परिचय
इतिहास को समझने के लिए केवल तिथियां ही काफी नहीं होतीं, बल्कि उस समय का साहित्य और पुरातात्विक अवशेष भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। NCERT कक्षा 6 इतिहास अध्याय 5 [क्या बताती हैं हमें किताबें और कब्रें] हमें दो अलग-अलग स्रोतों से अतीत को देखने का नजरिया देता है।
एक तरफ हम लिखित स्रोतों में ‘वेदों’ का अध्ययन करते हैं, जो हमें उत्तर-पश्चिम भारत के प्रारंभिक समाज के बारे में बताते हैं। वहीं दूसरी तरफ, हम दक्षिण भारत, कश्मीर और पूर्वोत्तर में फैली ‘महापाषाण’ (Megalithic) संस्कृति की कब्रों के माध्यम से उस समय के जीवन को समझते हैं। UPSC की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए यह अध्याय वैदिक काल और महापाषाण काल के बीच के अंतर को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

दुनिया की सबसे पुरानी किताबों में से एक – वेद
भारतीय उपमहाद्वीप में साहित्य की शुरुआत वेदों से मानी जाती है। वेद संख्या में चार हैं- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद। इनमें से सबसे पुराना ‘ऋग्वेद’ है, जिसकी रचना लगभग 3500 साल पहले हुई थी।
ऋग्वेद में एक हजार से अधिक प्रार्थनाएं हैं, जिन्हें ‘सूक्त’ कहा जाता है। सूक्त का अर्थ है – ‘अच्छी तरह से बोला गया’। ये सूक्त विभिन्न देवी-देवताओं की स्तुति में रचे गए थे। ऋग्वेद में तीन देवता बहुत महत्वपूर्ण माने गए हैं-
- अग्नि – आग के देवता।
- इंद्र – युद्ध के देवता।
- सोम – एक विशेष पौधा जिससे खास पेय बनाया जाता था।
इन प्रार्थनाओं की रचना ऋषियों ने की थी। अधिकांश सूक्तों के रचयिता, सीखने वाले और सिखाने वाले पुरुष थे, लेकिन कुछ प्रार्थनाओं की रचना महिलाओं ने भी की थी। यह हमें बताता है कि उस समय शिक्षा में महिलाओं की भी भागीदारी थी।
संस्कृत और अन्य भाषाओं का परिवार
ऋग्वेद की भाषा ‘प्राक-संस्कृत’ या ‘वैदिक संस्कृत’ कहलाती है। यह आज स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली संस्कृत से थोड़ी अलग थी। भाषा विज्ञान की दृष्टि से संस्कृत ‘भारोपीय’ (भारत-यूरोपीय) भाषा परिवार का हिस्सा है।
UPSC के लिए यह वर्गीकरण महत्वपूर्ण है-
- भारोपीय परिवार – इसमें संस्कृत, असमिया, गुजराती, हिंदी, कश्मीरी और सिंधी जैसी भारतीय भाषाएँ शामिल हैं। साथ ही फारसी और यूरोप की अंग्रेजी, फ्रांसीसी, जर्मन, ग्रीक आदि भाषाएँ भी इसी परिवार की हैं। इन्हें एक परिवार इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनके मूल शब्द एक जैसे हैं (जैसे- ‘मातृ’ संस्कृत में और ‘Mother’ अंग्रेजी में)।
- द्रविड़ परिवार – दक्षिण भारत की भाषाएँ जैसे तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम।
- ऑस्ट्रो-एशियाटिक परिवार – मध्य भारत और झारखंड के कई हिस्सों में बोली जाने वाली भाषाएँ।
- तिब्बत-बर्मा परिवार – पूर्वोत्तर भारत की भाषाएँ।
इतिहासकार ऋग्वेद का अध्ययन कैसे करते हैं?
