परिचय
भारतीय संविधान का भाग V (राष्ट्रपति) के अंतर्गत अनुच्छेद 63 से 73 तक उपराष्ट्रपति चुनाव के पद का वर्णन मिलता है। उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के बाद देश का दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद है। डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने इसे “द्वितीयक कार्यकारी” (Secondary Executive) की संज्ञा दी थी, परंतु समय के साथ इस पद की भूमिका और महत्व में वृद्धि हुई है।
UPSC प्रासंगिकता: यह विषय संविधान के कार्यकारी ढाँचे को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रीलिम्स में अनुच्छेदों, चुनाव प्रक्रिया, योग्यताओं पर प्रश्न आते हैं, जबकि मेन्स में राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के संबंध, राज्यसभा के सभापति की भूमिका और संवैधानिक विसंगतियों पर विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं।
वर्तमान प्रासंगिकता: हाल ही में श्री जगदीप धनखड़ ने उपराष्ट्रपति पद की शपथ ली। राज्यसभा में सभापति के रूप में उनके निर्णयों, विपक्षी सदस्यों के हंगामे और सभापति की तटस्थता पर बहस छिड़ी हुई है। इसके अलावा, उपराष्ट्रपति की क्षमादान, अध्यादेश और वीटो शक्तियों को लेकर अक्सर छात्रों में भ्रम रहता है। इस लेख में हम सभी उपविषयों को विस्तार से समझेंगे।
उपराष्ट्रपति क्या है?

भारत के उपराष्ट्रपति का पद संविधान निर्माताओं ने ब्रिटिश और अमेरिकी मॉडल के सम्मिश्रण से बनाया। अमेरिका में उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के निधन या पदमुक्ति पर स्वतः राष्ट्रपति बन जाता है, जबकि भारत में यह व्यवस्था थोड़ी भिन्न है। भारतीय उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उनके कार्यों का निर्वहन तो करता है, लेकिन वह स्वतः राष्ट्रपति नहीं बनता; उसके लिए निर्वाचन मंडल द्वारा चुनाव होता है।
अनुच्छेद 63 साफ़ कहता है: “भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।” यह पद मुख्यतः दो उद्देश्यों से बनाया गया:
- राज्यसभा का पदेन सभापति (Ex-officio Chairman of Rajya Sabha) बनना।
- राष्ट्रपति की अनुपस्थिति, बीमारी या पदमुक्ति पर उनके कर्तव्यों का निर्वहन करना।
उपराष्ट्रपति का चुनाव
यह लेख का केंद्रीय भाग है। उपराष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया अनुच्छेद 66 में विस्तार से दी गई है। यह चुनाव न तो प्रत्यक्ष होता है और न ही आम जनता इसका हिस्सा होती है।
1. निर्वाचक मंडल (Electoral College)
उपराष्ट्रपति का चुनाव एक अप्रत्यक्ष चुनाव होता है। निर्वाचक मंडल के सदस्य हैं:
- संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के निर्वाचित और मनोनीत सभी सदस्य।
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझ लें: राष्ट्रपति के चुनाव में राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य तथा संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं। जबकि उपराष्ट्रपति चुनाव में राज्य विधानसभाओं को कोई भूमिका नहीं होती।
क्यों? क्योंकि उपराष्ट्रपति के दोनों प्रमुख कार्य (राज्यसभा सभापति और राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन) संघ स्तर से जुड़े हैं। राज्य स्तर की विधायिका इससे प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित नहीं होती।
2. चुनाव की प्रणाली – एकल संक्रमणीय मत के माध्यम से आनुपातिक प्रतिनिधित्व
अनुच्छेद 66(1) के अनुसार, चुनाव एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) के माध्यम से आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) प्रणाली से होता है। मतदान गुप्त (Secret Ballot) होता है।
व्याख्या: सदस्य अपने मतपत्र पर 1, 2, 3… लिखकर अपनी पहली, दूसरी, तीसरी प्राथमिकता दर्शाते हैं। यदि किसी उम्मीदवार को पहली प्राथमिकता के पर्याप्त वोट नहीं मिलते, तो न्यूनतम वोट पाने वाले उम्मीदवार के वोट दूसरी प्राथमिकता के अनुसार स्थानांतरित कर दिए जाते हैं। यह व्यवस्था अल्पसंख्यकों को भी प्रतिनिधित्व देने के उद्देश्य से बनाई गई थी।
3. निर्वाचन अधिकारी
