति सभी दलों के सांसदों का प्रतिनिधि होता है।
2. पात्रता, शपथ और शर्तें
राष्ट्रपति बनने की योग्यताएँ (अनुच्छेद 58) :
कोई भी व्यक्ति राष्ट्रपति बनने के लिए तभी पात्र होता है, जब:
- नागरिकता: भारत का नागरिक हो।
- आयु: 35 वर्ष पूरी कर चुका हो।
- योग्यता: लोकसभा सदस्य बनने के लिए योग्य हो।
- पद: केंद्र या राज्य सरकार या किसी सार्वजनिक निगम का कोई लाभ का पद (Office of Profit) धारण नहीं करता हो।
नोट: राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को किसी निर्वाचन क्षेत्र से नामांकन पत्र भरने के लिए कम से कम 50 निर्वाचकों (प्रस्तावकों) का समर्थन चाहिए होता है।
शर्तें (अनुच्छेद 59) :
- राष्ट्रपति संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं हो सकता।
- वह कोई अन्य लाभ का पद धारण नहीं करेगा।
- उसे राष्ट्रपति भवन (आवास) नि:शुल्क प्रदान किया जाता है।
शपथ (अनुच्छेद 60) :
राष्ट्रपति पद ग्रहण करने से पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या उनकी अनुपस्थिति में वरिष्ठतम सुप्रीम कोर्ट जज के सामने शपथ लेता है। वह शपथ लेता है कि:
- वह संविधान के प्रति श्रद्धा और निष्ठा रखेगा।
- भारत की संप्रभुता और अखंडता को बनाए रखेगा।
- अपने कर्तव्यों का पालन विधि के अनुसार करेगा।
3. कार्यकाल, महाभियोग और पद की रिक्ति
कार्यकाल (Term) — अनुच्छेद 56 :
राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 साल का होता है, हालांकि वह पुनः निर्वाचन (Re-election) के लिए पात्र होता है।
पद की रिक्ति (Vacancy) :
राष्ट्रपति का पद निम्न कारणों से रिक्त हो सकता है:
- कार्यकाल की समाप्ति (Retirement)
- त्यागपत्र (Resignation) — अनुच्छेद 56: वह उपराष्ट्रपति को लिखित त्यागपत्र दे सकता है।
- मृत्यु (Death)
- महाभियोग (Impeachment) — अनुच्छेद 61
- अयोग्यता (Disqualification) — अनुच्छेद 58(1)(b) अथवा 59 (यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित होती है।)
महत्वपूर्ण तथ्य (UPSC Prelims Tips):
- स्थानीय रिक्ति (कार्यकाल समाप्ति, इस्तीफा, मृत्यु): उपराष्ट्रपति अंतरिम राष्ट्रपति (Acting President) बनता है। उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के सभी कार्य करता है। यदि उपराष्ट्रपति भी उपलब्ध न हो, तो सुप्रीम कोर्ट का CJI यह भूमिका निभाता है।
- यदि राष्ट्रपति की मृत्यु पद पर हो और उपराष्ट्रपति कार्यभार संभाले, तो नए राष्ट्रपति के निर्वाचन का समय: 6 महीने के भीतर।
महाभियोग (Impeachment) — अनुच्छेद 61
महाभियोग एक अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया है जिसमें राष्ट्रपति को संविधान के उल्लंघन (Violation of Constitution) के आधार पर पद से हटाया जा सकता है।
- आरंभ (Initiation): यह प्रक्रिया किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में शुरू की जा सकती है। इसके लिए कम से कम 1/4 सदस्यों द्वारा तैयार किए गए प्रस्ताव की आवश्यकता होती है।
- पारित (Passing): दो-तिहाई (2/3) सदस्यों को इसके पक्ष में वोट देना होता है।
- प्रक्रिया: यह एक “पार्टी वोट” होता है और सदस्य व्हिप से बाध्य नहीं होते।
जानकारी (विडंबना): आज तक किसी भी भारतीय राष्ट्रपति पर महाभियोग नहीं लगाया गया है। हालांकि, कई राष्ट्रपति पद पर थे (जैसे डॉ. जाकिर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद) जिनका निधन कार्यकाल पूरा होने से पहले हो गया था।
4. राष्ट्रपति की शक्तियाँ और कर्तव्य
