क्या आपने कभी सोचा कि हमारा संविधान, जो 1950 में बना था, आज की डिजिटल अर्थव्यवस्था, सोशल मीडिया और नई सामाजिक चुनौतियों से कैसे निपट पाता है? इसका जवाब है –संविधान का संशोधन (Amendment of Constitution)। एक सिविल सेवक की नज़र से यह व्यवस्था संविधान को समय के साथ चलने योग्य बनाती है, बिना उसकी मूल आत्मा को नुकसान पहुँचाए।

आज हम विस्तार से जानेंगे कि भारतीय संविधान का संशोधन कैसे होता है, इसके प्रकार क्या हैं, और UPSC के लिए इस विषय के कौन-कौन से पहलू सबसे महत्वपूर्ण हैं। साथ ही, भारतीय संविधान का संशोधन करने की विधियां क्या है, इसे भी स्पष्ट रूप से समझेंगे।

संविधान संशोधन: अर्थ और आवश्यकता

संविधान का संशोधन का तात्पर्य संविधान में परिवर्तन, जोड़ या हटाना करना है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि संविधान को इतना लचीला बनाया जाए कि वह बदलती परिस्थितियों में ढल सके, लेकिन इतना कठोर भी कि उसकी मूल संरचना सुरक्षित रहे।

आवश्यकता क्यों होती है?

  • सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलती हैं।
  • नई चुनौतियाँ (जैसे जलवायु परिवर्तन, डिजिटल गवर्नेंस) सामने आती हैं।
  • राज्यों की माँगों और क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करना होता है।
  • संविधान की कमियों को दूर करना (जैसे 73वें और 74वें संशोधन द्वारा पंचायती राज)।

Key Takeaway: संशोधन संविधान की “जीवंतता” का प्रतीक है। यदि संशोधन का प्रावधान न होता, तो संविधान पुराना पड़ जाता और क्रांतिकारी परिवर्तनों के लिए नई संविधान सभा बुलानी पड़ती।

भारतीय संविधान का संशोधन करने की विधियां: तीन प्रकार

अनुच्छेद 368 के तहत भारतीय संविधान का संशोधन करने की विधियां तीन प्रकार की हैं। यह वर्गीकरण इस बात पर निर्भर करता है कि संशोधन के लिए कितने बहुमत की आवश्यकता है और क्या राज्यों की सहमति जरूरी है।

प्रकारप्रक्रियाउदाहरण
1. साधारण बहुमत से संशोधनसंसद के दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का साधारण बहुमत।नए राज्यों का निर्माण (अनुच्छेद 3), नागरिकता (अनुच्छेद 11), अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन (पाँचवीं और छठी अनुसूची)।
2. विशेष बहुमत से संशोधनप्रत्येक सदन में कुल सदस्य संख्या का बहुमत + उपस्थित एवं मतदान करने वालों का 2/3 बहुमत।मौलिक अधिकार, राज्य के नीति निदेशक तत्व, 73वाँ, 74वाँ, 42वाँ, 44वाँ संशोधन।
3. विशेष बहुमत + राज्यों का अनुमोदनविशेष बहुमत के साथ-साथ कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से अनुमोदन।राष्ट्रपति का चुनाव (अनुच्छेद 54,55), संघ की विधायी शक्ति का विस्तार, उच्च न्यायालयों का क्षेत्राधिकार।

नोट: संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति की सहमति अनिवार्य है। राष्ट्रपति इसे पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकते; उनके पास केवल सहमति देने या रोकने का विकल्प होता है (अनुच्छेद 368)।

संविधान का संशोधन (Amendment of Constitution)

संशोधन की प्रक्रिया (अनुच्छेद 368)

  1. प्रस्ताव: संशोधन विधेयक केंद्रीय मंत्री या निजी सदस्य द्वारा किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है।
  2. पारित होना: प्रत्येक सदन में अलग-अलग विधेयक पारित होता है। यदि दोनों सदनों में मतभेद हो, तो संयुक्त बैठक की व्यवस्था नहीं है; विधेयक निरस्त हो जाता है।
  3. राज्यों का अनुमोदन: जहाँ आवश्यक हो, आधे राज्यों के विधानमंडल अनुमोदन करते हैं।
  4. राष्ट्रपति की सहमति: विधेयक पारित होने के बाद राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। राष्ट्रपति उस पर अपनी सहमति देना अनिवार्य है।
  5. अधिनियमन: राष्ट्रपति की सहमति मिलने के बाद विधेयक संविधान का अंग बन जाता है।

