विषय-सूची

  1. संसदीय व्यवस्था क्या है भूमिका और अर्थ (Introduction and Meaning)
  2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)
  3. संसदीय सरकार की प्रमुख विशेषताएं (Key Features of Parliamentary Government)
    • 3.1 नाममात्र एवं वास्तविक कार्यपालिका
    • 3.2 बहुमत प्राप्त दल का शासन
    • 3.3 सामूहिक उत्तरदायित्व
    • 3.4 राजनीतिक एकरूपता
    • 3.5 दोहरी सदस्यता
    • 3.6 प्रधानमंत्री का नेतृत्व
    • 3.7 निचले सदन का विघटन
    • 3.8 गोपनीयता
  4. राष्ट्रपति शासन व्यवस्था की विशेषताएं (Features of Presidential System)
  5. संसदीय व्यवस्था के गुण (Merits of Parliamentary System)
  6. संसदीय व्यवस्था के दोष (Demerits of Parliamentary System)
    • 6.1 अस्थिर सरकार
    • 6.2 नीतियों की अनिश्चितता
    • 6.3 मंत्रिमंडल की निरंकुशता
    • 6.4 शक्तियों के पृथक्करण के विपरीत
    • 6.5 अक्षम व्यक्तियों द्वारा शासन
  7. संसदीय व्यवस्था की स्वीकृति के कारण (Reasons for Adoption of Parliamentary System)
  8. भारतीय एवं ब्रिटिश मॉडल में भिन्नता (Differences between Indian and British Models)
    • तुलनात्मक तालिका
  9. समसामयिक घटनाक्रम और उदाहरण (Current Affairs Integration)
  10. चुनौतियाँ और मुद्दे (Challenges and Issues)
  11. संबंधित सरकारी योजनाएं और नीतियां (Government Schemes and Policies)
  12. आगे की राह (Way Forward)
  13. निष्कर्ष (Conclusion)
  14. UPSC पिछले वर्षों के प्रश्न (PYQ Analysis)
    • प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) प्रश्न एवं उत्तर
    • मुख्य परीक्षा (Mains) प्रश्न एवं मॉडल उत्तर संरचना
  15. अभ्यास प्रश्न (Practice Section)
    • 10 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) उत्तर सहित
    • 5 मुख्य परीक्षा आधारित प्रश्न
  16. संरचित उत्तर लेखन अभ्यास (Structured Answer Writing Practice)
    • 5 प्रश्नों के मॉडल उत्तर (परिचय, मुख्य भाग, निष्कर्ष)
  17. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

स्रोत एवं संदर्भ

इस लेख को तैयार करने में निम्नलिखित प्रामाणिक स्रोतों का उपयोग किया गया है। UPSC अभ्यर्थियों को सलाह दी जाती है कि विषय की गहन समझ के लिए इन मूल स्रोतों का अवश्य अध्ययन करें।

1. संवैधानिक एवं विधिक स्रोत

  • भारत का संविधान (Constitution of India): अनुच्छेद 52-78 (राष्ट्रपति एवं मंत्रिपरिषद), अनुच्छेद 79-122 (संसद), विशेषकर अनुच्छेद 74 और 75(3)।
  • भारत शासन अधिनियम, 1935 (Government of India Act, 1935): भारतीय संसदीय व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के लिए।
  • संसदीय प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमावली (Rules of Procedure and Conduct of Business in Lok Sabha)

2. प्रामाणिक पुस्तकें

  • भारत का संविधान (Introduction to the Constitution of India) – डॉ. दुर्गा दास बसु (Durga Das Basu)
  • हमारा संविधान (Our Constitution) – सुभाष कश्यप (Subhash C. Kashyap)
  • भारत की राजनीति (Indian Polity) – एम. लक्ष्मीकांत (M. Laxmikanth) – अध्याय: संसदीय व्यवस्था एवं राष्ट्रपति व्यवस्था।
  • संविधान सभा के वाद-विवाद (Constituent Assembly Debates) – खंड 7 एवं 8 (लोकसभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित)

3. सरकारी रिपोर्ट एवं समितियाँ

  • विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट (Law Commission of India, 170th Report): चुनाव सुधार।
  • विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट (Law Commission of India, 255th Report): निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन।
  • राष्ट्रीय विधि आयोग की रिपोर्ट (National Commission to Review the Working of the Constitution, 2002): अध्याय 4 एवं 5 (संसद एवं कार्यपालिका)।

4. आधिकारिक वेबसाइट (Official Websites)

5. समसामयिक सन्दर्भ (Current Affairs Sources)

  • प्रतियोगिता दर्पण (Pratiyogita Darpan) – राजव्यवस्था विशेषांक
  • द हिंदू (The Hindu) एवं इंडियन एक्सप्रेस (Indian Express) के संपादकीय (विगत एक वर्ष)
  • पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च (PRS Legislative Research): संसदीय सत्र की समीक्षा रिपोर्ट।

6. महत्वपूर्ण वाद (Landmark Judgments)

  • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973): मूल ढाँचा सिद्धांत।
  • एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994): राष्ट्रपति शासन एवं धर्मनिरपेक्षता।
  • राजा राम पाल बनाम लोकसभा अध्यक्ष (2007): संसदीय विशेषाधिकारों की सीमा।

1. भूमिका और अर्थ

जब हम लोकतंत्र की बात करते हैं, तो उसके दो प्रमुख स्वरूप विश्व में प्रचलित हैं: संसदीय व्यवस्था और राष्ट्रपति व्यवस्था। सरल शब्दों में, संसदीय व्यवस्था क्या है? यह शासन की वह प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका (Executive) अपनी उत्पत्ति, अस्तित्व और समाप्ति के लिए विधायिका (Legislature) के प्रति उत्तरदायी होती है। दूसरे शब्दों में, मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से संसद के निचले सदन (भारत में लोकसभा) के प्रति जवाबदेह होती है। यदि संसद सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दे, तो सरकार को इस्तीफा देना पड़ता है। यही कार्यपालिका और विधायिका के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध ही भारतीय संसदीय व्यवस्था की आत्मा है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 74 और 75 में इस व्यवस्था का स्पष्ट प्रावधान है। अनुच्छेद 74(1) कहता है कि राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होगा। यह सलाह राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी है (42वें संविधान संशोधन के बाद)। अनुच्छेद 75(3) में स्पष्ट उल्लेख है कि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होगी। यह प्रावधान ही संसदीय शासन प्रणाली की आधारशिला है।