उपराष्ट्रपति का चुनाव निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) द्वारा संचालित नहीं होता, बल्कि संसद सचिवालय (Parliament Secretariat) द्वारा कराया जाता है। निर्वाचन अधिकारी राज्यसभा के महासचिव (Secretary General) होते हैं।
4. चुनाव से संबंधित विवाद
यदि चुनाव में कोई विवाद होता है, तो उसकी जाँच सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) करता है। अनुच्छेद 71(1) के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अंतिम होता है। परंतु यदि सुप्रीम कोर्ट किसी चुनाव को अमान्य घोषित कर दे, तो उससे पहले उपराष्ट्रपति द्वारा किए गए कार्य (जैसे राज्यसभा में पारित विधेयकों पर हस्ताक्षर) पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
योग्यता, महाभियोग और पद-रिक्ति
योग्यताएँ (अनुच्छेद 66(3))
उपराष्ट्रपति बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिए:
- वह भारत का नागरिक हो।
- उसकी आयु 35 वर्ष पूर्ण हो चुकी हो।
- वह राज्यसभा का सदस्य बनने की योग्यता रखता हो (यानी वह किसी राज्य में मतदाता हो या निर्वाचित होने के अन्य मापदंड पूरे करता हो)।
- वह लाभ के पद (Office of Profit) पर आसीन न हो।
पद हेतु अयोग्यता
- यदि वह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, मंत्री या किसी सरकारी लाभ के पद पर है।
- मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित किया गया हो।
- दिवालिया घोषित किया गया हो।
- संविधान के अधीन या संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के तहत अयोग्ध ठहराया गया हो।
शर्तें (अनुच्छेद 66(4))
उपराष्ट्रपति संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) का सदस्य नहीं हो सकता। यदि वह चुनाव से पहले सदस्य था, तो चुनाव जीतने के बाद उसे अपनी सदस्यता छोड़नी होगी।
पद की अवधि (अनुच्छेद 67)
उपराष्ट्रपति 5 वर्ष के लिए पद पर रहता है। वह पद छोड़ने के बाद भी पुनः चुनाव लड़ सकता है। वह राष्ट्रपति को त्यागपत्र (Resignation) लिखकर कभी भी पद छोड़ सकता है।
महाभियोग? – नहीं, यह हटाने की प्रक्रिया भिन्न है
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य: उपराष्ट्रपति पर महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया लागू नहीं होती। महाभियोग केवल राष्ट्रपति के लिए है। उपराष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया अनुच्छेद 67(b) में दी गई है।
हटाने की प्रक्रिया:
- केवल राज्यसभा (लोकसभा नहीं) उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव पारित कर सकती है।
- प्रस्ताव प्रभावी बहुमत (Effective Majority) से पारित होना चाहिए। प्रभावी बहुमत = राज्यसभा के कुल सदस्यों का बहुमत नहीं, बल्कि उस समय उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से 2/3 बहुमत।
- यह प्रस्ताव 14 दिनों का अग्रिम सूचना देने के बाद ही लाया जा सकता है।
- लोकसभा की कोई भूमिका नहीं। राष्ट्रपति का हस्तक्षेप भी नहीं।
UPSC नोट: प्रश्न पूछा जा सकता है – “क्या उपराष्ट्रपति पर महाभियोग चलाया जा सकता है?” उत्तर: नहीं।
पद रिक्ति (अनुच्छेद 68, 69, 70)
पद रिक्त होने के कारण:
- कार्यकाल पूरा होना
- त्यागपत्र
- मृत्यु
- राज्यसभा द्वारा हटाया जाना
- निर्वाचन अमान्य घोषित होना
यदि उपराष्ट्रपति का पद रिक्त हो जाए, तो राज्यसभा के उपसभापति (Deputy Chairman) राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य करते हैं। नया चुनाव जल्द से जल्द करा दिया जाता है, परंतु संविधान में कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है।
जब उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर रहा हो (राष्ट्रपति के निधन, त्यागपत्र या असमर्थता पर), तब वह उपराष्ट्रपति के कर्तव्यों (जैसे राज्यसभा सभापति) का निर्वहन नहीं करता।
उपराष्ट्रपति की शक्तियाँ और कर्तव्य
उपराष्ट्रपति की शक्तियों को दो भागों में बाँटा जा सकता है:
1. राज्यसभा के पदेन सभापति के रूप में
यह उनका प्राथमिक एवं स्थायी कार्य है। इस क्षमता में वे:
- राज्यसभा की कार्यवाही का संचालन करते हैं।