संशोधन पर न्यायिक समीक्षा और मूल ढांचा सिद्धांत

क्या संसद संविधान के किसी भी भाग में मनमाने ढंग से संशोधन कर सकती है? सर्वोच्च न्यायालय ने मूल ढांचा सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) के माध्यम से इस पर अंकुश लगाया।

  • शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ (1951): संशोधन की शक्ति संविधान के अंतर्गत है, मौलिक अधिकारों पर भी लागू होती है।
  • गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967): 11-जजों की पीठ ने कहा कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती।
  • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973): 13-जजों की पीठ ने फैसला दिया कि संसद की संशोधन शक्ति असीमित नहीं है; वह संविधान के मूल ढांचे को नष्ट नहीं कर सकती।
  • इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण (1975): मूल ढांचा सिद्धांत को और मजबूत किया।
  • मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980): 42वें संशोधन के उन प्रावधानों को असंवैधानिक करार दिया जिनमें संशोधन को न्यायिक समीक्षा से बाहर रखा गया था।

मूल ढांचे के प्रमुख तत्व: संविधान की सर्वोच्चता, संप्रभुता, लोकतंत्र, गणतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्यायिक समीक्षा, शक्तियों का पृथक्करण, संघीय ढाँचा, मौलिक अधिकारों की भावना आदि।

प्रीलिम्स फैक्ट: 42वाँ संशोधन (1976) को “मिनी-कॉन्स्टिट्यूशन” कहा जाता है। इसने प्रस्तावना में “समाजवादी”, “धर्मनिरपेक्ष” और “अखंडता” शब्द जोड़े, और नागरिकों के कर्तव्यों (अनुच्छेद 51A) को जोड़ा।

संविधान का संशोधन (Amendment of Constitution)
संविधान का संशोधन (Amendment of Constitution)

UPSC मुख्य परीक्षा हेतु मॉडल उत्तर

150-शब्द उत्तर (10 अंक)

प्रश्न: भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया का वर्णन करें। संसद की संशोधन शक्ति पर न्यायिक अंकुशों पर प्रकाश डालें।

उत्तर (ढाँचा):
प्रस्तावना: संविधान का संशोधन अनुच्छेद 368 के अधीन किया जाता है, जो संविधान को लचीला और कठोर दोनों बनाती है।

मुख्य भाग:

  • तीन विधियाँ: (1) साधारण बहुमत – नए राज्य निर्माण; (2) विशेष बहुमत – अधिकांश संशोधन; (3) विशेष बहुमत + आधे राज्यों का अनुमोदन – राष्ट्रपति चुनाव आदि।
  • प्रक्रिया: विधेयक किसी भी सदन में पेश; प्रत्येक सदन में अलग-अलग पारित; राज्यों का अनुमोदन (जहाँ आवश्यक); राष्ट्रपति की अनिवार्य सहमति।
  • न्यायिक अंकुश: केशवानंद भारती केस (1973) में मूल ढांचा सिद्धांत के तहत सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद संविधान की मूल संरचना को नहीं बदल सकती।

निष्कर्ष: संशोधन की प्रक्रिया संसदीय सर्वोच्चता और न्यायिक समीक्षा के बीच संतुलन स्थापित करती है, जो संविधान की सुरक्षा सुनिश्चित करती है।

250-शब्द उत्तर (15 अंक)

प्रश्न: “संसद के पास संविधान संशोधन की शक्ति है, लेकिन यह शक्ति पूर्ण नहीं है।” इस कथन के आलोक में भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया तथा न्यायपालिका की भूमिका का विश्लेषण करें।

उत्तर (ढाँचा):
प्रस्तावना: भारतीय संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 368 के माध्यम से संशोधन की शक्ति संसद को सौंपी, किंतु इस शक्ति को संविधान की मूल भावना के प्रति उत्तरदायी बनाए रखने के लिए न्यायिक पुनर्विलोकन की व्यवस्था की।

मुख्य भाग:

  1. संशोधन की प्रक्रिया: तीन स्तरीय प्रक्रिया – साधारण बहुमत, विशेष बहुमत, और विशेष बहुमत के साथ राज्यों का अनुमोदन। यह वर्गीकरण संघीय ढाँचे और संविधान की कठोरता-लचीलेपन के बीच संतुलन बनाता है।
  2. न्यायपालिका की भूमिका:
    • गोलकनाथ (1967): संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती।
    • केशवानंद भारती (1973): ‘मूल ढांचा सिद्धांत’ प्रतिपादित।
    • मिनर्वा मिल्स (1980): 42वें संशोधन के प्रावधानों को रद्द किया।
    • आई.आर. कोएल्हो (2007): राज्य विधानमंडलों के संशोधन अधिकारों पर भी मूल ढांचा लागू।
  3. वर्तमान संदर्भ: 106वाँ संशोधन (महिला आरक्षण) विशेष बहुमत और राज्यों के अनुमोदन से पारित, जो प्रक्रिया की सफलता को दर्शाता है।

निष्कर्ष: संसद की संशोधन शक्ति न तो असीमित है, न ही अत्यधिक प्रतिबंधित। यह शक्ति न्यायपालिका द्वारा ‘मूल ढांचा’ की कसौटी पर परखी जाती है, जिससे संविधान का मूल चरित्र अक्षुण्ण रहता है।

पिछले 10 वर्षों के PYQs (2015-2024) – मुख्य परीक्षा

वर्षप्रश्नविषय / टिप्पणी
2024“संविधान संशोधन की प्रक्रिया में राज्यों की भूमिका को स्पष्ट करते हुए बताएँ कि यह प्रक्रिया संघीय व्यवस्था को कैसे संरक्षित करती है?”राज्यों का अनुमोदन; संघवाद की सुरक्षा।
2023“भारतीय संविधान के मूल ढांचा सिद्धांत ने संसद की संशोधन शक्ति पर किस प्रकार अंकुश लगाया है?”केशवानंद भारती, मिनर्वा मिल्स, न्यायिक समीक्षा।
2022“अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन और साधारण विधायन में अंतर स्पष्ट करें।”प्रक्रियागत अंतर, बहुमत की आवश्यकता।
2021“42वें संशोधन को ‘मिनी-कॉन्स्टिट्यूशन’ क्यों कहा जाता है? इसके प्रमुख प्रावधानों का उल्लेख करें।”प्रस्तावना में बदलाव, कर्तव्य, न्यायिक शक्तियों में कटौती।
2020“भारतीय संविधान की मूल संरचना की अवधारणा का विकास कैसे हुआ?”गोलकनाथ, केशवानंद भारती, मिनर्वा मिल्स का क्रम।
2019“क्या संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है? न्यायिक दृष्टांतों के साथ स्पष्ट करें।”मूल ढांचा सिद्धांत, न्यायिक समीक्षा।
2018“संविधान संशोधन की प्रक्रिया में संसद और राज्य विधानमंडलों के बीच शक्तियों के विभाजन पर चर्चा करें।”राज्यों का अनुमोदन, संघीय विशेषताएँ।
2017“73वें और 74वें संशोधन ने भारतीय लोकतंत्र को किस प्रकार सशक्त किया?”पंचायती राज, नगर निकाय, विकेंद्रीकरण।
2016“क्या संविधान संशोधन की शक्ति संसद की संप्रभुता का हिस्सा है? विवेचना करें।”संसदीय सर्वोच्चता बनाम न्यायिक समीक्षा।
2015“भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया को लचीला और कठोर दोनों क्यों कहा जाता है?”तीन प्रकार की विधियाँ, संशोधन का वर्गीकरण।

PYQs से सीख:

  • हर साल संशोधन से जुड़ा प्रश्न आता है – कभी प्रक्रिया पर, कभी मूल ढांचे पर, कभी राज्यों की भूमिका पर।
  • 42वाँ संशोधन, केशवानंद भारती, मिनर्वा मिल्स – ये तीनों सबसे अधिक पूछे गए हैं।
  • हाल के वर्षों में संघवाद और राज्यों की भूमिका पर जोर बढ़ा है।
  • उत्तर में अनुच्छेद 368 का सटीक उल्लेख, केस लॉ और हालिया संशोधनों (जैसे 103वाँ, 105वाँ, 106वाँ) के उदाहरण देने से अंक बढ़ते हैं।

संभावित प्रश्न (अगामी परीक्षा के लिए)