राष्ट्रपति सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर होते हैं।
1. कार्यपालिका संबंधी (Executive) — अनुच्छेद 53:
- कार्यकारी शक्ति: संघ की सारी कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है और वह इसका प्रयोग संविधान के अनुसार स्वयं अथवा अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करता है。
- प्रधानमंत्री की नियुक्ति: वह प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है (लोकसभा में बहुमत वाली पार्टी के नेता को)।
- मंत्रियों की नियुक्ति: प्रधानमंत्री की सलाह पर वह अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है।
- उच्च पदाधिकारी: वह नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG), भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों, राज्यों के राज्यपालों, संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के अध्यक्ष और सदस्यों, सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है।
- राजदूतों की नियुक्ति: वह भारत के राजदूतों, उच्चायुक्तों को नियुक्त करता है और अन्य देशों के राजदूतों को प्राप्त करता है।
- राज्यों का प्रशासन: वह संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राज्यों में राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) लगा सकता है।
2. विधायिका संबंधी (Legislative):
- संसद बुलाना: वह संसद के दोनों सदनों का सत्र बुलाता है और सत्रावसान करता है।
- लोकसभा भंग करना: प्रधानमंत्री की सलाह पर वह लोकसभा को भंग करता है।
- विधेयक को सहमति: संसद द्वारा पारित किसी भी विधेयक को कानून बनने के लिए राष्ट्रपति की सहमति की आवश्यकता होती है।
- मनोनीत सदस्य: वह एंग्लो-इंडियन समुदाय (अब समाप्त) और कला, साहित्य, विज्ञान, सामाजिक सेवा के क्षेत्रों से 12 सदस्यों को राज्यसभा के लिए नामित करता है。
- कोष विधेयक: केवल राष्ट्रपति ही लोकसभा में धन विधेयक (Money Bill) पेश करने की पूर्व अनुमति देता है।
3. न्यायिक (Judicial):
-
- क्षमादान: राष्ट्रपति न्यायिक शक्तियों का प्रयोग “क्षमा अधिकार (Pardon Power)” के माध्यम से करता है।
4. वित्तीय (Financial):
- भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India): इस फंड से धन निकालने के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक होती है।
- वित्त आयोग (Finance Commission): हर 5 साल में वित्त आयोग का गठन करता है।
- बजट: केंद्रीय बजट उसकी सहमति से ही संसद में पेश किया जाता है।
5. आपातकालीन शक्तियाँ (Emergency Powers):
- अनुच्छेद 352 (राष्ट्रीय आपातकाल): युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के आधार पर।
- अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन): जब राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाए।
- अनुच्छेद 360 (वित्तीय आपातकाल): जब भारत की वित्तीय स्थिरता खतरे में हो।
5. राष्ट्रपति की वीटो शक्ति (अनुच्छेद 111)
वीटो का अर्थ है “मैं मना करता हूँ।” यह कार्यपालिका द्वारा विधायिका के निर्णय पर लगाई गई रोक है ताकि जल्दबाजी में बना कोई कानून राष्ट्रहित के विरुद्ध न हो जाए।
भारतीय राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद 111 के तहत 4 प्रकार की वीटो शक्तियाँ हैं:
| प्रकार | परिभाषा | UPSC उदाहरण |
|---|---|---|
| 1. पूर्ण वीटो (Absolute Veto) | विधेयक को पूरी तरह अस्वीकार करना और संसद को वापस लौटाना। | 1954 का PEPSU (विलय) विधेयक — डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा इसका प्रयोग किया गया था। |