- सदन में शांति एवं व्यवस्था बनाए रखते हैं।
- किसी सदस्य को अविश्वास प्रस्ताव या हंगामे पर निलंबित (Suspend) करने का अधिकार रखते हैं।
- सदन में समान मत (Tie) की स्थिति में निर्णायक मत (Casting Vote) देते हैं। यहाँ गौर करने वाली बात: वे आम मतदान में भाग नहीं लेते, केवल बराबर वोट आने पर ही वोट डालते हैं।
- संसद का संयुक्त अधिवेशन (Joint Sitting) उपराष्ट्रपति नहीं, बल्कि लोकसभा अध्यक्ष बुलाता और संचालित करता है।
2. राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन
जब राष्ट्रपति अपनी मृत्यु, त्यागपत्र, महाभियोग या बीमारी के कारण पद पर नहीं होता, तब उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है। यह अवधि अनुच्छेद 65 के तहत आती है। इस दौरान:
- उसे राष्ट्रपति के सभी अधिकार एवं विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं।
- वह राष्ट्रपति को दिए जाने वाले वेतन एवं भत्ते का हकदार होता है (सामान्यतः उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति के रूप में वेतन पाता है)।
- वह उपराष्ट्रपति के पद से संबंधित कोई कार्य नहीं करता (जैसे राज्यसभा की अध्यक्षता)।
ध्यान रखें: यदि राष्ट्रपति के निधन से पद रिक्त हुआ, तो उपराष्ट्रपति 6 महीने के भीतर होने वाले नए चुनाव तक कार्यवाहक राष्ट्रपति (Acting President) के रूप में काम करता है। नया राष्ट्रपति चुन लिए जाने पर वह फिर उपराष्ट्रपति के पद पर वापस नहीं आता – बल्कि वह उपराष्ट्रपति पद से भी मुक्त हो जाता है। बाद में नए उपराष्ट्रपति का चुनाव होता है।
उपराष्ट्रपति की वीटो शक्ति – क्या वाकई है?
स्पष्ट उत्तर: नहीं, उपराष्ट्रपति के पास कोई वीटो शक्ति नहीं है।
वीटो शक्ति (Veto Power) केवल राष्ट्रपति के पास होती है। राष्ट्रपति संसद द्वारा पारित विधेयक को सहमति दे सकता है, विचारार्थ वापस भेज सकता है (Suspensive Veto) या कुछ मामलों में रोक सकता है (Pocket Veto)।
उपराष्ट्रपति, राज्यसभा के सभापति के नाते, सदन में पारित होने वाले किसी भी विधेयक पर वीटो नहीं लगा सकता। यदि कोई धन विधेयक राज्यसभा में आता है, तो सभापति उसे केवल सदन के नियमों के अनुसार ही एजेंडे में रखते हैं। उनके पास विधेयक को अवरुद्ध करने का कोई अधिकार नहीं।
UPSC ट्रिक: याद रखें – वीटो, अध्यादेश, क्षमादान – ये तीन शक्तियाँ राष्ट्रपति की हैं। उपराष्ट्रपति राज्यसभा के संचालन और राष्ट्रपति के कार्यवाहक भूमिका तक सीमित है।
उपराष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति
नहीं, उपराष्ट्रपति अध्यादेश (Ordinance) जारी नहीं कर सकता।
अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति दी गई है, जब संसद सत्र में न हो और तत्काल कानून बनाना आवश्यक हो। उपराष्ट्रपति, चाहे वह कितने भी बड़े पद पर हो, इस शक्ति से पूर्णतः वंचित है।
यहाँ तक कि जब उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर रहा हो, तब भी वह राष्ट्रपति की सभी शक्तियों का प्रयोग करता है – तब वह अध्यादेश जारी कर सकता है, लेकिन उस स्थिति में वह कार्यवाहक राष्ट्रपति होता है, न कि अपनी मूल क्षमता में। यह एक सूक्ष्म अंतर है।
उपराष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति
नहीं, उपराष्ट्रपति के पास क्षमादान (Pardon) की कोई शक्ति नहीं है।
अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को क्षमादान, प्रवास, परिहार आदि की शक्तियाँ प्राप्त हैं। राज्य स्तर पर राज्यपाल (अनुच्छेद 161) के पास यह अधिकार है। उपराष्ट्रपति इस सूची में कहीं नहीं हैं।
केवल एक स्थिति: जब उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति बनता है, तो वह अस्थायी रूप से क्षमादान की शक्ति का प्रयोग कर सकता है। परंतु इसे “उपराष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति” न कहकर “कार्यवाहक राष्ट्रपति की शक्ति” कहना अधिक उचित है।
उपराष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति
यह UPSC मेन्स के लिए सबसे महत्वपूर्ण भाग है। उपराष्ट्रपति को अक्सर “महत्वहीन”, “गौण”, “सिर्फ औपचारिक” पद माना जाता है। क्या यह सही है?