इतिहासकार और पुरातत्वविद् अतीत को समझने के लिए भौतिक अवशेषों के साथ-साथ लिखित स्रोतों का भी उपयोग करते हैं। ऋग्वेद एक लिखित ग्रन्थ होने के साथ-साथ एक ‘श्रुति’ (सुना हुआ) ग्रंथ भी था, जिसे छापने का काम बहुत बाद में हुआ।
इतिहासकार ऋग्वेद के सूक्तों में निहित ‘संवादों’ का विश्लेषण करते हैं। उदाहरण के लिए, विश्वामित्र नामक ऋषि और दो नदियों (व्यास और सतलज) के बीच का संवाद। इस संवाद से हमें पता चलता है कि उस समय नदियों को देवियों के रूप में पूजा जाता था और लोग पहाड़ों से नीचे उतरकर मैदानी इलाकों की ओर बढ़ रहे थे। इन संवादों से भौगोलिक स्थिति और उस समय के समाज की मान्यताओं का पता चलता है।
ऋग्वैदिक जीवन – मवेशी, घोड़े और रथ
ऋग्वेद के अध्ययन से पता चलता है कि उस समय का समाज मुख्य रूप से पशुचारक था। मवेशियों, बच्चों (खासकर पुत्रों) और घोड़ों के लिए अनेक प्रार्थनाएं मिलती हैं।
युद्ध और संपत्ति का स्वरूप-
- घोड़े और रथ – घोड़ों का उपयोग मुख्य रूप से रथ खींचने के लिए किया जाता था, जो युद्ध में काम आते थे।
- युद्ध के कारण – लड़ाइयाँ मवेशियों, ज़मीन (चरागाह के लिए), और पानी के स्रोतों पर कब्ज़ा करने के लिए लड़ी जाती थीं। कभी-कभी लोगों को बंदी बनाने के लिए भी युद्ध होते थे।
- धन का वितरण – युद्ध में जीता गया धन सरदार (नेता), पुरोहित और आम लोगों के बीच बांटा जाता था। कुछ हिस्सा यज्ञ के लिए रखा जाता था।
यज्ञ और अनुष्ठान- यज्ञों में आग में आहुति दी जाती थी। घी, अनाज और कभी-कभी जानवरों की भी आहुति दी जाती थी। यह अनुष्ठान देवताओं को प्रसन्न करने के लिए होते थे।
लोगों को विशेष बताने वाले शब्द – सामाजिक वर्गीकरण
ऋग्वेद में समाज का वर्गीकरण ‘काम’ और ‘भाषा’ के आधार पर किया जाता था, न कि जन्म के आधार पर (जैसा बाद में हुआ)।
दो मुख्य समूह-
- पुरोहित – जिन्हें कभी-कभी ब्राह्मण कहा जाता था। ये यज्ञ और अनुष्ठान करते थे।
- राजा – ये बाद के समय के राजाओं जैसे नहीं थे। इनके पास न तो बड़ी राजधानियाँ थीं, न महल, और न ही कोई स्थायी सेना। ये कर (Tax) भी नहीं वसूलते थे। अक्सर राजा की मृत्यु के बाद उसका बेटा अपने आप शासक नहीं बनता था।
जनता के लिए शब्द- पूरे समुदाय के लिए दो शब्दों का इस्तेमाल होता था – ‘जन’ और ‘विश’। ऋग्वेद में पुरु-जन, भरत-जन, और यदु-जन जैसे नामों का उल्लेख मिलता है।
दास और दस्यु- आर्यों ने अपने विरोधियों को ‘दस्यु’ कहा। ये वे लोग थे जो यज्ञ नहीं करते थे और शायद दूसरी भाषा बोलते थे। बाद में ‘दास’ शब्द का मतलब गुलाम हो गया। उन्हें युद्धबंदी के रूप में लाया जाता था और मालिक की संपत्ति माना जाता था।
खामोश प्रहरी – कहानी महापाषाणों की
जहाँ उत्तर भारत में वेदों की रचना हो रही थी, वहीं दक्षिण भारत, दक्कन, कश्मीर और पूर्वोत्तर में एक अलग संस्कृति पनप रही थी। इसे ‘महापाषाण’ (Megalithic) संस्कृति कहा जाता है।
महापाषाण का अर्थ- ‘महा’ यानी बड़ा और ‘पाषाण’ यानी पत्थर। ये बड़े पत्थर कब्रों को चिह्नित करने के लिए लगाए जाते थे। यह प्रथा लगभग 3000 साल पहले शुरू हुई।
कब्रों की विशेषताएं-
- कुछ महापाषाण ज़मीन के ऊपर दिखते हैं, जबकि कुछ ज़मीन के भीतर होते हैं।
- पुरातत्वविदों को अक्सर पत्थरों का एक गोला (Stone Circle) या एक अकेला बड़ा पत्थर खड़ा मिलता है। ये निशान बताते थे कि यहाँ कब्र है।
- सभी कब्रों में कुछ समानताएँ थीं। मृतकों को खास किस्म के बर्तनों के साथ दफनाया जाता था, जिन्हें काले-लाल मिट्टी के बर्तन (Black and Red Ware) कहा जाता है।