2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत में संसदीय व्यवस्था क्या है और इसे क्यों अपनाया गया, इसे समझने के लिए हमें ब्रिटिश काल के संवैधानिक विकास पर दृष्टि डालनी होगी। 1858 के बाद जब शासन ब्रिटिश क्राउन के हाथों में आया, तो धीरे-धीरे भारतीयों को विधान परिषदों में प्रतिनिधित्व मिलना शुरू हुआ। 1892 का भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 का मार्ले-मिंटो सुधार, 1919 का मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार और अंततः 1935 का भारत शासन अधिनियम – इन सभी ने धीरे-धीरे संसदीय संस्थाओं और प्रथाओं की नींव रखी।

हालाँकि 1935 के अधिनियम में प्रांतों में उत्तरदायी शासन (Responsible Government) की व्यवस्था की गई थी, किंतु केंद्र में यह व्यवस्था लागू नहीं थी। स्वतंत्रता के पश्चात संविधान सभा ने इसी परिचित ढाँचे को चुना। सदस्यों का मानना था कि ब्रिटिश संसदीय मॉडल भारतीय परिस्थितियों के लिए अधिक उपयुक्त है क्योंकि यह विधायिका और कार्यपालिका के बीच टकराव के बजाय सहयोग पर बल देता है, जो एक नव स्वतंत्र राष्ट्र के लिए अत्यंत आवश्यक था।

3. संसदीय सरकार की प्रमुख विशेषताएं

संसदीय प्रणाली के लक्षण को यदि ठीक से आत्मसात कर लिया जाए तो यह विषय अत्यंत सरल हो जाता है। निम्नलिखित आठ बिंदु इसकी आत्मा हैं:

  1. नाममात्र एवं वास्तविक कार्यपालिका (Nominal and Real Executive):
    यह संसदीय व्यवस्था की पहली और सबसे अलग पहचान है। भारत में राष्ट्रपति नाममात्र (De Jure) कार्यपालिका प्रमुख है। वह राष्ट्र का प्रथम नागरिक है, किंतु वह अपनी सभी शक्तियों का प्रयोग प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद की सलाह पर करता है। वास्तविक (De Facto) कार्यपालिका शक्ति प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल में निहित होती है। यही कारण है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण को ‘सरकार का अभिभाषण’ कहा जाता है क्योंकि वह सरकार की नीतियों का ही वाचन कर रहे होते हैं।
  2. बहुमत प्राप्त दल का शासन (Rule of Majority Party):
    संसदीय शासन में सरकार उसी दल या गठबंधन की बनती है जिसके पास लोकसभा में स्पष्ट बहुमत होता है। यदि किसी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता, तो चुनाव पश्चात गठबंधन (Coalition) बनाकर बहुमत सिद्ध किया जाता है। यह बहुमत का समर्थन स्थायी होना चाहिए, अन्यथा सरकार गिर जाती है।
  3. सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective Responsibility):
    यह संसदीय शासन प्रणाली की नींव है। अनुच्छेद 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। इसका अर्थ है कि मंत्रिमंडल के सभी निर्णय सबकी सहमति से लिए गए माने जाते हैं, चाहे कोई मंत्री व्यक्तिगत रूप से उससे असहमत ही क्यों न हो। जब कैबिनेट का कोई निर्णय लोकसभा में गिर जाता है, तो पूरे मंत्रिमंडल को इस्तीफा देना होता है। इसे ‘साथ में डूबना और साथ में तैरना’ (Sink or Swim Together) कहा जाता है।
  4. राजनीतिक एकरूपता (Political Homogeneity):
    सामान्यतः मंत्रिपरिषद के सदस्य एक ही राजनीतिक दल या गठबंधन के सदस्य होते हैं। वे समान विचारधारा साझा करते हैं। इससे नीति निर्माण और क्रियान्वयन में तीव्रता और निरंतरता आती है। हालाँकि गठबंधन सरकारों में विभिन्न विचारधाराओं का समावेश होता है, किंतु सत्ता में बने रहने के लिए न्यूनतम साझा कार्यक्रम (Common Minimum Programme) पर सहमति अनिवार्य होती है।
  5. दोहरी सदस्यता (Dual Membership):
    संसदीय प्रणाली में एक मंत्री को विधायिका का सदस्य होना अनिवार्य है। यदि कोई व्यक्ति जो सांसद या विधायक नहीं है, उसे मंत्री बनाया जाता है, तो उसे 6 माह के भीतर संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) का सदस्य बनना होता है, अन्यथा उसे मंत्री पद से हटना पड़ता है। इस व्यवस्था का लाभ यह है कि मंत्री संसदीय बहसों में भाग ले सकते हैं और जनता के प्रतिनिधियों के प्रति जवाबदेह रहते हैं।
  6. प्रधानमंत्री का नेतृत्व (Leadership of the Prime Minister):
    भारतीय संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री ‘समान लोगों में प्रथम’ (First Among Equals) होता है। वह मंत्रिपरिषद का केंद्र बिंदु होता है। वह मंत्रियों का चयन करता है, उनके विभागों का बंटवारा करता है, कैबिनेट की बैठकों की अध्यक्षता करता है और राष्ट्रपति तथा मंत्रिपरिषद के बीच संचार का एकमात्र माध्यम होता है। प्रधानमंत्री का नैतिक पतन पूरी सरकार का पतन माना जाता है।
  7. निचले सदन का विघटन (Dissolution of Lower House):
    राष्ट्रपति के पास यह शक्ति है कि वह प्रधानमंत्री की सलाह पर लोकसभा को उसकी नियत अवधि (5 वर्ष) से पूर्व भी भंग कर सकता है। यह एक ऐसा हथियार है जो केवल संसदीय व्यवस्था में ही कार्यपालिका के पास होता है। यदि सरकार को लगता है कि उसे जनता के बीच जाकर नए जनादेश की आवश्यकता है, तो वह मध्यावधि चुनाव की सिफारिश कर सकती है।
  8. गोपनीयता (Secrecy):
    मंत्रिमंडल के सदस्य पद और गोपनीयता की शपथ लेते हैं। कैबिनेट की बैठक में किस सदस्य ने किस विषय पर क्या तर्क दिया, इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। यह व्यवस्था निर्णय लेने की प्रक्रिया में खुली और स्पष्ट चर्चा को प्रोत्साहित करती है।