संवैधानिक स्थिति का विश्लेषण:
| पहलू | स्थिति |
|---|---|
| रैंक | देश का दूसरा सर्वोच्च पद |
| संवैधानिक पद | हाँ, अनुच्छेद 63-73 में उल्लेख |
| कार्यपालिका प्रमुख | नहीं, यह राष्ट्रपति है |
| विधायिका से संबंध | राज्यसभा का सभापति – अतः विधायिका का अभिन्न अंग |
| निर्वाचन प्रक्रिया | अप्रत्यक्ष, केवल संसद के सदस्य |
| हटाना | राज्यसभा द्वारा (लोकसभा नहीं) |
| न्यायिक शक्तियाँ | कोई नहीं |
| आपातकालीन शक्तियाँ | कोई नहीं |
आलोचनात्मक दृष्टि से:
- उपराष्ट्रपति का पद राज्यसभा की कार्यवाही तक सीमित है। वह प्रशासन में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं निभाता।
- वह न तो मंत्रिपरिषद का सदस्य है, न ही उसकी बैठकों में बुलाया जाता है।
- राष्ट्रपति के विपरीत, उपराष्ट्रपति को अनुच्छेद 74 (मंत्रियों की सलाह) से बंधे होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह कार्यपालिका का प्रमुख नहीं है।
हालाँकि, महत्वपूर्ण भूमिकाएँ:
- राज्यसभा में जब राजनीतिक गतिरोध आता है, तो सभापति के निर्णय (जैसे किसी सदस्य का निलंबन, या निर्णायक मत) कानून निर्माण को प्रभावित कर सकते हैं।
- जब राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों का पद रिक्त हो (दुर्लभ परिस्थिति), तो राज्यसभा के उपसभापति राष्ट्रपति के कार्य नहीं करते; बल्कि मुख्य न्यायाधीश (CJI) कार्यवाहक राष्ट्रपति बनते हैं। यह एक संवैधानिक सुरक्षा व्यवस्था है।
प्रोफेसर के.टी. शाह (Constituent Assembly): उन्होंने कहा था कि उपराष्ट्रपति को ज्यादा शक्तियाँ न देकर संविधान ने संतुलन बनाया है, क्योंकि अमेरिकी मॉडल की नकल करने से कार्यपालिका में द्वैधता हो सकती थी।
उदाहरण एवं समकालीन संदर्भ
वास्तविक उदाहरण:
- डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन – पहले उपराष्ट्रपति (1952-1962) और फिर राष्ट्रपति। उनके कार्यकाल में राज्यसभा को एक नई पहचान मिली।
- बी.डी. जत्ती – 1974 में राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के निधन पर कार्यवाहक राष्ट्रपति बने। उन्होंने लोकसभा का विघटन करने जैसे संवेदनशील निर्णय लिए।
- वेंकैया नायडू (2017-2022) – राज्यसभा में सदस्यों को निलंबित करने के लिए चर्चित। उनके कार्यकाल में सदन की कार्यक्षमता को लेकर बहस हुई।
- जगदीप धनखड़ (वर्तमान) – “तू तू मैं मैं” वाली घटनाओं के बाद उन्होंने सदन में अनुशासन पर जोर दिया। विपक्ष का आरोप है कि वे पक्षपात कर रहे हैं।
समकालीन मुद्दे:
- सभापति की तटस्थता: क्या उपराष्ट्रपति को राजनीतिक दल का सदस्य बने रहना चाहिए? वर्तमान उपराष्ट्रपति भाजपा से आए हैं और विपक्ष अक्सर उनके निर्णयों को पक्षपातपूर्ण बताता है।
- राष्ट्रपति शासन लगाने में भूमिका: कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं, लेकिन जब राष्ट्रपति अस्वस्थ हों, तब उपराष्ट्रपति सलाह दे सकते हैं।
- आपातकाल (Emergency) में भूमिका: 1975 के आपातकाल के दौरान उपराष्ट्रपति बी.डी. जत्ती ने कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाई, क्योंकि सारी शक्तियाँ प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के पास केन्द्रित थीं।
UPSC Prelims के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| अनुच्छेद 63 | भारत का उपराष्ट्रपति होगा |
| अनुच्छेद 64 | उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति |
| अनुच्छेद 65 | राष्ट्रपति के कर्तव्यों का निर्वहन |
| अनुच्छेद 66 | चुनाव प्रक्रिया |
| अनुच्छेद 67 | पद की अवधि (5 वर्ष) |
| अनुच्छेद 68 | पद रिक्ति हेतु चुनाव का समय |
| अनुच्छेद 69 | शपथ या प्रतिज्ञान |
| अनुच्छेद 70 | अन्य आकस्मिकताओं में राष्ट्रपति के कर्तव्यों का निर्वहन |
| पहले उपराष्ट्रपति | डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1952) |
| पहली महिला उपराष्ट्रपति | अब तक कोई नहीं |
| सबसे लंबा कार्यकाल | डॉ. राधाकृष्णन (10 वर्ष) |
| हटाने वाला सदन | केवल राज्यसभा |
| चुनाव में मतदाता | संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्य (लोकसभा + राज्यसभा) |
| चुनाव विवाद की अंतिम अदालत | सर्वोच्च न्यायालय |
| वेतन | राज्यसभा सभापति के रूप में (वर्तमान ₹4 लाख/माह) |
UPSC Mains Analysis
सकारात्मक पक्ष
- संवैधानिक निरंतरता: राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में राष्ट्र का प्रशासन ठप नहीं होता।
- राज्यसभा का सुचारू संचालन: सभापति के बिना उच्च सदन अराजक हो जाएगा।
- अनुभवी व्यक्तित्व: वरिष्ठ राजनेता इस पद पर आते हैं, जिनका अनुभव संसद को लाभ पहुँचाता है।
- राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति में तालमेल: दोनों के बीच अच्छे संबंध राष्ट्रहित में कार्य करते हैं।
चुनौतियाँ / आलोचना
- अधिकारों का अभाव: उपराष्ट्रपति को “बिना शक्तियों का राजा” कहा जाता है। वह न तो कैबिनेट बैठक में शामिल होता है, न ही प्रशासनिक निर्णयों में भागीदारी रखता है।
- राज्यसभा की “रबर स्टैम्प” छवि: यदि सत्तापक्ष के बहुमत के आगे सभापति असहाय हो जाते हैं, तो उनकी भूमिका प्रतीकात्मक रह जाती है।
- तटस्थता पर प्रश्न: जब उपराष्ट्रपति किसी राजनीतिक दल से चुनाव लड़कर आता है, तो राज्यसभा की अध्यक्षता में पक्षपात की आशंका बनी रहती है।
- अमेरिका से तुलना: अमेरिकी उपराष्ट्रपति प्रशासन में सक्रिय भूमिका निभाता है, जबकि भारत में वह केवल विधायी भूमिका में सीमित है।
सुधार के उपाय (Opinion for Mains)
- विधेयकों पर चर्चा में भूमिका: सभापति को केवल प्रक्रियात्मक निर्णय न देकर, सारगर्भित मुद्दों पर सदन को दिशा देने की शक्ति दी जानी चाहिए।
- पद की अवधि निर्धारण: वर्तमान में उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के साथ नहीं हटता; इसे सिंक्रनाइज़ किया जा सकता है।
- राज्यसभा सभापति का चुनाव: क्या इसे सीधे सदस्यों द्वारा चुना जाना चाहिए? (वर्तमान में पदेन)
- नैतिकता दिशानिर्देश: उपराष्ट्रपति को पद पर रहते हुए राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ने का प्रावधान लाया जा सकता है।
PYQ Perspective (पिछले वर्षों के प्रश्न)
Prelims (उदाहरण):
- 2023: “निम्नलिखित में से कौन उपराष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल का सदस्य नहीं है?” (उत्तर: राज्य विधानसभाओं के सदस्य)
- 2019: “अनुच्छेद 66 के संदर्भ में, एकल संक्रमणीय मत प्रणाली क्यों अपनाई गई?” (उत्तर: अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने के लिए)
- 2017: “राज्यसभा द्वारा उपराष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया में किस बहुमत की आवश्यकता होती है?” (उत्तर: प्रभावी बहुमत)
Mains (उदाहरण):
- 2022: “भारत के उपराष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति का विश्लेषण करें। क्या उन्हें ‘बिना शक्तियों का राजा’ कहना उचित है?”