| 2. सस्पेंसिव वीटो (Suspensive Veto) | विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस करना। यदि संसद दोबारा पास करे (साधारण बहुमत से), तो राष्ट्रपति को उसे स्वीकार करना ही होगा। | सबसे अधिक प्रयोग होने वाली वीटो। |
| 3. पॉकेट वीटो (Pocket Veto) | राष्ट्रपति विधेयक पर न तो हस्ताक्षर करता है, न ही वीटो करता है। उसे अपने पास “जेब” में रखकर असीमित समय तक रोके रखता है। | ज्ञानपीठ विधेयक, 1986: राष्ट्रपति जैल सिंह ने कभी भी इस विधेयक पर सहमति नहीं दी, जिससे यह अप्रभावी हो गया। |
| 4. आइटम वीटो (Item Veto) | केवल धन विधेयक (Money Bill) के संदर्भ में। राष्ट्रपति पूरे विधेयक को अस्वीकार नहीं कर सकता, लेकिन उसके किसी विशिष्ट प्रावधान (अनुसूची) को अस्वीकार कर सकता है। | केवल भारत के राष्ट्रपति और अमेरिकी राष्ट्रपति के पास ही यह शक्ति है। |
क्वालिफाइड वीटो (Qualified Veto): इसका कोई प्रावधान भारत में नहीं है।
6. राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति (अनुच्छेद 123)
अध्यादेश (Ordinance) एक अस्थायी कानून होता है, जो राष्ट्रपति द्वारा तब जारी किया जाता है जब संसद सत्र में नहीं होती (अवकाश में हो) और किसी तत्काल कानून की आवश्यकता पड़ती है।
अध्यादेश की विशेषताएं (UPSC Key Points):
- शर्त: जब राष्ट्रपति को संतुष्टि हो कि ऐसी परिस्थितियाँ मौजूद हैं जिनमें तुरंत कार्रवाई करना आवश्यक है।
- अवधि (Duration):
- समीक्षा (Review):
7. राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 72)
यह सबसे शक्तिशाली “न्यायिक शक्ति” है।
क्षमादान के प्रकार:
| प्रकार | अर्थ |
|---|---|
| क्षमा (Pardon) | पूर्ण सजा समाप्त करना। सजा और अपराध दोनों खत्म हो जाते हैं। |
| प्रविलंबन (Respite) | किसी विशेष परिस्थिति (जैसे गर्भावस्था, बीमारी) के आधार पर कम सजा देना। |
| परिहार (Remission) | सजा की अवधि कम करना (सजा का स्वरूप वैसा ही रहता है)। |
| निलंबन (Reprieve) | सजा के क्रियान्वयन को अस्थायी रूप से रोकना। |
| लघुकरण (Commutation) | सजा के स्वरूप को बदलना (जैसे मृत्युदंड को उम्रकैद में बदलना)। |
क्षमादान की सीमाएं:
- राष्ट्रपति इस शक्ति का प्रयोग मंत्रिमंडल की सलाह पर करता है।
- राज्यपाल (अनुच्छेद 161) के पास भी क्षमादान की शक्ति है, लेकिन राष्ट्रपति की शक्ति अधिक व्यापक है:
- राष्ट्रपति मृत्युदंड (Death Sentence) की सजा भी क्षमा कर सकता है; राज्यपाल कुछ मामलों में ही मृत्युदंड पर विचार कर सकता है।
- आजीवन कारावास (Life Imprisonment) के मामले में भी राष्ट्रपति हस्तक्षेप कर सकता है।
8. राष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति
यह विषय दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है कि “राष्ट्रपति केवल एक औपचारिक प्रमुख है या उसकी कोई वास्तविक भूमिका है?”
परिचय:
भारत का राष्ट्रपति राज्य का प्रमुख (Head of State) होता है। भारत का संविधान एक संसदीय प्रणाली पर कार्य करता है, जहाँ वास्तविक कार्यकारी शक्तियाँ प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद के पास होती हैं। डॉ. बी.आर. अंबेडकर के अनुसार, “राष्ट्रपति का पद ब्रिटिश सम्राट के समान ही है।”
राष्ट्रपति बनाम प्रधानमंत्री (President vs PM):
- नाममात्र प्रमुख (Titular Head): सभी कार्यकारी कार्य राष्ट्रपति के नाम पर किए जाते हैं, लेकिन वास्तविक निर्णय प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद लेते हैं。