4. राष्ट्रपति शासन व्यवस्था की विशेषताएं

संसदीय प्रणाली के लक्षण को बेहतर ढंग से समझने के लिए इसकी तुलना राष्ट्रपति प्रणाली से करना आवश्यक है। अमेरिका इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। इसकी विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  1. एकल कार्यपालिका: राष्ट्रपति राज्य का अध्यक्ष और सरकार का अध्यक्ष दोनों होता है। वह नाममात्र नहीं बल्कि वास्तविक प्रमुख होता है।
  2. स्थायित्व: राष्ट्रपति का कार्यकाल निश्चित होता है (अमेरिका में 4 वर्ष)। उसे विधायिका द्वारा केवल महाभियोग (Impeachment) की जटिल प्रक्रिया के माध्यम से ही हटाया जा सकता है, न कि केवल राजनीतिक असहमति के कारण।
  3. शक्तियों का पृथक्करण: कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका एक दूसरे से पूर्णतः स्वतंत्र होती हैं। मंत्री विधायिका के सदस्य नहीं हो सकते।
  4. उत्तरदायित्व का अभाव: राष्ट्रपति अपने कार्यों के लिए विधायिका (कांग्रेस) के प्रति उत्तरदायी नहीं होता। वह सीधे जनता के प्रति उत्तरदायी होता है।
  5. व्यक्तिगत शासन: यह व्यवस्था ‘राष्ट्रपति का शासन’ होती है, न कि ‘मंत्रिमंडल का शासन’। मंत्री केवल राष्ट्रपति के सचिव या सहायक होते हैं।
संसदीय व्यवस्था क्या है

5. संसदीय व्यवस्था के गुण

संविधान निर्माताओं ने संसदीय व्यवस्था को चुनने में जिन लाभों को देखा, वे इस प्रकार हैं:

  1. विधायिका एवं कार्यपालिका में सामंजस्य: चूँकि मंत्री विधायिका के सदस्य भी होते हैं, इसलिए दोनों अंगों के बीच टकराव की संभावना न्यूनतम हो जाती है। नीतियाँ और कानून शीघ्रता से पारित होते हैं। अमेरिका जैसे राष्ट्रपति शासन में अक्सर गतिरोध (Deadlock) की स्थिति देखी जाती है जब राष्ट्रपति और कांग्रेस का बहुमत अलग-अलग दलों के पास होता है।
  2. उत्तरदायी शासन (Responsible Government): यह इस व्यवस्था का सबसे बड़ा गुण है। मंत्री प्रतिदिन संसद में प्रश्नकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव और स्थगन प्रस्ताव के माध्यम से जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं। यह निरंतर जांच का एक तंत्र है जो मंत्रियों को मनमानी करने से रोकता है।
  3. निरंकुशता की रोकथाम: संसदीय शासन में सत्ता किसी एक व्यक्ति में निहित नहीं होती, बल्कि सामूहिक निकाय (मंत्रिपरिषद) में होती है। इससे तानाशाही प्रवृत्तियों पर अंकुश लगता है।
  4. लचीलापन: आपातकाल की स्थिति में यह व्यवस्था त्वरित निर्णय ले सकती है क्योंकि कार्यपालिका का विधायिका पर नियंत्रण होता है। साथ ही, यदि सरकार अलोकप्रिय हो जाए तो अविश्वास प्रस्ताव या लोकसभा भंग करके तत्काल परिवर्तन किया जा सकता है, जबकि राष्ट्रपति व्यवस्था में जनता को अगले निश्चित चुनाव तक अक्षम सरकार झेलनी पड़ती है।
  5. प्रतिनिधित्व की व्यापकता: मंत्रिपरिषद में विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और जातियों के सांसदों को सम्मिलित किया जा सकता है, जिससे राष्ट्रीय एकता का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होता है।

6. संसदीय व्यवस्था के दोष

हालाँकि भारतीय संसदीय व्यवस्था ने अनेक संकटों का सामना किया है, फिर भी इसके कई दोष उजागर हुए हैं जो UPSC Mains के लिए विश्लेषण का विषय हैं:

  1. अस्थिर सरकार (Unstable Government):
    यह बहुदलीय राजनीति और गठबंधन के युग में सबसे बड़ी चुनौती है। 1977, 1989, 1996-99 के दौरान केंद्र में अस्थिर सरकारें देखी गईं। हालाँकि दल-बदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) ने इसे कुछ हद तक रोका है, किंतु गठबंधन के सहयोगियों द्वारा समर्थन वापसी की आशंका सरकार को लोकलुभावन और अदूरदर्शी नीतियां बनाने के लिए विवश करती है।
  2. नीतियों की अनिश्चितता (Uncertainty of Policies):
    चुनावी राजनीति के कारण सरकारें दीर्घकालिक हितों की अपेक्षा अल्पकालिक लाभ देने वाली योजनाओं पर ध्यान देती हैं। कर सुधार, श्रम सुधार या कृषि सुधार जैसे कठोर निर्णय राजनीतिक दुष्परिणामों के भय से टाले जाते रहते हैं।
  3. मंत्रिमंडल की निरंकुशता (Dictatorship of Cabinet):
    जब सत्ताधारी दल के पास लोकसभा में भारी बहुमत होता है, तो विधायिका कार्यपालिका की रबड़ स्टैम्प (Rubber Stamp) बनकर रह जाती है। ऐसे में संसद का सत्र थोड़े समय के लिए चलता है और बिना पर्याप्त चर्चा के विधेयक पारित कर दिए जाते हैं। यह संसदीय व्यवस्था क्या है के मूल उद्देश्य यानी विचार-विमर्श को कमजोर करता है।
  4. शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के विपरीत:
    संसदीय शासन प्रणाली में कार्यपालिका और विधायिका एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। न्यायपालिका ही स्वतंत्र रहती है। इससे कार्यपालिका द्वारा मनमाने ढंग से अध्यादेश (Ordinance) लाने या विधायी शक्तियों का दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति देखी जाती है।
  5. अक्षम व्यक्तियों द्वारा शासन (Government by Amateurs):
    मंत्री पद के लिए प्रशासनिक दक्षता या विशेषज्ञता की बजाय राजनीतिक वफादारी या चुनाव जीतने की क्षमता को अधिक तरजीह दी जाती है। एक सांसद जो भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहा है, वह एक महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल सकता है, क्योंकि नियुक्ति का मानदंड प्रशासनिक योग्यता न होकर लोकप्रियता है।
संसदीय व्यवस्था क्या है

