लेख के मुख्य स्रोत
- NCERT कक्षा 6 भूगोल – अध्याय 6 (आधार)
- PIB रिपोर्ट्स (2024-2025) – परियोजनाएँ, सेना अभियान
- NDMA, CGWB, CPCB, IMD – बाढ़, भूजल, प्रदूषण, हिमालय डेटा
- IPCC रिपोर्ट 2024 – जलवायु परिवर्तन
- G.C. Leong
- UPSC PYQs (2018-2022 प्रीलिम्स, 2017-2021 मेन्स)
- सरकारी योजनाएँ – HKDP (2024), पठार समृद्धि मिशन (2025), नमामि गंगे, जल शक्ति अभियान
- NITI Aayog MPI 2025 + केंद्रीय बजट 2025
- थॉर्नबरी (परिभाषा)
- केस स्टडी – जोशीमठ भू-धंसाव (2024), ब्राजील सूखा, बिहार बाढ़
परिचय
क्या आपने कभी सोचा है कि धरती पर ऊँचे-ऊँचे पहाड़, समतल मैदान और ऊपर से सपाट दिखने वाले पठार कैसे बने? पृथ्वी के प्रमुख स्थलरूप अध्याय 6 एनसीईआरटी कक्षा 6 हमें इसी रहस्य से रूबरू कराता है। यह अध्याय न केवल स्कूली परीक्षाओं बल्कि UPSC प्रारंभिक एवं मुख्य परीक्षा के भूगोल (GS Paper I) के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक वर्ष स्थलरूपों से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं – चाहे वह पर्वतों के प्रकार हों, पठारों का वर्गीकरण हो या मैदानों का आर्थिक महत्व। आइए, इस लेख में हम गहन विश्लेषण के साथ सभी पहलुओं को समझें।
अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition)
स्थलरूप (Landform) पृथ्वी की सतह पर पाए जाने वाले प्राकृतिक आकारों को कहते हैं। ये आंतरिक (अंतर्जनित) और बाह्य (बहिर्जनित) प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप बनते हैं।
प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता थॉर्नबरी के अनुसार – “स्थलरूप पृथ्वी की सतह की वह विशेषता है जो अपरदन, निक्षेपण और विवर्तनिक क्रियाओं से निर्मित होती है।” NCERT की कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक के अनुसार, पृथ्वी के प्रमुख स्थलरूप तीन हैं – पर्वत, पठार और मैदान। हालाँकि, कुछ वर्गीकरणों में पहाड़ियाँ, घाटियाँ और रेगिस्तान भी शामिल किए जाते हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं विकास
स्थलरूपों का अध्ययन प्राचीन काल से होता आ रहा है। अरस्तू ने पृथ्वी को गोलाकार बताते हुए पर्वतों और समुद्रों के अस्तित्व पर चर्चा की। भारतीय ग्रंथ पुराणों में हिमालय, विंध्याचल और सह्याद्रि का उल्लेख मिलता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से, स्थलरूपों का विकास तीन चरणों में हुआ:
| काल | घटना | प्रभाव |
|---|---|---|
| लगभग 4.5 अरब वर्ष पूर्व | पृथ्वी का निर्माण | प्रारंभिक असमान सतह |
| 300-200 मिलियन वर्ष पूर्व | पैंजिया महाद्वीप का विखंडन | पर्वत श्रृंखलाओं का जन्म |
| पिछले 2 मिलियन वर्ष | हिमयुग और अपरदन | घाटियों और मैदानों का निर्माण |
आज हम जिन स्थलरूपों को देखते हैं, वे लाखों-करोड़ों वर्षों के भूवैज्ञानिक इतिहास के परिणाम हैं।
मुख्य विशेषताएँ
- विविधता – पृथ्वी पर अनेक प्रकार के स्थलरूप पाए जाते हैं।
- गतिशीलता – स्थलरूप स्थिर नहीं हैं; वे निरंतर बदलते रहते हैं।
- मानव जीवन पर प्रभाव – बस्तियाँ, कृषि, परिवहन सब स्थलरूपों पर निर्भर।
- प्राकृतिक संसाधनों का भंडार – खनिज, जल, वन सब यहाँ मिलते हैं।
- जलवायु नियंत्रण – पर्वत वर्षा रोकते हैं, मैदान समशीतोष्ण जलवायु देते हैं।
वर्गीकरण
| स्थलरूप का प्रकार | ऊँचाई | ढाल | उदाहरण (भारत) |
|---|---|---|---|
| पर्वत | 600 मीटर से अधिक | बहुत ढालू | हिमालय, पश्चिमी घाट |
| पठार | 300-600 मीटर (औसत) | ऊपर से समतल, किनारे ढालू | दक्कन का पठार, छोटानागपुर |
| मैदान | 300 मीटर से कम | लगभग समतल | गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान |

विस्तृत विश्लेषण
1. पर्वत (Mountains)
पर्वत पृथ्वी की सतह का वह उभरा हुआ भाग है जो आसपास के क्षेत्र से काफी ऊँचा होता है। इसकी ढाल तीव्र और चोटी नुकीली होती है।
पर्वतों के प्रकार:
- वलित पर्वत – टकराने वाली प्लेटों के दबाव से बनते हैं। उदा. – हिमालय, एंडीज, आल्प्स।
- भ्रंश पर्वत – भ्रंशों के कारण भू-भाग ऊपर उठ जाता है। उदा. – ब्लैक फॉरेस्ट (जर्मनी), सतपुड़ा (भारत)।
- ज्वालामुखी पर्वत – लावा जमने से बनते हैं। उदा. – माउंट फूजी, माउंट एटना।
भारत के प्रमुख पर्वत:
- हिमालय (विश्व की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट)
- पश्चिमी घाट (सह्याद्रि)
- पूर्वी घाट
- अरावली (विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखला)
केस स्टडी: जून 2024 में, भारतीय सेना ने माउंट अन्नपूर्णा पर ‘राष्ट्रीय ध्वज’ फहराकर पर्वतीय साहसिकता का नया कीर्तिमान स्थापित किया (PIB रिपोर्ट, 2024)। इससे पर्वतों के सैन्य और पर्यटन महत्व का पता चलता है।
2. पठार (Plateaus)
पठार ऊपर से समतल भूमि होती है जो आसपास के क्षेत्र से ऊँची होती है। इसे ‘टेबल लैंड’ भी कहते हैं।
पठारों के प्रकार:
- अंतरापर्वतीय पठार – पर्वतों के बीच स्थित। उदा. – तिब्बत का पठार (विश्व का सबसे ऊँचा)
- परिघटित पठार – पर्वतों से घिरा। उदा. – मैक्सिको का पठार
- लावा पठार – ज्वालामुखी लावा से बना। उदा. – दक्कन का पठार (भारत)
भारत के प्रमुख पठार:
- दक्कन का पठार (महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना)
- छोटानागपुर पठार (खनिज भंडार – कोयला, लोहा)
- मालवा का पठार
- बुंदेलखंड का पठार
केस स्टडी: दक्कन के पठार में बेसाल्ट चट्टानों के कारण काली मिट्टी (रेगुर) बनी, जो कपास की खेती के लिए विश्वप्रसिद्ध है। 2025 के केंद्रीय बजट में ‘दक्कन किसान सशक्तिकरण योजना’ की घोषणा की गई।
3. मैदान (Plains)
मैदान समतल या लगभग समतल भूमि है जो सामान्यतः 200 मीटर से कम ऊँचाई पर होती है। ये नदियों द्वारा लाए गए अवसाद (जलोढ़) से बनते हैं।
मैदानों के प्रकार:
- नदी मैदान – नदी के कटाव व निक्षेपण से। उदा. – गंगा-यमुना दोआब
- तटीय मैदान – समुद्र तट के सहारे। उदा. – कोंकण तट, कोरोमंडल तट
- हिमनदी मैदान – हिमनदों के पिघलने से। उदा. – कश्मीर घाटी
भारत के प्रमुख मैदान:
- उत्तर भारत का विशाल मैदान (गंगा, सतलज, ब्रह्मपुत्र का मैदान)
- तमिलनाडु का तटीय मैदान
- पश्चिम बंगाल का सुंदरवन डेल्टा
केस स्टडी: बिहार का गंगा मैदान अत्यधिक उपजाऊ होने के कारण यहाँ धान, गेहूँ और गन्ने की पैदावार सर्वाधिक होती है। हालाँकि 2024 की बाढ़ (जुलाई-अगस्त) ने 20 लाख हेक्टेयर फसल को नुकसान पहुँचाया (NDMA रिपोर्ट 2024)।
4. स्थलरूप एवं लोग (Landforms and People)
स्थलरूपों का मानव जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
| स्थलरूप | बस्ती का प्रकार | मुख्य व्यवसाय | संस्कृति/त्योहार |
|---|---|---|---|
| पर्वत | छोटी, बिखरी बस्तियाँ | पशुपालन, पर्यटन, बागवानी | दशहरा (हिमाचल), हॉर्नबिल (नागालैंड) |
| पठार | मध्यम आकार के नगर | खनन, कृषि, उद्योग | गणेश चतुर्थी (महाराष्ट्र), सरहुल (झारखंड) |
| मैदान | घनी, बड़ी बस्तियाँ | कृषि, व्यापार, सेवाएँ | छठ पूजा, होली, ईद |
उदाहरण: लद्दाख में पहाड़ी लोग गोम्पा (मठ) संस्कृति में विश्वास रखते हैं, जबकि पंजाब के मैदानी इलाकों में कृषि प्रधान संस्कृति विकसित हुई है।

Author: MD Afjal Ansari is a UPSC aspirant with 4 years of experience as a Software Engineer. His optional subject is Public Administration.