- 2018: “राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में अंतर स्पष्ट करें।”
- 2014: “उपराष्ट्रपति की हटाने की प्रक्रिया महाभियोग से किस प्रकार भिन्न है?”
Quick Revision Notes
✓ उपराष्ट्रपति → दूसरा सर्वोच्च पद
✓ चुनाव → अप्रत्यक्ष, एकल संक्रमणीय मत, गुप्त मतदान
✓ निर्वाचक मंडल → लोकसभा + राज्यसभा के सभी सदस्य
✓ योग्यता → 35 वर्ष, भारतीय नागरिक, राज्यसभा सदस्यता योग्य
✓ कार्यकाल → 5 वर्ष (पुनः चुनाव संभव)
✓ हटाना → राज्यसभा द्वारा ‘प्रभावी बहुमत’ से (महाभियोग नहीं)
✓ राष्ट्रपति के कर्तव्य → केवल अनुपस्थिति/मृत्यु/असमर्थता पर
✓ राज्यसभा सभापति → निर्णायक मत (केवल tie पर)
✓ वीटो शक्ति → नहीं
✓ अध्यादेश → नहीं (केवल कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में हाँ)
✓ क्षमादान → नहीं
✓ वेतन → राज्यसभा सभापति के रूप में
✓ सुप्रीम कोर्ट → चुनाव विवाद का अंतिम निर्णायक
FAQs
प्रश्न 1: क्या उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति का त्यागपत्र स्वीकार कर सकता है?
उत्तर: नहीं। राष्ट्रपति का त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को संबोधित होता है, लेकिन उपराष्ट्रपति इसे स्वीकार नहीं करता; वह इसे तुरंत लोकसभा अध्यक्ष को सूचित करता है और फिर संसद के समक्ष रखा जाता है।
प्रश्न 2: यदि उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति बनता है, तो राज्यसभा का सभापति कौन होगा?
उत्तर: राज्यसभा का उपसभापति (Deputy Chairman) उस अवधि में सभापति के कर्तव्यों का निर्वहन करता है।
प्रश्न 3: क्या उपराष्ट्रपति पर कोई आपराधिक मुकदमा चल सकता है?
उत्तर: हाँ। राष्ट्रपति को कार्यकाल के दौरान किसी भी आपराधिक मुकदमे से प्रतिरक्षा (Immunity) मिली हुई है, लेकिन उपराष्ट्रपति को यह प्रतिरक्षा राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते समय को छोड़कर नहीं मिलती। सामान्य दशा में वह नागरिक की तरह अभियोजित हो सकता है।
प्रश्न 4: क्या उपराष्ट्रपति किसी राजनीतिक दल का सदस्य रह सकता है?
उत्तर: संविधान में इस पर कोई स्पष्ट रोक नहीं है। व्यवहार में अधिकांश उपराष्ट्रपति किसी न किसी दल से जुड़े रहे हैं, लेकिन पद की गरिमा के अनुसार वे अपनी दलीय गतिविधियाँ स्थगित रखते हैं।
प्रश्न 5: क्या उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सदस्यों का निलंबन कर सकता है, और उसके खिलाफ क्या उपाय है?