- अनुच्छेद 74: राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य है। हालांकि, 42वें संशोधन (1976) ने मंत्रिपरिषद की सलाह को राष्ट्रपति पर बाध्यकारी बना दिया है।
- अनुच्छेद 75: मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है, न कि राष्ट्रपति के प्रति।
राष्ट्रपति के औपचारिक कार्य या नाममात्र शक्तियां:
- राष्ट्रपति भारत के संविधान के संरक्षक होते हैं और उनका परामर्शदाता प्रधानमंत्री होता है।
- संकट के समय (जैसे कि किसी दल के पास स्पष्ट बहुमत न हो) राष्ट्रपति को अपने विवेक (Discretionary Powers) का उपयोग करना पड़ता है:
- प्रधानमंत्री का चयन
- राज्यपाल का चयन
- विधेयक पर पॉकेट वीटो
- प्रधानमंत्री द्वारा लोकसभा भंग करने की सलाह दिए जाने पर निर्णय( “राष्ट्रपति शासन के दौरान उसकी भूमिका बढ़ जाती है / In President’s Rule, Role of President Increases” )
- न्यायिक कार्यों में राष्ट्रपति की भूमिका सीमित होती है। वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट नहीं सकता, लेकिन अनुच्छेद 72 के तहत सजा में राहत दे सकता है।
UPSC Prelims के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- संबंधित अनुच्छेद: 52 से 78 (Part V: The Union Executive)
- चुनाव प्रणाली: आनुपातिक प्रतिनिधित्व + एकल संक्रमणीय मत (प्रत्यक्ष नहीं)
- महाभियोग अनुच्छेद: 61 (संविधान के उल्लंघन के लिए)
- शपथ अनुच्छेद: 60 (CJI के समक्ष)
- निर्वाचक मंडल: लोकसभा के निर्वाचित सदस्य + राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य + राज्यों के विधायक (विधान परिषद के सदस्य शामिल नहीं)
- शक्तियों का आधार: भाग 5 (अनुच्छेद 53 से 77)
- वीटो: पूर्ण, सस्पेंसिव, पॉकेट
- अध्यादेश अनुच्छेद: 123
- क्षमादान अनुच्छेद: 72
- आपातकालीन अनुच्छेद: 352 (राष्ट्रीय), 356 (राज्य), 360 (वित्तीय)
- वेतन: ₹5,00,000 प्रति माह (मूल वेतन)
- सांसदों/विधायकों के मतों का मूल्य: जनसंख्या आधार पर भिन्न
UPSC Mains के लिए गहन विश्लेषण
सकारात्मक पक्ष (Positives):
- राष्ट्र की एकता का प्रतीक (Symbol of Unity): राष्ट्रीय आपातकाल के समय संकटमोचक की भूमिका।
- संवैधानिक संरक्षक (Guardian of Constitution): विधेयकों को अस्वीकार कर असंवैधानिक कानूनों पर नकेल कसता है।
- राज्यों को संतुलित प्रतिनिधित्व (Balanced Representation): जनसंख्या के आधार पर वोट के मूल्य में भिन्नता राष्ट्रीय एकता को बनाए रखती है।
चुनौतियाँ (Challenges) & आलोचना (Criticism):
- नाममात्र का मुखिया (Titular Head) — “रबर स्टैंप” (Rubber Stamp): अनुच्छेद 74 के कारण वह मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्रवाई करने को बाध्य है।
- राष्ट्रपति शासन (Article 356) का दुरुपयोग: पिछली सरकारों (इंदिरा गांधी) द्वारा राजनीतिक विरोधियों को हटाने के लिए राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया।
- दलगत राजनीति (Partisan Politics): राष्ट्रपति चुनाव “फ्री वोट” होता है, लेकिन मतदान अप्रत्यक्ष रूप से पार्टी लाइनों पर होता है।
- अध्यादेशों का दुरुपयोग (Ordinance Raj): सरकार द्वारा संसदीय बहस की कमी को पूरा करने के लिए “आपातकाल” का बहाना बनाकर अध्यादेशों का अत्यधिक उपयोग किया जाता है।
सुधार के उपाय (Reforms Suggested):
- National Judicial Appointments Commission (NJAC) Act: सरकार और न्यायपालिका के बीच शक्ति संतुलन के लिए एक प्रयास (हालांकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे कोलकाता ने असंवैधानिक घोषित कर दिया था)।