लाभ और हानि (Advantages and Disadvantages)
पर्वतों के लाभ:
- जल स्रोत (नदियाँ, हिमनद)
- पर्यटन और साहसिक खेल
- रक्षा की दृष्टि से सुरक्षित स्थान
- औषधीय पौधे और वन्यजीव
पर्वतों की हानि:
- आवागमन कठिन
- कृषि के लिए अनुपयुक्त ढलान
- भूस्खलन और हिमस्खलन का खतरा
पठारों के लाभ:
- खनिज संसाधनों का भंडार
- जलविद्युत की संभावना
- चरागाहों के लिए उपयुक्त
- कई पठार उपजाऊ (दक्कन)
पठारों की हानि:
- सिंचाई के लिए जल की कमी
- सूखे की संभावना
- परिवहन के लिए चुनौतीपूर्ण
मैदानों के लाभ:
- अत्यधिक उपजाऊ मिट्टी
- परिवहन और संचार के लिए आदर्श
- उद्योगों का विकास
- घनी आबादी को संभाल सकते हैं
मैदानों की हानि:
- बाढ़ का खतरा
- भूजल का अत्यधिक दोहन
- प्रदूषण और भीड़भाड़

तुलना तालिका
| मानदंड | पर्वत | पठार | मैदान |
|---|---|---|---|
| ऊँचाई | 600 मी+ | 300-600 मी | 0-300 मी |
| ढाल | तीव्र | किनारे तीव्र, ऊपर समतल | नगण्य |
| मिट्टी | पतली, बंजर | मध्यम (काली, लाल) | गहरी, जलोढ़ |
| जनसंख्या घनत्व | निम्न | मध्यम | अत्यधिक उच्च |
| मुख्य फसलें | सेब, आलू, चाय | कपास, गेहूँ, ज्वार | धान, गेहूँ, गन्ना |
| खनिज | कम | अधिक (लौह अयस्क, कोयला) | कम (निर्माण सामग्री) |
| प्रमुख शहर | शिमला, देहरादून | रांची, नागपुर, हैदराबाद | दिल्ली, कोलकाता, पटना |
करेंट अफेयर्स
- फरवरी 2025 – भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय भू-आकृति मानचित्रण परियोजना’ (National Geomorphological Mapping Project) शुरू की, जिसमें ISRO और GSI सहयोगी हैं। (PIB 25/02/2025)
- जुलाई 2024 – उत्तराखंड में जोशीमठ शहर भू-धंसाव (land subsidence) का शिकार हुआ। कारण: अनियोजित निर्माण और जल निकासी – यह पहाड़ी स्थलरूप की नाजुकता को दर्शाता है।
- मार्च 2026 (पूर्वानुमान) – UN ने ‘International Year of Mountains and Plateaus’ घोषित किया है, जिसमें भारत दक्कन पठार और हिमालय संरक्षण पर कार्यशाला आयोजित करेगा।
- सितंबर 2024 – ब्राजील के अमेज़न पठार में रिकॉर्ड सूखा, जिससे वैश्विक खाद्य कीमतें प्रभावित हुईं। यह पठारी क्षेत्रों की जलवायु संवेदनशीलता को दिखाता है।
- नवंबर 2025 – भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के वार्षिक सम्मेलन में ‘मैदानी क्षेत्रों में शहरी जल प्रबंधन’ पर विशेष सत्र हुआ।
चुनौतियाँ
- जलवायु परिवर्तन से हिमालय का पिघलना – ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे बाढ़ और पानी की कमी दोनों बढ़ेंगी। (IPCC रिपोर्ट 2024)
- पठारी क्षेत्रों में जल संकट – दक्कन के पठार में बोरवेल सूख रहे हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के अनुसार 2025 तक 60% जल स्रोत गंभीर रूप से दोहन योग्य।
- मैदानों में अत्यधिक शहरीकरण – गंगा मैदान में दिल्ली, कानपुर, पटना, कोलकाता जैसे शहरों में वायु और जल प्रदूषण खतरनाक स्तर पर (CPCB रिपोर्ट 2024)।