- इनके साथ लोहे के औजार, हथियार, घोड़ों के कंकाल और पत्थर या सोने के गहने भी मिले हैं।
पुरातात्विक साक्ष्य – सामाजिक असमानता
पुरातत्वविदों को कब्रों में मिली वस्तुओं के आधार पर उस समय के समाज में व्याप्त असमानता का पता चलता है।
ब्रह्मगिरि का उदाहरण- यहाँ एक व्यक्ति की कब्र में 33 सोने के मनके और शंख पाए गए। जबकि दूसरे कंकालों के पास सिर्फ कुछ मिट्टी के बर्तन मिले। यह दर्शाता है कि लोगों की सामाजिक स्थिति में अंतर था। कुछ लोग अमीर थे तो कुछ गरीब, कुछ सरदार थे तो कुछ अनुयायी।
पारिवारिक कब्रें- कभी-कभी एक ही महापाषाण में एक से अधिक कंकाल मिले हैं। यह शायद इस बात का संकेत है कि एक ही परिवार के लोगों को अलग-अलग समय पर मरने के बाद एक ही स्थान पर दफनाया जाता था। कब्र के रास्तों को ‘पोर्ट-होल’ (Port-hole) कहा जाता था, जिसके जरिए बाद में मरने वालों को अंदर लाया जाता था।
इनामगांव – एक विशेष कब्र का अध्ययन
इनामगांव, भीमा की सहायक नदी ‘घोड़’ के किनारे स्थित एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। यहाँ 3600 से 2700 साल पहले लोग रहते थे।
दफनाने का तरीका- यहाँ वयस्कों को अक्सर गड्ढे में सीधा लिटाकर दफनाया जाता था, जिनका सिर उत्तर की ओर होता था। कई बार उन्हें घर के अंदर ही दफनाया जाता था।
एक विशिष्ट उदाहरण- एक आदमी को पाँच कमरों वाले मकान के आँगन में, चार पैरों वाले मिट्टी के एक बड़े संदूक (Jar) में दफनाया गया था। यह बस्ती के सबसे बड़े घरों में से एक था और यहाँ अनाज का गोदाम भी था। शव के पैर मुड़े हुए थे। यह शायद किसी मुखिया या महत्वपूर्ण व्यक्ति की कब्र रही होगी।
UPSC मुख्य परीक्षा नोट्स
UPSC मुख्य परीक्षा के लिए इन बिंदुओं का उपयोग उत्तर लेखन में किया जा सकता है-
- वैदिक बनाम महापाषाण संस्कृति – उत्तर भारत में साहित्यिक परंपरा (वेद) का विकास हो रहा था, जबकि प्रायद्वीपीय भारत में भौतिक संस्कृति (महापाषाण) लोहे के उपयोग के साथ विकसित हो रही थी।
- राजनीतिक संरचना का विकास – ऋग्वैदिक काल में ‘राजा’ का पद वंशानुगत नहीं था और न ही कोई स्थायी सेना थी। यह ‘जन’ (कबीले) आधारित व्यवस्था थी, न कि ‘जनपद’ (क्षेत्र) आधारित।
- महिलाओं की स्थिति – ऋग्वेद में महिला ऋषियों का उल्लेख और शिक्षा में उनकी भागीदारी एक प्रगतिशील समाज की ओर इशारा करती है, हालांकि पुत्र प्राप्ति की कामना पितृसत्तात्मक तत्वों को भी दर्शाती है।
- लोहे का महत्व – महापाषाण संस्कृति भारतीय उपमहाद्वीप में लोहे के शुरुआती उपयोग के प्रमाण देती है, जो बाद में कृषि और युद्ध तकनीक में क्रांति लाया।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- वेद – ऋग्वेद (सबसे पुराना, 3500 वर्ष पूर्व), सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
- भाषा – संस्कृत (भारोपीय परिवार), तमिल/तेलुगु (द्रविड़ परिवार)।
- नदियाँ – ऋग्वेद में सरस्वती, सिंधु और उसकी सहायक नदियों का सर्वाधिक उल्लेख है। गंगा और यमुना का उल्लेख केवल एक बार है।
- महापाषाण काल – 3000 साल पहले शुरू हुआ।
- प्रमुख स्थल – इनामगांव (घोड़ नदी), ब्रह्मगिरि (महापाषाण स्थल)।
- विशिष्ट बर्तन – काले और लाल मृदभांड (Black and Red Ware)।
- चरक – प्रसिद्ध वैद्य, जिन्होंने लगभग 2000 साल पहले ‘चरक संहिता’ लिखी। उन्होंने मनुष्य के शरीर में 360 हड्डियों का जिक्र किया था।
UPSC विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs)