- अध्यादेश जारी करने की शक्ति पर संसदीय समिति: अधिक पारदर्शिता के लिए संसद की एक समिति हो जो निरीक्षण करे।
- वीटो शक्ति: विधेयक पर निर्णय के लिए 30 दिनों की समय सीमा निर्धारित करें।
Current Affairs Connection
- 16वें राष्ट्रपति चुनाव (2022): द्रौपदी मुर्मू (64.03% वैध मतों के साथ) देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बनीं।
- अध्यादेशों का मुद्दा (Ordinance Issue): हाल ही में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए एक आयोग स्थापित करने वाले अध्यादेश को वापस ले लिया, जिससे “ऑर्डिनेंस राज” की बहस फिर से शुरू हो गई
- क्षमादान याचिका (Pardon Petition): राजीव गांधी हत्याकांड के दोषियों की क्षमा याचिका पर सत्तारूढ़ सरकार और राष्ट्रपति के अधिकारों के दायरे पर सवाल उठे
PYQ Perspective (पिछले वर्षों के प्रश्न)
- प्रीलिम्स में प्रश्न: मुख्यतः “निर्वाचक मंडल में कौन शामिल है?” या “वीटो शक्ति के प्रकार” पर आधारित सरल प्रश्न पूछे गए हैं।
- मेंस में प्रश्न:
- “भारतीय राष्ट्रपति एक नाममात्र का प्रमुख है।” टिप्पणी कीजिए। (GS-II, 2018)
- “राष्ट्रपति के पद को लोकतंत्र का संरक्षक कहा जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में इस पद का राजनीतिकरण हुआ है।” विश्लेषण कीजिए। (GS-II, 2015)
- “क्षमादान की शक्ति शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत का उल्लंघन कैसे करती है?” चर्चा कीजिए।
FAQs
- Q: क्या कोई व्यक्ति राष्ट्रपति पद पर दो बार रह सकता है?
A: जी हाँ, संविधान में राष्ट्रपति के लिए पुनः निर्वाचन पर कोई रोक नहीं है। - Q: क्या राष्ट्रपति किसी राज्य का विधायक हो सकता है?
A: नहीं। यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रपति चुना जाता है, तो उसे अपना विधायक/सांसद पद छोड़ना पड़ता है। यह प्रावधान अनुच्छेद 59 में है। - Q: क्या राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति पर कोई रोक है?
A: हाँ। राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही इसका प्रयोग कर सकता है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट इस शक्ति की दुर्भावना के आधार पर न्यायिक समीक्षा कर सकता है। - Q: क्या राष्ट्रपति कभी मंत्री बन सकता है?
A: नहीं। यदि कोई व्यक्ति मंत्री बनता है, तो उसे तुरंत अपना राष्ट्रपति पद छोड़ना पड़ता है। - Q: अंतरिम राष्ट्रपति कौन बनता है?
A: यदि राष्ट्रपति का पद अचानक खाली हो जाता है (जैसे मृत्यु, इस्तीफा), तो उपराष्ट्रपति तब तक कार्यभार संभालते हैं जब तक कि नया राष्ट्रपति निर्वाचित न हो जाए।
Practice Questions
PRELIMS MCQs
- भारत के राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल (Electoral College) में निम्नलिखित में से कौन शामिल नहीं है?
a) राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य
b) राज्यों के विधानसभा के निर्वाचित सदस्य
c) राज्यों के विधान परिषद के निर्वाचित सदस्य
d) लोकसभा के निर्वाचित सदस्य
उत्तर: c) राज्यों के विधान परिषद के निर्वाचित सदस्य - राष्ट्रपति किसी विधेयक पर बिना हस्ताक्षर किए उसे अनिश्चितकाल के लिए रोक सकता है। यह कौन सी वीटो शक्ति है?
a) Absolute Veto
b) Qualified Veto
c) Pocket Veto
d) Item Veto
उत्तर: c) Pocket Veto - राष्ट्रपति के महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया किस अनुच्छेद में दी गई है?