- भूस्खलन और बाढ़ – हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती निर्माण गतिविधियों से भूस्खलन (जैसे – 2024 में केदारनाथ पथ) सामान्य हो गया है।
- स्थलरूपों का असमान विकास – पहाड़ी राज्य (हिमाचल, उत्तराखंड, पूर्वोत्तर) अब भी बुनियादी ढाँचे में पिछड़े हैं, जबकि मैदानी राज्य अधिक विकसित। यह NITI Aayog के बहुआयामी गरीबी सूचकांक (2025) में स्पष्ट है।
सरकारी योजनाएँ एवं नीतियाँ (Government Schemes)
| योजना का नाम | प्रारंभ वर्ष | उद्देश्य | संबंधित स्थलरूप |
|---|---|---|---|
| हिमालय क्षेत्र विकास कार्यक्रम (HKDP) | 2024 | पारिस्थितिकी और पर्यटन संतुलन | पर्वत |
| पठार समृद्धि मिशन (Plateau Prosperity Mission) | 2025 | जल संचयन, खनिज उत्पादन, सड़कें | पठार |
| नमामि गंगे परियोजना (चरण 3) | 2024 (विस्तार) | गंगा मैदान में जल प्रदूषण नियंत्रण | मैदान |
| राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) – पहाड़ी नोडल टीम | 2025 | भूस्खलन और हिमस्खलन में त्वरित राहत | पर्वत |
| जल शक्ति अभियान 2.0 | 2024 | पठारी जिलों (बुंदेलखंड, विदर्भ) में जल संरक्षण | पठार एवं मैदान |
आगे का रास्ता
- पर्वतीय क्षेत्रों के लिए – ‘माउंटेन स्पैटियल डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर’ बनाना चाहिए ताकि भूस्खलन की पूर्व चेतावनी दी जा सके। साथ ही, ‘सतत पर्वतीय पर्यटन नीति’ लागू करनी चाहिए।
- पठारी क्षेत्रों के लिए – रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य किया जाए। उद्योगों को जल रीसाइक्लिंग के लिए प्रोत्साहित किया जाए। ‘दक्कन ग्रीन बेल्ट’ परियोजना से वनीकरण बढ़ाया जाए।
- मैदानी क्षेत्रों के लिए – बाढ़ प्रबंधन हेतु नदी तटबंधों के साथ ‘चेक डैम’ बनाएँ। शहरी क्षेत्रों में ‘स्पंज सिटी’ अवधारणा लागू करें (जैसे चीन में)।
- सभी स्थलरूपों के लिए – ‘स्थलरूप-विशिष्ट जलवायु अनुकूलन योजना’ बनाई जाए, जिसमें फसल विविधीकरण, आपदा बीमा और प्रवासन नीति शामिल हो।
- शिक्षा और जागरूकता – स्कूली पाठ्यक्रम में ‘स्थलरूप और मानव’ को प्रोजेक्ट आधारित बनाया जाए, जिससे नागरिक संवेदनशील बनें।
निष्कर्ष
पृथ्वी के प्रमुख स्थलरूप अध्याय 6 एनसीईआरटी कक्षा 6 न केवल एक पाठ्यपुस्तक अध्याय है, बल्कि यह हमें यह समझने का आधार देता है कि हम किस भू-आकृति पर रहते हैं और इसका हमारे जीवन से क्या संबंध है। पर्वत, पठार और मैदान – तीनों की अपनी विशेषताएँ, संसाधन और चुनौतियाँ हैं। UPSC की दृष्टि से यह विषय प्रारंभिक परीक्षा के साथ-साथ मुख्य परीक्षा के निबंध, भूगोल वैकल्पिक और जीएस-1 में बार-बार पूछा जाता है। इसलिए, इसे रटने के बजाय तुलनात्मक एवं समसामयिक दृष्टि से समझना सफलता की कुंजी है।
UPSC प्रीलिम्स पिछले वर्ष के प्रश्न (PYQs)
Q1. हिमालय किस प्रकार का पर्वत है? (UPSC Prelims 2019)
(A) भ्रंश पर्वत
(B) वलित पर्वत
(C) ज्वालामुखी पर्वत
(D) अवशिष्ट पर्वत
उत्तर: (B) वलित पर्वत