  1. प्रारंभिक परीक्षा:
    • अनुच्छेद 368 के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
      (a) राष्ट्रपति संशोधन विधेयक को पुनर्विचारार्थ वापस भेज सकते हैं।
      (b) संशोधन विधेयक पर राज्यों की सहमति केवल तभी आवश्यक है जब यह संघ सूची को प्रभावित करता हो।
      (c) संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों में अलग-अलग पारित कराना अनिवार्य है।
      (d) संशोधन विधेयक को जनमत संग्रह द्वारा अनुमोदित करना आवश्यक है।
      उत्तर: (c)
  2. मुख्य परीक्षा:
    • “संविधान संशोधन की प्रक्रिया भारतीय संघवाद की सुरक्षा कैसे करती है?” विश्लेषण कीजिए।
    • 73वें और 74वें संशोधन ने भारतीय लोकतंत्र को किस प्रकार सशक्त किया?
    • हाल के वर्षों में संविधान संशोधनों (जैसे 103वाँ, 105वाँ, 106वाँ) ने सामाजिक न्याय के क्षेत्र में क्या बदलाव लाए हैं?
    • मूल ढांचा सिद्धांत और संसद की संशोधन शक्ति के बीच संतुलन पर चर्चा करें।

त्वरित पुनरावृत्ति (बुलेट समरी)

  • संशोधन का आधार अनुच्छेद 368 है।
  • तीन प्रकार की विधियाँ: साधारण बहुमत, विशेष बहुमत, विशेष बहुमत + राज्यों का अनुमोदन।
  • मूल ढांचा सिद्धांत – केशवानंद भारती केस (1973) से प्रतिपादित।
  • न्यायिक समीक्षा से संसद की संशोधन शक्ति पर अंकुश।
  • 42वाँ संशोधन (1976): मिनी-कॉन्स्टिट्यूशन; प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, अखंडता जोड़े; नागरिकों के कर्तव्य जोड़े।
  • 44वाँ संशोधन (1978): 42वें संशोधन की विकृतियों को हटाया; मौलिक अधिकारों की रक्षा की।
  • 73वाँ और 74वाँ संशोधन (1992): पंचायती राज और नगर निकायों को संवैधानिक दर्जा।
  • 103वाँ संशोधन (2019): आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) को 10% आरक्षण।
  • 105वाँ संशोधन (2021): राज्यों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान का अधिकार।
  • 106वाँ संशोधन (2023): लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. संविधान का संशोधन कब आवश्यक होता है?
जब संविधान के किसी प्रावधान में परिवर्तन, परिवर्धन या निरसन की आवश्यकता होती है, तब संविधान का संशोधन किया जाता है। यह सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तनों के अनुरूप ढलने के लिए जरूरी है।

2. भारतीय संविधान का संशोधन करने की विधियां क्या हैं?
तीन विधियाँ हैं – (i) साधारण बहुमत (जैसे राज्यों का निर्माण), (ii) विशेष बहुमत (जैसे मौलिक अधिकारों में बदलाव), (iii) विशेष बहुमत + आधे राज्यों का अनुमोदन (जैसे राष्ट्रपति चुनाव से संबंधित प्रावधान)।

3. क्या राष्ट्रपति संशोधन विधेयक को वीटो कर सकते हैं?
अनुच्छेद 368 के अनुसार, राष्ट्रपति को संशोधन विधेयक पर सहमति देना अनिवार्य है; वह उसे पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकते। हाँ, वह सहमति में देरी कर सकते हैं, लेकिन अस्वीकार नहीं कर सकते।

4. क्या संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है?
हाँ, लेकिन इस पर न्यायिक समीक्षा होती है। यदि संशोधन मूल ढांचे का उल्लंघन करता है, तो सर्वोच्च न्यायालय उसे असंवैधानिक घोषित कर सकता है (जैसे केशवानंद भारती केस)।

5. मूल ढांचा सिद्धांत का महत्व क्या है?
यह सिद्धांत संसद की असीमित संशोधन शक्ति पर रोक लगाता है। यह सुनिश्चित करता है कि संविधान की मूल पहचान (जैसे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद) सुरक्षित रहे।

लेखक:
मो. अफजाल अंसारी
4+ वर्ष UPSC अनुभवी aspirant
BCA, एडवांस्ड डिप्लोमा इन सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग
सॉफ्टवेयर इंजीनियर

स्रोत: NCERT (11वीं राजनीति विज्ञान), M. Laxmikanth “भारत की राजव्यवस्था”, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय, PIB प्रेस विज्ञप्तियाँ, भारत सरकार के आधिकारिक दस्तावेज।

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