7. संसदीय व्यवस्था की स्वीकृति के कारण

यह प्रश्न अक्सर UPSC Mains में पूछा जाता है कि आखिर भारत ने संसदीय व्यवस्था को ही क्यों चुना? इसके पीछे मुख्य कारण थे:

  1. परिचय और अनुभव: भारतीयों को 1919 और 1935 के अधिनियमों के तहत सीमित ही सही, संसदीय पद्धतियों का कुछ अनुभव हो चुका था। यह एक परिचित प्रणाली थी।
  2. उत्तरदायित्व को प्राथमिकता: संविधान सभा शक्तियों के सख्त पृथक्करण से अधिक उत्तरदायी सरकार चाहती थी। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने तर्क दिया कि संसदीय व्यवस्था कार्यपालिका पर दैनिक निगरानी और आलोचना का अवसर प्रदान करती है।
  3. विविधता में एकता: भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में राष्ट्रपति प्रणाली के तहत एक सख्त कार्यपालिका अल्पसंख्यकों और क्षेत्रीय आकांक्षाओं की उपेक्षा कर सकती थी। संसदीय व्यवस्था ने गठबंधन और समावेशन के माध्यम से विविध हितों को शासन में भागीदारी का अवसर दिया।
  4. कठोरता से बचाव: संविधान निर्माता यह नहीं चाहते थे कि सरकार और विधायिका के बीच गतिरोध के कारण देश का कामकाज ठप हो जाए, जैसा अक्सर अमेरिका में देखा जाता है।

8. भारतीय एवं ब्रिटिश मॉडल में भिन्नता

हालाँकि भारत ने ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था को अपनाया, किंतु यह उसकी अक्षरशः नकल नहीं है। दोनों में मूलभूत अंतर हैं। संसदीय और राष्ट्रपति प्रणाली में अंतर के अतिरिक्त, दो संसदीय मॉडलों में अंतर जानना आवश्यक है:

विशेषताब्रिटिश संसदीय व्यवस्थाभारतीय संसदीय व्यवस्था
राज्य की प्रकृतिराजतंत्र (Monarchy) है। राजा नाममात्र प्रमुख।गणतंत्र (Republic) है। राष्ट्रपति निर्वाचित प्रमुख।
संप्रभुतासंसद सर्वोच्च (Parliamentary Sovereignty) है। न्यायालय कानून की समीक्षा नहीं कर सकते।संविधान सर्वोच्च है। न्यायपालिका को न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति है।
मंत्री पद हेतु योग्यतामंत्री को अनिवार्यतः संसद (हाउस ऑफ कॉमन्स) का सदस्य होना चाहिए।कोई भी योग्य व्यक्ति 6 माह के लिए बिना सदस्यता के मंत्री बन सकता है।
प्रधानमंत्री की भूमिकाप्रधानमंत्री ‘चाँद के तारों के बीच सूर्य’ के समान अत्यंत शक्तिशाली होता है।शक्तियाँ संविधान और राजनीतिक परिस्थितियों (गठबंधन) द्वारा सीमित होती हैं।
उच्च सदन की शक्तिलॉर्ड सभा अत्यंत कमजोर है। वह केवल विलंबकारी शक्ति रखती है।राज्यसभा धन विधेयक को छोड़कर लोकसभा के समकक्ष शक्ति रखती है।
संसदीय व्यवस्था क्या है

9. समसामयिक घटनाक्रम और उदाहरण

UPSC के दृष्टिकोण से वर्तमान राजनीतिक घटनाओं के साथ संसदीय व्यवस्था क्या है के सिद्धांत को जोड़ना अनिवार्य है।

  • राज्यसभा में विपक्ष का बहुमत और गतिरोध: हाल के वर्षों में केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार होने के बावजूद राज्यसभा में संख्या बल न होने के कारण अनेक विधेयक (जैसे कृषि विधेयक का पुनः पारित न होना) संयुक्त बैठक तक गए। यह भारतीय संघीय ढाँचे और संसदीय व्यवस्था के बीच तनाव को दर्शाता है।
  • अध्यादेशों का बढ़ता प्रयोग: संविधान में अध्यादेश केवल आपातकालीन प्रावधान है, किंतु हाल के वर्षों में विवादास्पद विषयों पर संसद के सत्र से पूर्व ही अध्यादेश लाकर शासन करने की प्रवृत्ति देखी गई है। यह विधायिका के पर्यवेक्षण की भावना के विरुद्ध है।
  • महिला आरक्षण विधेयक (नारी शक्ति वंदन अधिनियम): यह एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि कैसे भारतीय संसदीय व्यवस्था में व्यापक सहमति बनने पर दशकों से लंबित विधेयक पारित हो सकता है।

10. चुनौतियाँ और मुद्दे

वर्तमान संदर्भ में संसदीय शासन प्रणाली के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ हैं:

  1. आपराधिकरण: लोकसभा में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों की संख्या में वृद्धि चिंता का विषय है। इससे सदन की गरिमा और नीति निर्माण की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
  2. सत्रों का घटता समय: संसद की बैठकों के दिनों की संख्या में निरंतर गिरावट आई है। पहले वर्ष में 100-120 दिन बैठकें होती थीं, जो अब घटकर 60-70 दिन रह गई हैं। इससे कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने वाली संसदीय समितियों का कार्य प्रभावित होता है।
  3. व्हिप प्रणाली की कठोरता: राजनीतिक दलों द्वारा जारी व्हिप (Whip) सांसदों की अंतरात्मा की आवाज को दबा देता है। सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्र की समस्याओं या अपने विवेक के बजाय दल के आदेश पर मतदान करने को बाध्य होता है।

11. संबंधित सरकारी योजनाएं और नीतियां

हालाँकि कोई विशेष योजना सीधे संसदीय व्यवस्था के ढाँचे को नहीं बदलती, फिर भी शासन सुधार से जुड़ी पहलें इसकी दक्षता को प्रभावित करती हैं:

  • राष्ट्रीय ई-विधान परियोजना (NeVA): इसका उद्देश्य संसद और सभी राज्य विधानमंडलों को कागज रहित (Paperless) बनाना है। यह सदन की कार्यवाही को अधिक पारदर्शी और सुलभ बनाता है।
  • संसदीय समिति प्रणाली का सुदृढ़ीकरण: विभागीय संबंधित स्थायी समितियों (DRSCs) की स्थापना 1993 में की गई थी। ये समितियाँ मंत्रालयों के बजट और कामकाज की सूक्ष्म जाँच करती हैं, जो संसदीय नियंत्रण का एक सशक्त माध्यम हैं।
संसदीय व्यवस्था क्या है

12. आगे की राह

भारतीय संसदीय व्यवस्था को अधिक प्रभावी और उत्तरदायी बनाने के लिए निम्नलिखित सुधार आवश्यक हैं:

  1. वित्तीय वर्ष में बदलाव: अनेक विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि वित्तीय वर्ष जनवरी-दिसंबर किया जाना चाहिए ताकि बजट सत्र मानसून और किसानों की फसल चक्र के अनुरूप हो सके।
  2. न्यूनतम बैठक अवधि: संसद के वर्ष में न्यूनतम 100 या 120 दिन चलने का संवैधानिक या वैधानिक प्रावधान होना चाहिए।
  3. रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव (Constructive Vote of No-Confidence): जर्मनी की तरह भारत में भी यह प्रावधान लाया जा सकता है, जहाँ सरकार तभी गिराई जा सके जब वैकल्पिक सरकार के लिए बहुमत सिद्ध हो जाए। इससे अस्थिरता कम होगी।
  4. विधि आयोग की सिफारिशें: 170वीं रिपोर्ट में चुनाव सुधार और 255वीं रिपोर्ट में निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन संबंधी सुझावों को लागू करना समय की मांग है।

13. निष्कर्ष

निःसंदेह, संसदीय व्यवस्था भारत के लोकतंत्र की धुरी है। इसने सात दशकों से अधिक समय में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं, किंतु यह निरंतर विकसित होती रही है। यह समझना आवश्यक है कि संसदीय व्यवस्था क्या है, यह केवल एक संवैधानिक ढाँचा नहीं है, बल्कि एक सजीव संस्कृति है जो बहस, सहमति और जवाबदेही पर आधारित है। भले ही इसमें अस्थिरता और नीतिगत पंगुता जैसे दोष हैं, किंतु इसकी लचीलापन और उत्तरदायित्व की क्षमता इसे भारत जैसे जटिल समाज के लिए अब भी सर्वाधिक उपयुक्त बनाती है। एक सजग मतदाता और भावी प्रशासक के रूप में, इस व्यवस्था की गहन समझ ही आपको एक बेहतर लोक सेवक बनाएगी।

Author

MD Afjal Ansari is a UPSC aspirant with 4 years of experience as a Software Engineer. His optional subject is Public Administration.

UPSC पिछले वर्षों के प्रश्न (PYQ Analysis)

पिछले 10 वर्षों के प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) प्रश्न

  1. प्रश्न (2023): भारत में, निम्नलिखित में से किसे विधान मंडल में धन विधेयक प्रस्तुत करने हेतु राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश की आवश्यकता नहीं होती है?
    (क) समेकित निधि से व्यय की संवीक्षा करने वाला विधेयक
    (ख) कर लगाने वाला विधेयक
    (ग) उधार लेने पर रोक लगाने वाला विधेयक
    (घ) जुर्माना अधिनियमित करने वाला विधेयक
    उत्तर: (घ) जुर्माना या शास्ति अधिनियमित करने वाला विधेयक धन विधेयक की श्रेणी में नहीं आता है, अतः उसे राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश की आवश्यकता नहीं होती।
  2. प्रश्न (2021): भारत के संविधान के निम्नलिखित में से किस अनुच्छेद के अंतर्गत, अधिवेशन के दौरान संसद के दोनों सदनों में से किसी के लिए स्थगन प्रस्ताव पेश करने का प्रावधान है?
    (क) अनुच्छेद 75
    (ख) अनुच्छेद 85
    (ग) अनुच्छेद 87
    (घ) यह किसी विशेष अनुच्छेद में नहीं है बल्कि संसदीय प्रक्रिया का विषय है।
    उत्तर: (घ) यह नियम संसद की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमावली का भाग है, संविधान का अनुच्छेद नहीं।
  3. प्रश्न (2020): भारत के संविधान का अनुच्छेद 75(3) निम्नलिखित में से किस सिद्धांत का प्रतिपादन करता है?
    (क) न्यायिक पुनरावलोकन
    (ख) मंत्रिपरिषद का सामूहिक उत्तरदायित्व
    (ग) विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया
    (घ) शक्तियों का पृथक्करण
    उत्तर: (ख) अनुच्छेद 75(3) स्पष्ट रूप से कहता है कि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होगी।
  4. प्रश्न (2017): संसदीय शासन प्रणाली में कार्यपालिका का वास्तविक प्रमुख कौन होता है?
    (क) राष्ट्रपति
    (ख) उपराष्ट्रपति
    (ग) प्रधानमंत्री
    (घ) लोकसभा अध्यक्ष
    उत्तर: (ग) प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यपालिका प्रमुख है, जबकि राष्ट्रपति नाममात्र का प्रमुख है।
  5. प्रश्न (2015): भारतीय संदर्भ में ‘शून्यकाल’ का क्या अर्थ है?
    (क) प्रश्नकाल के तुरंत बाद का समय
    (ख) सदन के स्थगित होने के पश्चात का समय
    (ग) राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान का समय
    (घ) प्रश्नकाल शुरू होने से पहले का समय
    उत्तर: (क) शून्यकाल प्रश्नकाल के ठीक बाद आता है और यह भारतीय संसदीय प्रक्रिया की एक अनूठी देन है जिसमें सदस्य बिना पूर्व सूचना के मामले उठा सकते हैं।