उत्तर: हाँ, सदन की अनुशासनहीनता पर सभापति सदस्यों को निलंबित कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने ‘राजा राम पाल बनाम लोकसभा सभापति’ (2005) मामले में कहा कि निलंबन के आदेश की न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती, लेकिन चरम मामलों में सदन स्वयं सभापति के निर्णय को अवहेलना प्रस्ताव (Censure Motion) से चुनौती दे सकता है।
Practice Questions
Prelims MCQs
1. भारत के उपराष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में निम्नलिखित में से कौन शामिल नहीं है?
(A) लोकसभा के निर्वाचित सदस्य
(B) राज्यसभा के मनोनीत सदस्य
(C) राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य
(D) लोकसभा के मनोनीत सदस्य
उत्तर: (C) – राज्य विधानसभाओं के सदस्य उपराष्ट्रपति के चुनाव में भाग नहीं लेते।
2. अनुच्छेद 67(b) के तहत उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए राज्यसभा को किस बहुमत की आवश्यकता होती है?
(A) साधारण बहुमत
(B) निरपेक्ष बहुमत
(C) प्रभावी बहुमत
(D) सर्वसम्मति
उत्तर: (C) – प्रभावी बहुमत अर्थात उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3 बहुमत।
3. निम्नलिखित में से कौन सी शक्ति उपराष्ट्रपति के पास नहीं है?
- वीटो शक्ति
- अध्यादेश जारी करने की शक्ति
- क्षमादान की शक्ति
नीचे दिए गए कूट का उपयोग कर उत्तर चुनें:
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (D) – उपराष्ट्रपति के पास तीनों में से कोई भी शक्ति नहीं है (केवल कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में अपवाद)।
Mains Questions
1. “भारत के उपराष्ट्रपति का पद संवैधानिक रूप से ‘गौण’ अवश्य है, परंतु राजनीतिक रूप से ‘महत्वपूर्ण’ है।” इस कथन के आलोक में उपराष्ट्रपति की शक्तियों एवं सीमाओं का विश्लेषण करें।
2. उपराष्ट्रपति के चुनाव और राष्ट्रपति के चुनाव में चार प्रमुख अंतर बताइए। क्या उपराष्ट्रपति के चुनाव में राज्य विधानसभाओं को शामिल किए जाने का कोई तर्कसंगत औचित्य है?
3. हाल के वर्षों में राज्यसभा के सभापति की तटस्थता एक विवादास्पद मुद्दा बना है। क्या उपराष्ट्रपति को पद पर रहते हुए राजनीतिक दल की सदस्यता त्यागने का संवैधानिक प्रावधान होना चाहिए? अपने तर्क प्रस्तुत करें।
निष्कर्ष
भारत का उपराष्ट्रपति एक ऐसा पद है, जो दिखने में सीमित शक्तियों वाला लगता है, लेकिन संवैधानिक तंत्र की निरंतरता और विधायिका के सुचारु संचालन के लिए अपरिहार्य है। उपराष्ट्रपति चुनाव की अप्रत्यक्ष एवं आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली प्रणाली यह सुनिश्चित करती है कि दूसरा सर्वोच्च पद भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से भरा जाए। जहाँ एक ओर उनके पास राष्ट्रपति जैसी वीटो, अध्यादेश या क्षमादान की शक्तियाँ नहीं, वहीं दूसरी ओर राज्यसभा के सभापति के रूप में उनका निर्णायक मत और सदन के नियमों की व्याख्या करने का अधिकार कानून निर्माण को प्रभावित कर सकता है।
UPSC की दृष्टि से, इस विषय को संविधान के कार्यकारी ढाँचे के परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद – इन चारों के बीच के अंतर और संबंधों को स्पष्टता से जानना ही प्रीलिम्स और मेन्स दोनों में उत्तीर्ण होने की कुंजी है।
अंतिम सलाह: इन नोट्स को पढ़ने के बाद संविधान के अनुच्छेद 63 से 73 को मूल पाठ (Bare Act) में एक बार अवश्य देखें। वहाँ की भाषा, हालाँकि कठिन है, लेकिन वही अंतिम प्रमाणिक स्रोत है। इसके बाद पिछले 10 वर्षों के PYQs को हल करें – आप पाएंगे कि उपराष्ट्रपति से जुड़े अधिकांश प्रश्न आपके लिए अब सरल हो गए हैं।

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