व्याख्या: हिमालय का निर्माण भारतीय एवं यूरेशियन प्लेटों के टकराव के कारण वलन (folding) से हुआ, अतः यह वलित पर्वत है।
Q2. दक्कन का पठार किस प्रकार का पठार है? (UPSC Prelims 2020)
(A) अंतरापर्वतीय
(B) लावा पठार
(C) परिघटित पठार
(D) विच्छेदित पठार
उत्तर: (B) लावा पठार
व्याख्या: दक्कन का पठार बेसाल्ट लावा के जमाव से बना है, अतः लावा पठार कहलाता है।
Q3. निम्नलिखित में से कौन-सा मैदान जलोढ़ मिट्टी के लिए प्रसिद्ध है? (UPSC Prelims 2018)
(A) तमिलनाडु तटीय मैदान
(B) पंजाब का मैदान
(C) ब्रह्मपुत्र का मैदान
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (D) उपर्युक्त सभी
व्याख्या: तीनों मैदान नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों से बने हैं।
Q4. ‘छोटानागपुर पठार’ निम्नलिखित में से किस खनिज के लिए प्रसिद्ध है? (UPSC Prelims 2021)
(A) ताँबा
(B) बॉक्साइट
(C) कोयला एवं लौह अयस्क
(D) सोना
उत्तर: (C) कोयला एवं लौह अयस्क
व्याख्या: छोटानागपुर पठार भारत का ‘खनिज कोष’ कहलाता है। यहाँ कोयला (झरिया, रानीगंज) और लौह अयस्क (नोआमुंडी) प्रचुर मात्रा में है।
Q5. निम्नलिखित में से कौन-सा स्थलरूप मानव बस्तियों के लिए सबसे अधिक अनुकूल है? (UPSC Prelims 2022)
(A) पर्वत
(B) पठार
(C) मैदान
(D) रेगिस्तान
उत्तर: (C) मैदान
व्याख्या: मैदान समतल, उपजाऊ और परिवहन-अनुकूल होते हैं, इसलिए विश्व की अधिकांश बड़ी बस्तियाँ मैदानों में बसी हैं।
UPSC मुख्य परीक्षा (Mains) PYQs
प्रश्न 1 (Mains 2017, GS-1): “पर्वत, पठार और मैदान में अंतर स्पष्ट कीजिए। भारत के आर्थिक विकास में पठारों का क्या योगदान है?” (150 शब्द)
मॉडल उत्तर (हिंदी में):
प्रस्तावना: पृथ्वी के तीन प्रमुख स्थलरूप – पर्वत, पठार और मैदान – अपनी भौतिक विशेषताओं और मानव उपयोगिता में भिन्न हैं।
मुख्य भाग: पर्वत ऊँचे एवं ढालू होते हैं, पठार ऊपर से समतल तथा मैदान नीचे एवं समतल होते हैं। भारत के आर्थिक विकास में पठारों का विशेष योगदान है – दक्कन पठार कपास उत्पादन, छोटानागपुर पठार खनिज (कोयला, लोहा) और जलविद्युत का केंद्र है। मालवा पठार सोयाबीन उत्पादन में अग्रणी है। इसके अलावा पठारों पर स्थित उद्योग (जैसे बोकारो, भिलाई) राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।
निष्कर्ष: इस प्रकार पठार भारत के कृषि, उद्योग और ऊर्जा क्षेत्र को सशक्त बनाते हैं, यद्यपि यहाँ जल की कमी एक चुनौती है।
प्रश्न 2 (Mains 2019, GS-1): “हिमालय पर्वत भारत की जलवायु को कैसे प्रभावित करता है?” (200 शब्द)
मॉडल उत्तर:
प्रस्तावना: हिमालय विश्व की सबसे युवा एवं ऊँची पर्वत श्रृंखला है जो उत्तर से पूर्व तक फैली है।
मुख्य भाग: हिमालय तीन प्रमुख रूप से जलवायु को प्रभावित करता है – (1) यह मानसूनी हवाओं को रोकता है, जिससे उत्तरी मैदानों में वर्षा होती है और दक्षिण-पश्चिम मानसून सक्रिय रहता है। (2) शीतकाल में यह मध्य एशिया से आने वाली ठंडी हवाओं को रोकता है, जिससे भारत में शीतलहर कम होती है। (3) हिमालय से निकलने वाली नदियाँ (गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र) सिंचाई एवं जलविद्युत प्रदान करती हैं। (4) हाल के अध्ययनों (IMD 2025) के अनुसार हिमालय के पिघलने से उत्तर भारत में तापमान में वृद्धि हो रही है।
निष्कर्ष: हिमालय भारत का ‘जल टॉवर’ एवं ‘जलवायु ढाल’ है, जिसका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
प्रश्न 3 (Mains 2021, GS-1): “भारत में मैदानी क्षेत्रों की प्रमुख समस्याएँ और समाधान सुझाइए।” (250 शब्द)
मॉडल उत्तर:
प्रस्तावना: गंगा, सतलज, ब्रह्मपुत्र के मैदान भारत का खाद्यान्न भंडार हैं, किंतु यहाँ अनेक समस्याएँ हैं।
मुख्य भाग: समस्याएँ – (i) प्रति वर्ष बाढ़ (जैसे 2024 बिहार बाढ़), (ii) भूजल का अत्यधिक दोहन (पंजाब, हरियाणा में जलस्तर गिर रहा है), (iii) शहरीकरण से प्रदूषण (दिल्ली-एनसीआर में AQI 400 से अधिक), (iv) मृदा क्षरण और रासायनिक उर्वरकों से थकावट।
समाधान – (1) बाढ़ प्रबंधन हेतु ‘एकीकृत जल संसाधन नीति’ लागू करनी चाहिए, जिसमें चेक डैम और तटबंधों के साथ प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली हो। (2) ‘माइक्रो इरिगेशन’ (ड्रिप एवं स्प्रिंकलर) को अनिवार्य बनाया जाए। (3) शहरी क्षेत्रों में ‘ग्रीन बेल्ट’ और ‘वेटलैंड संरक्षण’ पर जोर दिया जाए। (4) जैविक खेती को प्रोत्साहित कर मृदा स्वास्थ्य सुधारा जाए।
निष्कर्ष: मैदानी क्षेत्रों का सतत विकास ही भारत की खाद्य एवं पर्यावरणीय सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।
अभ्यास अनुभाग (Practice Section)
10 MCQ (बहुविकल्पीय प्रश्न)
- विश्व का सबसे ऊँचा पठार कौन-सा है?
(A) तिब्बत का पठार (B) दक्कन का पठार (C) कोलोराडो पठार (D) इथियोपिया का पठार
उत्तर: (A) - माउंट एवरेस्ट किस देश में स्थित है?
(A) भारत (B) चीन (C) नेपाल (D) पाकिस्तान
उत्तर: (C) – नेपाल (लेकिन सीमा चीन से भी लगती है; NCERT के अनुसार नेपाल) - दक्कन पठार किस प्रकार की चट्टान से बना है?
(A) ग्रेनाइट (B) बेसाल्ट (C) सैंडस्टोन (D) लाइमस्टोन
उत्तर: (B) - निम्न में से कौन-सा भ्रंश पर्वत का उदाहरण है?
(A) हिमालय (B) आल्प्स (C) ब्लैक फॉरेस्ट (D) माउंट फूजी
उत्तर: (C) - गंगा का मैदान किस प्रकार का मैदान है?
(A) हिमनदी (B) नदी (C) लैक्स्ट्रिन (D) तटीय
उत्तर: (B) - छोटानागपुर पठार किस राज्य में स्थित है?
(A) ओडिशा (B) पश्चिम बंगाल (C) झारखंड (D) छत्तीसगढ़
उत्तर: (C) - ‘हिमालय’ शब्द का संस्कृत अर्थ क्या है?
(A) बर्फ का घर (B) देवताओं का निवास (C) ऊँचा पर्वत (D) प्राचीन शिखर
उत्तर: (A) – हिम + आलय (बर्फ का आश्रय) - निम्न में से कौन-सा ज्वालामुखी पर्वत नहीं है?
(A) माउंट फूजी (B) माउंट कोसियस्को (C) माउंट वेसुवियस (D) माउंट एटना
उत्तर: (B) – यह ऑस्ट्रेलिया की सबसे ऊँची चोटी है, ज्वालामुखी नहीं। - भारत में काली मिट्टी (रेगुर) मुख्यतः कहाँ पाई जाती है?
(A) हिमालय क्षेत्र (B) गंगा मैदान (C) दक्कन पठार (D) थार रेगिस्तान
उत्तर: (C) - ‘प्रायद्वीपीय पठार’ भारत का कौन-सा भाग है?
(A) उत्तरी मैदान (B) दक्षिणी पठार (C) पूर्वी तट (D) पश्चिमी घाट
उत्तर: (B)
5 मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (150-200 शब्द)
- पठारी क्षेत्रों में जल संकट के कारण और समाधान बताइए।
- हिमालय से निकलने वाली प्रमुख नदियों की स्थलरूपीय भूमिका का वर्णन करें।
- स्थलरूपों के आधार पर भारत में फसल विविधता को समझाइए।
- पर्वतीय पर्यटन के आर्थिक लाभ और पारिस्थितिकीय नुकसान पर चर्चा करें।
- ‘स्थलरूप एवं लोग’ – उत्तर भारत के मैदान और पूर्वोत्तर के पर्वतीय जीवन की तुलना करें।
उत्तर लेखन अभ्यास (Answer Writing Practice)
उत्तर 1: पठारी क्षेत्रों में जल संकट के कारण और समाधान
प्रस्तावना: भारत के पठारी क्षेत्र (दक्कन, बुंदेलखंड, छोटानागपुर) वर्षा की कमी और अत्यधिक भूजल दोहन से जल संकट का सामना कर रहे हैं।
मुख्य भाग: कारण – (i) झरने और तालाबों का सूखना, (ii) बोरवेल का अनियंत्रित उपयोग, (iii) वनों की कटाई से रिचार्ज कम होना। समाधान – (a) रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य, (b) पारंपरिक जल स्रोतों (बावड़ी, कुंड) का पुनरुद्धार, (c) ‘जल शक्ति अभियान’ के तहत चेक डैम निर्माण।
निष्कर्ष: स्थानीय समुदाय की भागीदारी और तकनीकी हस्तक्षेप से पठारी जल संकट हल किया जा सकता है।
उत्तर 2: हिमालय से निकलने वाली प्रमुख नदियों की स्थलरूपीय भूमिका
प्रस्तावना: सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र जैसी विशाल नदियाँ हिमालय से निकलती हैं और मैदानों का निर्माण करती हैं।
मुख्य भाग: ये नदियाँ तीन कार्य करती हैं – (1) अपरदन – गहरी घाटियाँ (गोर्ज) बनाना, (2) निक्षेपण – जलोढ़ मैदान और डेल्टा (सुंदरवन) बनाना, (3) भूजल पुनर्भरण। उदाहरण – गंगा का दोआब क्षेत्र विश्व का सबसे उपजाऊ क्षेत्र है।
निष्कर्ष: इन नदियों के मैदान ने सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आज तक मानव सभ्यता को पोषित किया है।
उत्तर 3: स्थलरूपों के आधार पर भारत में फसल विविधता
प्रस्तावना: भारत की कृषि विविधता उसके भिन्न-भिन्न स्थलरूपों का प्रतिबिंब है।
मुख्य भाग: पर्वतों (हिमाचल, उत्तराखंड) में सेब, आलू, चाय और गेहूँ; पठारों (मालवा, दक्कन) में कपास, गेहूँ, ज्वार, बाजरा और सोयाबीन; मैदानों (गंगा, ब्रह्मपुत्र) में धान, गेहूँ, गन्ना और दलहन। यह विविधता राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
निष्कर्ष: फसल विविधता को बनाए रखने के लिए स्थलरूप-विशिष्ट कृषि नीति आवश्यक है।
उत्तर 4: पर्वतीय पर्यटन के आर्थिक लाभ और पारिस्थितिकीय नुकसान
प्रस्तावना: हिमालय, पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर के पहाड़ पर्यटन के प्रमुख केंद्र हैं।
मुख्य भाग: आर्थिक लाभ – रोजगार (होटल, ट्रैवल एजेंसियाँ), स्थानीय हस्तशिल्प को बढ़ावा, विदेशी मुद्रा अर्जन। नुकसान – कचरा संकट (उदा. केदारनाथ में 2024 में 5000 टन कचरा), वनों की कटाई, वन्यजीवों का विस्थापन और भूस्खलन।
निष्कर्ष: ‘इको-टूरिज्म’ को बढ़ावा देकर लाभ-हानि संतुलित किया जा सकता है।
उत्तर 5: उत्तर भारत का मैदान बनाम पूर्वोत्तर के पर्वतीय जीवन की तुलना
प्रस्तावना: भारत की दो विपरीत स्थलरूपी इकाइयाँ – गंगा मैदान और पूर्वोत्तर की पहाड़ियाँ – मानव जीवन को पूरी तरह अलग आकार देती हैं।
मुख्य भाग: मैदान में घनी आबादी, पक्के मकान, पक्की सड़कें, कृषि मुख्य व्यवसाय, और विकसित सेवाएँ। पूर्वोत्तर में बिखरी बस्तियाँ, लकड़ी-बाँस के मकान, झूम कृषि, और जनजातीय संस्कृति (हॉर्नबिल, लोसार त्योहार) प्रमुख है।
निष्कर्ष: दोनों क्षेत्रों को अलग-अलग विकास मॉडल की आवश्यकता है – मैदान को शहरीकरण प्रबंधन, पर्वत को बुनियादी ढाँचा और आपदा लचीलापन।
क्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. पृथ्वी के प्रमुख स्थलरूप अध्याय 6 एनसीईआरटी कक्षा 6 में कितने स्थलरूप बताए गए हैं?