पिछले 10 वर्षों के मुख्य परीक्षा (Mains) प्रश्न

  1. प्रश्न (2022): “भारत में संसदीय विशेषाधिकारों का दुरुपयोग संवैधानिक नैतिकता के लिए खतरा है।” टिप्पणी कीजिए।
    मॉडल उत्तर संरचना:
    • परिचय: संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 के तहत प्रदत्त विशेषाधिकारों का उल्लेख।
    • मुख्य भाग: विशेषाधिकार के दुरुपयोग के उदाहरण (न्यायालय की अवमानना से बचना, विधानमंडल में मीडिया की आलोचना पर रोक)।
    • निष्कर्ष: राजा राम पाल मामले और विशेषाधिकारों के संहिताकरण की आवश्यकता पर बल।
  2. प्रश्न (2020): क्या भारत में मंत्रिपरिषद का आकार बढ़ने से सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत कमजोर हुआ है? विवेचना कीजिए।
    मॉडल उत्तर संरचना:
    • परिचय: 91वें संविधान संशोधन (2003) के तहत मंत्रिपरिषद के आकार की सीमा (15%) का उल्लेख।
    • मुख्य भाग: बड़ी कैबिनेट में समन्वय की समस्या, पोर्टफोलियो के लिए टकराव, और निर्णय लेने में विलंब।
    • निष्कर्ष: आकार से अधिक निर्णय की गुणवत्ता और प्रधानमंत्री का नेतृत्व महत्वपूर्ण है।
  3. प्रश्न (2018): संसदीय समितियों को ‘लघु विधानमंडल’ क्यों कहा जाता है? इनकी भूमिका का आकलन कीजिए।
    मॉडल उत्तर संरचना:
    • परिचय: संसदीय समितियों की उत्पत्ति एवं प्रकार (स्थायी एवं तदर्थ)।
    • मुख्य भाग: विभागीय संबंधित स्थायी समितियों (DRSCs) का कार्य: बजट जाँच, विधेयकों की समीक्षा, गोपनीय चर्चा।
    • निष्कर्ष: सदन के समय की कमी की भरपाई और विशेषज्ञ जाँच का महत्व।

अभ्यास प्रश्न (Practice Section)

10 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

  1. भारत में मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से किसके प्रति उत्तरदायी होती है?
    (क) राष्ट्रपति
    (ख) प्रधानमंत्री
    (ग) लोकसभा
    (घ) संसद के दोनों सदन
    उत्तर: (ग)
  2. निम्नलिखित में से कौन सा भारतीय संसदीय व्यवस्था की विशेषता नहीं है?
    (क) नाममात्र और वास्तविक कार्यपालिका
    (ख) कार्यपालिका और विधायिका के बीच निश्चित कार्यकाल
    (ग) सामूहिक उत्तरदायित्व
    (घ) निचले सदन का विघटन
    उत्तर: (ख)
  3. अनुच्छेद 75, भारत के राष्ट्रपति को क्या शक्ति प्रदान करता है?
    (क) प्रधानमंत्री की नियुक्ति
    (ख) लोकसभा का विघटन
    (ग) धन विधेयक पर हस्ताक्षर
    (घ) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति
    उत्तर: (क)
  4. ‘शक्तियों के पृथक्करण’ का सिद्धांत निम्न में से किस व्यवस्था का आधार है?
    (क) ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था
    (ख) भारतीय संसदीय व्यवस्था
    (ग) स्विस कॉलेजिएट व्यवस्था
    (घ) अमेरिकी राष्ट्रपति व्यवस्था
    उत्तर: (घ)
  5. संसदीय शासन प्रणाली में सरकार का वास्तविक प्रमुख कौन होता है?
    (क) राष्ट्रपति
    (ख) राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त राज्यपाल
    (ग) प्रधानमंत्री
    (घ) लोकसभा अध्यक्ष
    उत्तर: (ग)
  6. भारतीय संविधान की किस अनुसूची में दल-बदल विरोधी कानून का प्रावधान है?
    (क) आठवीं अनुसूची
    (ख) नौवीं अनुसूची
    (ग) दसवीं अनुसूची
    (घ) ग्यारहवीं अनुसूची
    उत्तर: (ग)
  7. निम्नलिखित में से कौन सा कथन राष्ट्रपति शासन प्रणाली के लिए सही है?
    (क) कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है।
    (ख) राष्ट्रपति विधायिका को भंग कर सकता है।
    (ग) मंत्री विधायिका के सदस्य नहीं होते।
    (घ) प्रधानमंत्री की प्रमुख भूमिका होती है।
    उत्तर: (ग)
  8. “संसद की संप्रभुता” का सिद्धांत किस देश से संबंधित है?
    (क) भारत
    (ख) अमेरिका
    (ग) ब्रिटेन
    (घ) फ्रांस
    उत्तर: (ग)
  9. मंत्रिमंडल की बैठकों में गोपनीयता का सिद्धांत किससे संबंधित है?
    (क) न्यायिक पुनरावलोकन
    (ख) सामूहिक उत्तरदायित्व
    (ग) प्रधानमंत्री का नेतृत्व
    (घ) नाममात्र कार्यपालिका
    उत्तर: (ख)
  10. यदि कोई गैर-सांसद मंत्री बनता है, तो उसे कितने समय के भीतर संसद का सदस्य बनना अनिवार्य है?
    (क) 1 माह
    (ख) 3 माह
    (ग) 6 माह
    (घ) 1 वर्ष
    उत्तर: (ग)