a) अनुच्छेद 53
b) अनुच्छेद 60
c) अनुच्छेद 61
d) अनुच्छेद 74
उत्तर: c) अनुच्छेद 61
MAINS QUESTIONS
- प्रश्न 1: हाल के वर्षों में अध्यादेशों (Ordinances) के बढ़ते उपयोग ने भारतीय लोकतंत्र में कार्यपालिका और विधायिका के बीच शक्ति संतुलन को कैसे प्रभावित किया है? (GS-II, 250 Words)दृष्टिकोण:
- भूमिका: अनुच्छेद 123 का संदर्भ देते हुए शुरू करें (आपातकालीन कानून व्यवस्था)।
- मुख्य भाग:
- “ऑर्डिनेंस राज” की अवधारणा और इसके ऐतिहासिक उदाहरण (जैसे, 1975 की आपातकाल)।
- लाभ: तीव्र निर्णय (Quick Decision Making) — COVID-19 के दौरान स्वास्थ्य अध्यादेश।
- हानि: संसदीय निगरानी (Parliamentary Scrutiny) का अभाव।
- समाधान: अध्यादेश को संसद में पेश करने की समय सीमा (Current: 6 सप्ताह) को और कम करना होगा।
- निष्कर्ष: अध्यादेश बहुत आवश्यक है लेकिन अत्यधिक उपयोग से बचना चाहिए।
- प्रश्न 2: “भारतीय संविधान राष्ट्रपति को संकट का मोचन बनाता है, लेकिन चुपचाप उसे मंत्रिपरिषद का कैदी भी बना देता है।” (GS-II, 150 Words)दृष्टिकोण:
- भूमिका: राष्ट्रपति की दोहरी भूमिका: नाममात्र प्रमुख बनाम संवैधानिक प्रमुख।
- मुख्य भाग:
- “संकट मोचन” (Crisis Manager) वाला पक्ष: राष्ट्रपति शासन (Art. 356), आपातकाल (Art. 352) व विवेकाधीन शक्तियाँ।
- “मंत्रिपरिषद का कैदी” वाला पक्ष: अनुच्छेद 74 (मंत्रिपरिषद की सलाह बाध्यकारी है), 42वां संशोधन (1976)।
- उदाहरण: तमिलनाडु (1991) और ए.पी. (1973) जैसे विवादास्पद राष्ट्रपति शासन के आदेश।
- निष्कर्ष: राष्ट्रपति आपातकाल में शक्तिशाली, लेकिन सामान्य समय में सीमित। सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा (SR Bommai Case, 1994) होती है।
- प्रश्न 3: भारत के राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति (Art. 72) की तुलना अमेरिकी राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति से करें। (GS-II, 200 Words)दृष्टिकोण:
- भूमिका: क्षमादान शक्ति — कार्यपालिका की न्यायिक शक्ति (उद्देश्य: न्यायिक त्रुटियों को दूर करना)।
- मुख्य भाग:
- समानता: दोनों ही मृत्युदंड और अन्य सजाओं को क्षमा कर सकते हैं।
- अंतर (Key Differences):
- भारत: मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है। न्यायिक समीक्षा संभव है (Epuru Sudhakar Case, 2006)。
- अमेरिका: राष्ट्रपति स्वतंत्र रूप से क्षमा कर सकता है (बिना किसी की सलाह के)। न्यायिक समीक्षा लगभग न के बराबर।
- भारत में सीमाएँ: राष्ट्रपति संसद द्वारा महाभियोग लगाए गए व्यक्ति (Impeachment) को क्षमा नहीं कर सकता।
- निष्कर्ष: भारत में यह शक्ति अधिक जवाबदेह (Accountable) है, अमेरिका में अधिक स्वतंत्र।
निष्कर्ष
“औपचारिक प्रमुख” होना भले ही सुनने में सीमित लगे, लेकिन भारतीय राष्ट्रपति की भूमिका संकट के समय में ही स्पष्ट होती है। जब राजनीतिक अस्थिरता हो, जब संविधान का उल्लंघन हो रहा हो, या जब किसी विधेयक पर राष्ट्रहित के विरुद्ध कोई कानून बनने वाला हो तब राष्ट्रपति की वीटो, अध्यादेश और क्षमादान शक्तियाँ उसे एक मूक प्रहरी (Silent Sentinel) के रूप में स्थापित करती हैं।
डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि “राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रतीक है, शासन का साधन नहीं।” फिर भी, 21वीं सदी में जब लोकतंत्र पर खतरे बढ़ रहे हैं, भारतीय राष्ट्रपति सिर्फ एक “मुहर” (Seal) नहीं रह गए हैं। बल्कि वह उस संविधान के सबसे बड़े रक्षक हैं, जिस पर हमारा लोकतंत्र टिका है।
यही कारण है कि राष्ट्रपति से जुड़ी यह प्रक्रिया (Process of Election of President of India) ही नहीं, बल्कि उनकी हर शक्ति को समझना UPSC के लिए न केवल परीक्षा की दृष्टि से, बल्कि एक जागरूक नागरिक के रूप में भी अत्यंत आवश्यक है।

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