प्रश्न (2017) – ऋग्वैदिक आर्य और सिंधु घाटी के लोगों की संस्कृति के बीच अंतर के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
- ऋग्वैदिक आर्य कवच और शिरस्त्राण (हेलमेट) का उपयोग करते थे, जबकि सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों में इसके उपयोग का कोई साक्ष्य नहीं मिलता।
- ऋग्वैदिक आर्यों को स्वर्ण, चांदी और ताम्र का ज्ञान था, जबकि सिंधु घाटी के लोगों को केवल ताम्र और लोहे का ज्ञान था।
- ऋग्वैदिक आर्यों ने घोड़े को पालतू बना लिया था, जबकि इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है कि सिंधु घाटी के लोग इस पशु को जानते थे। उत्तर के लिए संकेत- कथन 1 और 3 सही हैं। (सिंधु लोगों को लोहे का ज्ञान नहीं था)।
अभ्यास प्रश्न (MCQs)
Q1. ऋग्वेद के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें-
- इसमें एक हजार से अधिक प्रार्थनाएं हैं जिन्हें ‘सूक्त’ कहा जाता है।
- इसकी रचना प्राक-संस्कृत में की गई थी।
- इसमें गंगा नदी का उल्लेख सबसे अधिक बार हुआ है। उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सत्य है/हैं? A) केवल 1 B) केवल 1 और 2 C) केवल 2 और 3 D) 1, 2 और 3
Q2. महापाषाण (Megaliths) के संदर्भ में सत्य है-
A) ये केवल उत्तर भारत में पाए जाते हैं। B) इनका उपयोग खगोल विज्ञान के लिए होता था। C) ये कब्रगाहों को चिह्नित करने के लिए इस्तेमाल होते थे। D) इनका संबंध केवल कांस्य युग से है।
Q3. ‘इनामगांव’ पुरातात्विक स्थल किस नदी के किनारे स्थित है?
A) गंगा B) घोड़ C) नर्मदा D) कावेरी
Q4. ऋग्वैदिक काल में ‘विश’ शब्द का प्रयोग किसके लिए होता था?
A) राजा के लिए B) पुरोहित के लिए C) जनता या पूरे समुदाय के लिए D) दास के लिए
Q5. चरक संहिता का संबंध किससे है?
A) खगोल विज्ञान B) व्याकरण C) चिकित्सा शास्त्र D) गणित
निष्कर्ष
अध्याय 5 हमें यह सिखाता है कि भारतीय इतिहास एकांगी नहीं है। एक ही समय खंड में देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग जीवन शैलियाँ पनप रही थीं। जहाँ एक ओर ऋग्वेद के श्लोक देवताओं का आह्वान कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर दक्कन के पठारों पर बड़े पत्थर अपने पूर्वजों की गाथाएं सहेज रहे थे। UPSC अभ्यर्थी के रूप में, इन विविधताओं और उनके पुरातात्विक प्रमाणों को समझना मुख्य परीक्षा में एक संतुलित उत्तर लिखने के लिए अनिवार्य है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. ऋग्वेद की रचना कब हुई थी?
उत्तर- ऋग्वेद की रचना लगभग 3500 साल पहले (1500 ई.पू. के आसपास) हुई थी।
Q2. महापाषाण संस्कृति का संबंध किस युग से है?
उत्तर- यह मुख्य रूप से लोह युग (Iron Age) से जुड़ी है, क्योंकि इन कब्रों में लोहे के औजार मिले हैं।
Q3. ऋग्वैदिक राजा और बाद के राजाओं में क्या अंतर था?
उत्तर- ऋग्वैदिक राजा के पास न तो कोई राजधानी थी, न महल और न ही स्थायी सेना। वे कर (Tax) भी नहीं वसूलते थे, जबकि बाद के राजाओं के पास यह सब था।
Q4. ‘ब्लैक एंड रेड वेयर’ (Black and Red Ware) क्या है?
उत्तर- यह एक विशेष प्रकार के मिट्टी के बर्तन हैं, जो काले और लाल रंग के होते थे। यह महापाषाण संस्कृति की प्रमुख विशेषता है।
Q5. इनामगांव में मिला विशेष कंकाल क्यों महत्वपूर्ण है? उत्तर- यह कंकाल एक बड़े घर के आंगन में, मिट्टी के जार में दफनाया गया था। यह उस समय के सामाजिक स्तरीकरण और किसी प्रभावशाली व्यक्ति (संभवतः मुखिया) की स्थिति को दर्शाता है।