5 मुख्य परीक्षा (Mains) आधारित प्रश्न (उत्तर लेखन हेतु)

  1. प्रश्न: भारतीय संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री की बदलती भूमिका का विश्लेषण कीजिए। क्या गठबंधन की राजनीति ने प्रधानमंत्री के कार्यालय को कमजोर किया है?
  2. प्रश्न: भारत में संसदीय विशेषाधिकार और न्यायिक समीक्षा के बीच तनाव पर चर्चा कीजिए। हाल के उदाहरणों से स्पष्ट करें।
  3. प्रश्न: “राष्ट्रपति प्रणाली की तुलना में संसदीय व्यवस्था भारत की विविधता के लिए अधिक उपयुक्त है।” इस कथन का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
  4. प्रश्न: संसदीय समिति प्रणाली के कार्यों का वर्णन करते हुए, सदन की कार्यवाही में घटते समय के संदर्भ में इनकी प्रासंगिकता सिद्ध कीजिए।
  5. प्रश्न: भारत में विधायिका पर कार्यपालिका के प्रभुत्व के कारणों की विवेचना कीजिए। इस प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं?

संरचित उत्तर लेखन अभ्यास (Structured Answer Writing Practice)

प्रश्न 1: संसदीय व्यवस्था क्या है? इसकी चार प्रमुख विशेषताएं बताइए।

  • परिचय (Introduction): संसदीय व्यवस्था क्या है को परिभाषित करें। यह वह शासन प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका अपने अस्तित्व के लिए विधायिका (विशेषकर निम्न सदन) के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। अनुच्छेद 75(3) का उल्लेख करें।
  • मुख्य भाग (Body):
    1. दोहरी कार्यपालिका: राष्ट्रपति (नाममात्र) और प्रधानमंत्री (वास्तविक)।
    2. सामूहिक उत्तरदायित्व: मंत्रिमंडल एकजुट होकर सदन के प्रति जवाबदेह है।
    3. बहुमत प्राप्त दल का शासन: जिस दल/गठबंधन के पास सदन में बहुमत होता है, वही सरकार बनाता है।
    4. विघटन की शक्ति: प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति निचले सदन को समय से पूर्व भंग कर सकता है।
  • निष्कर्ष (Conclusion): भारत की विविधता और लोकतांत्रिक आवश्यकताओं के अनुरूप यह व्यवस्था सर्वाधिक लचीली और उत्तरदायी है।

प्रश्न 2: भारतीय और ब्रिटिश संसदीय मॉडल में दो प्रमुख अंतर स्पष्ट करें।

  • परिचय: भारत ने संसदीय शासन प्रणाली ब्रिटेन से ली, किंतु दोनों की संवैधानिक स्थिति में भिन्नता है।
  • मुख्य भाग:
    1. संप्रभुता: ब्रिटेन में संसद सर्वोच्च है (Parliamentary Sovereignty) और न्यायालय कानून को रद्द नहीं कर सकता। भारत में संविधान सर्वोच्च है और सर्वोच्च न्यायालय के पास न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति है (केशवानंद भारती वाद)।
    2. गणतंत्र बनाम राजतंत्र: भारत का राष्ट्राध्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपति होता है, जबकि ब्रिटेन का राष्ट्राध्यक्ष वंशानुगत सम्राट होता है।
  • निष्कर्ष: भारतीय मॉडल एक समन्वित दृष्टिकोण अपनाता है जिसमें संसदीय उत्तरदायित्व के साथ-साथ संवैधानिक सर्वोच्चता भी शामिल है।

प्रश्न 3: संसदीय व्यवस्था के अंतर्गत कार्यपालिका की निरंकुशता को नियंत्रित करने वाले उपकरणों का वर्णन करें।

  • परिचय: भारतीय संसदीय व्यवस्था में जब एक दल को प्रचंड बहुमत मिलता है तो विधायिका कमजोर पड़ जाती है। इस निरंकुशता पर नियंत्रण हेतु संवैधानिक और राजनीतिक उपाय हैं।
  • मुख्य भाग:
    1. संसदीय उपकरण: प्रश्नकाल, शून्यकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव और स्थगन प्रस्ताव।
    2. संसदीय समितियाँ: विभागीय स्थायी समितियाँ बंद कमरे में मंत्रालयों से सवाल पूछकर सरकार पर अंकुश रखती हैं।
    3. विपक्ष की भूमिका: एक मजबूत और सक्रिय विपक्ष सरकार को सदन में घेरने का कार्य करता है।
    4. न्यायिक हस्तक्षेप: यदि कार्यपालिका संविधान या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है तो न्यायपालिका हस्तक्षेप करती है।
  • निष्कर्ष: हालाँकि कार्यपालिका शक्तिशाली है, किंतु सुदृढ़ लोकतांत्रिक संस्थाएँ और जागरूक जनमत इसके स्वेच्छाचार पर प्रभावी रोक लगाते हैं।

प्रश्न 4: सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत को उदाहरण सहित समझाइए।

  • परिचय: यह सिद्धांत संसदीय व्यवस्था की रीढ़ है। इसका आशय है कि मंत्रिमंडल के निर्णय के लिए सभी मंत्री समान रूप से जिम्मेदार हैं, भले ही वे व्यक्तिगत रूप से सहमत न हों।
  • मुख्य भाग:
    1. संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 75(3) लोकसभा के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व स्थापित करता है।
    2. उदाहरण: यदि लोकसभा में रेल बजट या किसी विधेयक पर सरकार पराजित होती है, तो केवल संबंधित मंत्री ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री सहित संपूर्ण मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना होता है।
    3. कैबिनेट की एकता: सार्वजनिक रूप से सभी मंत्रियों को एक स्वर में बोलना होता है। असहमति होने पर मंत्री को इस्तीफा देना पड़ता है (जैसे पूर्व में कुछ मंत्रियों ने नीतिगत असहमति पर इस्तीफा दिया)।
  • निष्कर्ष: यह सिद्धांत सरकार को एकजुट रखता है और विधायिका के सामने कार्यपालिका की जवाबदेही को व्यावहारिक बनाता है।