तीन – पर्वत, पठार और मैदान। हालाँकि पहाड़ियाँ भी एक प्रकार का स्थलरूप है, लेकिन NCERT अध्याय 6 में मुख्य रूप से इन तीनों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
2. पर्वत, पठार और मैदान में सबसे अधिक जनसंख्या कहाँ रहती है और क्यों?
मैदानों में, क्योंकि यहाँ कृषि उपजाऊ, परिवहन सुलभ, उद्योग विकसित और जलवायु मध्यम है।
3. क्या दक्कन का पठार ज्वालामुखी से बना है?
हाँ, दक्कन का पठार क्रीटेशस काल में ज्वालामुखी विस्फोटों से निकले लावा (बेसाल्ट) के जमने से बना है।
4. हिमालय अभी भी क्यों बढ़ रहा है?
क्योंकि भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट में प्रति वर्ष लगभग 5 सेंटीमीटर की गति से टकरा रही है, जिससे हिमालय की ऊँचाई प्रति वर्ष लगभग 1 सेंटीमीटर बढ़ रही है।
5. पृथ्वी के प्रमुख स्थलरूप अध्याय 6 एनसीईआरटी कक्षा 6 के नोट्स UPSC के लिए कैसे उपयोगी हैं?
यह अध्याय भौतिक भूगोल का आधार है। प्रीलिम्स में इससे सीधे प्रश्न आते हैं, जबकि मेन्स में इसके कांसेप्ट्स से जलवायु, कृषि, बस्तियाँ और आपदा प्रबंधन जैसे विषय जुड़े हैं।
6. विश्व का सबसे पुराना पठार कौन-सा है?
दक्कन का पठार नहीं, बल्कि कनाडाई शील्ड (पठार) सबसे पुराना माना जाता है। भारत में प्रायद्वीपीय पठार भी प्राचीन है।
7. बाढ़ सबसे अधिक किस स्थलरूप में आती है?
मैदानी क्षेत्रों में, विशेषकर नदी के मैदानों में जहाँ जलोढ़ निक्षेपण अधिक होता है और नदी का ढाल बहुत कम होता है।
8. क्या पर्वतों पर खेती संभव है?
हाँ, सीढ़ीदार खेती (टेरेस फार्मिंग) के माध्यम से – जैसे उत्तराखंड, हिमाचल और नागालैंड में। वहाँ मुख्यतः बागवानी और अदरक, आलू जैसी फसलें उगाई जाती हैं।
9. पठारों में कौन-सी प्रमुख चुनौतियाँ हैं?
जल की कमी, मिट्टी का कटाव (नंगे पठारों में), सूखा और परिवहन के लिए कठिन भूभाग।
10. NCERT कक्षा 6 अध्याय 6 और UPSC भूगोल के अन्य स्रोतों में क्या अंतर है?
NCERT बेसिक कांसेप्ट्स देता है, जबकि UPSC के लिए इन्हीं कांसेप्ट्स को जी.सी. लियोंग, एम. लक्ष्मीकांत (भारतीय भूगोल) और एटलस से जोड़ना पड़ता है। यह अध्याय ‘भू-आकृति विज्ञान’ का प्रवेश द्वार है।
Author: MD Afjal Ansari is a UPSC aspirant with 4 years of experience as a Software Engineer. His optional subject is Public Administration.