प्रश्न 5: क्या भारत को राष्ट्रपति शासन प्रणाली अपना लेनी चाहिए? पक्ष और विपक्ष में तर्क दीजिए।

  • परिचय: समय-समय पर स्थिरता और विकास की गति बढ़ाने के लिए संसदीय और राष्ट्रपति प्रणाली में अंतर पर बहस होती रही है।
  • मुख्य भाग (पक्ष में तर्क):
    1. स्थिरता: निश्चित कार्यकाल के कारण गठबंधन की मजबूरियों से मुक्ति।
    2. दक्षता: विशेषज्ञों को सीधे मंत्री बनाया जा सकता है, राजनीतिक दबाव कम होता है।
    3. जवाबदेही में स्पष्टता: नीतियों की सफलता/विफलता का श्रेय/दोष सीधे राष्ट्रपति को जाता है।
  • मुख्य भाग (विपक्ष में तर्क):
    1. तानाशाही का खतरा: शक्तियों के पूर्ण पृथक्करण के कारण राष्ट्रपति निरंकुश हो सकता है।
    2. संघर्ष की संभावना: राष्ट्रपति और कांग्रेस (विधायिका) के बीच गतिरोध से शासन ठप हो सकता है।
    3. भारतीय विविधता के लिए अनुपयुक्त: यह व्यवस्था क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दे पाती।
  • निष्कर्ष: भारतीय संसदीय व्यवस्था ने विविधता में एकता को बनाए रखा है। राष्ट्रपति प्रणाली स्थिरता दे सकती है किंतु लचीलेपन और समावेशिता की कीमत पर, जो भारत के लिए वर्तमान में स्वीकार्य नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. प्रश्न: संसदीय व्यवस्था क्या है सरल परिभाषा में?
    उत्तर: सरल शब्दों में, संसदीय व्यवस्था क्या है का अर्थ है वह शासन पद्धति जिसमें प्रधानमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद संसद (विशेषकर लोकसभा) के प्रति अपने कार्यों के लिए जवाबदेह होते हैं और बहुमत खोने पर उन्हें इस्तीफा देना पड़ता है।
  2. प्रश्न: भारतीय संसदीय व्यवस्था की मुख्य विशेषताएं क्या हैं?
    उत्तर: इसकी मुख्य विशेषताएं हैं: नाममात्र (राष्ट्रपति) और वास्तविक (प्रधानमंत्री) कार्यपालिका, सामूहिक उत्तरदायित्व, बहुमत प्राप्त दल का शासन, राजनीतिक एकरूपता, तथा प्रधानमंत्री का नेतृत्व।
  3. प्रश्न: संसदीय प्रणाली के लक्षण राष्ट्रपति प्रणाली से कैसे भिन्न हैं?
    उत्तर: संसदीय प्रणाली के लक्षण में कार्यपालिका और विधायिका का सम्मिलन होता है, जबकि राष्ट्रपति प्रणाली में शक्तियों का कठोर पृथक्करण होता है। संसदीय व्यवस्था में सरकार विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है, जबकि राष्ट्रपति व्यवस्था में कार्यपालिका स्वतंत्र होती है।
  4. प्रश्न: संसदीय शासन प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
    उत्तर: संसदीय शासन प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ ‘उत्तरदायी शासन’ है। मंत्रियों को प्रतिदिन संसद में जनता के प्रतिनिधियों के सवालों का जवाब देना पड़ता है, जिससे मनमानी पर अंकुश रहता है।
  5. प्रश्न: क्या भारत में संसदीय व्यवस्था पूर्णतः ब्रिटिश मॉडल की नकल है?
    उत्तर: नहीं। भारतीय संसदीय व्यवस्था ब्रिटिश मॉडल से प्रेरित है, किंतु इसमें अंतर है। जैसे ब्रिटेन में संसद सर्वोच्च है, जबकि भारत में संविधान सर्वोच्च है। ब्रिटेन राजतंत्र है, भारत गणतंत्र है।
  6. प्रश्न: अविश्वास प्रस्ताव का क्या अर्थ है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
    उत्तर: अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में यह जांचने के लिए लाया जाता है कि सरकार के पास अभी भी सदन का बहुमत है या नहीं। यह संसदीय व्यवस्था का सबसे मजबूत हथियार है जिससे विपक्ष सरकार को गिरा सकता है और जवाबदेही तय कर सकता है।
  7. प्रश्न: सामूहिक उत्तरदायित्व से आप क्या समझते हैं?
    उत्तर: इसका अर्थ है कि मंत्रिपरिषद एक इकाई के रूप में लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। यदि कोई एक मंत्री गलती करता है या कोई नीति विफल होती है, तो पूरा मंत्रिमंडल उसकी जिम्मेदारी लेता है। इसे ‘साथ डूबो या साथ तैरो’ का सिद्धांत कहते हैं।
  8. प्रश्न: संसदीय और राष्ट्रपति प्रणाली में अंतर का सबसे स्पष्ट बिंदु क्या है?
    उत्तर: सबसे स्पष्ट अंतर यह है कि संसदीय और राष्ट्रपति प्रणाली में अंतर कार्यपालिका के कार्यकाल की निश्चितता में है। संसदीय में कार्यकाल निश्चित नहीं (कभी भी भंग हो सकता है), जबकि राष्ट्रपति में कार्यकाल निश्चित होता है।
  9. प्रश्न: क्या प्रधानमंत्री राष्ट्रपति की सलाह मानने से इनकार कर सकता है?
    उत्तर: संवैधानिक रूप से, राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य है (42वां संशोधन)। वास्तविक कार्यकारी शक्ति प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद के पास है। अतः प्रश्न ही विपरीत है; राष्ट्रपति ही सलाह मानने से इनकार नहीं कर सकते (कुछ विवेकाधीन शक्तियों को छोड़कर)।
  10. प्रश्न: किस अनुच्छेद के तहत मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है?
    उत्तर: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75(3) के तहत मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। यह संसदीय व्यवस्था की आधारशिला है।
2 thoughts on “संसदीय व्यवस्था क्या है UPSC 2026 – Important PYQs PDF (Prelims+Mains)”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *